भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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१३८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

भामती

न हि भवति कुण्डं बदरमिति। नाप्येकासनस्थयोश्चैत्रमैत्रयोश्चैत्रो मैत्र इति। सोऽयमबाधितोऽसन्दिग्धः सर्वजनीनः सामानाधिकरण्यप्रत्यय एव कार्यकारणयोर्भेदाभेदौ व्यवस्थापयति। तथा च कार्याणां कारणात्मकत्वात् कारणस्य च सद्रूपस्य सर्वत्रानुगमात् सद्रूपेणाभेदः कार्यस्य जगतो भेदः कार्यरूपेण गोघटादिनेति। यथाहुः—

कार्यरूपेण नानात्वमभेदः कारणात्मना।
हेमात्मना यथाऽभेदः कुण्डलाद्यात्मना भिदा॥ इति।

अत्रोच्यते—कः पुनरयं भेदो नाम, यः सहाभेदेनेकत्र भवेत्। परस्पराभाव इति चेत्, किमयं कार्यकारणयोः कटकहाटकयोरस्ति न वा। न चेदेकत्वमेवास्ति न च भेदः। अस्ति चेद् भेद एव नाभेदः। न च भावाभावयोर्विरोधः, सहावस्थानासम्भवात्। सम्भवे वा कटकवर्धमानकयोरपि तत्त्वेनाभेदप्रसङ्गः, भेदस्याभेदाविरोधात्। अपि च कटकस्य हाटकादभेदे यथा हाटकात्मना कटकमुकुटकुण्डलादयो न भिद्यन्ते


भामती-व्याख्या

का एक ही अर्थ में वाच्यत्वेन प्रवृत्त होना सामानाधिकरण्य कहलाता है, वह भेदाभेद-पक्ष में ही बनता है—ऐसा नहीं, अपितु आधाराधेयभाव और एकाश्रयवृत्तिता को लेकर भी देखा जाता है, जैसे 'मृद् घटः'—यहाँ पर मृत्तिका आधार और घट आधेय है, एवं 'एकं रूपम्'—यहाँ 'एकत्व' संख्या और 'रूप'—दोनों पदार्थ एक ही घटादि आश्रय में रहते हैं, अतः उनका भी सामानाधिकरण्य-व्यवहार देखा जाता है। तथापि वह काचित्क है, सार्वत्रिक नहीं, अन्यथा कुण्डाद्यात्मक आधार और बदराद्यात्मक आधेय का भी 'कुण्डं बदरम्'—ऐसा व्यवहार होना चाहिए। इसी प्रकार एक ही आसन पर बैठे हुए चैत्र और मैत्र का भी 'चैत्रो-मैत्रः'—इस प्रकार सामानाधिकरण्य-प्रत्यय होना चाहिए। परिशेषतः सभी सुवर्णादि कारणपदार्थों और कटकादि कार्य पदार्थों का सार्वत्रिक और सर्वजनीन अबाधित सामानाधिकरण्य-व्यवहार कार्य और कारण में भेदाभेद सम्बन्ध का व्यवस्थापक होता है। फलतः सभी गो-घटादि कार्य पदार्थों में अनुगतरूप से प्रतीत होनेवाले सद्रूप कारण का अपने कार्य-वर्ग के साथ भेदाभेद मानना आवश्यक है, जैसा कि अनेकान्तवादियों ने कहा है—

कार्यरूपेण नानात्वमभेदः कारणात्मना।
हेमात्मना यथाऽभेदः कुण्डलाद्यात्मना भिदा॥

[ इस पद्य में 'भिदा' पद का अर्थ भेद है। सुवर्ण और कुण्डलादि का 'सुवर्णं कुण्डलम्' और 'सुवर्णस्य कुण्डलम्'—इस प्रकार के दोनों व्यवहारों का भेदाभेद सम्बन्ध के द्वारा निर्वाह हो जाता है ]।

समाधान—वह भेद पदार्थ कौन है जो कि अभेद के साथ एक आधार में रह जाता है? यदि वह अन्योऽन्याभावात्मक है, तब जिज्ञासा होती है कि वह (अन्योऽन्याभाव) सुवर्ण और कटकादिरूप कारण और कार्य पदार्थों में रहता है? अथवा नहीं? यदि नहीं रहता, तब कार्य और कारण का आत्यन्तिक अभेद ही स्थिर होता है, भेद नहीं। कार्य और कारण पदार्थों में यदि अन्योऽन्याभाव रहता है, तब उनमें भेद ही पर्यवसित होता है, अभेद नहीं। 'भेदाभेद या भावाभाव का विरोध नहीं—ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि दो विरोधी पदार्थों का सहावस्थान (एकत्र रहना) सम्भव नहीं। यदि सम्भव माना जाता है, तब कटक, कुण्डल और वर्धमानक (प्याला) आदि कार्य पदार्थों का आत्यन्तिक अभेद होना चाहिए, क्योंकि भेद अत्र अभेद का विरोधी होता है। दूसरी बात यह भी है कि कटक जिस सुवर्ण से अभिन्न है, उसी सुवर्ण से मुकुट और कुण्डलादि अभिन्न हैं, अतः कटक, मुकुट और कुण्डलादि का