भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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कूटस्थनित्यत्वादिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १३७

भामती परिणामे वा स एकदेशस्ततो भिन्नो वाऽभिन्नो वा ? भिन्नश्चेत् कथं तस्य परिणामः ? न ह्यन्यस्मिन् परिणममानेऽन्यः परिणमतेऽतिप्रसङ्गात् । अभेदे वा कथं न सर्वात्मना परिणामः ? भिन्नाभिन्नं तदिति चेत्, तथा हि तदेव कारणात्मनाऽभिन्नं भिन्नं च कार्यात्मना कटकादय इवाभिन्ना हाटकात्मना भिन्नाश्च कटकाद्यात्मना । न च भेदाभेदयोर्विरोधान्नैकत्र समावेश इति युक्तम्, विरुद्धमिति नः क्व संप्रत्ययः ? यत्प्रमाणविपर्ययेण वर्त्तते । यत्तु यथा प्रमाणेनावगम्यते तस्य तथा भाव एव । कुण्डलमिदं सुवर्णमिति सामानाधिकरण्यप्रत्यये व्यक्तं भेदाभेदौ चकास्तः । तथा ह्यात्यन्तिकेऽभेदेऽन्यतरस्य द्विरवभासप्रसङ्गः । भेदे चात्यन्तिके न सामानाधिकरण्यं, गवाश्ववत् । आधाराधेयभावे एकाश्रयत्वे वा न सामानाधिकरण्यं

भामती-व्याख्या चैतन्यम् ।' 'सांख्यादिमतवाद के अनुसार दो प्रकार की नित्यता मानी जाती है—(१) कूटस्थ-नित्यता और (२) परिणामिनित्यता । ब्रह्माभावरूप मोक्ष में परिणामिनित्यता की भ्रांति हटाने के लिए नित्यता के दो भेद प्रदर्शित किए गए हैं—"तत्र किंचित्परिणामिनित्यमित्यादि ।" जो वस्तु परिणत ( विकृत ) होने पर भी अपने मौलिक रूप में प्रत्यभिज्ञात होती रहती है, उसे परिणामिनित्य कहते हैं, जैसे स्वर्ण-मृदादि पदार्थ कटक-घटादिरूप में परिणत होकर भी अपनी तात्त्विक स्वर्णरूपता मृद्रूपता को कभी नहीं गँवाते, अतः परिणामिनित्य कहे जाते हैं। परिणामिनित्यता कभी पारमार्थिकी नहीं होती, क्योंकि परिणमनशील वस्तु क्या पूर्णरूपेण परिणत होती है ? अथवा एकदेशेन ? पूर्णरूपेण परिणत होने पर तात्त्विक व्याहृति (विनाश) क्यों नहीं होता ? एकदेशेन परिणत होने पर वह एकदेश उस वस्तु से भिन्न माना जाता है ? अथवा अभिन्न ? यदि भिन्न है, तब उस अपने से भिन्न एक देश के परिणत होने पर वह वस्तु क्योंकर परिणत मानी जायगी ? क्योंकि अन्य ( भिन्न ) वस्तु के परिणत होने पर अन्य वस्तु में 'परिणमते'—ऐसा व्यवहार कभी नहीं होता । अन्यथा एक स्वर्ण-पिण्ड के परिणत होने पर 'विश्वं परिणमते'—ऐसा व्यवहार अतिप्रसक्त होगा । यदि वह ( परिणममान ) एकदेश उस वस्तु से अभिन्न है, तब उस एकदेश के परिणत होने पर उससे अभिन्न वस्तु का सर्वात्मना परिणाम क्यों नहीं माना जाता ?

शङ्का—वस्तु का परिणममान अवयव वस्तु से भिन्न भी है और अभिन्न भी, क्योंकि एक ही सुवर्णरूप कारण के कटक-कुण्डलादि कार्य परस्पर कार्यरूपेण ( कटकत्वादिरूपेण ) भिन्न और कारणगत सुवर्णत्वरूपेण अभिन्न । 'कटकं कुण्डलाद् भिन्नमभिन्नं च'—ऐसी प्रतीति को विरुद्ध भी नहीं कह सकते, क्योंकि प्रमाण से बाधित पदार्थ को विरुद्ध कहा जाता है, किन्तु जैसे एक ही कुण्डल में 'कुण्डलमिदं' और 'सुवर्णमिदम्'—इस प्रकार दोनों प्रतीतियाँ प्रामाणिक मानी जाती हैं, वैसे ही कटक में भी 'कटकमिदम्' और 'सुवर्णमिदम्'—इस प्रकार दोनों प्रतीतियाँ अनुभव-सिद्ध हैं, फलतः कटक और कुण्डल—दोनों सुवर्णरूप होने से अभिन्न और कटकत्वादिरूपेण भिन्न हैं— ऐसा मानना प्रमाण-बाधित नहीं, अपितु प्रमाण के अनुरूप ही है, तब इसे विरुद्ध क्योंकर कहा जा सकता है ? जिन पदार्थों में भेद और अभेद—दोनों प्रमाण-सिद्ध हैं, उन्हें भिन्नाभिन्न कहना विरुद्ध कदापि नहीं ।

कटक और कुण्डल का ऐकान्तिक अभेद मानने पर 'इमे कटककुण्डले'—ऐसी प्रतीति न होकर 'इमे कटके या इमे कुण्डले'—इस प्रकार एक-एक कार्य का दो बार भान होना चाहिए । इसी प्रकार दोनों का ऐकान्तिक भेद मानने पर जैसे कटक को कुण्डल नहीं कहा जाता, वैसे कटक को सुवर्ण भी नहीं कह सकते, अतः 'कटकं सुवर्णम्'—इस प्रकार का सामानाधिकरण्य-व्यपदेश न हो सकेगा, क्योंकि अत्यन्त भिन्न गौ और अश्व का कहीं भी 'गौरश्वः'—इस प्रकार का सामानाधिकरण्य-व्यवहार कभी नहीं होता । यद्यपि अपर्याय शब्दों

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