भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकूटस्थनित्यत्वादिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १३९
भामती
एवं कटकात्मनापि न भिद्येरन्, कटकस्य हाटकादभेदात् । तथा च हाटकमेव वस्तु सन्न कटकादयो भेदस्याप्रतिभासनात् । अथ हाटकत्वेनाप्यभेदो न कटकत्वेन तेन तु भेद एव कुण्डलादेः । यदि हाटकादभिन्नः कटकः कथमयं कुण्डलादिषु नानुवर्त्तते । नानुवर्त्तते चेत्, कथं हाटकादभिन्नः कटकः । ये हि यस्मिन्ननुवर्त्तमाने व्यावर्तन्ते ते ततो भिन्ना एव, यथा सूत्रात् कुसुमभेदाः । नानुवर्त्तन्ते चानुवर्त्तमानेऽपि हाटकत्वे कुण्डलादयः, तस्मात्तेऽपि हाटकाद्भिन्ना एवेति । सत्तानुवृत्त्या च सर्ववस्त्वनुगमे इदमिह नेदमिदमस्मान्नेदमिदानीं नेदमिदमेवं नेदमिति विभागो न स्यात् । कस्यचित् क्वचित् कदाचित् कथञ्चिद्विवेकहेतोरभावात् । अपि च दूरात्कनकमित्यवगते न तस्य कुण्डलादयो विशेषा जिज्ञास्येरन्, कनकादभेदात्तेषां, तस्य च ज्ञातत्वात् । अथ भेदोऽप्यस्ति कनकात् कुण्डलादीनामिति कनकावगमेऽप्यज्ञातास्ते । नन्वभेदोऽप्यस्तीति किं न ज्ञाताः । प्रत्युत ज्ञानमेव तेषां युक्तं, कारणाभावे हि कार्याभाव औत्सर्गिकः, स च कारण-
भामती-व्याख्या
आत्यन्तिक अभेद होना चाहिए, क्योंकि 'स्वाभिन्नाभिन्नस्य स्वाभिन्नत्वम्'—ऐसा नियम लोक-प्रसिद्ध है, तब तो कटकादि के रूप में सर्वत्र 'सुवर्णम्-सुवर्णम्'—ऐसा ही भान होना चाहिए, कटकादि की कोई वस्तु-सत्ता नहीं रह जाती ।
यदि कहा जाय कि कटक में दो धर्म रहते हैं—( १ ) सुवर्णत्व और ( २ ) कटकत्व । कटक का कुण्डलादि से जो अभेद माना जाता है, वह सुवर्णत्वेन ही माना जाता है, कटकत्वेन नहीं । तब यह प्रश्न उठता है कि यदि सुवर्ण से कटक अभिन्न है, तब कुण्डलादि से अभिन्न क्यों नहीं । यदि कुण्डलादि से कटक अभिन्न नहीं, तब वह सुवर्ण से भी अभिन्न न हो सकेगा, क्योंकि अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा सुवर्ण से कटकादि का भेद सिद्ध होता है—'यस्मिन् अनुवर्तमानं यद् व्यावर्तते, तत् ततो भिन्नम्' इस नियम के अनुसार जैसे पुष्पमाला के द्वितीयादि पुष्पों के स्थान पर अनुवृत्त न रहनेवाले प्रथमादि पुष्प सर्वत्रान्वयी सूत्र (धागे) से भिन्न होते हैं, वैसे ही कुण्डलादि में अनुवर्तमान सुवर्ण से व्यावर्तमान कटक का भेद न्यायसिद्ध है । कुण्डलादि में सुवर्ण की अनुवृत्ति होने के कारण यदि कुण्डलादि का सुवर्ण से अभेद माना जाता है, तब सत्तारूप कारण का 'घटः सन्', 'पटः सन्' इस प्रकार समस्त कार्यों में अनुवर्तन होने के कारण सभी कार्य सदात्मक हो जाते हैं और असत् कोई नहीं रहता, तब 'इदमिह नेदम्', 'इदमस्मान्नेदम्', 'इदमिदानीं नेदम्', 'इदमेव नेदम्'—ऐसा विभाग न हो सकेगा, क्योंकि किसी वस्तु का कहीं पर भी कोई विभाजक धर्म नहीं रह जाता । यह भी एक प्रश्न उठ खड़ा होता है कि दूर से 'सुवर्णमिदम्'—इस प्रकार का ज्ञान हो जाने पर जैसे सुवर्ण के विषय में सन्देह नहीं होता, वैसे ही कुण्डलादि का सन्देह नहीं होना चाहिए, क्योंकि सुवर्ण से कुण्डलादि का अभेद माना जाता है । यदि कहा जाता है कि सुवर्ण से कुण्डलादि का भेद भी माना जाता है, अतः सुवर्ण का ज्ञान हो जाने पर भी कुण्डलादि अज्ञात रह जाते हैं, फलतः उनकी जिज्ञासा होती है । तब यह भी स्मरण दिलाया जा सकता है कि कुण्डलादि से सुवर्ण का अभेद भी तो माना जाता है, अतः ज्ञात हो जाने पर कुण्डलादि की जिज्ञासा क्यों होगी ? कुण्डलादि के ज्ञान का कारण न होने पर ज्ञानरूप कार्य का अभाव हो सकता था, किन्तु सुवर्णाभेद रूप कारण का सद्भाव होने से कारणाभाव बाधित हो जाता है, ज्ञात सुवर्ण से अभिन्न होने के कारण जब कुण्डलादि भी ज्ञात ही हो जाते हैं, तब उनकी जिज्ञासा एवं जिज्ञासा-निवृत्ति के लिए उनका ज्ञान करना निरर्थक ही हो जाता है । अतः जिज्ञास्य अत एव अज्ञात कुण्डलादि ज्ञात सुवर्ण से भिन्न ही सिद्ध होते हैं, क्योंकि 'यस्मिन् ज्ञाते यन्न