भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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१४०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

भामती

सत्तयाऽपोद्यते। अस्ति चाभेदे कारणसत्तेति कनके ज्ञाते ज्ञाता एव कुण्डलादय इति तज्जिज्ञासाज्ञानानि चानर्थकानि स्युः। तेन यस्मिन् गृह्यमाणे यन्न गृह्यते तत्ततो भिद्यते। यथा करभे गृह्यमाणेऽगृह्यमाणो रासभः करभात्। गृह्यमाणे च दूरतो हेम्नि न गृह्यन्ते तस्य भेदाः कुण्डलादयः, तस्मात्ते हेम्नो भिद्यन्ते। कथं तर्हि हेम कुण्डलमिति सामानाधिकरण्यमिति चेत् न ह्याधाराधेयभावे समानाश्रयत्वे वा सामानाधि-करण्यमित्युक्तम्। अथानुवृत्तिव्यावृत्तिव्यवस्था च हेम्नि ज्ञाते कुण्डलादिविजिज्ञासा च कथम्। न खल्वभेद ऐकान्तिकेऽनेकान्तिके चेतदुभयमुपपद्यते यत इत्युक्तम्। तस्माद् भेदाभेदयोरन्यतरस्मिन्नवधेयेऽभेदोपादानैव भेदकल्पना न भेदोपादानाऽभेदकल्पनेति युक्तम्। भिद्यमानतन्त्रत्वाद्भेदस्य भिद्यमानानां च प्रत्येकमेकत्वात्, एकाभावे चानाश्रयस्य भेदस्यायोगात्, एकस्य च भेदानधीनत्वात्, नायमयमिति च भेदग्रहस्य प्रतियोगिग्रह-सापेक्षत्वादेकत्वग्रहस्य चान्यानपेक्षत्वादभेदोपादानेवानिर्वचनीयभेदकल्पनेति साम्प्रतम्। तथा च श्रुतिः— 'मृत्तिकेत्येव सत्यम्' इति तस्मात् कूटस्थनित्यतैव पारमार्थिकी न परिणामिनित्यतेति सिद्धम्। ॐ व्योम-वद् ॐ इति च दृष्टान्तः परसिद्धः अस्मन्मते तस्यापि कार्यत्वेनानित्यत्वात्।

अत्र च ॐ कूटस्थनित्यम् ॐ। इति निर्वर्त्यकर्मतामपाकरोति ॐ सर्वव्यापि ॐ। इति प्राप्य-

भामती-व्याख्या

ज्ञायते तत् ततो भिद्यते'—इस न्याय के अनुसार जैसे करभ (ऊँट) का ज्ञान हो जाने पर भी रासभ (गर्दभ) अज्ञात ही रह जाता है, अतः वह करभ से भिन्न होता है, वैसे ही कुण्डलादि सुवर्ण से भिन्न क्यों न होंगे ?

यदि सुवर्ण से कुण्डलादि भिन्न हैं, तब 'सुवर्णं कुण्डलम्'—ऐसा सामानाधिकरण्य-व्यवहार क्योंकर होगा ? आधाराधेयभाव या एकाश्रयवृत्तित्व को लेकर सामानाधिकरण्य, व्यवस्था नहीं हो सकती—यह कहा जा चुका है। अनुवृत्ति (अन्वय-व्यतिरेक) के आधार पर कारण और कार्य का भेद सम्भव नहीं, क्योंकि इस पक्ष में भी दूर से 'सुवर्णमिदं' ऐसा ज्ञान हो जाने पर कुण्डलादि की जिज्ञासा कैसे होगी ? जैसे ऐकान्तिक अभेद मानने पर कुण्डलादि की जिज्ञासा उपपन्न नहीं होती, वैसे ही अनैकान्तिक (भेदाभेद) पक्ष में भी ये दोनों (अनुवृत्ति-व्यावृत्ति-व्यवस्था एवं कुण्डलादि-जिज्ञासा) उपपन्न नहीं हो सकते। फलतः भेद और अभेद में से एक का परित्याग आवश्यक हो जाने पर भेद का परित्याग एवं भेदाश्रित भेद का कल्पन मानना उचित है, भेदाश्रित अभेद की कल्पना युक्त नहीं, क्योंकि भेद सदैव भिद्यमान पदार्थों के आश्रित होता है, भिद्यमान पदार्थों में से प्रत्येक को भिन्न नहीं, अभिन्न या एक ही माना जाता है, क्योंकि एक पदार्थ के न होने पर भेद किसके आश्रित रहेगा ? एकात्मक वस्तु भेद के अधीन नहीं होती, क्योंकि 'अयम् अयं (घटः पटो) न भवति'—इस प्रकार प्रतीयमान भेद सदैव प्रतियोगी के ज्ञान की अपेक्षा करता है, किन्तु एकत्व-ज्ञान अन्य किसी की भी अपेक्षा नहीं करता, परिशेषतः अभेद के आश्रित अनिर्वचनीय भेद की कल्पना ही युक्ति-संगत है, जैसा कि श्रुति कहती है—"मृत्तिकेत्येव सत्यम्"। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि कूटस्थ-नित्यता ही पारमार्थिक है, परिणामि-नित्यता नहीं। भाष्यकार ने जो कूटस्थ-नित्यता में दृष्टान्त दिया है—'व्योमवत्', वह न्याय-मत के अनुसार है, क्योंकि वेदान्त-सिद्धान्त में व्योम भी जन्य होने के कारण अनित्य ही है। उत्पत्ति, प्राप्ति, विकृति और संस्कृति क्रिया के भेद से कर्मता (क्रियाश्रितता) भी चार प्रकार की होती है—(१) उत्पाद्यता, (२) प्राप्यता, (३) विकृतता तथा (४) संस्कृतता। ब्रह्मभाव में 'कूटस्थनित्य' पद के द्वारा उत्पाद्यकर्मता, 'सर्वव्यापि' विशेषण के द्वारा प्राप्यकर्मता, 'सर्वविक्रियारहितम्' ऐसा कहकर विकार्यतात्मक कर्मता और 'निरवयवम्' पद के द्वारा संस्कार्य कर्मता की निवृत्ति

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