भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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उपासनाविधिनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १३५

निमित्तं शरीरोपादानपूर्वकं सुखदुःखतारतम्यमनित्यं संसाररूपं श्रुतिस्मृतिन्याय-

भामती तत्साधनत्वप्रतीतेर्विधेर्वैयर्थ्यात् । न चावघातादिविधितुल्यता, तत्रापि नियमापूर्वस्यान्यतोऽनवगतेः । न च ब्रह्मभूयादन्यदमृतत्वमार्थवादिकं किञ्चिदस्ति, येन तत्काम उपासनायामधिक्रियेत । विश्वजिन्न्‍यायेन तु स्वर्गकल्पनायां तस्य सातिशयत्वं क्षयित्वं चेति न नित्यफलत्वमुपासनायाः । तस्माद् ब्रह्मभूयस्याविद्यापिधानापनयमात्रेणाविर्भावाद्, अविद्यापनयस्य च वेदान्तार्थज्ञानावगतिपर्यन्तादेव सम्भवाद्, उपासनायाः संस्कारहेतुभावस्य संस्कारस्य च साक्षात्कारोपजनने मनःसाचिव्यस्य च मानान्तरसिद्धत्वात्, आत्मेत्येवोपासीतेति न विधिः, अपि तु विधिसरूपोऽयं, यथौपांशुयाजवाक्ये विष्णुरुपांशु यष्टव्य इत्यादयो विधि-

भामती-व्याख्या वैसे अभ्यास में साक्षात्कार की साधनता लौकिक अन्वय-व्यतिरेकरूप न्याय से ही सम्पन्न हो जाती है, उसके लिए किसी प्रकार के विधि-वाक्य की आवश्यकता नहीं होती। "व्रीहीनवहन्ति"-इत्यादि विधि वाक्य जैसे तुष-विमोकरूप दृष्टफल के उद्देश्य से अवघातादि क्रिया का विधान करते हैं, वैसे ही "आत्मेत्येवोपासीत"-इत्यादि वेदान्त वाक्य ब्रह्मात्मता-साक्षात्कार के लिए केवल आत्मोपासनारूप क्रिया का विधान करते हैं-ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि 'व्रीहीनवहन्ति'-इत्यादि वाक्य केवल अवघातरूप क्रिया का विधान नहीं करते, अपितु अवघातापूर्व का विधान करते हैं [ 'दर्शपूर्णमास' कर्म के प्रकरण में पठित "व्रीहीनवहन्ति"-यह वाक्य केवल तुष-विमोकरूप (धान की भूसी उतारने के लिए) अवघात ओखली में मूसल से कूटने) का विधान नहीं कर सकता, क्योंकि लोक-प्रसिद्ध अन्वय-व्यतिरेक के आधार पर ही तुष-निवृत्ति के लिए नख-विदलन, पाषाण-घर्षणादि के समान अवघात भी निसर्गतः प्राप्त है, अतः अवघात-विधि को नियमार्थक माना गया है-"नियमाथवा पुनः श्रुतिः" (जै. सू. ४।२।२४) अर्थात् अवघात को छोड़ कर नख-विदलनादि के द्वारा तुष-निवृत्ति करने पर तण्डुल-निष्पत्तिरूप दृष्ट फल का लाभ तो हो जायगा, किन्तु दर्शपूर्णमास-जन्य परमापूर्व या उसके जनकीभूत उत्पत्त्यपूर्व की सम्पत्ति नहीं होगी, उसकी सम्पत्ति तभी होगी, जब कि नियमतः अवघात का अनुष्ठान किया जाय, फलतः 'व्रीहीनवहन्ति'-इस वाक्य के द्वारा अवघातनियम-जन्य नियमापूर्व का अवबोधन किया जाता है]। "ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति" (मुण्ड. ३।२।९) इस वाक्य के द्वारा प्रतिपादित ब्रह्मभाव अमृतत्व से भिन्न नहीं, यदि अमृतत्व से ब्रह्मभाव भिन्न होता, तब अवश्य उसकी कामना रखनेवाला व्यक्ति ब्रह्मोपासना का अधिकारी बन जाता। 'विश्वजित्' न्याय (जै. सू. ४।३।७) के आधार पर ब्रह्मोपासना का यदि स्वर्ग फल मान कर स्वर्गकामानावान् व्यक्ति को अधिकारी माना जाता है, तब स्वर्गरूप फल के सातिशय और नश्वर होने के कारण ब्रह्मोपासना में अनित्य-फलकत्वापत्ति होती है और "न स पुनरावर्तते" (छां. ८।१५।१) इत्यादि श्रुतियों का विरोध उपस्थित होता है। अतः जीव में ब्रह्मभाव का अविद्या की निवृत्तिमात्र से आविर्भाव माना जाता है। अविद्या की निवृत्ति तो वेदान्ताभिहित अर्थ के साक्षात्कारात्मक ज्ञान से ही हो जाती है, उसके लिए उपासना की आवश्यकता ही नहीं। उपासना में संस्कार-जनकता और मन के द्वारा साक्षात्काररूप फल की उत्पत्ति के लिए संस्कार मन के सहायक होते हैं-यह ज्ञान लौकिक अन्वय-व्यतिरेक से ही हो जाता है, उसके लिए उपासना-विधि की आवश्यकता नहीं, फलतः "आत्मेत्येवोपासीत" (बृह. उ. १।४।७) यह वाक्य विधिरूप नहीं, केवल वैसे ही विधि का अनुकरणमात्र है, जैसे- उपांशुयाग के प्रकरण में "विष्णुरुपांशु यष्टव्यः" इत्यादि वाक्य ।