भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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१३४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४

लक्षणस्य तदनुष्ठायिनां च तारतम्यं गम्यते । एवमविद्यादिदोषवतां धर्माधर्मतारतम्य-

भामती फलं, नित्यत्वादकार्यत्वात् । नाप्यनाद्यविद्याविधानापनयः, तस्य स्वविरोधिद्योत्यादेव भावात् । नापि विद्योदयः, तस्यापि श्रवणमननपूर्वकौपासनाजनितसंस्कारसचिवादेव चेतसो भावात् । उपासनासंस्कारव- दुपासनापूर्वमपि चेतःसहकारीति चेत्, दृष्टं च खलु नैयोगिकं फलमैहिकमपि, यथा चित्राकारीर्यादि- नियोगानामनियतनियतफलानाम् । न, गान्धर्वशास्त्रोपासनावासनाया इवापूर्वानपेक्षायाः षड्जादिसाक्षा- त्कारे वेदान्तार्थोपासनावासनाया जीवब्रह्मभावसाक्षात्कारेऽनपेक्षाया एव सामर्थ्यात् । तथा चामृतीभावं प्रत्यहेतुत्वादुपासनापूर्वस्य नामृतत्वकामस्तत्कार्यमवबोद्धुमर्हति, अन्यदिच्छत्यन्यत् करोतीति हि विप्रति- षिद्धम् । न च तत्कामः क्रियामेव कार्यमवगमिष्यति नापूर्वमिति साम्प्रतम्, तस्या मानान्तरादेव-

भामती-व्याख्या

विधि का फल नहीं कह सकते, क्योंकि श्रवण-मननपूर्वक उपासना-जनित संस्कारों से युक्त चित्त के द्वारा ही विद्या का उदय माना जाता है । [ जैसे बाणादिगत बाह्य क्रिया से जनित वेगसंज्ञक संस्कारों में विधि-विषयता नहीं होती, अत एव उन्हें 'नियोग' या 'अपूर्व' पद के द्वारा अभिहित नहीं किया जाता, वैसे ही उपासनादि आन्तरिक (मानस क्रिया) से जनित संस्कार ऐहिक (तात्कालिक) फल के जनक होने के कारण न तो नियोगपदास्पद होते हैं और न विधि के विषय ] ।

शङ्का— उपासना-जनित ऐहिकफलक संस्कार जैसे चित्त के सहकारी होते हैं, वैसे ही उपासना-जनित पारलौकिकफलक नियोगरूप संस्कार भी उपासना-जनित ऐहिकफलक संस्कारों के सहकारी होते हैं, क्योंकि नियोग (अपूर्व) से केवल पारलौकिक फल नहीं, ऐहिक फल भी उत्पन्न होता देखा जाता है, जैसे कि “चित्रया यजेत पशुकामः", "कारीर्या यजेत वृष्टिकामः" इत्यादि वाक्यों के द्वारा विहित कर्मों का फल ऐहिक ही होता है । हाँ, चित्रा याग-साध्य अपूर्व का पशुरूप फल नियमतः ऐहिक नहीं, किन्तु कारीरी याग-साध्य अपूर्व का वृष्टिरूप फल नियमतः ऐहिक ही होता है, क्योंकि "यदि वर्षेत् तावत्येव होतव्यम्, यदि न वर्षेत् श्वोभूते हविर्निर्वपेत्”—इत्यादि प्राकरणिक वाक्यों का सामर्थ्य यह अत्यन्त स्पष्ट कर रहा है कि कारीरी याग केवल ऐहिक (तात्कालिक) वृष्टि के उद्देश्य से ही किया जाता है । फलतः उपासना-जनित संस्कारों के सहायक अपूर्व को लेकर विधि-विषयता का सामञ्जस्य किया जा सकता है ।

समाधान— जीवगत ब्रह्मात्मता के साक्षात्कार को वेदान्तार्थ की उपासना से जनित केवल ऐहिकफलक संस्कार वैसे ही उत्पन्न कर देते हैं, जैसे गान्धर्व शास्त्राभिहित अर्थ की उपासना से जनित संस्कार षड्जादि स्वर-ग्राम के साक्षात्कार को उत्पन्न कर देते हैं । जीवगत ब्रह्मभाव के साक्षात्कार की उत्पत्ति में वेदान्तार्थोपासना-जनित संस्कारों को अपूर्व की अपेक्षा नहीं होती, अतः वेदान्त वाक्यार्थ विधि के विषय क्योकर होंगे ? जब अमृतीभाव (ब्रह्मभाव) के प्रति उपासनापूर्व हेतु ही नहीं, तब अमृतत्व की कामना रखनेवाला व्यक्ति उसको अपना कर्तव्य नहीं मान सकता । अन्यथा 'अन्यदिच्छति अन्यत्करोति' चाहता कुछ और है और करता कुछ और ] यह कहावत लागू होगी । चाहना स्वर्ग और नरक के मार्ग पर चलना अत्यन्त विरुद्धाचरण है ।

अमृतत्व-कामनावान् व्यक्ति केवल “ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति”—इत्यादि वाक्यार्थ की अभ्यास रूप क्रिया को ही अपना कार्य (कर्तव्य) समझेगा—ऐसा सम्भव नहीं, क्योंकि केवल

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