भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
१३४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४
लक्षणस्य तदनुष्ठायिनां च तारतम्यं गम्यते । एवमविद्यादिदोषवतां धर्माधर्मतारतम्य-
भामती फलं, नित्यत्वादकार्यत्वात् । नाप्यनाद्यविद्याविधानापनयः, तस्य स्वविरोधिद्योत्यादेव भावात् । नापि विद्योदयः, तस्यापि श्रवणमननपूर्वकौपासनाजनितसंस्कारसचिवादेव चेतसो भावात् । उपासनासंस्कारव- दुपासनापूर्वमपि चेतःसहकारीति चेत्, दृष्टं च खलु नैयोगिकं फलमैहिकमपि, यथा चित्राकारीर्यादि- नियोगानामनियतनियतफलानाम् । न, गान्धर्वशास्त्रोपासनावासनाया इवापूर्वानपेक्षायाः षड्जादिसाक्षा- त्कारे वेदान्तार्थोपासनावासनाया जीवब्रह्मभावसाक्षात्कारेऽनपेक्षाया एव सामर्थ्यात् । तथा चामृतीभावं प्रत्यहेतुत्वादुपासनापूर्वस्य नामृतत्वकामस्तत्कार्यमवबोद्धुमर्हति, अन्यदिच्छत्यन्यत् करोतीति हि विप्रति- षिद्धम् । न च तत्कामः क्रियामेव कार्यमवगमिष्यति नापूर्वमिति साम्प्रतम्, तस्या मानान्तरादेव-
भामती-व्याख्या
विधि का फल नहीं कह सकते, क्योंकि श्रवण-मननपूर्वक उपासना-जनित संस्कारों से युक्त चित्त के द्वारा ही विद्या का उदय माना जाता है । [ जैसे बाणादिगत बाह्य क्रिया से जनित वेगसंज्ञक संस्कारों में विधि-विषयता नहीं होती, अत एव उन्हें 'नियोग' या 'अपूर्व' पद के द्वारा अभिहित नहीं किया जाता, वैसे ही उपासनादि आन्तरिक (मानस क्रिया) से जनित संस्कार ऐहिक (तात्कालिक) फल के जनक होने के कारण न तो नियोगपदास्पद होते हैं और न विधि के विषय ] ।
शङ्का— उपासना-जनित ऐहिकफलक संस्कार जैसे चित्त के सहकारी होते हैं, वैसे ही उपासना-जनित पारलौकिकफलक नियोगरूप संस्कार भी उपासना-जनित ऐहिकफलक संस्कारों के सहकारी होते हैं, क्योंकि नियोग (अपूर्व) से केवल पारलौकिक फल नहीं, ऐहिक फल भी उत्पन्न होता देखा जाता है, जैसे कि “चित्रया यजेत पशुकामः", "कारीर्या यजेत वृष्टिकामः" इत्यादि वाक्यों के द्वारा विहित कर्मों का फल ऐहिक ही होता है । हाँ, चित्रा याग-साध्य अपूर्व का पशुरूप फल नियमतः ऐहिक नहीं, किन्तु कारीरी याग-साध्य अपूर्व का वृष्टिरूप फल नियमतः ऐहिक ही होता है, क्योंकि "यदि वर्षेत् तावत्येव होतव्यम्, यदि न वर्षेत् श्वोभूते हविर्निर्वपेत्”—इत्यादि प्राकरणिक वाक्यों का सामर्थ्य यह अत्यन्त स्पष्ट कर रहा है कि कारीरी याग केवल ऐहिक (तात्कालिक) वृष्टि के उद्देश्य से ही किया जाता है । फलतः उपासना-जनित संस्कारों के सहायक अपूर्व को लेकर विधि-विषयता का सामञ्जस्य किया जा सकता है ।
समाधान— जीवगत ब्रह्मात्मता के साक्षात्कार को वेदान्तार्थ की उपासना से जनित केवल ऐहिकफलक संस्कार वैसे ही उत्पन्न कर देते हैं, जैसे गान्धर्व शास्त्राभिहित अर्थ की उपासना से जनित संस्कार षड्जादि स्वर-ग्राम के साक्षात्कार को उत्पन्न कर देते हैं । जीवगत ब्रह्मभाव के साक्षात्कार की उत्पत्ति में वेदान्तार्थोपासना-जनित संस्कारों को अपूर्व की अपेक्षा नहीं होती, अतः वेदान्त वाक्यार्थ विधि के विषय क्योकर होंगे ? जब अमृतीभाव (ब्रह्मभाव) के प्रति उपासनापूर्व हेतु ही नहीं, तब अमृतत्व की कामना रखनेवाला व्यक्ति उसको अपना कर्तव्य नहीं मान सकता । अन्यथा 'अन्यदिच्छति अन्यत्करोति' चाहता कुछ और है और करता कुछ और ] यह कहावत लागू होगी । चाहना स्वर्ग और नरक के मार्ग पर चलना अत्यन्त विरुद्धाचरण है ।
अमृतत्व-कामनावान् व्यक्ति केवल “ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति”—इत्यादि वाक्यार्थ की अभ्यास रूप क्रिया को ही अपना कार्य (कर्तव्य) समझेगा—ऐसा सम्भव नहीं, क्योंकि केवल
उपासनाविधिनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १३५
निमित्तं शरीरोपादानपूर्वकं सुखदुःखतारतम्यमनित्यं संसाररूपं श्रुतिस्मृतिन्याय-
भामती तत्साधनत्वप्रतीतेर्विधेर्वैयर्थ्यात् । न चावघातादिविधितुल्यता, तत्रापि नियमापूर्वस्यान्यतोऽनवगतेः । न च ब्रह्मभूयादन्यदमृतत्वमार्थवादिकं किञ्चिदस्ति, येन तत्काम उपासनायामधिक्रियेत । विश्वजिन्न्यायेन तु स्वर्गकल्पनायां तस्य सातिशयत्वं क्षयित्वं चेति न नित्यफलत्वमुपासनायाः । तस्माद् ब्रह्मभूयस्याविद्यापिधानापनयमात्रेणाविर्भावाद्, अविद्यापनयस्य च वेदान्तार्थज्ञानावगतिपर्यन्तादेव सम्भवाद्, उपासनायाः संस्कारहेतुभावस्य संस्कारस्य च साक्षात्कारोपजनने मनःसाचिव्यस्य च मानान्तरसिद्धत्वात्, आत्मेत्येवोपासीतेति न विधिः, अपि तु विधिसरूपोऽयं, यथौपांशुयाजवाक्ये विष्णुरुपांशु यष्टव्य इत्यादयो विधि-
भामती-व्याख्या वैसे अभ्यास में साक्षात्कार की साधनता लौकिक अन्वय-व्यतिरेकरूप न्याय से ही सम्पन्न हो जाती है, उसके लिए किसी प्रकार के विधि-वाक्य की आवश्यकता नहीं होती। "व्रीहीनवहन्ति"-इत्यादि विधि वाक्य जैसे तुष-विमोकरूप दृष्टफल के उद्देश्य से अवघातादि क्रिया का विधान करते हैं, वैसे ही "आत्मेत्येवोपासीत"-इत्यादि वेदान्त वाक्य ब्रह्मात्मता-साक्षात्कार के लिए केवल आत्मोपासनारूप क्रिया का विधान करते हैं-ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि 'व्रीहीनवहन्ति'-इत्यादि वाक्य केवल अवघातरूप क्रिया का विधान नहीं करते, अपितु अवघातापूर्व का विधान करते हैं [ 'दर्शपूर्णमास' कर्म के प्रकरण में पठित "व्रीहीनवहन्ति"-यह वाक्य केवल तुष-विमोकरूप (धान की भूसी उतारने के लिए) अवघात ओखली में मूसल से कूटने) का विधान नहीं कर सकता, क्योंकि लोक-प्रसिद्ध अन्वय-व्यतिरेक के आधार पर ही तुष-निवृत्ति के लिए नख-विदलन, पाषाण-घर्षणादि के समान अवघात भी निसर्गतः प्राप्त है, अतः अवघात-विधि को नियमार्थक माना गया है-"नियमाथवा पुनः श्रुतिः" (जै. सू. ४।२।२४) अर्थात् अवघात को छोड़ कर नख-विदलनादि के द्वारा तुष-निवृत्ति करने पर तण्डुल-निष्पत्तिरूप दृष्ट फल का लाभ तो हो जायगा, किन्तु दर्शपूर्णमास-जन्य परमापूर्व या उसके जनकीभूत उत्पत्त्यपूर्व की सम्पत्ति नहीं होगी, उसकी सम्पत्ति तभी होगी, जब कि नियमतः अवघात का अनुष्ठान किया जाय, फलतः 'व्रीहीनवहन्ति'-इस वाक्य के द्वारा अवघातनियम-जन्य नियमापूर्व का अवबोधन किया जाता है]। "ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति" (मुण्ड. ३।२।९) इस वाक्य के द्वारा प्रतिपादित ब्रह्मभाव अमृतत्व से भिन्न नहीं, यदि अमृतत्व से ब्रह्मभाव भिन्न होता, तब अवश्य उसकी कामना रखनेवाला व्यक्ति ब्रह्मोपासना का अधिकारी बन जाता। 'विश्वजित्' न्याय (जै. सू. ४।३।७) के आधार पर ब्रह्मोपासना का यदि स्वर्ग फल मान कर स्वर्गकामानावान् व्यक्ति को अधिकारी माना जाता है, तब स्वर्गरूप फल के सातिशय और नश्वर होने के कारण ब्रह्मोपासना में अनित्य-फलकत्वापत्ति होती है और "न स पुनरावर्तते" (छां. ८।१५।१) इत्यादि श्रुतियों का विरोध उपस्थित होता है। अतः जीव में ब्रह्मभाव का अविद्या की निवृत्तिमात्र से आविर्भाव माना जाता है। अविद्या की निवृत्ति तो वेदान्ताभिहित अर्थ के साक्षात्कारात्मक ज्ञान से ही हो जाती है, उसके लिए उपासना की आवश्यकता ही नहीं। उपासना में संस्कार-जनकता और मन के द्वारा साक्षात्काररूप फल की उत्पत्ति के लिए संस्कार मन के सहायक होते हैं-यह ज्ञान लौकिक अन्वय-व्यतिरेक से ही हो जाता है, उसके लिए उपासना-विधि की आवश्यकता नहीं, फलतः "आत्मेत्येवोपासीत" (बृह. उ. १।४।७) यह वाक्य विधिरूप नहीं, केवल वैसे ही विधि का अनुकरणमात्र है, जैसे- उपांशुयाग के प्रकरण में "विष्णुरुपांशु यष्टव्यः" इत्यादि वाक्य ।
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सिद्धम् । तथा च श्रुतिः--'न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति' (छान्दो० ८।१२।१) इति यथावर्णितं संसाररूपमनुवदति । 'अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः' (छान्दो० ८।१२।१) इति प्रियाप्रियस्पर्शनप्रतिषेधाच्चोदनालक्षण-धर्मकार्यत्वं मोक्षाख्यस्याशरीरत्वस्य प्रतिषिध्यत इति गम्यते । धर्मकार्यत्वे हि प्रियाप्रियस्पर्शनप्रतिषेधो नोपपद्यते । अशरीरत्वमेव धर्मकार्यमिति चेन्न; तस्य स्वाभाविकत्वात् । 'अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति' (काठ० १।२।२१) 'अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः' (मुण्ड० २।१।२) 'असङ्गो ह्ययं पुरुषः' (बृह० ४।३।१५) इत्यादिश्रुतिभ्यः । अत एवानुष्ठेयकर्मफलविलक्षणं मोक्षाख्यमशरीरत्वं नित्यमिति सिद्धम् । तत्र किञ्चित्परिणामिनित्यं यस्मिन्विक्रिय-माणेऽपि तदेवेदमिति बुद्धिर्न विहन्यते, यथा पृथिव्यादिजगन्नित्यत्ववादिनाम् । यथा च सांख्यानां गुणाः, इदं तु पारमार्थिकं, कूटस्थनित्यं, व्योमवत्सर्वव्यापि, सर्वविक्रि-
भामती
सरूपा न विधय इति तात्पर्यार्थः । श्रुतिस्मृतिन्यायसिद्धमित्युक्तं, तत्र श्रुतिं दर्शयति ॐ तथा च श्रुतिः इति ॐ । न्यायमाह ॐ अत एव इति ॐ । यत् किल स्वाभाविकं तन्नित्यं, यथा चैतन्यं, स्वाभाविकं चेदं, तस्मान्नित्यम् । परे हि द्वयीं नित्यतानाहुः- कूटस्थनित्यतां परिणामिनित्यतां च, तत्र नित्यमित्युक्ते मा भूदस्य परिणामिनित्यतेत्यत आह ॐ तत्र किञ्चिद् इति ॐ । परिणामिनित्यता हि न पारमार्थिकी । तथा हि- तत्सर्वात्मना वा परिणमेदेकदेशेन वा ? सर्वात्मना परिणामे कथं न तत्त्वव्याहतिः ? एकदेश-
भामती-व्याख्या
विष्णुरुपांशु यष्टव्योऽजामित्वाय, प्रजापतिरुपांशु यष्टव्योऽजामित्वाय, अग्नीषोमावुपांशु यष्टव्या-वजामित्वाय'' (तै. सं. २।६।६) इस वाक्य को लेकर जै. सू. २।१।४ में पूर्वपक्ष किया गया है कि विष्णुवादि तीन वाक्यों के द्वारा विहित तीन कर्मों का अनुवादक प्रथम वाक्य है। उसका निराकरण करते हुए सिद्धान्ती ने कहा है कि उपक्रम और उपसंहार को देखते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि निरन्तर पुरोडाशद्रव्यक दो कर्मों का अनुष्ठान करने पर आलस्य या उकताहट होती है, अतः उन कर्मों के मध्य में घृतादि विजातीय द्रव्यवाले कर्म का विधान अपेक्षित है, अतः 'उपांशुयाजमन्तरा यजति'—यह वाक्य उपांशुयाज का विधायक है और विष्णुवादि वाक्य विधायक नहीं, अपितु अर्थवादमात्र हैं, केवल विधि के सरूप हैं, विधि नहीं] ।
भाष्यकार ने जो धर्माधर्म के फलभूत सुख-दुःख में तारतम्य (न्यूनाधिकभाव) दिखाते हुए कहा है—"एवमविद्याऽदिदोषवतां धर्माधर्मतारतम्यनिमित्तं शरीरोपादानपूर्वकं सुखदुःखतारतम्यमनित्यं संसाररूपं श्रुतिस्मृतिन्यायसिद्धम्।" वहाँ प्रक्रान्त श्रुति का निदर्शन प्रस्तुत किया गया है—"तथा च श्रुतिः—'न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति' (छां. ८।१२।१)। अर्थात् धर्म और अधर्म के फलोपभोग में आत्मा को शरीराभिमान बना रहता है और जब तक शरीराभिमान है, तब तक प्रिय (सुख) एवं अप्रिय (दुःख) की अपहति (निवृत्ति) नहीं हो सकती । कथित न्याय-सिद्धता दिखाने के लिए न्याय दिखाया गया है—"अत एवानुष्ठेयकर्मफलविलक्षणं मोक्षाख्यमशरीरत्वं नित्यमिति सिद्धम्।" उक्त 'न्याय' पद से अनुमान विवक्षित है, अनुमान के वेदान्त-सिद्धान्त में उदाहरण, उपनय और निगमन अथवा प्रतिज्ञा, हेतु और उदाहरण नाम के तीन अवयव माने जाते हैं, उसके अनुरूप न्याय का पूर्ण कलेवर इस प्रकार कहा जाता है—'यत् स्वाभाविकं, तन्नित्यं, यथा चैतन्यम् । स्वाभाविकं चेदम् । तस्मान्नितम् ।' इसी तथ्य को प्रतिज्ञादिरूप में इस प्रकार कह सकते हैं—'अशरीरत्वात्मकं मोक्षफलं नित्यम्, स्वाभाविकत्वाद्, यत्स्वाभाविकं तन्नित्यं यथा जीवस्य
कूटस्थनित्यत्वादिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १३७
भामती परिणामे वा स एकदेशस्ततो भिन्नो वाऽभिन्नो वा ? भिन्नश्चेत् कथं तस्य परिणामः ? न ह्यन्यस्मिन् परिणममानेऽन्यः परिणमतेऽतिप्रसङ्गात् । अभेदे वा कथं न सर्वात्मना परिणामः ? भिन्नाभिन्नं तदिति चेत्, तथा हि तदेव कारणात्मनाऽभिन्नं भिन्नं च कार्यात्मना कटकादय इवाभिन्ना हाटकात्मना भिन्नाश्च कटकाद्यात्मना । न च भेदाभेदयोर्विरोधान्नैकत्र समावेश इति युक्तम्, विरुद्धमिति नः क्व संप्रत्ययः ? यत्प्रमाणविपर्ययेण वर्त्तते । यत्तु यथा प्रमाणेनावगम्यते तस्य तथा भाव एव । कुण्डलमिदं सुवर्णमिति सामानाधिकरण्यप्रत्यये व्यक्तं भेदाभेदौ चकास्तः । तथा ह्यात्यन्तिकेऽभेदेऽन्यतरस्य द्विरवभासप्रसङ्गः । भेदे चात्यन्तिके न सामानाधिकरण्यं, गवाश्ववत् । आधाराधेयभावे एकाश्रयत्वे वा न सामानाधिकरण्यं
भामती-व्याख्या चैतन्यम् ।' 'सांख्यादिमतवाद के अनुसार दो प्रकार की नित्यता मानी जाती है—(१) कूटस्थ-नित्यता और (२) परिणामिनित्यता । ब्रह्माभावरूप मोक्ष में परिणामिनित्यता की भ्रांति हटाने के लिए नित्यता के दो भेद प्रदर्शित किए गए हैं—"तत्र किंचित्परिणामिनित्यमित्यादि ।" जो वस्तु परिणत ( विकृत ) होने पर भी अपने मौलिक रूप में प्रत्यभिज्ञात होती रहती है, उसे परिणामिनित्य कहते हैं, जैसे स्वर्ण-मृदादि पदार्थ कटक-घटादिरूप में परिणत होकर भी अपनी तात्त्विक स्वर्णरूपता मृद्रूपता को कभी नहीं गँवाते, अतः परिणामिनित्य कहे जाते हैं। परिणामिनित्यता कभी पारमार्थिकी नहीं होती, क्योंकि परिणमनशील वस्तु क्या पूर्णरूपेण परिणत होती है ? अथवा एकदेशेन ? पूर्णरूपेण परिणत होने पर तात्त्विक व्याहृति (विनाश) क्यों नहीं होता ? एकदेशेन परिणत होने पर वह एकदेश उस वस्तु से भिन्न माना जाता है ? अथवा अभिन्न ? यदि भिन्न है, तब उस अपने से भिन्न एक देश के परिणत होने पर वह वस्तु क्योंकर परिणत मानी जायगी ? क्योंकि अन्य ( भिन्न ) वस्तु के परिणत होने पर अन्य वस्तु में 'परिणमते'—ऐसा व्यवहार कभी नहीं होता । अन्यथा एक स्वर्ण-पिण्ड के परिणत होने पर 'विश्वं परिणमते'—ऐसा व्यवहार अतिप्रसक्त होगा । यदि वह ( परिणममान ) एकदेश उस वस्तु से अभिन्न है, तब उस एकदेश के परिणत होने पर उससे अभिन्न वस्तु का सर्वात्मना परिणाम क्यों नहीं माना जाता ?
शङ्का—वस्तु का परिणममान अवयव वस्तु से भिन्न भी है और अभिन्न भी, क्योंकि एक ही सुवर्णरूप कारण के कटक-कुण्डलादि कार्य परस्पर कार्यरूपेण ( कटकत्वादिरूपेण ) भिन्न और कारणगत सुवर्णत्वरूपेण अभिन्न । 'कटकं कुण्डलाद् भिन्नमभिन्नं च'—ऐसी प्रतीति को विरुद्ध भी नहीं कह सकते, क्योंकि प्रमाण से बाधित पदार्थ को विरुद्ध कहा जाता है, किन्तु जैसे एक ही कुण्डल में 'कुण्डलमिदं' और 'सुवर्णमिदम्'—इस प्रकार दोनों प्रतीतियाँ प्रामाणिक मानी जाती हैं, वैसे ही कटक में भी 'कटकमिदम्' और 'सुवर्णमिदम्'—इस प्रकार दोनों प्रतीतियाँ अनुभव-सिद्ध हैं, फलतः कटक और कुण्डल—दोनों सुवर्णरूप होने से अभिन्न और कटकत्वादिरूपेण भिन्न हैं— ऐसा मानना प्रमाण-बाधित नहीं, अपितु प्रमाण के अनुरूप ही है, तब इसे विरुद्ध क्योंकर कहा जा सकता है ? जिन पदार्थों में भेद और अभेद—दोनों प्रमाण-सिद्ध हैं, उन्हें भिन्नाभिन्न कहना विरुद्ध कदापि नहीं ।
कटक और कुण्डल का ऐकान्तिक अभेद मानने पर 'इमे कटककुण्डले'—ऐसी प्रतीति न होकर 'इमे कटके या इमे कुण्डले'—इस प्रकार एक-एक कार्य का दो बार भान होना चाहिए । इसी प्रकार दोनों का ऐकान्तिक भेद मानने पर जैसे कटक को कुण्डल नहीं कहा जाता, वैसे कटक को सुवर्ण भी नहीं कह सकते, अतः 'कटकं सुवर्णम्'—इस प्रकार का सामानाधिकरण्य-व्यपदेश न हो सकेगा, क्योंकि अत्यन्त भिन्न गौ और अश्व का कहीं भी 'गौरश्वः'—इस प्रकार का सामानाधिकरण्य-व्यवहार कभी नहीं होता । यद्यपि अपर्याय शब्दों
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भामती
न हि भवति कुण्डं बदरमिति। नाप्येकासनस्थयोश्चैत्रमैत्रयोश्चैत्रो मैत्र इति। सोऽयमबाधितोऽसन्दिग्धः सर्वजनीनः सामानाधिकरण्यप्रत्यय एव कार्यकारणयोर्भेदाभेदौ व्यवस्थापयति। तथा च कार्याणां कारणात्मकत्वात् कारणस्य च सद्रूपस्य सर्वत्रानुगमात् सद्रूपेणाभेदः कार्यस्य जगतो भेदः कार्यरूपेण गोघटादिनेति। यथाहुः—
कार्यरूपेण नानात्वमभेदः कारणात्मना।
हेमात्मना यथाऽभेदः कुण्डलाद्यात्मना भिदा॥ इति।
अत्रोच्यते—कः पुनरयं भेदो नाम, यः सहाभेदेनेकत्र भवेत्। परस्पराभाव इति चेत्, किमयं कार्यकारणयोः कटकहाटकयोरस्ति न वा। न चेदेकत्वमेवास्ति न च भेदः। अस्ति चेद् भेद एव नाभेदः। न च भावाभावयोर्विरोधः, सहावस्थानासम्भवात्। सम्भवे वा कटकवर्धमानकयोरपि तत्त्वेनाभेदप्रसङ्गः, भेदस्याभेदाविरोधात्। अपि च कटकस्य हाटकादभेदे यथा हाटकात्मना कटकमुकुटकुण्डलादयो न भिद्यन्ते
भामती-व्याख्या
का एक ही अर्थ में वाच्यत्वेन प्रवृत्त होना सामानाधिकरण्य कहलाता है, वह भेदाभेद-पक्ष में ही बनता है—ऐसा नहीं, अपितु आधाराधेयभाव और एकाश्रयवृत्तिता को लेकर भी देखा जाता है, जैसे 'मृद् घटः'—यहाँ पर मृत्तिका आधार और घट आधेय है, एवं 'एकं रूपम्'—यहाँ 'एकत्व' संख्या और 'रूप'—दोनों पदार्थ एक ही घटादि आश्रय में रहते हैं, अतः उनका भी सामानाधिकरण्य-व्यवहार देखा जाता है। तथापि वह काचित्क है, सार्वत्रिक नहीं, अन्यथा कुण्डाद्यात्मक आधार और बदराद्यात्मक आधेय का भी 'कुण्डं बदरम्'—ऐसा व्यवहार होना चाहिए। इसी प्रकार एक ही आसन पर बैठे हुए चैत्र और मैत्र का भी 'चैत्रो-मैत्रः'—इस प्रकार सामानाधिकरण्य-प्रत्यय होना चाहिए। परिशेषतः सभी सुवर्णादि कारणपदार्थों और कटकादि कार्य पदार्थों का सार्वत्रिक और सर्वजनीन अबाधित सामानाधिकरण्य-व्यवहार कार्य और कारण में भेदाभेद सम्बन्ध का व्यवस्थापक होता है। फलतः सभी गो-घटादि कार्य पदार्थों में अनुगतरूप से प्रतीत होनेवाले सद्रूप कारण का अपने कार्य-वर्ग के साथ भेदाभेद मानना आवश्यक है, जैसा कि अनेकान्तवादियों ने कहा है—
कार्यरूपेण नानात्वमभेदः कारणात्मना।
हेमात्मना यथाऽभेदः कुण्डलाद्यात्मना भिदा॥
[ इस पद्य में 'भिदा' पद का अर्थ भेद है। सुवर्ण और कुण्डलादि का 'सुवर्णं कुण्डलम्' और 'सुवर्णस्य कुण्डलम्'—इस प्रकार के दोनों व्यवहारों का भेदाभेद सम्बन्ध के द्वारा निर्वाह हो जाता है ]।
समाधान—वह भेद पदार्थ कौन है जो कि अभेद के साथ एक आधार में रह जाता है? यदि वह अन्योऽन्याभावात्मक है, तब जिज्ञासा होती है कि वह (अन्योऽन्याभाव) सुवर्ण और कटकादिरूप कारण और कार्य पदार्थों में रहता है? अथवा नहीं? यदि नहीं रहता, तब कार्य और कारण का आत्यन्तिक अभेद ही स्थिर होता है, भेद नहीं। कार्य और कारण पदार्थों में यदि अन्योऽन्याभाव रहता है, तब उनमें भेद ही पर्यवसित होता है, अभेद नहीं। 'भेदाभेद या भावाभाव का विरोध नहीं—ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि दो विरोधी पदार्थों का सहावस्थान (एकत्र रहना) सम्भव नहीं। यदि सम्भव माना जाता है, तब कटक, कुण्डल और वर्धमानक (प्याला) आदि कार्य पदार्थों का आत्यन्तिक अभेद होना चाहिए, क्योंकि भेद अत्र अभेद का विरोधी होता है। दूसरी बात यह भी है कि कटक जिस सुवर्ण से अभिन्न है, उसी सुवर्ण से मुकुट और कुण्डलादि अभिन्न हैं, अतः कटक, मुकुट और कुण्डलादि का
कूटस्थनित्यत्वादिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १३९
भामती
एवं कटकात्मनापि न भिद्येरन्, कटकस्य हाटकादभेदात् । तथा च हाटकमेव वस्तु सन्न कटकादयो भेदस्याप्रतिभासनात् । अथ हाटकत्वेनाप्यभेदो न कटकत्वेन तेन तु भेद एव कुण्डलादेः । यदि हाटकादभिन्नः कटकः कथमयं कुण्डलादिषु नानुवर्त्तते । नानुवर्त्तते चेत्, कथं हाटकादभिन्नः कटकः । ये हि यस्मिन्ननुवर्त्तमाने व्यावर्तन्ते ते ततो भिन्ना एव, यथा सूत्रात् कुसुमभेदाः । नानुवर्त्तन्ते चानुवर्त्तमानेऽपि हाटकत्वे कुण्डलादयः, तस्मात्तेऽपि हाटकाद्भिन्ना एवेति । सत्तानुवृत्त्या च सर्ववस्त्वनुगमे इदमिह नेदमिदमस्मान्नेदमिदानीं नेदमिदमेवं नेदमिति विभागो न स्यात् । कस्यचित् क्वचित् कदाचित् कथञ्चिद्विवेकहेतोरभावात् । अपि च दूरात्कनकमित्यवगते न तस्य कुण्डलादयो विशेषा जिज्ञास्येरन्, कनकादभेदात्तेषां, तस्य च ज्ञातत्वात् । अथ भेदोऽप्यस्ति कनकात् कुण्डलादीनामिति कनकावगमेऽप्यज्ञातास्ते । नन्वभेदोऽप्यस्तीति किं न ज्ञाताः । प्रत्युत ज्ञानमेव तेषां युक्तं, कारणाभावे हि कार्याभाव औत्सर्गिकः, स च कारण-
भामती-व्याख्या
आत्यन्तिक अभेद होना चाहिए, क्योंकि 'स्वाभिन्नाभिन्नस्य स्वाभिन्नत्वम्'—ऐसा नियम लोक-प्रसिद्ध है, तब तो कटकादि के रूप में सर्वत्र 'सुवर्णम्-सुवर्णम्'—ऐसा ही भान होना चाहिए, कटकादि की कोई वस्तु-सत्ता नहीं रह जाती ।
यदि कहा जाय कि कटक में दो धर्म रहते हैं—( १ ) सुवर्णत्व और ( २ ) कटकत्व । कटक का कुण्डलादि से जो अभेद माना जाता है, वह सुवर्णत्वेन ही माना जाता है, कटकत्वेन नहीं । तब यह प्रश्न उठता है कि यदि सुवर्ण से कटक अभिन्न है, तब कुण्डलादि से अभिन्न क्यों नहीं । यदि कुण्डलादि से कटक अभिन्न नहीं, तब वह सुवर्ण से भी अभिन्न न हो सकेगा, क्योंकि अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा सुवर्ण से कटकादि का भेद सिद्ध होता है—'यस्मिन् अनुवर्तमानं यद् व्यावर्तते, तत् ततो भिन्नम्' इस नियम के अनुसार जैसे पुष्पमाला के द्वितीयादि पुष्पों के स्थान पर अनुवृत्त न रहनेवाले प्रथमादि पुष्प सर्वत्रान्वयी सूत्र (धागे) से भिन्न होते हैं, वैसे ही कुण्डलादि में अनुवर्तमान सुवर्ण से व्यावर्तमान कटक का भेद न्यायसिद्ध है । कुण्डलादि में सुवर्ण की अनुवृत्ति होने के कारण यदि कुण्डलादि का सुवर्ण से अभेद माना जाता है, तब सत्तारूप कारण का 'घटः सन्', 'पटः सन्' इस प्रकार समस्त कार्यों में अनुवर्तन होने के कारण सभी कार्य सदात्मक हो जाते हैं और असत् कोई नहीं रहता, तब 'इदमिह नेदम्', 'इदमस्मान्नेदम्', 'इदमिदानीं नेदम्', 'इदमेव नेदम्'—ऐसा विभाग न हो सकेगा, क्योंकि किसी वस्तु का कहीं पर भी कोई विभाजक धर्म नहीं रह जाता । यह भी एक प्रश्न उठ खड़ा होता है कि दूर से 'सुवर्णमिदम्'—इस प्रकार का ज्ञान हो जाने पर जैसे सुवर्ण के विषय में सन्देह नहीं होता, वैसे ही कुण्डलादि का सन्देह नहीं होना चाहिए, क्योंकि सुवर्ण से कुण्डलादि का अभेद माना जाता है । यदि कहा जाता है कि सुवर्ण से कुण्डलादि का भेद भी माना जाता है, अतः सुवर्ण का ज्ञान हो जाने पर भी कुण्डलादि अज्ञात रह जाते हैं, फलतः उनकी जिज्ञासा होती है । तब यह भी स्मरण दिलाया जा सकता है कि कुण्डलादि से सुवर्ण का अभेद भी तो माना जाता है, अतः ज्ञात हो जाने पर कुण्डलादि की जिज्ञासा क्यों होगी ? कुण्डलादि के ज्ञान का कारण न होने पर ज्ञानरूप कार्य का अभाव हो सकता था, किन्तु सुवर्णाभेद रूप कारण का सद्भाव होने से कारणाभाव बाधित हो जाता है, ज्ञात सुवर्ण से अभिन्न होने के कारण जब कुण्डलादि भी ज्ञात ही हो जाते हैं, तब उनकी जिज्ञासा एवं जिज्ञासा-निवृत्ति के लिए उनका ज्ञान करना निरर्थक ही हो जाता है । अतः जिज्ञास्य अत एव अज्ञात कुण्डलादि ज्ञात सुवर्ण से भिन्न ही सिद्ध होते हैं, क्योंकि 'यस्मिन् ज्ञाते यन्न
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भामती
सत्तयाऽपोद्यते। अस्ति चाभेदे कारणसत्तेति कनके ज्ञाते ज्ञाता एव कुण्डलादय इति तज्जिज्ञासाज्ञानानि चानर्थकानि स्युः। तेन यस्मिन् गृह्यमाणे यन्न गृह्यते तत्ततो भिद्यते। यथा करभे गृह्यमाणेऽगृह्यमाणो रासभः करभात्। गृह्यमाणे च दूरतो हेम्नि न गृह्यन्ते तस्य भेदाः कुण्डलादयः, तस्मात्ते हेम्नो भिद्यन्ते। कथं तर्हि हेम कुण्डलमिति सामानाधिकरण्यमिति चेत् न ह्याधाराधेयभावे समानाश्रयत्वे वा सामानाधि-करण्यमित्युक्तम्। अथानुवृत्तिव्यावृत्तिव्यवस्था च हेम्नि ज्ञाते कुण्डलादिविजिज्ञासा च कथम्। न खल्वभेद ऐकान्तिकेऽनेकान्तिके चेतदुभयमुपपद्यते यत इत्युक्तम्। तस्माद् भेदाभेदयोरन्यतरस्मिन्नवधेयेऽभेदोपादानैव भेदकल्पना न भेदोपादानाऽभेदकल्पनेति युक्तम्। भिद्यमानतन्त्रत्वाद्भेदस्य भिद्यमानानां च प्रत्येकमेकत्वात्, एकाभावे चानाश्रयस्य भेदस्यायोगात्, एकस्य च भेदानधीनत्वात्, नायमयमिति च भेदग्रहस्य प्रतियोगिग्रह-सापेक्षत्वादेकत्वग्रहस्य चान्यानपेक्षत्वादभेदोपादानेवानिर्वचनीयभेदकल्पनेति साम्प्रतम्। तथा च श्रुतिः— 'मृत्तिकेत्येव सत्यम्' इति तस्मात् कूटस्थनित्यतैव पारमार्थिकी न परिणामिनित्यतेति सिद्धम्। ॐ व्योम-वद् ॐ इति च दृष्टान्तः परसिद्धः अस्मन्मते तस्यापि कार्यत्वेनानित्यत्वात्।
अत्र च ॐ कूटस्थनित्यम् ॐ। इति निर्वर्त्यकर्मतामपाकरोति ॐ सर्वव्यापि ॐ। इति प्राप्य-
भामती-व्याख्या
ज्ञायते तत् ततो भिद्यते'—इस न्याय के अनुसार जैसे करभ (ऊँट) का ज्ञान हो जाने पर भी रासभ (गर्दभ) अज्ञात ही रह जाता है, अतः वह करभ से भिन्न होता है, वैसे ही कुण्डलादि सुवर्ण से भिन्न क्यों न होंगे ?
यदि सुवर्ण से कुण्डलादि भिन्न हैं, तब 'सुवर्णं कुण्डलम्'—ऐसा सामानाधिकरण्य-व्यवहार क्योंकर होगा ? आधाराधेयभाव या एकाश्रयवृत्तित्व को लेकर सामानाधिकरण्य, व्यवस्था नहीं हो सकती—यह कहा जा चुका है। अनुवृत्ति (अन्वय-व्यतिरेक) के आधार पर कारण और कार्य का भेद सम्भव नहीं, क्योंकि इस पक्ष में भी दूर से 'सुवर्णमिदं' ऐसा ज्ञान हो जाने पर कुण्डलादि की जिज्ञासा कैसे होगी ? जैसे ऐकान्तिक अभेद मानने पर कुण्डलादि की जिज्ञासा उपपन्न नहीं होती, वैसे ही अनैकान्तिक (भेदाभेद) पक्ष में भी ये दोनों (अनुवृत्ति-व्यावृत्ति-व्यवस्था एवं कुण्डलादि-जिज्ञासा) उपपन्न नहीं हो सकते। फलतः भेद और अभेद में से एक का परित्याग आवश्यक हो जाने पर भेद का परित्याग एवं भेदाश्रित भेद का कल्पन मानना उचित है, भेदाश्रित अभेद की कल्पना युक्त नहीं, क्योंकि भेद सदैव भिद्यमान पदार्थों के आश्रित होता है, भिद्यमान पदार्थों में से प्रत्येक को भिन्न नहीं, अभिन्न या एक ही माना जाता है, क्योंकि एक पदार्थ के न होने पर भेद किसके आश्रित रहेगा ? एकात्मक वस्तु भेद के अधीन नहीं होती, क्योंकि 'अयम् अयं (घटः पटो) न भवति'—इस प्रकार प्रतीयमान भेद सदैव प्रतियोगी के ज्ञान की अपेक्षा करता है, किन्तु एकत्व-ज्ञान अन्य किसी की भी अपेक्षा नहीं करता, परिशेषतः अभेद के आश्रित अनिर्वचनीय भेद की कल्पना ही युक्ति-संगत है, जैसा कि श्रुति कहती है—"मृत्तिकेत्येव सत्यम्"। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि कूटस्थ-नित्यता ही पारमार्थिक है, परिणामि-नित्यता नहीं। भाष्यकार ने जो कूटस्थ-नित्यता में दृष्टान्त दिया है—'व्योमवत्', वह न्याय-मत के अनुसार है, क्योंकि वेदान्त-सिद्धान्त में व्योम भी जन्य होने के कारण अनित्य ही है। उत्पत्ति, प्राप्ति, विकृति और संस्कृति क्रिया के भेद से कर्मता (क्रियाश्रितता) भी चार प्रकार की होती है—(१) उत्पाद्यता, (२) प्राप्यता, (३) विकृतता तथा (४) संस्कृतता। ब्रह्मभाव में 'कूटस्थनित्य' पद के द्वारा उत्पाद्यकर्मता, 'सर्वव्यापि' विशेषण के द्वारा प्राप्यकर्मता, 'सर्वविक्रियारहितम्' ऐसा कहकर विकार्यतात्मक कर्मता और 'निरवयवम्' पद के द्वारा संस्कार्य कर्मता की निवृत्ति
कूटस्थनित्यत्वादिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १४१
यारहितं, नित्यतृप्तं, निरवयवं, स्वयंज्योतिःस्वभावम्। यत्र धर्माधर्मौ सह कार्येण कालत्रयं च नोपावर्तेते। तदेतदशरीरत्वं मोक्षाख्यम्। 'अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात्। अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च' कठ० २।१४) इत्यादिश्रुतिभ्यः। अतस्तद् ब्रह्म यस्येयं जिज्ञासा प्रस्तुता, तद्यदि कर्तव्यशेषत्वेनोपदिश्येत, तेन च कर्तव्येन साध्यश्चेन्मोक्षोऽभ्युपगम्येत, अनित्य एव स्यात्। तत्रैवं सति यथोक्तकर्मफलेष्वेव तारतम्यावस्थितेष्वनित्येषु कश्चिदतिशयो मोक्ष इति प्रसज्येत। नित्यश्च मोक्षः सर्वैर्मोक्षवादिभिरभ्युपगम्यते, अतो न कर्तव्यशेषत्वेन ब्रह्मोपदेशो युक्तः। अपि च 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' (मुण्ड० ३।२।९) 'क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे' (मुण्ड० २।२।८)। 'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन' (तैत्ति० २।९)। 'अभयं वै जनक प्राप्तोऽसि' (बृह० ४।२।४)। 'तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मीति तस्मात्तत्सर्वमभवत्' (वाजसनेयिब्राह्मणोप० १।४।१०)। 'तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः' (ईशा० ७) इत्येवमाद्याः श्रुतयो ब्रह्मविद्यानन्तरं मोक्षं दर्शयन्त्यो मध्ये कार्यान्तरं वारयन्ति। तथा 'तद्वैतत्पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभवं सूर्यश्च' (बृह० १।४।१०) इति ब्रह्मदर्शनसर्वात्मभावयोर्मध्ये कर्तव्यान्तरवारणायोदाहार्यम्। यथा तिष्ठन्गायतीति तिष्ठतिगायतयोर्मध्ये तत्कर्तृकं कार्यान्तरं नास्तीति
भामती
कर्मताम् ॐ सर्वविक्रियारहितम् ॐ । इति विकार्यकर्मताम्, ॐ निरवयवम् ॐ । इति संस्कार्यकर्मताम् । व्रीहीणां खलु प्रोक्षणेन संस्काराख्योऽतिशयो यथा जन्यते, नैवं ब्रह्मणि कश्चिदंशः क्रियाध्येयोऽस्त्यनवयवत्वात् । अनंशत्वादित्यर्थः । पुरुषार्थतामाह ॐ नित्यतृप्तम् इति ॐ । तृप्त्या दुःखरहितं सुखमुपलक्षयति । क्षुद्दुःख-निवृत्तिसहितं हि सुखं तृप्तिः । सुखं चाप्रतीयमानं न पुरुषार्थ इत्यत आह ॐ स्वयंज्योतिः इति ॐ । तदेवं स्वमतेन मोक्षाख्यं फलं नित्यं श्रुत्यादिभिरुपपाद्य क्रियानिष्पाद्यस्य तु मोक्षस्यानित्यत्वं प्रसञ्जयति ॐ तद्यदि इति ॐ । न चागमबाधः, आगमस्योक्तेन प्रकारेणोपपत्तेः । अपि च ज्ञानजन्यापूर्वजनितो मोक्षो नैयोगिक इत्यस्यार्थस्य सन्ति भूयस्यः श्रुतयो निवारिका इत्याह ॐ अपि च ब्रह्म वेद इति ॐ । अविद्या-
भामती-व्याख्या
की गई है, क्योंकि जैसे "व्रीहीन् प्रोक्षति"—इस श्रुति से विहित व्रीहि में प्रोक्षणरूप संस्कार के द्वारा अदृष्ट उत्पन्न होता है, वैसा ब्रह्म में कोई अंश उत्पन्न नहीं होता, ब्रह्म सर्वथा निरवयव और निरंश होता है। ब्रह्मभाव में पुरुषार्थता (पुरुषाभिलाषा) प्रकट करने के लिए 'नित्यतृप्तम्'—ऐसा कहा गया है। यहाँ 'तृप्ति' पद की दुःखाभावरूप सुख में लक्षणा विवक्षित है, क्योंकि क्षुधारूप दुःख की निवृत्ति का ही नाम तृप्ति है। अप्रतीयमान सुख पुरुषाभिलषित नहीं होता, अतः सदा प्रतीयमानता प्रकट करने के लिए कहा है—"स्वयंज्योतिः"। इस प्रकार अपने अद्वैत वेदान्त के अनुसार श्रुत्यादि के द्वारा मोक्षरूप फल की नित्यता का उपपादन करके पराभिमत कर्मजन्य मोक्ष में अनित्यता का प्रसञ्जन करते हैं—"तद् यदि कर्त्तव्यशेषत्वेनोपदिश्येत, तेन च कर्त्तव्येन साध्यश्चेन्मोक्षोऽभ्युपगम्येत, अनित्य एव स्यात्"। क्रिया-साध्य या अनित्य मोक्षवाद में मोक्षगत नित्यता के प्रतिपादक आगम वाक्यों का विरोध इसलिए प्रसक्त नहीं होता कि मोक्षगत नित्यता के प्रतिपादक आगम वाक्यों का उस (क्रिया-साध्य) मोक्ष में तात्पर्य न होकर नित्यमोक्ष में ही होता है। केवल इतना ही नहीं, ज्ञानजन्य अपूर्व या नियोग के द्वारा साध्य होने के कारण मोक्ष के नैयोगिकत्व-मत की निषेधिका बहुत सी श्रुतियाँ हैं, यह दिखाने के लिए कहा जाता है—"अपि च ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' इत्येवमादयः श्रुतयो ब्रह्मविद्यानन्तरं दर्शयन्त्यो मध्ये कार्यान्तरं वारयन्ति"। कथित द्विविध
१४२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४
गम्यते । ‘त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसि’ ( प्रश्न० ६।८ ) ‘श्रुतं ह्येव मे भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकमात्मविदिति सोऽहं भगवः शोचामि तं मां भगवान्छोकस्य पारं तारयतु’ ( छान्दो० ७।१।३ ) ‘तस्मै मृदितकषायाय तमसः पारं दर्शयति भगवान्सनत्कुमारः’ ( छान्दो० ७।२६।२ ) इति चैवमाद्याः श्रुतयो मोक्षप्रतिबन्धनिवृत्तिमात्रमेवात्मज्ञानस्य फलं दर्शयन्ति । तथा चाचार्यप्रणीतं न्यायोपबृंहितं सूत्रम्—‘दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः’ (न्या०
भामती
द्वयप्रतिबन्धापनयमात्रेण च विद्याया मोक्षसाधनत्वे न स्वतःपूर्वोत्पादेन चेत्यत्रापि श्रुतिमुदाहरति ॐ त्वं हि नः पिता इति ॐ । न केवलमस्मिन्नर्थे श्रुत्यादयोऽपि त्वक्षपादाचार्यसूत्रमपि न्यायमूलमस्तीत्याह ॐ तथा चाचार्यप्रणीत० इति ॐ । आचार्यश्लोकलक्षणः पुराणे ।
‘आचिनोति च शास्त्रार्थमाचारे स्थापयत्यपि ।
स्वयमाचरते यस्मादाचार्यस्तेन सोच्यते ॥ इति ।
तेन हि प्रणीतं सूत्रं "दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तराभावादपवर्ग इति" । पाठापेक्षया कारणमुत्तरं, कार्यं च पूर्वं, कारणापाये कार्यापायः, कफापाय इव कफोद्भवस्य ज्वरस्यापायः । जन्मापाये दुःखापायः प्रवृत्त्यपाये जन्मापायः, दोषापाये प्रवृत्त्यपायः, मिथ्याज्ञानापाये
भामती-व्याख्या
अविद्यारूप प्रतिबन्ध की निवर्तिका होने मात्र से विद्या ( ब्रह्म-वेदन ) को मोक्ष का साधन माना जाता है, वस्तुतः विद्या न तो स्वतः और न अपूर्वोत्पत्ति के द्वारा मोक्ष की जनिका मानी जाती है — इस रहस्य में प्रमाणभूत श्रुतियों का उदाहरण दिया जाता है—"त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं दर्शयति भगवान् सनत्कुमारः" ( छान्दो. ७।२६।२ ) इति चैवमाद्याः श्रुतयो मोक्षप्रतिबन्धनिवृत्तिमात्रमेवात्मज्ञानस्य फलं दर्शयन्ति ।" केवल श्रुतियाँ ही उक्त अर्थ में प्रमाण नहीं, अपि तु महर्षि अक्षपाद के द्वारा प्रणीत सूत्र भी प्रमाण है— "तथा चाचार्यप्रणीतं न्यायोपबृंहितं सूत्रम्—"दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः' ( न्या. सू. १।१।२ ) इति" । शिक्षा-दीक्षा के क्षेत्र में आचार्य का नितान्त उन्नत स्थान है, आचार्य की शरण लिए बिना विद्या फलवती ही नहीं होती— "आचार्याद्धि विद्या विहिता साधिष्ठं प्रापयति" ( छां. ४।९।३ ) । द्विजाति को उपनीत, संस्कृत एवं दीक्षित करने का दायित्व आचार्य पर ही है ( मनु. २।१४० ) निरुक्त (१।४), आपस्तम्ब धर्मसूत्र (१।१।१।४) एवं पुराणों में आचार्य का गौरव वर्णित है । कारण की निवृत्ति से कार्य की निवृत्ति, कारण पूर्ववृत्ति और कार्य उत्तर वृत्ति होना स्वाभाविक है, अतः पूर्वं-पूर्वं की निवृत्ति से उत्तरोत्तर की निवृत्ति का कथन न्याय-संगत है, किन्तु यहाँ सूत्रकार जो उत्तरोत्तर की निवृत्ति से पूर्व-पूर्वं की निवृत्ति का अभिधान करता है, वह अपने सूत्र में पठित पद-क्रम को ध्यान में रख कर कहा है । दुख, जन्म, प्रवृत्ति ( धर्माधर्म ), दोष ( राग-द्वेष ) और मिथ्याज्ञान में पूर्व-पूर्वं कार्य और उत्तरोत्तर कारण का निर्देश किया गया है, अतः 'उत्तरोत्तरापाये' का अर्थ 'कारणानामभावे सति'—ऐसा ही है । 'तत्पूर्वापायः' का अर्थ है—'कार्याणामभावः' । कारण का अभाव होने से वैसे ही कार्य का अभाव होता है, जैसे कफ दोष का अभाव हो जाने से कफज ज्वर का अभाव हो जाता है । अर्थात् जन्म का अभाव होने से दुःख का धर्माधर्मरूप प्रवृत्ति का अभाव होने से जन्म का, दोष ( राग द्वेष ) का अभाव होने से प्रवृत्ति का एवं मिथ्याज्ञान का अभाव हो जाने से दोष का अभाव हो जाता
सम्प्रद्रूपज्ञानविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १४३
स० १।१।२ ) इति । मिथ्याज्ञानापायश्च ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानाद्भवति । न चेदं ब्रह्मात्मैक- त्वविज्ञानं संपद्रूपम्, यथा 'अनन्तं वै मनोऽनन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति' (बृह० ३।१।९) इति । न चाध्यासरूपम्, यथा 'मनो ब्रह्मेत्युपासीत' (छान्दो०
भामती
दोषापायः । मिथ्याज्ञानं चाविद्या, रागाद्युपजनितक्रमेण दृष्टेनैव संसारस्य परमं निदानम् । सा च तत्त्वज्ञानेन ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानेनावगतिपर्यन्तेन विरोधिना निवर्त्यते । ततोऽविद्यानिवृत्त्या ब्रह्मरूपावि- र्भावो मोक्षः । न तु विद्याकार्यस्तज्जनितापूर्वकार्यो वेति सूत्रार्थः । तत्त्वज्ञानान्मिथ्याज्ञानापाय इत्येता- वन्मात्रेण सूत्रोपन्यासः, न त्वक्षपादसम्मतं तत्त्वज्ञानमिह सम्मतम् । तदनेनाचार्यान्तरसंवादेनायमर्थो दृढ़ीकृतः ।
स्यादेतत्—नैकत्वविज्ञानं स्थितवस्तुविषयं, येन मिथ्याज्ञानं भेदावभासं निवर्त्तयन्न विधि- विषयो भवेत् । अपि तु सम्पदादिरूपम् । तथा च विधेः प्रागप्राप्तं पुरुषेच्छया कर्त्तव्यं सद्विधिविगोचरो भविष्यति । यथा वृत्त्यनन्तत्वेन मनसो विश्वदेवसाम्याद् विश्वान् देवान् मनसि सम्पाद्य मन आल- म्बनमविद्यमानसभं कृत्वा प्राधान्येन सम्पाद्यानां विश्वेषामेव देवानामन्डुचिन्तनं तेन चानन्तलोकप्राप्तिः । एवं चिद्रूपसाम्याज्जीवस्य ब्रह्मरूपतां सम्पाद्य जीवमालम्बनमविद्यमानसभं कृत्वा प्राधान्येन ब्रह्मानुचिन्तनं तेन चामृतत्वफलप्राप्तिः । अध्यासे त्वालम्बनस्यैव प्राधान्येनाारोपिततद्भावस्यानुचिन्तनं, यथा मनो ब्रह्मेत्यु-
भामती-व्याख्या
है । मिथ्या ज्ञान का नाम ही अविद्या है, वह ( अविद्या ) जीव में राग-द्वेषरूप दोष को, दोष प्रवृत्ति को प्रवृत्ति जन्म को और जन्म विविध दुःखों को उत्पन्न करता है । उक्त अविद्या जीवब्रह्माभेद-साक्षात्काररूप तत्त्वज्ञान के द्वारा निवृत्त ( नष्ट ) की जाती है, क्योंकि विद्या अविद्या की सर्वथा विरोधिनी है । अविद्या की निवृत्ति से ब्रह्मभावरूप मोक्ष का आविर्भाव हो जाता है । मोक्ष न तो विद्या का कार्य होता है और न अविद्या-जनित अपूर्व या नियोग का फल । तत्त्व-ज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश होता है— इतना ही दिखाने के लिए भाष्यकार ने यहाँ न्याय-सूत्र उद्धृत किया है, न कि अक्षपाद-सम्मत तत्त्व-ज्ञान और मोक्ष से सम्मति प्रकट करने के लिए, क्योंकि आगे चल कर तर्कपाद में न्याय-मत का भी पूर्णतया निराकरण किया गया है । यहाँ अन्यमतावलम्बी आचार्य का संवाद दिखा कर अपने सिद्धान्त का दृढीकरणमात्र विवक्षित है ।
शङ्का—यह जो कहा गया कि यहाँ 'तत्त्वज्ञान' पद से जीव और ब्रह्म की एकता का ज्ञान विवक्षित है, वह संगत नहीं, क्योंकि वह एकत्व-विज्ञान केवल यथावस्थितवस्तुविषयक नहीं कि वह मिथ्या का निवर्तक होकर विधि का विषय न होता । वस्तु-स्थिति यह है कि यहाँ एकत्व-ज्ञान सम्पदादिरूप है । अन्य वस्तु में अन्यरूपता-का सम्पादन पुरुष की इच्छा पर निर्भर है, अतः विधि के पूर्व कर्त्तव्यत्वेन अप्राप्त होकर सम्परूप ज्ञान विधेय हो जाता है, जैसे कि मन की वृत्तियाँ अनन्त हैं और विश्वदेव भी अनन्त हैं, अतः अनन्तत्व की समानता को लेकर मन में विश्वदेवरूपता का सम्पादन किया जाता है । सम्पादन का अर्थ है—आलम्बनीभूत मन को अविद्यमान-जैसा करके प्रधानतः आरोप्यमान विश्वदेव का अनुचिन्तन । उससे अनन्त- लोक की प्राप्ति होती है । उसी प्रकार जीव और ब्रह्म के चिद्रूपत्वात्मक साम्य को लेकर जीव में ब्रह्मरूपता का सम्पादन अर्थात् आलम्बनीभूत जीव की उपेक्षा कर प्रधानतः ब्रह्मरूपता का अनुचिन्तन किया जाता है, उस अनुचिन्तन से अमृतत्व की प्राप्ति होती है। यद्यपि 'सम्पद्' और 'अध्यास'—दोनों ही आरोप-ज्ञान हैं, तथापि सम्पद में आरोप्य एवं अध्यास में अधिष्ठान वस्तु क? प्राधान्य विवक्षित होता है, जैसे "मनो ब्रह्मेत्युपा?
१४४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४
३।१८।१) 'आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः' (छान्दो० ३।१९।१) इति च मनआदित्यादिषु ब्रह्मदृष्टयध्यासः। नापि विशिष्टक्रियायोगनिमित्तं 'वायुर्वाव संवर्गः' (छान्दो० ४।३।१) 'प्राणो वाव संवर्गः' (छान्दो० ४।३।३) इतिवत्। नाप्याज्यवेक्षणादिकर्मवत्कर्माङ्ग-संस्काररूपम्। संपदादिरूपे हि ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानेऽभ्युपगम्यमाने 'तत्त्वमसि' (छान्दो० ६।८।७) 'अहं ब्रह्मास्मि' (बृह० १।४।१०) 'अयमात्मा ब्रह्म' (बृह० २।५।१९) इत्येवमादीनां वाक्यानां ब्रह्मात्मैकत्ववस्तुप्रतिपादनपरः पदसमन्वयः पीड्येत। 'भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः' (मुण्ड० २।२।८) इति चैवमादीन्यविद्या-
भामती
पासीतादित्यो ब्रह्मेत्यादेश एवं जीवमब्रह्म ब्रह्मेत्युपासीतेति। क्रियाविशेषयोगाद्वा, यथा वायुर्वाव संवर्गः प्राणो वाव संवर्गः। बाह्या खलु वायुदेवता वह्न्यादीन् संवृङ्क्ते। महाप्रलयसमये हि वायुर्वह्नयादीन् संवृज्य संहृत्यात्मनि स्थापयति। यथाह द्रविडाचार्यः—'संहरणाद्वा संवरणाद्वा सात्मीभावाद्वायुः संवर्गः' इति। अध्यात्मं च प्राणः संवर्ग इति। स हि सर्वाणि वागादीनि संवृङ्क्ते, प्रयाणकाले हि स एव सर्वाणी-न्द्रियाणि संगृह्योत्क्रामतीति। सेयं संवर्गदृष्टिर्वायौ प्राणे च दशाशागतं जगद्दर्शयति यथा, एवं जीवात्मनि बृंहणक्रियया ब्रह्मदृष्टिरमृतत्वाय फलाय कल्पत इति। तदेतेषु त्रिष्वपि पक्षेष्वात्मदर्शनोपासनादयः प्रधान-कर्मण्यपूर्वविषयत्वात् स्तुतशस्त्रवत्।
भामती-व्याख्या
(छां. ३।१८।१) यहाँ पर ब्रह्मरूपता का जिसमें आरोप किया है, ऐसे मन का अनुचिन्तन जब किया जाता है—'यह जो हमारा मन है, वही ब्रह्म है'। तब इसे अध्यासानुचिन्तन कहते हैं और जब मन की उपेक्षा कर ब्रह्म का अनुचिन्तन किया जाता है—यह हमारा मन नहीं अपितु ब्रह्म है, ऐसे ब्रह्मप्रधानक अनुचिन्तन को सम्पत् कहा जाता है, जैसे अब्रह्मभूत जीव के लिए कहा गया है—"ब्रह्मेत्युपासीत"।
अथवा क्रिया-विशेष के सम्बन्ध से ब्रह्म-ज्ञान में विधेयता का निर्वाह हो सकता है, जैसे “वायववि संवर्गः, प्राणो वाय संवर्गः” (छां. ४।३।१-३)। अर्थात् बाह्य (अन्तरिक्षस्थ) वायु देवता प्रलय के समय अग्न्यादि पदार्थों को अपने में संवर्जित या उपसंहृत कर लेता है, जैसा द्रविडाचार्य ने कहा है—"संहरणाद्वा संवरणाद्वा सात्मीभावाद् वायुः संवर्गः"। बाह्य वायु के समान ही शरीर के अन्दर की प्राणसंज्ञक वायु भी संवर्ग है, क्योंकि वह वागादि सभी इन्द्रियों का संवर्जन करती है। अर्थात् प्राण मृत्यु के समय सभी इन्द्रियों को अपने में समेट कर शरीर से उत्क्रमण करता है। बाह्य वायु और प्राण में यह संवर्ग दृष्टि दसों दिशाओं में व्याप्त अन्नादत्व का दर्शन प्रस्तुत करती है।
उसी प्रकार जीवात्मा में बृंहण (शरीर को संवर्धित करना) क्रिया को देख कर जीव में ब्रह्म-दृष्टि अमृतत्वरूप फल प्रदान करती है। सम्पद्, अध्यास और क्रिया-विशेष के द्वारा जीव में ब्रह्म-दृष्टि'--ये तीनों उपासनाएँ अपूर्वविषयक होने के कारण वैसे ही प्रधान कर्म मानी जाती हैं, जैसे स्तुत और शस्त्र [मीमांसा-दर्शन के द्वितीय अध्याय में कहा गया है—"स्तुतशस्त्रयोस्तु संस्कारो याज्यावद् देवताभिधानत्वात्" (जै. सू. २।१।१३)। “आज्यैः स्तुवते”, “प्रउगं शंसति”—इत्यादि विधि वाक्यों के द्वारा 'स्तुत' और शास्त्र का विधान किया गया है। साम-गान-युक्त मन्त्रों के द्वारा देवता के गुण-गान को स्तोत्र और अप्रगीत मंत्रों के द्वारा देवता के गुणों का अभिधान शस्त्र कहलाता है। उसके विषय में पूर्व पक्षी ने कहा है कि वे दोनों प्रधान कर्म नहीं, अपितु गुणकर्म हैं, क्योंकि देवताभिधान के द्वारा वैसे हो
प्रधानगुणकर्मविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १४५
निवृत्तिफलश्रवणान्यनुपरुध्येरन् । 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' ( मुण्ड० ३।२।९ ) इति चैव- मादीनि तद्भावापत्तिवचनानि संपदादिपक्षे न सामञ्जस्येनोपपद्येरन् । तस्मान्न संपदा- दिरूपं ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानम् । अतो न पुरुषव्यापारतन्त्रा ब्रह्मविद्या । किं तर्हि ? प्रत्यक्षादिप्रमाणविषयवस्तुज्ञानवद्वस्तुतन्त्रा । एवंभूतस्य ब्रह्मणस्तज्ज्ञानस्य च न
भामती
आत्मा तु द्रव्यं कर्मणि गुण इति संस्कारो वाऽऽत्मनो दर्शनं विधीयते । यथा दर्शपूर्ण- मासप्रकरणे पत्न्यवेक्षितमाज्यं भवतीति समाम्नातं प्रकरणिना च गृहीतमुपांशुयागाङ्गभूताज्यद्रव्य- संस्कारतयाऽवेक्षणं गुणकर्म विधीयते, एवं कर्तृत्वेन क्रत्वङ्गभूते आत्मन्यात्मा वा अरे द्रष्टव्य इति दर्शनं गुणकर्म विधीयते । 'यैस्तु द्रव्यं चिकीर्ष्यते गुणस्तत्र प्रतीयेत' इति न्यायात्, अत आह ❀ न चेदं ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानम् इति ❀ । कुतः, ❀ सम्पदादिरूपे हि ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञाने इति ❀ । दर्शपूर्णमासप्रकरणे हि समाम्नातमाज्यावेक्षणं तदङ्गभूताज्यसंस्कार इति युज्यते । न चात्मा वा अरे द्रष्टव्य इत्यादि कस्यचित् प्रकरणे समाम्नातम् । न चानारभ्याधीतमपि यस्य पर्णमयी जुहूर्भवतीत्यूव्यभि-
भामती-व्याख्या
देवता में संस्कार उत्पन्न करते हैं, जैसे 'याज्या' मन्त्र, अत एव याज्या मन्त्र (ऋग्विशेष) का उच्चारण गुणकर्म माना गया है। भाष्यकार कहते हैं—"याज्या देवतोपलक्षणार्था" (जै. सू. २।३।१५)। इस पूर्व पक्ष का खण्डन करते हुए सिद्धान्त स्थापित किया गया है- "अपि वा श्रुतिसंयोगात् प्रकरणे स्तौतिशंसती क्रियोत्पत्तिं विदध्यातां" (जै. सू. २।१।२२)। यहाँ 'श्रुति' पद शक्ति वृत्ति का बोधक है, अतः 'स्तौति' और 'शंसति'—इन दोनों धातुओं की शक्ति स्तुतिरूप अर्थ (देवतागत गुणों के प्रकाशन) में है। गुण-प्रकाशन का कोई दृष्ट फल नहीं, अतः क्रियोत्पत्ति (अपूर्व का उत्पादन) ही मुख्य फल है। अपूर्वार्थक कर्म प्रधान कर्म होता है]।
अथवा आत्म-दर्शन को गुण कर्म कहा जा सकता है, क्योंकि दर्शनरूप कर्म (क्रिया) का विषयीभूत आत्मा कर्मों का अङ्ग है, उसी का दर्शनरूप संस्कार 'द्रष्टव्यः' पद के द्वारा विहित है। जैसे दर्शपूर्णमास के प्रकरण में पठित "पत्न्यवेक्षितमाज्यं भवति"—इस वाक्य के द्वारा जिस आज्य (घृत) द्रव्य का दर्शनरूप संस्कार विहित है, वह आज्य दर्शपूर्णमास- घटक उपांशुयाज नाम के कर्म की हवि है—"सर्वस्मै वा एतद्यज्ञाय गृह्यते यद् ध्रुवाया- माज्यम्" (तै. ब्रा. ३।३।५।५)। 'ध्रुवा' नाम के पात्र में रखा हुआ घृत साधारण द्रव्य होने के कारण उपांशुयाज का द्रव्य माना गया है। यजमान की पत्नी के द्वारा उसका निरीक्षण उस आज्य का संस्कार गुणकर्म है। वैसे ही सभी कर्मों में अपेक्षित कर्त्ता आत्मा द्रव्य है, उसी का "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः" (बृह० २।४।५) इस अनारभ्याधीत वाक्य के द्वारा दर्शनरूप संस्कार कर्म विहित है, ऐसे संस्कार कर्मों को गुण कर्म कहा गया है— "यैस्तु द्रव्यं चिकीर्ष्यते गुणस्तत्र प्रतीयेत" (जै. सू. २।१।८)। अर्थात् जिन संस्कार कर्मों के द्वारा कोई द्रव्य संस्कार्यत्वेन आकांक्षित होता है, उन कर्मों को गुण कर्म कहते हैं।
समाधान—इस प्रकार आशङ्कित आत्मदर्शन की सम्पदादिरूपता का निराकरण करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"न चेदं ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानं सम्पद्रूपम्"। जीव-ब्रह्म का एकत्व-दर्शन सम्पदादिरूप नहीं माना जा सकता क्योंकि "सम्पदादिरूपे हि ब्रह्मात्मैकत्व- विज्ञानेऽभ्युपगम्यमाने 'तत्त्वमसि' (छां. ६।८।७) इत्यादि पदसन्दर्भः पीड्येत"। आशय यह है कि दर्शपूर्णमास के प्रकरण में पठित आज्यावेक्षण दर्शपूर्णमास कर्म के अङ्गभूत आज्य का संस्कार कर्म है—यह तो युक्ति-संगत है. किन्तु "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः"—यह वाक्य किसी भी कर्म के प्रकरण में पठित नहीं, अतः कर्माङ्गभूत द्रव्य का संस्कार क्योंकर होगा ?
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१४६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४
कयाचिद्युक्त्या शक्यः कार्यानुप्रवेशः कल्पयितुम् । न च विदिक्रियाकर्मत्वेन कार्यानुप्रवेशो ब्रह्मणः, 'अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि' ( केन० १।३ ) इति विदिक्रिया-
भामती चरितक्रतुसम्बन्धजुहूद्वारेण जुहूत्वं क्रतुं स्मारयद्वाक्येन यथा पर्णतायाः क्रतुशेषभावमापादयति, एवमात्मा-व्यभिचरितक्रतुसम्बन्धो येन तद्दर्शनं क्रत्वङ्गं सदात्मानं क्रत्वर्थं संस्कुर्यात् । तेन यद्ययं विधिस्तथापि सुवर्णं भार्यमितिवद् विनियोगभङ्गेन प्रधानकर्मैवापूर्वविषयत्वाच्च गुणकर्मेति स्थवीयस्तयैतद्दूषणमनभिधाय सर्वपक्षसाधारणं दूषणमुक्तम्, तदतिरोहितार्थतया न व्याख्यातम् । किञ्च ज्ञानक्रियाविषयत्वविधानमस्य बहुश्रुतिविरुद्धमित्याह ॐ न च विदिक्रिया इति ।
भामती-व्याख्या यद्यपि कर्म के प्रकरण में अपठित ( अनारभ्याधीत ) वाक्य के द्वारा विहित पदार्थ भी कर्म का अङ्ग हो सकता है, जैसे "यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति" ( तै. सं. ३।५।७।२ ) इस वाक्य के द्वारा जिस 'जुहू' पात्र के उद्देश्य से पर्णता [ "पलाशे किंशुकः पर्णो वातपोथः"—इस अमरकोष के अनुसार यहाँ पलाश वृक्ष का नाम पर्ण है, अतः जुहू बनाने के लिए पलाश की लकड़ी ] का विधान किया गया है । जुहू के बिना कोई याग सम्पन्न नहीं हो सकता, अतः जुहू का याग से अव्यभिचरित सम्बन्ध होने के कारण जुहू के प्रकृतिभूत पर्ण ( पलाश वृक्ष के काष्ठ ) में यागाङ्गत्व पर्यवसित हो जाता है । तथापि आत्मा का याग के साथ वैसा अव्यभिचरित सम्बन्ध न होने के कारण आत्मदर्शन में यागाङ्गत्व प्राप्त नहीं होता । अतः "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः"—यह वाक्य यदि विधि-वाक्य है, तब इसके द्वारा विहित दर्शन को वैसे ही गुणकर्म न मानकर प्रधान कर्म माना जायगा, जैसे—सुवर्ण-धारण । ["तस्मात् सुवर्णं हिरण्यं भार्यम्, सुवर्ण एव भवति, दुर्वर्णोऽस्य भ्रातृव्यो भवति" ( तै. ब्रा. २।२।४।५ ) इस अनारभ्याधीत वाक्य के द्वारा विहित शोभन वर्णवाले सुवर्ण का धारण ( कड़ा, मुन्द्रादि का हाथ और कान आदि में पहनना ) गुण कर्म है ? अथवा प्रधान कर्म ? ऐसा सन्देह होने पर पूर्वपक्षी ने कहा है—"अद्रव्यत्वात्तु शेषः स्यात्" ( जै. सू. ३।४।२५ ) । अर्थात् इस कर्म का कोई विशेष द्रव्य ( हवि ) और देवता निर्दिष्ट नहीं, अतः प्रधान कर्म न होकर सुवर्ण-धारण सभी कर्मों का शेष ( अङ्गभूत गुण कर्म ) है । सिद्धान्ती ने उस पूर्व पक्ष का खण्डन करते हुए कहा है—"अप्रकरणे तु तद्धर्मस्ततो विशेषात्" ( जै. सू. ३।४।२६ ) । अर्थात् सुवर्ण-धारण न तो किसी कर्म के प्रकरण में पठित है और न इसका कर्म के साथ अव्यभिचरित सम्बन्ध है, अतः यह गुण कर्म न होकर पुरुष का धर्मभूत प्रधान कर्म है ।] किसी कर्म के साथ सुवर्ण-धारण का विनियोग न होकर पुरुष के साथ विनियोग ( अङ्गाङ्गीभाव ) होता है । उसका फल परमापूर्व के द्वारा भ्रातृव्य ( शत्रु ) की दुर्वर्णता होती है । इसी प्रकार "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः"—इस वाक्य से विहित आत्मदर्शन गुण कर्म न होकर प्रधान कर्म ही होगा—यह दोष अत्यन्त स्थूल और प्रसिद्ध होने के कारण भाष्यकार के द्वारा उद्भावित न होकर "तत्त्वमसि"—इत्यादि वाक्यों का जो विरोथोद्भावन हुआ है, वह नितान्त स्पष्ट है कि उपासनादि में उपास्य, उपासक और उपासना का भेद अनिवार्य है, किन्तु "तत्त्वमसि"—इत्यादि वाक्य सर्वथा भेद का संहार कर रहे हैं, अतः एकत्व-ज्ञान को सम्पदादिरूप न मानकर तत्त्व-साक्षात्कारात्मक ही मानना आवश्यक है ।
'ब्रह्म वेद'—इत्यादि वाक्यों के द्वारा विदि ( वेदन ) क्रिया की कर्मता ब्रह्म में प्रतिपादित है । क्रिया का विधान होता है, ज्ञान का नहीं, अतः विदि क्रिया की विधि के द्वारा ब्रह्म का कार्यानुप्रवेश हो जायगा'—ऐसी शङ्का नहीं की जा सकती, क्योंकि ब्रह्म को
अविषये शास्त्रयोनित्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १४७
कर्मत्वप्रतिषेधाद्, ‘येनेदं सर्वं विजानाति तं केन विजानीयात्’ (बृह० २।४।१३) इति च। तथोपास्तिक्रियाकर्मत्वप्रतिषेधोऽपि भवति – ‘यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते’ इत्यविषयत्वं ब्रह्मण उपन्यस्य, ‘तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते’ (केन० १।४) इति। अविषयत्वे ब्रह्मणः शास्त्रयोनित्वानुपपत्तिरिति चेत्, – न; अविद्याकल्पितभेद-निवृत्तिपरत्वाच्छास्त्रस्य। न हि शास्त्रमिदंतया विषयभूतं ब्रह्म प्रतिपिपादयिषति। किं तर्हि? प्रत्यगात्मत्वेनाविषयतया प्रतिपादयदविद्याकल्पितं वेद्यवेदितृवेदनादिभेद-मपनयति। तथा च शास्त्रम् – ‘यस्याऽमतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः। अविज्ञातं
भामती
शङ्कते ॐ अविषयत्वे इति ॐ। ततश्च शान्तिकर्मणि वेतालोदय इति भावः। निराकरोति ॐ न ॐ। कुतः? ॐ अविद्याकल्पितभेदन्निवृत्तिविषयत्वाद् इति ॐ। सर्वमेव हि वाक्यं नेदन्तया वस्तुभेदं बोधयितुमर्हति, न हीक्षुक्षीरगुडादीनां मधुररसभेदः शक्य आख्यातुम्, एवमन्यत्रापि सर्वत्र द्रष्टव्यम्। तेन प्रमाणान्तरसिद्धे लौकिक एवार्थे यदा गतिरीदृशी शब्दस्य, तदा केव कथा प्रत्यगात्मन्यलौकिके? अदूरविप्रकर्षेण तु कथञ्चित् प्रतिपादनमिहापि समानम्। त्वम्पदार्थो हि प्रमाता प्रमाणाधीनया प्रमित्या प्रमेयं घटादि व्याप्नोतीत्यविद्याविलसितम्। तदस्याविषयीभूतोदासीनतत्पदार्थप्रत्यगात्मसामानाधिकरण्येन प्रमातृत्वाभावाद् तन्निवृत्तौ प्रमाणाद्यस्तिस्रो विधा निवर्त्तन्ते। न हि पक्तुरवस्तुत्वे पाक्यपाकपचनानि वस्तुसन्ति भवितुमर्हन्तीति। तथा हि—
विगलितपराग्वृत्त्यर्थत्वं पदस्य तवस्तदा
त्वमिति हि पदेनैकार्थत्वे त्वमित्यपि यत्पदम्।
तदपि च तदा गत्वैकाग्र्यं विशुद्धचिदात्मतां
त्यजति सकलान् कर्तृत्वादीन् पदार्थमलाश्रयान्॥
भामती-व्याख्या
विदि क्रिया का कर्म मानने पर "अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि" (केन. १।३) इत्यादि श्रुतियों के द्वारा ब्रह्म में विदि क्रिया की कर्मता का निषेध कर दिया गया है। 'ब्रह्म यदि किसी ज्ञान का विषय नहीं, तब सर्वथा अज्ञेय ब्रह्म में शास्त्रयोनित्व (शास्त्र-प्रतिपादितत्व) क्योंकर सम्भव होगा—यह शङ्का की जा रही है—"अविषयत्वे ब्रह्मणः शास्त्रयोनित्वानुपपत्तिः"। छोटे-से भूत को भगाने के लिए शान्ति कर्म आरम्भ किया था, देखते क्या हैं कि सामने उससे बड़ा खबीस मुँह फाड़े खड़ा है। चिन्ता की बात नहीं, उसे भी भगाने का मन्त्र पढ़ दिया गया है—"न, अविद्याकल्पितभेदनिवृत्तिविषयत्वात्"। जैसे इक्षु (ईख) क्षीर (दूध) और गुड़ादि के माधुर्य का अन्तर किसी भी वाक्य से नहीं कहा जा सकता, वैसे ही लोकोत्तर आनन्द की उत्ताल तरङ्गोंवाले उस महासागर (भूमा तत्त्व) का यथावत् प्रतिपादन किसी भी वाक्य से नहीं किया जा सकता, केवल (अदूरविप्रकर्ष) लक्षणादि के द्वारा ब्रह्म के सूचक शास्त्रों को ब्रह्म में प्रमाण मान कर उसे शास्त्रप्रमाणक कह दिया गया है। यह जो कहा जाता है कि त्वम्पदार्थभूत जीव प्रमाता है, वह प्रमाणाधीन प्रमिति के माध्यम से घटादि प्रमेय वर्ग को व्याप्त करता है। वह कथन पूर्णतया अविद्या-विलसित है, क्योंकि 'अहं घटं जानामि'—यहाँ अस्मत्पदार्थभूत प्रत्यगात्मा और शुद्ध चैतन्य का सामानाधिकरण्य प्रतीत होता है, किन्तु शुद्ध चैतन्य किसी भी प्रमा का विषय नहीं होता, तब उसमें प्रमातृत्व क्योंकर होगा? प्रमाता के बिना प्रमाता, प्रमाण और प्रमा—ये तीनों वैसे ही अनुपपन्न हो जाते हैं, जैसे पक्ता (पाचक पुरुष) के विना पाक्य, पाक और पचन का वास्तविक सद्भाव नहीं रहता। इस तथ्य का प्रकाश इस श्लोक के द्वारा किया जा सकता है—
| १४८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४ |
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विजानतां विज्ञातमविजानताम्' ( केन० २।३ ) 'न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येः', 'न विज्ञातेर्विज्ञा- तारं विजानीयाः' ( बृह० ३।४।२ ) इति चैवमादि । अतोऽविद्याकल्पितसंसारित्वनि- वर्तनेन नित्यमुक्तात्मस्वरूपसमर्पणान्न मोक्षस्यानित्यत्वदोषः । यस्य तूत्पाद्यो मोक्षस्त- स्य मानसं, वाचिकं कायिकं वा कार्यमपेक्षत इति युक्तम् । तथा विकार्यत्वे च; तयोः पक्षयोर्मोक्षस्य ध्रुवमनित्यत्वम् । न हि दध्यादि विकार्यं उत्पाद्यं वा घटादि नित्यं दृष्टं
भामती
इत्यान्तरश्लोकः । अत्रैवार्थे श्रुतीरुदाहरति ॐ तथा च शास्त्रं, यस्यामतम् इति ॐ । प्रकृतमुपसंहरति ॐ अतोऽविद्याकल्पित इति ॐ । परपक्षे मोक्षस्यानित्यतामापादयति— ॐ यस्य तु इति ॐ । कार्यमपूर्व यागादिव्यापारजन्यं तमपेक्षते मोक्षः स्वोत्पत्ताविति । ॐ तयोः पक्षयोः इति ॐ निर्वर्त्यविकार्ययोः । क्षणिकं ज्ञानमात्मेति बौद्धाः । तथा च विशुद्धविज्ञानोत्पादो मोक्ष इति निर्वर्त्यो मोक्षः । अन्येषां तु संसाररूपा- वस्थापहाया कैवल्यावस्थावाप्तिरात्मनः स मोक्ष इति विकार्यो मोक्षः, यथा पयसः पूर्वावस्थापहानेनाव- स्थान्तरप्राप्तिर्विकारो दधोति । तदेतयोः पक्षयोरनित्यता मोक्षस्य, कार्यत्वाद् , दधिघटादिवत् । अथ
भामती-व्याख्या
विगलितपराग्वृत्त्यर्थत्वं पदस्य तदस्तदा
त्वमिति हि पदेनैकार्थत्वे त्वमित्यपि यत्पदम् ।
तदपि च तदा गत्वैकार्थ्य विशुद्धचिदात्मतां
त्यजति सकलान् कर्तृत्वादीन् पदार्थमलान् निजाम् ॥
[ 'तत् त्वमसि'—यहाँ पर प्रत्यक्पदार्थ की पराक्त्वेन वृत्तिता ( विद्यमानता ) सम्भव नहीं, तब तत्पद की उसमें वृत्ति ( शक्ति ) नहीं हो सकती, क्योंकि त्वम्पदार्थ तत्पदार्थ से अभिन्न या विशुद्ध होकर रह जाता है । तब आत्मा अपने में आरोपित सकल कर्तृत्वादि ( प्रमातृत्वादि ) धर्मों का परित्याग कर डालता है । इसी अर्थ ( ब्रह्मगत फल-व्याप्यताभाव के प्रदर्शन ) में श्रुति प्रमाण प्रस्तुत करते हैं—"यस्यामतं तस्य मतम्, मतं यस्य न वेद सः" (केनो. २।३) । [ जिस व्यक्ति को 'ब्रह्म अमतम्' ( ज्ञानाविषयः ) ऐसा निश्चय है, उस व्यक्ति को ही मतम् ( सम्यक् निश्चय ) है । उसके विपरीत जिस व्यक्ति को 'ब्रह्म मतम्' ( ज्ञानस्य विषयः ) ऐसा निश्चय होता है, वह ब्रह्म का वस्तुस्वरूप नहीं समझ पाया ] । प्रकरण का उपसंहार किया जाता है—"अतोऽविद्याकल्पितसंसारित्वनिवर्तनेन न मोक्षस्यानित्यत्वदोषः" ।
परकीय पक्ष में मोक्ष की अनित्यतापत्ति का उद्भावन करते हैं—"यस्य तूत्पाद्यो मोक्षः, तस्य कार्यम् अपेक्षते" । यहाँ 'कार्य' पद से यागादि-जन्य अपूर्व विवक्षित है, मोक्ष अपनी उत्पत्ति में उसी अपूर्व को अपेक्षा करता है । 'तयोः पक्षयोः" का अर्थ है—'निर्वर्त्य- विकार्यपक्षयोः । 'मोक्षस्य ध्रुवमनित्यत्वम्, न हि दध्यादि विकार्यमुत्पाद्यं वा घटादि नित्यं दृष्टं लोके" । निर्वर्त्य ( उत्पाद्य ) और विकार्य पक्षों का उदाहरण यह है—( १ ) बौद्धगण क्षणिक विज्ञान को आत्मा मानते हैं, उनके पक्ष में विज्ञान-सन्तति में उत्पद्यमान विशुद्ध विज्ञानक्षणों को मोक्ष माना जाता है, अतः वह मोक्ष निर्वर्त्य है । [ चित्त या विज्ञान में क्लेशावरण और ज्ञेयावरण—ये दो प्रकार के मल माने जाते हैं, उनकी निवृत्ति ही चित्त की विशुद्धता है—"धर्माभावोपलब्धिश्च निःक्लेशविशुद्धता" । ( महायान सू. १३।१६ ) । बौद्ध- निकायों के विविध निर्वाणवाद हैं, उनका दिग्दर्शन भूमिका में देखा जा सकता है ] ।
अन्य आचार्यों के मत में संसाररूप अवस्था छोड़ कर कैवल्यावस्था को आत्मा वैसे ही प्राप्त करता है, जैसे सुवर्ण पिण्डावस्था को छोड़ कर कटकादि में विकृत होता है । यह अवस्थान्तर-प्राप्तिरूप मोक्ष वैसे ही विकार्य है, जैसे दूध का अपनी पूर्वावस्था को छोड़ कर
मोक्षस्योत्पाद्यत्वादिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १४९
लोके । न चाप्यत्वेनापि कार्यापेक्षा; स्वात्मस्वरूपत्वे सत्यनाप्यत्वात् । स्वरूपव्यति- रिक्तत्वेऽपि ब्रह्मणो नाप्यत्वं, सर्वगतत्वेन नित्याप्तस्वरूपत्वात्सर्वेण ब्रह्मणः, आकाश- स्येव । नापि संस्कार्यो मोक्षः, येन व्यापारमपेक्षेत । संस्कारो हि नाम संस्कार्यस्य गुणाधानेन वा स्याद्दोषापनयनेन वा ? न तावद् गुणाधानेन संभवति; अनाधेयातिशय-
भामती
‘यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते’ इति श्रुतेर्ब्रह्मणो विकृताविकृतदेशभेदावगमादविकृतदेशब्रह्मप्राप्तिरुपा- सनाविधिविधेया भविष्यति । तथा च प्राप्यकर्मता ब्रह्मण इत्यत आह ॐ न चाप्यत्वेनापि इति ॐ । अन्यदन्येन विकृतदेशपरिहाण्याऽविकृतदेशं प्राप्यते । तद्यथोपेवेलं जलधिरतिबहलचपलकल्लोलमालापर- स्परास्फालनसमुल्लसत्फेनपुञ्जस्तवकतया विकृतः, मध्ये तु प्रशान्तसकलकल्लोलोपसर्गः स्वस्थः स्थिर- तयाऽविकृतस्तस्य मध्यमविकृतं पोतिकः पोतेन प्राप्नोति । जीवस्तु ब्रह्मैवेति किं केन प्राप्यतां, भेदाश्रय- त्वात् प्राप्तेरित्यर्थः । अथ जीवो ब्रह्मणो भिन्नस्तथापि न तेन ब्रह्माप्यते, ब्रह्मणो विभुत्वेन नित्यप्राप्तत्वा- दित्याह ॐ स्वरूपव्यतिरिक्तत्वेऽपि इति ॐ । संस्कार्यकर्मतामपाकरोति ॐ नापि संस्कार्यं इति ॐ । द्वयी हि संस्कार्यता, गुणाधानेन वा यथा बीजपूरककुसुमस्य लाक्षारसावसेकस्तेन हि तत् कुसुमं संस्कृतं लाक्षासवर्णं फलं प्रसूते । दोषापनयेन वा यथा मलिनमादर्शतलं निघृष्टमिष्टकाचूर्णेनोद्भासितभास्वरत्वं
भामती-व्याख्या
अवस्थान्तर की प्राप्ति दधिरूप विकार है। इन दोनों पक्षों में घट और दधि के समान मोक्ष में अनित्यत्व सिद्ध होता है ।
शङ्का—मोक्ष यदि उत्पाद्य या विकार्य नहीं, तब प्राप्य तो अवश्य है, क्योंकि "अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु" ( छां. ३।१३।३ ) इत्यादि श्रुतियों के अनुरोध पर आत्मा के दो ( विकृत और अविकृत ) देश प्रतीत होते हैं। उनमें अविकृत देश की प्राप्ति उपासना-विधि की देन है, वही मोक्ष है, अतः मोक्ष में प्राप्य कर्मता स्थिर होती है।
समाधान—भाष्यकार ने उक्त पक्ष का खण्डन करने के लिए कहा है—"न चाप्यत्वेनापि कार्यापेक्षा, स्वात्मस्वरूपत्वे सत्यनाप्यत्वात्" । तात्पर्य यह है कि अन्य वस्तु अन्य साधन के द्वारा विकृत देश को छोड़ कर अविकृत देश को प्राप्त होती है, जैसे जलधि ( महासागर ) अपने तट के समीप अत्यन्त चपल और उत्ताल तरङ्गावलियों के परस्पर आस्फालन ( टकराहट ) से फेनिल अवस्था में विकृत होता है और वही मध्य भाग में जा कर सकल कल्लोल ( उछल-कूद ) को छोड़ कर नितान्त प्रशान्त होता है। नाविक अपने नौका यान के द्वारा उसी प्रशान्त क्षेत्र को प्राप्त करता है, किन्तु जीव तो ब्रह्म रूप ही है, अतः वह किस अन्य पदार्थ को प्राप्त करेगा ? प्राप्ति क्रिया सदैव प्रापक और प्राप्य के भेद की अपेक्षा करती है, प्रकृत में प्रापक ( जीव ) और प्राप्य ( ब्रह्म ) का भेद न होने के कारण प्राप्ति सम्भव नहीं, फलतः मोक्ष में प्राप्य कर्मता क्योंकर बनेगी ? यदि जीव को ब्रह्म से भिन्न भी मान लिया जाय, तब भी वह प्राप्य नहीं हो सकता, क्योंकि लोक में प्राप्य वही माना जाता है, जो कभी अप्राप्त हो, ब्रह्म तो विभु होने के कारण सदैव प्राप्त है—"स्वरूपव्यतिरिक्तत्वेऽपि ब्रह्मणो नाप्यत्वम्, सर्वगतत्वेन नित्याप्तस्वरूपत्वात्" ।
मोक्ष में संस्कार्यकर्मता का अपाकरण किया जाता है—"नापि संस्कार्यो मोक्षः"। संस्कार्य कर्मता दो प्रकार की होती है—( १ ) गुण-विशेष की उत्पत्ति के द्वारा जैसे—
कुसुमे बीजपूरादेः यल्लाक्षाद्युपसिच्यते ।
तद्रूपस्यैव संक्रान्तिः फले तस्येति वासना ॥ ( प्र. वा. भा. पृ. ३५८ )
बीजपूर ( बिजोरा निम्बू ) के फल को लाख के रस ( पानी ) से तर कर देने पर विजोरा
| १५० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४ |
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ब्रह्मस्वरूपत्वान्मोक्षस्य । नापि दोषापनयनेन; नित्यशुद्धब्रह्मस्वरूपत्वान्मोक्षस्य ।
स्वात्मधर्म एव संस्तिरोभूतो मोक्षः क्रियायात्मनि संस्क्रियमाणेऽभिव्यज्यते, यथाऽऽदर्शे निघर्षणक्रियया संस्क्रियमाणे भास्वरत्वं धर्म इति चेत्,—न; क्रियाश्रयत्वानुपपत्तेरात्मनः । यदाश्रया क्रिया तमविकुर्वती नैवात्मानं लभते । यद्यात्मा क्रियया
भामती
संस्कृतं भवति । तत्र न तावद् ब्रह्मणि गुणाधानं सम्भवति । गुणो हि ब्रह्मणः स्वभावो वा भिन्नो वा ? स्वभावश्चेत् कथमाधेयस्तस्य नित्यत्वात् । भिन्नत्वे तु कार्यत्वेन मोक्षस्यानित्यत्वप्रसङ्गः । न च भेदे धर्मधर्मिभावो गवाश्ववत् । भेदाभेदश्च व्युदस्तो विरोधात् । तदनेनाभिसन्धिनोक्तम् ॐ अनाधेयातिशयब्रह्मस्वरूपत्वान्मोक्षस्य ॐ । द्वितीयं पक्षमपक्षिपति ॐ नापि दोषापनयनेन इति ॐ । अशुद्धिः सती दर्पणे निवर्त्तते, न तु ब्रह्मणि असती निवर्त्तनीया, नित्यनिवृत्तत्वादित्यर्थः ।
शङ्कते ॐ स्वात्मधर्म एव इति ॐ । ब्रह्मस्वभाव एव मोक्षोऽनाद्यविद्यामलावृत उपासनादिक्रिययाऽऽत्मनि संस्क्रियमाणेऽभिव्यज्यते, न तु क्रियते । एतदुक्तं भवति—नित्यशुद्धत्वमात्मनोऽसिद्धं, संसारावस्थायामविद्यामलिनत्वादिति । शङ्कां निराकरोति ॐ न ॐ । कुतः ? ॐ क्रियाश्रयत्वानुपपत्तेः ॐ । नाविद्या ब्रह्माaction/ब्रह्माश्रया, किन्तु जीवे, सा त्वनिर्वचनीयेत्युक्तं, तेन नित्यशुद्धमेव ब्रह्म । अभ्युपेत्य त्वशुद्धिं क्रियासंस्कार्यत्वं दूष्यते । क्रिया हि ब्रह्मसमवेता वा ब्रह्म संस्कुर्यात्, यथा घर्षणमिष्टकाचूर्णसंयोग-
भामती-व्याख्या
का फल अन्दर से लाल हो जाता है । यहाँ फूल पर लालिमात्मक गुण का आधान किया जाता है, वह फूल की लालिमा फल के रस में परिणत हो जाती है । (२) दूसरा संस्कार दोषापनयन के द्वारा किया जाता है, जैसे मलिन दर्पण-तल पर ईंट का चूर्ण रगड़ने से दर्पण संस्कृत अर्थात् निर्मल हो जाता है । ब्रह्म पर गुणाधानरूप संस्कार नहीं किया जा सकता, क्योंकि ब्रह्म पर जो गुण उत्पन्न किया जाता है, वह क्या ब्रह्म का स्वरूप है ? अथवा ब्रह्म से भिन्न ? यदि स्वभाव है, तब वह आधेय नहीं हो सकता, क्योंकि नित्य ब्रह्म का स्वरूप भी नित्य ही है । संस्कार को ब्रह्म से भिन्न और उत्पाद्य मानने पर मोक्ष में अनित्यत्वापत्ति होती है । अत्यन्त भेद मानने पर संस्कार और ब्रह्म का वैसे ही धर्मधर्मिभाव नहीं बन सकता, जैसे गौ और अश्व का । भेदाभेद-पक्ष का निरास पहले ही किया जा चुका है, क्योंकि वह परस्पर-विरुद्ध है—इस आशय को मन में रखकर कहा है—"अनाधेयातिशयब्रह्मस्वरूपत्वान्मोक्षस्य" । संस्कार के दोषापनयनरूप द्वितीय कल्प का निरास किया जा रहा है—"नापि दोषापनयनेन, नित्यशुद्धब्रह्मस्वरूपत्वान्मोक्षस्य" । आशय यह है कि दृष्टान्त-स्थल पर मल या अशुद्धि वस्तुतः होती है, तब उसकी निवृत्ति हो सकी, किन्तु ब्रह्म पर अशुद्धि की सत्ता तीनों कालों में भी नहीं, तब नित्य असत् या निवृत्त पदार्थ की निवृत्ति क्योंकर होगी ?
शङ्का-सूचक शब्द न होने पर भी यह शङ्का-भाष्य है—'स्वात्मधर्म एव संस्तिरोभूतो मोक्षः' । यद्यपि मोक्ष ब्रह्म-स्वभाव है, तथापि वह अनादि अविद्यारूप मल से आच्छन्न है, उपासनादि क्रिया के द्वारा आत्मा के संस्कृत हो जाने पर वह अभिव्यक्त हो जाता है । शङ्कावादी का अभिप्राय यह है कि आत्मा में नित्यशुद्धत्व सिद्ध नहीं, क्योंकि संसारावस्था में वह अविद्यारूप मल से युक्त होता है । उक्त शङ्का का निराकरण किया जाता है—"न" । किसी भी क्रिया के द्वारा ब्रह्म का संस्कार नहीं किया जा सकता, क्योंकि "क्रियाश्रयत्वानुपपत्तेः" । अविद्या भी ब्रह्म के आश्रित नहीं रहती, किन्तु जीव के आश्रित रहती है । अविद्या अनिर्वचनीय है—यह कहा जा चुका है । फलतः ब्रह्म नित्य शुद्ध ही है । ब्रह्म में अविद्यारूप अशुद्धि को मानकर क्रिया के द्वारा संस्कार्यत्व का निरास किया गया है, क्योंकि क्या क्रिया ब्रह्म के
ब्रह्मणोऽविषयत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १५१
विक्रियेत, अनित्यत्वमात्मनः प्रसज्येत । ‘अविकार्योऽयमुच्यते’ ( भ. गी. २।२५ ) इति चैवमादीनि वाक्यानि बाध्येरन् । तच्चानिष्टम् । तस्मान्न स्वाश्रया क्रियाऽऽत्मनः संभवति । अन्याश्रयायास्तु क्रियाया अविषयत्वान्न तयाऽऽत्मा संस्क्रियते । ननु देहाश्रयया स्नानाचमनयज्ञोपवीतादिकया क्रियया देही संस्क्रियमाणो दृष्टः, न; देहादिसंहतस्यैवाविद्यागृहीतस्यात्मनः संस्क्रियमाणत्वात् । प्रत्यक्षं हि स्नानाचमनादेर्देहसमबायित्वम् । तया देहाश्रयया तत्संहत एव कश्चिदविद्ययात्मत्वेन परिगृहीतः संस्क्रियत इति युक्तम् । यथा देहाश्रयचिकित्सानिमित्तेन धातुसाम्येन तत्संहतस्य तदभिमानिन आरोग्यफलम् , अहमरोग इति बुद्धिरुत्पद्यते । एवं स्नानाचमनयज्ञोपवीतादिना अहं
भामती
विभागप्रचयो निरन्तर आदर्श तलसमवेतोऽन्यसमवेतो वा । न तावद् ब्रह्मधर्मः क्रिया, तस्याः स्वाश्रयविकारहेतुत्वेन ब्रह्मणो नित्यत्वव्याघातात् । अन्याश्रया तु कथमन्यस्योपकरोति, अतिप्रसङ्गात् । न हि दर्पणे निघृष्यमाणे मणिविशुद्धो दृष्टः । ॐ तच्चानिष्टम् इति ॐ । तदा बाधनं परामृशति । अत्र व्यभिचारं चोदयति ॐ ननु देहाश्रयया इति ॐ । परिहरति ॐ न, देहसंहतस्य इति ॐ । अनाद्यनिर्वचनीयाविद्योपधानमेव ब्रह्मणो जीव इति च क्षेत्रज्ञ इति चाचक्षते । स च स्थूलसूक्ष्मशरीरेन्द्रियादिसंहतस्तत्सङ्घातमध्यपतितस्तदभेदेनाहमितिप्रत्ययविषयीभूतोऽतः शरीरादिसंस्कारः शरीरादिधर्मोऽप्यात्मनो भवति, तदभेदाध्यवसायात् । यथाऽङ्गरागधर्मः सुगन्धिता कामिनीनां व्यपदिश्यते । तेनात्रापि यदाश्रिता क्रिया सांव्यवहारिकप्रमाणविषयोकृता तस्यैव संस्कारी नान्यस्येति न व्यभिचारः । तत्त्वतस्तु न क्रिया न
भामती-व्याख्या
आश्रित होकर वैसे ही ब्रह्म को संस्कृत करती है, जैसे आदर्श-तल पर इष्टिका-चूर्णका निरन्तर संयोग-विभाग-प्रचयरूप घर्षण ? अथवा अन्य वस्तु में रहकर क्रिया ब्रह्म को संस्कृत करती है ? क्रिया ब्रह्म का धर्म नहीं हो सकती, क्योंकि वह नियमतः अपने आश्रय को विकृत करती है, यदि ऐसा मान लिया जाय, तब ब्रह्मगत नित्यत्व-प्रतिपादक श्रुतियों का विरोध होता है । ब्रह्म से अन्य पदार्थ में रहनेवाली क्रिया के द्वारा ब्रह्म संस्कृत नहीं हो सकता, अन्यथा दर्पण पर इष्टिका-चूर्ण रगड़ने पर स्फटिक मणि भी संस्कृत हो जायगी, किन्तु वैसा कभी लोक में देखा नहीं जाता । "तच्चानिष्टम्"-इस भाष्य में 'तत्' पद के द्वारा ब्रह्मगत अनित्यत्व का बाध गृहीत होता है, अर्थात् ब्रह्मगत अनित्यत्व का बाध किसी को भी अभीष्ट नहीं । 'यदाश्रिता क्रिया भवति, तया तदेव संस्क्रियते'-इस नियम के व्यभिचार की शङ्का की जा रही है-"ननु देहाश्रयया स्नानाचमनयज्ञोपवीतादिकया क्रियया देही संस्क्रियमाणो दृष्टः" । उक्त शङ्का का परिहार किया जा रहा है-"न, देहादिसंहतस्यैवात्मनः संस्क्रियमाणत्वात्" । अर्थात् देह-तादात्म्यापन्न आत्मा ही स्नानादि क्रिया का कर्त्ता ( आश्रय ) और वही उसके फल का भोक्ता माना जाता है, अतः उसकी क्रिया से वह ( विशिष्ट ) आत्मा संस्कृत होता है, शुद्ध ब्रह्म नहीं, क्योंकि अनादि और अनिर्वचनीय अविद्यारूप उपाधि से युक्त ब्रह्म को जीव, क्षेत्रज्ञादि पदों के द्वारा अभिहित किया जाता है । वह स्थूल शरीर एवं इन्द्रियादि-घटित सूक्ष्म शरीर से विशिष्ट होता है । देहादि संघात के मध्य में निविष्ट वह देहादि-तादात्म्याध्यास के कारण देहादि को 'अहम्' ही मानता है, इस प्रकार शरीर का संस्कार शरीर-विशिष्ट आत्मा का वैसे ही माना जाता है, जैसे कामिनी के शरीर पर मले हुए चन्दन-चूर्ण की सुगन्धि का व्यवहार कामिनी में होता है, फलतः व्यावहारिक प्रत्यक्षादि प्रमाणों के द्वारा स्नानादि क्रिया जिस आश्रय में देखी जाती है, वह संस्कृत होता है, उक्त नियम में किसी प्रकार का व्यभिचार नहीं होता । तत्त्वतः ( पारमार्थिक दृष्टि से ) पृथक्
| १५२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४ |
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शुद्धः संस्कृत इति यत्र बुद्धिरुत्पद्यते स संस्क्रियते। स च देहेन संहत एव। तेनैव ह्यहंकर्त्राऽहंप्रत्ययविषयेण प्रत्ययिना सर्वाः क्रिया निर्वर्त्यन्ते। तत्फलं च स एवाश्नाति; ‘तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति’ (मुण्ड० ३।१।१) इति मन्त्र-वर्णात्। ‘आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः’ (काठ० १।३।४) इति च। तथा च ‘एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च’ (श्वेता० ६।११) इति, ‘स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम-स्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्’ (ईशा० ८) इति चैतौ मन्त्रावनाधेयातिशयतां नित्यशुद्धतां च ब्रह्मणो दर्शयतः। ब्रह्मभावश्च मोक्षः। तस्मान्न संस्कार्योऽपि मोक्षः। अतोऽन्यन्मोक्षं प्रति क्रियानुप्रवेशद्वारं न शक्यं केनचिद्दर्शयितुम्। तस्माज्ज्ञानमेकं मुक्त्वा क्रियाया
भामती
संस्कार इति। सनिदर्शनं तु शेषमध्यासभाष्य एव कृतव्याख्यानमिति नेह व्याख्यातम्। ॐ तयोरन्यः पिप्पलं इति ॐ। अन्यो जीवात्मा, पिप्पलं कर्मफलम्। ॐ अनश्नन्नन्य - इति ॐ। परमात्मा। संहतस्यैव भोक्तृत्वमाह मन्त्रवर्णः। ॐ आत्मेन्द्रिय इति ॐ। अनुपहितशुद्धस्वभावब्रह्मप्रदर्शनपरो मन्त्रौ पठति ॐ एको देवः इति ॐ। "शुक्रं" दीप्तिमत् , "अव्रणं" दुःखरहितम्, "अस्नाविरम्" अविगलितम् , अविनाशीति यावत्। उपसंहरति ॐ तस्माद् इति ॐ। ननु मा भून्निर्वर्त्यादिकर्मताचतुष्टयी, पञ्चमी तु काचिद् विधा भविष्यति यया मोक्षस्य कर्मता घटिष्यत इत्यत आह ॐ अतोऽन्यद् इति ॐ। एभ्यः प्रकारेभ्यो न प्रकारान्तरमन्यदस्ति, यतो मोक्षस्य क्रियानुप्रवेशो भविष्यति। एतदुक्तं भवति - चतसृणां विधानां मध्येऽन्यतमतया क्रियाफलत्वं व्याप्तं, सा च मोक्षाद् व्यावर्त्तमाना व्यापकानुपलब्ध्या मोक्षस्य क्रियाफलत्वं व्यावर्त्तयतीति। तत् किं मोक्षे क्रियेव नास्ति, तथा च तदर्थानि शास्त्राणि तदर्थाश्च प्रवृत्तयोऽ-
भामती-व्याख्या
न कोई क्रिया होती है और न तज्जन्य संस्कार। आध्यासिक दृष्टि का विशेष वर्णन "परत्र पूर्वदृष्टावभास"—इस भाष्य की व्याख्या में विविध उदाहरणों के द्वारा पहले किया जा चुका है, अतः यहाँ विशेष व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। "तयोरन्यः" इस श्रुति में 'अन्यः' का अर्थ जीव, 'पिप्पलं' का अर्थ कर्म-फल और 'अनश्नन् अन्यः' का अर्थ ब्रह्म या परमात्मा है, क्योंकि शुद्ध चैतन्य में फल-भोक्तृत्व नहीं होता, संहत, उपहित या विशिष्ट आत्मा में ही भोक्तृत्व का वर्णन मन्त्र वर्ण (संहिता-मन्त्र) करता है—"आत्मा इन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः" (कठ० १।३।४)। अनुपहित या शुद्धस्वभाव ब्रह्मपरक दो मन्त्रों का उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है—"एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा" (श्वेता. ६।११)। द्वितीय मन्त्र में 'शुक्रम्' का अर्थ—दीप्तिमान् (शुक्ल), 'अव्रणम्' का अर्थ दुःख-रहित, 'अस्नाविरं' का अर्थ—अविगलित (अविनाशी) है। प्रकरण का उपसंहार किया जाता है—"तस्मान्न संस्कार्योऽपि मोक्षः"। यदि ऐसी शङ्का हो कि निर्वर्त्य, आप्य, विकार्य और संस्कार्यरूप चार प्रकारों से भिन्न पाँचवीं कोई विधा हो सकती है, जिसको लेकर मोक्ष में कर्मता (क्रियाश्रयता) घट जायगी। तो वैसी शङ्का का निरास किया जाता है—"अतोऽन्यन्मोक्षं प्रति क्रियानुप्रवेशद्वारं न शक्यं केनचिद् दर्शयितुम्"। अर्थात् इन चार प्रकारों को छोड़ कर कोई पञ्चम प्रकार ऐसा नहीं दिखाया जा सकता, जिसके द्वारा मोक्ष में क्रिया की अपेक्षा सिद्ध की जा सके। 'यत्र-यत्र क्रियाफलत्वम्, तत्र-तत्र निर्वर्त्यत्वादिचतुष्टयान्यतमत्वम्'—इस प्रकार की व्याप्ति पर्यवसित होती है, अतः प्रकृत (ब्रह्मभावरूप) मोक्ष में निर्वर्त्यत्वाद्यन्यतमता की निवृत्ति से क्रिया-जन्यत्व की निवृत्ति हो जाती है। यह जो शङ्का होती है कि यदि मोक्ष में किसी प्रकार की क्रिया (कृति-साध्यता)
ज्ञानस्य मानसक्रियात्वविचारः ] हिन्दोसहितभामतीसंवलितम् १५३
गन्धमात्रस्याप्यनुप्रवेश इह नोपपद्यते ।
ननु ज्ञानं नाम मानसी क्रिया न, वैलक्षण्यात् । क्रिया हि नाम सा, यत्र वस्तुस्वरूपनिरपेक्षैव चोद्यते, पुरुषचित्तव्यापाराधीना च । यथा—‘यस्यै देवतायै हविर्गृहीतं स्यात् तां मनसा ध्यायेद्वषट् करिष्यन्’ इति, ‘संध्यां मनसा ध्यायेत्’ ( ऐ० ब्रा० ३।८।१ ) इति चैवमादिषु । ध्यानं चिन्तनं यद्यपि मानसं, तथापि पुरुषेण कर्तुमकर्तुमन्यथा वा कर्तुं शक्यं; पुरुषतन्त्रत्वात् । ज्ञानं तु प्रमाणजन्यम् । प्रमाणं च यथाभूतवस्तुविषयम्, अतो ज्ञानं कर्तुमकर्तुमन्यथा वा कर्तुमशक्यम्, केवलं वस्तुतन्त्रमेव तत् । न चोदनातन्त्रम् । नापि पुरुषतन्त्रम् । तस्मान्मानसत्वेऽपि ज्ञानस्य महद्वैलक्षण्यम् । यथा च ‘पुरुषो वाव गौतमाग्निः’ ‘योषा वाव गौतमाग्निः’ ( छान्दो० ५।७, ८।१ ) इत्यत्र योषित्पुरुषयोरग्निबुद्धिर्मानसी भवति । केवलचोदनाजन्यत्वात् क्रियैव सा
भामती
नर्थकानीत्यत उपसंहारव्याजेनाह ॐ तस्माज् ज्ञानमेकम् इति ॐ । अत्र ज्ञानं क्रिया मानसी कस्मान्न विधिगोचरः, कस्माच्च तस्याः फलं निर्वर्त्यादिष्वन्यतमं न मोक्ष इति चोद्यति ॐ ननु ज्ञानम् इति ॐ । परिहरति ॐ न, वैलक्षण्यात् ॐ । अयमर्थः—सत्यं ज्ञानं मानसी क्रिया, न त्वियं ब्रह्मणि फलं जनयितुमर्हति, तस्य स्वयम्प्रकाशतया विदिक्रियाकर्मभावानुपपत्तेरित्युक्तम् । तदेतस्मिन् वैलक्षण्ये स्थिते एव वैलक्षण्यान्तरमाह ॐ क्रिया हि नाम सा इति ॐ । “यत्र” विषये “वस्तुस्वरूपनिरपेक्षैव चोद्यते” यथा देवतासम्प्रदानकहविर्ग्रहणे देवतावस्तुस्वरूपानपेक्षा देवताध्यानक्रिया । यथा वा योषिति अग्निवस्त्वनपेक्षाऽग्निबुद्धिर्या सा क्रिया हि नामेति योजना । न हि यस्यै देवतायै हविर्गृहीतं स्यात्तां ध्यायेद्वषट्करिष्यन्नित्यस्माद्विधेः प्राग्देवताध्यानं प्राप्तं, प्राप्तं त्वधीतवेदान्तस्य विदितपवतदर्थसम्बन्धस्याधिगतशब्दन्याय-
भामती-व्याख्या
ही नहीं, तब मोक्ष-सम्पादन करने के लिए उपदिष्ट शास्त्र एवं मुमुक्षुओं की प्रवृत्ति अत्यन्त व्यर्थ हो जाती है । उस शङ्का का समाधान उपसंहार के बहाने किया जाता है—“तस्माज्ज्ञानमेकं मुक्त्वा क्रियाया गन्धमात्रस्याप्यनुप्रवेश इह नोपपद्यते” ।
ज्ञान को मानस क्रिया क्यों न मान लिया जाय, वह विधि का विषय भी हो सकती है और उसके फलभूत मोक्ष में कथित चतुर्विधान्यतमत्व भी—ऐसी शङ्का उठाई जा रही है—“ननु ज्ञानं नाम मानसी क्रिया” । उस शङ्का का परिहार किया जा रहा है—“न” । ज्ञान को मानस क्रिया नहीं मान सकते, क्योंकि इसमें क्रिया से वैलक्षण्य पाया जाता है । आशय यह है कि यह सत्य है कि ज्ञान भी एक मानस क्रिया है, किन्तु यह ब्रह्म में किसी प्रकार का फल उत्पन्न नहीं कर सकती, क्योंकि ब्रह्म स्वयं प्रकाश होने के कारण ज्ञानरूप विदि क्रिया का कर्म नहीं हो सकता । इस प्रकार के वैलक्षण्य के रहने पर भी अन्य वैलक्षण्य प्रदर्शित किया जा रहा है—“क्रिया हि नाम सा यत्र वस्तुस्वरूपनिरपेक्षैव चोद्यते” । यहाँ ‘यत्र’ का अर्थ है—जिस विषय में, इस प्रकार यहाँ क्रिया का यह लक्षण विवक्षित है—‘यत्र विषये या वस्त्वनपेक्षा चोद्यते, तत्र विषये सा क्रिया’ । जैसे देवतारूप सम्प्रदान के लिए हवि की ग्रहण क्रिया के अवसर पर “यस्यै देवतायै हविर्गृहीतं स्यात् तां ध्यायेद् वषट् करिष्यन्” ( ऐ. ब्रा. ११।८।१ ) इस वाक्य के द्वारा जो ध्यान क्रिया विहित है, वह अपने विषयीभूत देवता की अपेक्षा नहीं करती, क्योंकि ज्ञेय वस्तु ज्ञान से पहले जैसे अपने स्वरूप में व्यवस्थित होती है, ध्येय वस्तु वैसी नहीं, सम्पदादि स्थलों पर अन्य वस्तु में ध्यान अन्य का ही होता है, जैसे योषित् (स्त्री) में अग्नि-भावना । देवता-ध्यान विहित भी इसी लिए है कि “तां मनसा ध्यायेत्”—इस विधि वाक्य के श्रवण से पहले देवता-ध्यान प्राप्त नहीं, किन्तु जिस
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