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भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

१५४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४

पुरुषतन्त्रा च। या तु प्रसिद्धेऽग्नावग्निबुद्धिः, न सा चोदनातन्त्रा, नापि पुरुषतन्त्रा। किं तर्हि ? प्रत्यक्षविषयवस्तुतन्त्रैवेति ज्ञानमेवैतन्न क्रिया। एवं सर्वप्रमाणविषयवस्तुषु वेदितव्यम्। तत्रैवं सति यथाभूतब्रह्मात्मविषयमपि ज्ञानं न चोदनातन्त्रम्। तद्विषये लिङादयः श्रूयमाणा अप्यनियोज्यविषयत्वात्कुण्ठीभवन्ति, उपलादिषु प्रयुक्तक्षुरतैक्ष्ण्या-

भामती

तत्त्वस्य सदेव सोम्येदमित्यादेस्तत्त्वमसीत्यन्तात्सन्दर्भाद् ब्रह्मात्मभावज्ञानं शब्दप्रमाणसामर्थ्यात् । इन्द्रियार्थ-सन्निष्कर्षसामर्थ्यादिव प्रणिहितमनसः स्फीतालोकमध्यवर्तिकुम्भानुभवः। न ह्यसौ स्वसामग्रीबललब्धजन्मा मनुजेच्छयाऽन्यथाकर्तुमकर्तुं वा शक्यः, देवताध्यानवत्, येनार्थवानत्र विधिः स्यात्। न चोपासना वाऽनु-भवपर्यन्तता वाऽस्य विधेर्गोचरस्तयोरन्वयव्यतिरेकावधृतसामर्थ्ययोः साक्षात्कारे वाऽनाद्यविद्यापनये वा विधिमन्तरेण प्राप्तत्वेन पुरुषेच्छयाऽन्यथाकर्तुमकर्तुं वाऽशक्यत्वात् । तस्माद् ब्रह्मज्ञानं मानसी क्रियाऽपि न विधिगोचरः । पुरुषचित्तव्यापाराधीनायास्तु क्रियाया वस्तुस्वरूपनिरपेक्षता क्वचिदविरोधिनी, यथा देवताध्यानक्रियायाः । न ह्यत्र वस्तुस्वरूपेण कश्चिद्विरोधः । क्वचित्स्तुविरोधिनी, यथा योषित्पुरुषयो-रग्निबुद्धिरित्येतावता भेदेन निदर्शनमिथुनद्वयोपन्यासः । क्रियैवेत्येवकारेण वस्तुतन्त्रत्वमपाकरोति ।

नन्वात्मेत्येवोपासीतेत्यादयो विधयः श्रूयन्ते, न च प्रमत्तगीताः, तुल्यं हि साम्प्रदायिकं, तस्माद्वि-धेयेनात्र भवितव्यमित्यत आह ❖ तद्विषयं लिङादयः इति ❖। सत्यं श्रूयन्ते लिङादयः, न त्वमी विधि-

भामती-व्याख्या

व्यक्ति ने वेदान्त का अध्ययन किया है एवं पद-पदार्थ का संगति-ग्रह भी कर लिया है, उस व्यक्ति को “सदेव सोम्येदमग्रआसीत्”—यहाँ से लेकर “तत्त्वमसि”—यहाँ तक के सन्दर्भ (प्रकरण) से शब्द प्रमाण के बल पर वैसे ही ब्रह्म में आत्मत्व-बोध हो जाता है, जैसे इन्द्रियार्थ-सन्निकर्ष के बल पर समाहितमनवाले व्यक्ति की उज्ज्वल प्रकाश में अवस्थित घट का अनुभव हो जाता है, क्योंकि ऐसे घटानुभव का जो अपनी इन्द्रिय-सन्निकर्षादि-घटित सामग्री से उत्पन्न हुआ है, किसी पुरुष की इच्छा से न तो अन्यथा किया जा सकता है और न अकरण । यदि इसका इच्छामात्र के बल पर ध्यानादि के समान अन्यथाकरण या अकरण सम्भव होता, तब इसके विधान की सार्थकता हो सकती थी। इस ‘द्रष्टव्यः’ विधि के द्वारा उपासना (श्रावण ज्ञान की आवृत्ति) या अविद्यापनयनार्थ परोक्ष ज्ञान की साक्षात्कार-पर्यन्तता का विधान नहीं किया जा सकता, क्योंकि लोक-प्रसिद्ध अन्वय-व्यतिरेक के आधार पर उपासना (निरन्तरानुचिन्तन) में साक्षात्कार की एवं साक्षात्कार-पर्यन्त ज्ञान में अविद्या-निवृत्ति की जनकता विधि के बिना ही स्वतः सिद्ध है, पुरुष की इच्छा के द्वारा उसका अन्यथा-करणनहीं हो सकता। फलतः ब्रह्मज्ञान को मानस क्रिया मान लेने पर भी उसमें विधि-विषयता सम्भव नहीं। क्रिया में सर्वत्र वस्तुस्वरूप-निरपेक्षता का विरोध नहीं होता, कहीं-कहीं अविरोध भी होता है, जैसे देवताविषयक ध्यान क्रिया में, क्योंकि वस्तुस्वरूप (देवता-स्वरूप) के साथ इसका कोई विरोध नहीं होता । कहीं-कहीं क्रिया अवश्य ही वस्तुस्वरूप की विरोधिनी होती है, जैसे स्त्री और पुरुष में अग्नि का ध्यान । क्रियाओं के इस अन्तर को ध्यान में रख कर देवता-ध्यान और स्त्री आदि में अग्नि-ध्यान इन द्विविध ध्यान क्रियाओं का उदाहरण भाष्यकार ने दिया है। भाष्यकार ने जो कहा है ‘क्रियैव सा’। वहाँ एवकार के द्वारा क्रिया में वस्तु-तन्त्रता का निराकरण किया गया है।

शङ्का— “आत्मेत्येवोपासीत” (बृह० उ० १।४।७) इत्यादि विधि वाक्य जब वेदान्त-क्षेत्र में उपलब्ध होते हैं, तब उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती, क्योंकि ये वाक्य कोई प्रमत्त पुरुष के प्रलाप के समान निरर्थक नहीं, एवं अर्थवाद-वाक्यों की प्रामाणिकता और

वेदान्तेषु लिङ्गादिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १५५

दिवद् ; अहेयानुपादेयवस्तुविषयत्वात् । किमर्थानि तर्हि 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः' (बृ. २।४।५ ) इत्यादीनि विधिच्छायानि वचनानि ? स्वाभाविकप्रवृत्तिविषय- विमुखीकरणार्थानीति ब्रूमः । यो हि बहिर्मुखः प्रवर्तते पुरुषः 'इष्टं मे भूयादनिष्टं मा भूद्' इति, न च तत्रात्यन्तिकं पुरुषार्थं लभते, तमात्यन्तिकपुरुषार्थवाञ्छिनं स्वाभाविक्रार्य- करणसंघातप्रवृत्तिगोचराद्विमुखीकृत्य प्रत्यगात्मस्रोतस्तया प्रवर्तयन्ति - 'आत्मा वा


भामती

विषयाः, तद्विषयत्वेऽप्रामाण्यप्रसङ्गात् । हेयोपादेयविषयो हि विधिः । स एव च हेय उपादेयो वा यं पुरुषः कर्तुमकर्त्तुमन्यथा वा कर्तुं शक्नोति । तत्रैव च समर्थः कर्ताऽधिकृतो नियोज्यो भवति । न चेव- म्भूतात्मात्मश्रवणमननोपासनदर्शनानीति विषयतदनुष्ठात्रोर्विधिव्यापकतयोरभावाद् विधेरभाव इति प्रयुक्ता अपि लिङादयः प्रवर्तनायामसमर्था उपल इव क्षुरतैक्ष्ण्यं कुण्ठप्रमाणीभवन्तीति । ॐ अनियोज्यविषय- त्वाद् इति ॐ । समर्थो हि कर्ताऽधिकारी नियोज्यः । असामर्थ्ये तु न कर्तृता ततोऽनधिकृतो न नियोज्य इत्यर्थः । यदि विधेरभावान्न विधिवचनानि, किमर्थानि तर्हि वचनान्येतानि विधिच्छायानीति पृच्छति ॐ किमर्थानि इति ॐ । न चानर्थकानि युक्तानि, स्वाध्यायविध्यधीनग्रहणत्वानुपपत्तेरिति भावः । उत्तरम् ॐ स्वाभाविक इति ॐ । अन्यतः प्राप्ता एव हि श्रवणादयो विधिसरूपैर्वाक्यैरनूद्यन्ते । न चानुवाद्योऽप्य-


भामती-व्याख्या

सार्थकता की पुष्टि में कहा जाता है— "तुल्यं च साम्प्रदायिकम्" (जै. सू. १।२।८) अर्थात् अध्ययनाध्यापन की परम्परा में अन्य विधि में वाक्यों के समान ही इन वाक्यों को मान्यता प्राप्त है, अतः इनकी विधिरूपता निश्चित है, तब आत्मोपासना का विधान क्यों नहीं माना जाता ?

समाधान — उक्त शङ्का का समाधान करते हुए भाष्यकार ने कहा है— "तद्विषये लिङादयः श्रूयमाणा अप्यनियोज्यविषयत्वात् कुण्ठीभवन्ति"। अर्थात् इस बात को कभी भी नकारा नहीं जा सकता कि आत्मोपासना-विधि-बोधक वाक्य उपलब्ध नहीं होते । ऐसे वाक्य अवश्य हैं, किन्तु उनका विधि में तात्पर्य मानने पर प्रामाण्य अक्षुण्ण नहीं रहता, क्योंकि विधि सदैव हेय और उपादेय विषय की होती है, हेय ( त्याज्य ) या उपादेय ( ग्राह्य ) वही होता है, जिस विषय का पुरुष अपनी इच्छा से त्याग या ग्रहण कर सके । जिस विषय के करण, अकरण या अन्यथाकरण में पुरुष सर्वथा समर्थ और स्वतन्त्र होता है, उसी विषय का पुरुष कर्त्ता, अधिकारी या नियोज्य माना जाता है । इस प्रकार यह एक नियम या व्याप्ति स्थिर होती है कि "यत्र यत्र पुरुषस्वातन्त्र्यं सनियोज्यत्वं तत्र तत्र विधेयत्वम्"। आत्मा के श्रवण, मनन और उपासन ( निदिध्यासन ) में विधेयत्व सम्भव नहीं, क्योंकि उनमें विधेयत्व का व्यापकीभूत हेयत्वोपादेयत्वरूप पुरुष-स्वातन्त्र्य एवं सनियोज्यत्व नहीं, व्यापक का अभाव होने पर व्याप्य का अभाव निश्चित है। लिङादि प्रत्यय अवश्य ही विधि या प्रवर्तना में शक्त होते हैं, किन्तु प्रवर्तना के अविषयीभूत पदार्थ के बोधन में प्रयुक्त लिङादि वैसे ही कुण्ठित या विवश हो जाते हैं, जैसे पत्थर को काटने के लिए चलाया गया छुरा, पत्थर काटने में समर्थ नहीं होता। अविषयीभूत पदार्थ में लिङादि प्रमाण या प्रवर्तक नहीं हो सकते, क्योंकि उस विषय का नियोज्य या अधिकारी व्यक्ति ही सुलभ नहीं, समर्थ कर्त्ता पुरुष को अधि- कारी या नियोज्य माना जाता है, जिस पदार्थ के सम्पादन में जो समर्थ नहीं, उसका वह न कर्त्ता हो सकता है और न नियोज्य ( अधिकारी ) । विधि के अभाव में विधि-वचन यदि प्रयुक्त नहीं हो सकते, तब "आत्मेत्येवोपासीत'—इस प्रकार श्रूयमाण विध्याभास-वचन किस लिए ? ऐसी शङ्का की जा रही है—किमर्थानि तर्हि "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्य" इत्येवमादीनि विधिच्छायानि वचनानि ?""स्वाध्यायोऽध्येतव्यः"—इस स्वाध्याय-विधि के

१५६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४

अरे द्रष्टव्यः' इत्यादीनि । तस्यात्मान्वेषणाय प्रवृत्तस्याहेयमनुपादेयं चात्मतत्त्वमुपदिश्यते । 'इदं सर्वं यदयमात्मा' (बृह० २।४।६) 'यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत् केन कं विजानीयात्', 'विज्ञातारमरे केन विजानीयात्' (बृह० ४।५।१५) 'अयमात्मा ब्रह्म' (बृह० २।५।१९) इत्यादिभिः । यदप्यकर्तव्यप्रधानमात्मज्ञानं हानायोपादानाय वा न भवतीति, तत्तथैवेत्यभ्युपगम्यते अलंकारो ह्ययमस्माकं यद् ब्रह्मात्मावगतौ सत्यां सर्वकर्तव्यताहानिः कृतकृत्यता चेति । तथा च श्रुतिः—'आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः । किमिच्छन्कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ।' (बृह०


भामती

प्रयोजनः, प्रवृत्तिविशेषकरत्वात् । तथाहि—तत्तदिष्टानिष्टविषयेप्साजिहासापहृतहृदयतया बहिर्मुखो न प्रत्यगात्मनि समाधातुमर्हति । आत्मश्रवणादिविधिसरूपैस्तु वचनैर्मनसो विषयस्रोतः खिलीकृत्य प्रत्यगात्मस्रोतः उद्घाट्यते इति प्रवृत्तिविशेषकरत्वानुवादानास्तीति सप्रयोजनतया स्वाध्यायविध्यधीनग्रहणत्वमुपपद्यत इति ।

यच्च चोदितमात्मज्ञानमननुष्ठानाङ्गतत्वादपुरुषार्थमिति । तदयुक्तम्, स्वतोऽस्य पुरुषार्थत्वे सिद्धे यदनुष्ठानानङ्गत्वं तद् भूषणं न दूषणमित्याह ॐ यदपि इति ॐ । "अनुसंज्वरेत्" शरीरं परितप्यमानमनु-


भामती-व्याख्या

द्वारा गृहीत होने के कारण उक्त वाक्यों को अनर्थक नहीं कहा जा सकता । उक्त शङ्का का समाधान है — “स्वाभाविकप्रवृत्तिविषयविमुखीकरणार्थानि ब्रूमः” । वैषयिक सुख की लिप्सा में जीव की सहज प्रवृत्ति को रोकने के लिए "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यः" — ऐसा कह दिया गया है । वह भी विधि वाक्यों के द्वारा आत्म-साक्षात्कारार्थ श्रवणादि का विधान नहीं, अपितु अन्यतः (लोक-प्रसिद्ध अन्वय-व्यतिरेक के माध्यम से) जो श्रवणादि में साक्षात्कार-जनकत्व प्राप्त है, उसी का अनुवादमात्र कर दिया गया है। यह अनुवाद भी निरर्थक नहीं, श्रवणादिगत प्राशस्त्य का गमक होकर आत्म-श्रवणादि में रुचि और अनात्म-चिन्तन में अरुचि का जनक हो जाता है। विविध इष्ट विषयों की लिप्सा और अनिष्ट विषयों की जिहासा के मोहक प्रपञ्च में फँसा जीव आत्म-चिन्तन में मन को नहीं लगा सकता, कथित आत्मश्रवणादि-बोधक विध्याभासों के द्वारा विषयाभिमुख मानस प्रवाह को रोककर प्रत्यगात्माभिमुख प्रवृत्त किया जाता है। इस प्रकार सार्थक श्रवणादि-विषयक अनुवाद के गमक कथित विधि के समान रूपवाले "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यः"—इत्यादि वाक्यों का स्वाध्याय-विधि के द्वारा ग्रहण उपपन्न हो जाता है ।

यह जो आक्षेप किया था कि आत्म-ज्ञान किसी कर्मानुष्ठान का अङ्ग न होने के कारण निरर्थक है। वह आक्षेप युक्ति-युक्त नहीं, क्योंकि जब कि आत्म-ज्ञान स्वयं पुरुषार्थ सिद्ध हो जाता है, तब उसमें किसी कर्मानुष्ठान की अङ्गता आवश्यक नहीं—यह कहा जा रहा है— “यदपि अकर्त्तव्यप्रधानमात्मज्ञानं हानायोपादानाय न भवतीति, तत्तथैवेत्यभ्युपगम्यते, अलङ्कारो ह्ययमस्माकं यद् ब्रह्मात्मावगतौ सत्यां सर्वकर्त्तव्यताहानिः कृतकृत्यता च”। जैसे धर्म-ज्ञान के पश्चात् धर्म का अनुष्ठान अपेक्षित होता है, वैसे ब्रह्म-ज्ञान के पश्चात् किसी प्रकार का अनुष्ठान अवशिष्ट नहीं रहता—यह हमारे अद्वैत-सिद्धान्त में कोई दोष नहीं, अपितु गुण है, अलंकार है, महती कृतकृत्यता है, श्रुति भगवती का विजय-घोष हमारे पक्ष में है—

“आत्मानं चेद् विजानीयादयमस्मीति पूरुषः ।
किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥” (बृह. उ. ४।४।१२)

[ यदि यह पुरुष (जीव) अपने वास्तविक शुद्ध बुद्ध ब्रह्मस्वरूप का विज्ञान (साक्षात्कार)

औपनिषदपुरुषविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १५७


४।४।१२) इति । 'एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत' (भ० गी० १५।२०) इति स्मृतिः । तस्मान्न प्रतिपत्तिविधिविषयतया ब्रह्मणः समर्पणम् ।

यदपि केचिदाहुः— 'प्रवृत्तिनिवृत्तिविधितच्छेषव्यतिरेकेण केवलवस्तुवादी वेदभागो नास्ति' इति, — तन्न; औपनिषदस्य पुरुषस्यानन्यशेषत्वात् । योऽसावुपनिष-


भामती

तप्येत । सुगममन्यत् । प्रकृतमुपसंहरति ॐ तस्मान्न प्रतिपत्ति इति ॐ । प्रकृतसिद्धयर्थमेकदेशिमंत दूषयितुमनुभाषते ॐ यदपि केचिदाहुः इति ॐ । दूषयति ॐ तन्न इति ॐ । इदमत्राकूतम्—

कार्यबोधे यथा चेष्टा लिङ्गं हर्षादयस्तथा ।
सिद्धबोधेऽर्थवत्त्वं च शास्त्रत्वं हितशासनात् ।

यदि हि पदानां कार्याभिधाने तदर्थार्थाभिधाने वा नियमेन वृद्धव्यवहारे सामर्थ्यमवधृतं भवेत्, न भवेत्, अहेयोपादेयभूतब्रह्मात्मतापरत्वमुपनिषदाम् । तत्राविदितसामर्थ्यत्वात् पदानां लोके तत्पूर्वकत्वाच्च वैदिकार्थप्रतीतेः । अथ तु भूतेऽप्यर्थे पदानां लोके शक्यः सङ्गतिग्रहस्तत उपनिषदां तत्परत्वं पौर्वापर्यपर्यालोचनयाऽवगम्यमानमपह्नुत्य न कार्यपरत्वं शक्यं कल्पयितुं, श्रुतहान्यश्रुतकल्पनाप्रसङ्गात् । तत्र तावदेवमकार्यार्थे न सङ्गतिग्रहः, यदि तत्परः प्रयोगो न लोके दृश्येत, तत्प्रत्ययो वा


भामती-व्याख्या

कर ले, तब और किस फल की इच्छा से अथवा अपने से भिन्न किस पुरुष के लिए शरीर-सन्ताप के द्वारा अनुसन्तप्त होगा ? ] 'अनुसंज्वरेत्' शब्द का अर्थ भाष्यकार ने ही श्रुति की व्याख्या में किया है— “शरीरमनुसंज्वरेत्, शरीरोपाधिकृतदुःखमनु दुःखी स्यात्, शरीरतापमनुतप्येत” (बृह. भा. पृ. ६७७) । प्रकरण का उपसंहार किया जाता है— “तस्मान्न प्रतिपत्तिविधिविषयतया ब्रह्मणः समर्पणम्” ।

अपने सिद्धान्त की दृढ़ता के लिए एकदेशी के दूषित मत का अनुवाद करते हैं— “यदपि केचिदाहुः” । उसमें दोषोद्भावन किया जा रहा है— “तन्न” । आशय यह है कि—

कार्यबोधे यथा चेष्टा लिङ्गं हर्षादयस्तथा ।
सिद्धबोधेऽर्थवत्त्वं शास्त्रत्वं हितशासनात् ॥

[ विगत पृ. १२६ पर एकदेशी की ओर से कहा गया था कि (१) 'अज्ञातसंगतित्व', (२) 'शास्त्रत्व', (३) 'अर्थवत्त्व' और (५) 'मननादिप्रतीत्या'—इन चार हेतुओं के द्वारा वेदान्त-क्षेत्र में भी कार्यानुप्रवेश आवश्यक है । उसी का यहाँ निराकरण किया जाता है कि संगति-ग्रह से लेकर तत्त्व-निश्चय करने तक वेदान्त में कहीं भी कार्यानुप्रवेश आवश्यक नहीं] । आनयनादि कार्यरूप अर्थ के बोध में जैसे चेष्टा (प्रवृत्ति) अपेक्षित है, वैसे ही पुत्रादि सिद्धरूप अर्थ के बोधन में “पुत्रस्ते जातः”—इत्यादि वाक्यों को सुनकर श्रोता के मुख-मण्डल पर बिखरी हुई हर्ष की रेखाएँ लिङ्ग (गमक) रूपेण अपेक्षित हैं । यदि कार्यार्थ के अभिधान में पदों को नियमतः उत्तम और मध्यम वृद्धों के व्यवहार अपेक्षित होते, तब हेयोपादेय-रहित ब्रह्म-परता वेदान्त-वाक्यों में नहीं होती, क्योंकि लोक में पदों का वैसा शक्ति-ग्रह सम्भव नहीं था और शक्ति-ग्रह पूर्वक ही वैदिकार्थ की प्रतीति होती है । यदि भूत (सिद्ध) अर्थ में पदों का शक्ति-ग्रह सम्भव है और उसके आधार पर उपनिषद्-ग्रन्थों में उपक्रमोपसंहारादि-न्याय का सहारा लेकर ब्रह्मपरता निश्चित है, तब उसका अपलाप करके कार्यार्थपरत्व की स्थापना कभी नहीं की जा सकती, अन्यथा श्रुत (सिद्धार्थपरत्व) की हानि और अश्रुत (कार्यपरत्व) की प्रसक्ति वेदान्त में होगी ।

अकार्य (सिद्ध) रूप अर्थ में तब शक्ति-ग्रह नहीं हो सकता था, जब कि लोक में

१५८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४

भामती व्युत्पन्नस्योन्नेतुं न शक्येत । न तावत्तत्परः प्रयोगो न दृश्यते लोके, कुतूहलभयादिनिवृत्त्यर्थानामाकार्य- पराणां पदसन्दर्भाणां प्रयोगस्य लोके बहुलमुपलब्धेः । तथाह्याऽऽखण्डलादिलोकपालचक्रवालदिवसतिः सिद्धविद्याधरगन्धर्वाप्सरःपरिवारो ब्रह्मलोकावतीर्णमन्दाकिनीपयःप्रवाहपातधौतकलधौतमयशिलातलो नन्दनादिप्रमदवनविहारिमणिमयशकुन्तककमनीयनिनादमनोहरः पर्वंतराजः सुमेरुरिति । नैष भुजङ्गो रज्जुरित्यादि ।

नापि भूतार्थबुद्धिव्युत्पन्नपुरुषवर्तिनी न शक्या समुन्नेतुं हर्षदिरन्यहेतोः सम्भवात् । तथाह्या- विदितार्थजनभाषार्थो द्रविड़ो नगरगमनोद्यतो राजमार्गभ्रणं देवदत्तमन्दिरमध्यासीनः प्रतिपन्नजनका- नन्दनिबन्धनपुत्रजन्मा वार्त्ताहारेण सह नगरस्थदेवदत्ताभ्याशमागतः पटवासोपायनार्पणपुरःसरं दिष्ट्या वर्धसे पुत्रस्ते जात इति वार्त्ताहारव्याहारश्रवणसमनन्तरमुपजातर रोमाञ्चकञ्चुकं विकसितनयनोत्पलमसि- स्मेरमुखमहोत्पलमवलोक्य देवदत्तमुत्पन्नप्रमोदमनुमिमीते, प्रमोदस्य च प्रागभूतस्य तद्व्याहारश्रवणसम- नन्तरं भवतस्तद्धेतुताम् । न चायमप्रतिपादयन् हर्षहेतुमर्थं हर्षाय कल्पत इत्यनेन हर्षहेतुरर्थ उक्त इति प्रतिपद्यते । हर्षहेत्वन्तरस्य चाप्रतीतेः पुत्रजन्मनेश्च तद्धेतोरवगमात्तदेव वार्त्ताहारेणाभ्यधायीति निश्चि- नोति । एवं भयशोकादयोऽप्युदाहार्याः । तथा च प्रयोजनवत्ता भूतार्थाभिधानस्य प्रेक्षावत्प्रयोगोऽप्यु-

भामती-व्याख्या सिद्धार्थ-बोधक शब्द-प्रयोग उपलब्ध न होता अथवा व्युत्पन्न पुरुष के द्वारा शब्दों में सिद्धार्थ- परत्व की ऊहा नहीं की जा सकती हो, किन्तु वे दोनों बातें नहीं, क्योंकि सिद्धार्थक पदों का प्रयोग लोक में भी होता देखा जाता है, जैसे सुमेरुपर्वत कैसा होगा ? इस प्रकार के कुतूहल को निवृत्त करने के लिए कहा जाता है—आखण्डल ( इन्द्र ) आदि लोक-पाल देवगणों का अधिवास जिस पर है; सिद्ध, विद्याधर, गन्धर्व और अप्सरादिसंज्ञक देवजातियाँ विहरण कर रही हैं जिस पर; ब्रह्म-लोक से अवतीर्ण मन्दाकिनी के धवल जल से प्रक्षालित हैं सुवर्णमय शिला-तल जिसके; नन्दनादि प्रमद-वन में क्रीडा-रत मणिमय पक्षियों के कमनीय कूजन से जो नितान्त मोहक है; ऐसा पर्वत-राज है—सुमेरु । सर्प-भ्रम-जनित भय की निवृत्ति के लिए कहा जाता है—"नैष भुजङ्गो रज्जुरियम्" ।

अन्य पुरुषों में समुत्पन्न सिद्धार्थविषयक ज्ञान की ऊहा भी सम्भव है, क्योंकि श्रोता के मुख पर लहराई हुई हर्ष की रेखाएँ ही श्रोता के हृदय में उठी हर्ष की तरङ्गों का समुन्नयन करा देती हैं, जैसे कि किसी अन्य प्रान्त की भाषा से अनभिज्ञ द्रविड़देश का कोई व्यक्ति अपने नगर में देवदत्त के घर पर पुत्र-जन्म का महोत्सव देख चुका था, किसी ऐसे सन्देशवाहक के साथ देशान्तर के लिए चल पड़ता है, जिसके हाथ में पुत्र-पद-लिप्त केसर की छापवाला वस्त्रोपहार था । अन्य प्रान्त के किसी नगर में अवस्थित देवदत्त के घर पर पहुँचता है । संदेश-वाहक ने देवदत्त के लिए लाया उक्त वस्त्रादि का उपहार देवदत्त के सामने रख कर कहता है—'दिष्ट्या वर्धसे पुत्रस्ते जातः' । सन्देश-वाहक का इतना कहना था कि देवदत्त के अन्दर उठीं हर्ष की उत्ताल तरङ्गं मुख-मण्डल पर लहराने लग जाती है, नेत्र-कमल सहसा खिल उठते हैं । इस पूरे दृश्य को देखकर वह देश भाषानभिज्ञ द्रविड़ देश-वासी व्यक्ति यह सोच लेता है कि यह देवदत्त सन्देश-वाहक के वाक्य को सुनकर जो हर्षविभोर हो गया, अवश्य ही इसके हर्ष का जनक अर्थ इस वाक्य के द्वारा प्रतिपादित है । प्रकृत में पुत्रोत्पत्ति ही हर्ष की जनक है, जो कि इस वाक्य के द्वारा अभिहित है, इस प्रकार लिङादि से अघटित वाक्य भी सिद्धार्थ का बोधक निश्चित हो जाता है । इसी प्रकार भय और शोकादि के जनक उदाहरण भी प्रस्तुत किए जा सकते हैं । प्रयोजनवत्ता भी कार्यार्थक वाक्यों में ही सीमित होती है—ऐसी

औपनिषदपुरुषविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १५९

त्स्वेवाधिगतः पुरुषोऽसंसारी ब्रह्म, उत्पाद्यादिचतुर्विधद्रव्यविलक्षणः स्वप्रकरण-

भामती

पपन्नः । एवं च ब्रह्मस्वरूपज्ञानस्य परमपुरुषार्थहेतुभाववादनुपदिशतामपि पुरुषप्रवृत्तिनिवृत्तौ वेदान्तानां पुरुषहितानुशासनाच्छास्त्रत्वं सिद्धं भवति । तस्सिद्धमेतद् — विवादाध्यासितानि वचनानि भूतार्थविषयाणि, भूतार्थविषयप्रमाजनकत्वात् , यद्यद्विषयप्रमाजनकं तत्तद्विषयं, यथा रूपादिविषयं चक्षुरादि, तथा चैतानि, तस्मात्तथेति । तस्मात्सुष्ठूक्तं ॐ तन्नोपनिषदस्य पुरुषस्यानन्यशेषत्वाद् इति ॐ । उपनिपूर्वात्सदेर्विशरणार्थात् क्विप्युपनिषत्पदं व्युत्पादितमुपनीयाद्वयं ब्रह्म सवासनामविद्यां हिनस्तीति ब्रह्मविद्यामाह, तद्धेतुत्वाद्द्वेदान्ता अप्युपनिषदः, तत्र विदित औपनिषदः पुरुषः । एतदेव विभजते ॐ योऽसावुपनिषत्सु इति ॐ । अहम्प्रत्ययविषयाद्भिनत्ति ॐ असंसारी इति ॐ । अत एव क्रियारहितत्वाच्चतुर्विधद्रव्यविलक्षणः । अतश्च चतुर्विधद्रव्यविलक्षणो यदनन्यशेषः । अन्यशेषं हि भूतं द्रव्यं चिकीर्षितं सदुत्पत्त्याद्याप्यं सम्भवति । यथा यूपं तक्षतीत्यादि । यत् पुनरनन्यशेषं भूतभाष्युपयोगरहितं, यथा सुवर्णं भार्य्यं, सक्तून् जुहोतीत्यादि, न तस्योत्पत्त्याद्याप्यता । कस्मात्पुनरस्यानन्यशेषतेत्यत आह ॐ यतः स्वप्रकरणस्थः ॐ ।

भामती-व्याख्या

बात नहीं, अपितु सिद्धार्थक वाक्य भी कुतूहल और भयादि-निवृत्तिरूप प्रयोजन के जनक होने के कारण प्रयोजनवान् होते हैं, अत एव प्रेक्षावान् व्यक्तियों के द्वारा उनका लोक में बहुल प्रयोग किया जाता है । जब कि ब्रह्मस्वरूप ज्ञान में परम पुरुषार्थ की हेतुता निश्चित है, तब उसके बोधक वेदान्त-वाक्यों में भले ही प्रवृत्ति निवृत्ति की जनकता न हो, उनकी प्रामाणिकता और शास्त्ररूपता में सन्देह नहीं रह जाता, क्योंकि वे भी मुमुक्षु पुरुषों का हितानुशासन करते हैं, अतः यह अनुमान पर्यवसित होता है— “विवादाध्यासितानि (“ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति” इत्यादीनि ) सिद्धार्थबोधकानि, सिद्धार्थविषयकप्रमाजनकत्वात् । यद् यद्विषयकप्रमाजनकम् तत् तद्विषयकम्, यथा रूपादिविषयकं चक्षुरादि तथा चैतानि, तस्मात्तथा' । अतः भाष्यकार ने बहुत सुन्दर ही कहा है—'‘तन्न, औपनिषदस्य पुरुषस्यानन्यशेषत्वात्” । 'उप' और 'नि' इन दोनों उपसर्ग पदों के उत्तर ‘षदॢ विशरणगत्यवसादनेषु’ इस धातु से किप् प्रत्यय करके 'उपनिषत्' पद सम्पन्न हुआ है, 'अद्वयं ब्रह्मोपनीय सवासनामविद्यां सादयति हिनस्ती उपनिषत्, इस प्रकार उपनिषत्' पद ब्रह्म-विद्या का वाचक है । उस विद्या के हेतुभूत वेदान्त-वाक्य भी उपनिषत् कहे जाते हैं, उपनिषत्सु विदित इति औपनिषदः पुरुषः । यही “औपनिषद' पद की व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है— “योऽसावुपनिषत्स्वेवाधिगतः” । 'अहम्'-इस प्रतीति के विषयीभूत जीव से भिन्नता प्रदर्शित करने के लिए उक्त पुरुष को “असंसारी” कहा गया है । अत एव क्रिया-रहित होने के कारण उत्पाद्यादि चतुर्विध द्रव्य से वह विलक्षण है । चतुर्विध द्रव्य से विलक्षण होने के कारण किसी कर्म का शेष ( अङ्ग ) नहीं, किन्तु “अनन्यशेष” है । अन्य-शेष ( कर्म का अङ्गभूत द्रव्य उत्पत्त्यादि में से किसी एक क्रिया के द्वारा चिकीर्षित होकर उत्पाद्यादि चतुर्विध द्रव्यों में अन्यतम ) होता है, जैसे-“यूपं तक्षति” इत्यादि । जो द्रव्य अन्य शेष न होकर अतीत और अनागत क्रिया से रहित होता है, जैसे “सुवर्णं भार्यम्”, “सक्तून् जुहोति”—वह उत्पत्त्यादि क्रियाओं से रहित है । ब्रह्म अनन्यशेष क्यों ? इस प्रश्न का उत्तर है—“स्वप्रकरणस्थः” । उपनिषद्वाक्य आत्मा के प्रकरण का आरम्भ करके समाम्नात हैं, पौर्वापर्य की आलोचना से यह निश्चित हो जाता है कि उक्त पुरुष तत्त्व स्व-प्रकरणस्थ और प्रधान है । जैसे याग से बाहर जुहू पात्र नहीं होता, अत एव याग का अव्यभिचरित सम्बन्धी होता है, वैसे पुरुष तत्त्व क्रतु का अव्यभिचरित सम्बन्धी नहीं— यह पहले ही कहा जा चुका है। ऐसा प्रधानभूत पुरुष उपनिषद्वाक्यों से प्रतीयमान है, अतः

१६०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

स्थोऽनन्यशेषः- नासौ नास्ति नाधिगम्यत इति वा शक्यं वदितुम्, 'स एष नेति नेत्यात्मा' (बृह० ३।९।२६) इत्यात्मशब्दाद् आत्मनश्च प्रत्याख्यातुमशक्यत्वाद्, य

भामती

उपनिषदामनारभ्याधीतानां पौर्वापर्यपर्यालोचनया पुरुषप्रतिपादनपरत्वेन पुरुषस्यैव प्राधान्येनेदं प्रकरणं, न च जुह्वादिवदव्यभिचरितक्रतुसम्बन्धः पुरुष इत्युपपादितम् । अतः स्वप्रकरणस्थः सोऽयं तथाविध उपनिषद्बुद्धः प्रतीयमानो न नास्तीति शक्यो वक्तुमित्यर्थः ।

स्यादेतत्—मानान्तरागोचरत्वेनागृहीतसङ्गतितयाऽपदार्थस्य ब्रह्मणो वाक्यार्थत्वानुपपत्तेः कथमुपनिषदर्थतेत्यत आह ॐ स एष नेति नेत्यात्मेत्यात्मशब्दात् ॐ । यद्यपि गवाविवन्मानान्तरगोचरत्वमात्मनो नास्ति तथापि प्रकाशात्मन एव सतस्तत्तदुपाधिपरिहाण्या शक्यं वाक्यार्थत्वेन निरूपणं, हाटकस्येव कटककुण्डलादिपरिहाण्या । नहि प्रकाशः स्वसंवेदनो न भासते, नापि तदवच्छेदकः कार्यकारणसङ्घातः । तेन स एष नेति नेत्यात्मेति तत्तदवच्छेदपरिहाण्या बृहत्त्वाद्वापनाच्च स्वयम्प्रकाशः शक्यो वाक्याद् ब्रह्मेति चात्मेति च निरूपयितुमित्यर्थः । अथोपाधिनिरासवदुपहितमप्यात्मरूपं कस्मान्न निरस्यते इत्यत आह ॐ आत्मनश्च प्रत्याख्यातुमशक्यत्वात् ॐ । प्रकाशो हि सर्वस्यात्मा तदधिष्ठानत्वाच्च प्रपञ्चविभ्रमस्य, न चाधिष्ठानाभावे विभ्रमो भवितुमर्हति । न हि जातु रज्ज्वभावे रज्ज्वां भुजङ्ग इति वा धारेति वा विभ्रमो दृष्टपूर्वः । अपि चात्मनः प्रकाशस्य भासा प्रपञ्चस्य प्रथा । तथा हि श्रुतिः 'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' इति । न चात्मनः प्रकाशस्य प्रत्याख्याने प्रपञ्चप्रथा युक्ता । तस्मा-


भामती-व्याख्या

'नास्ति'—इस प्रकार उसकी सत्ता का अपलाप नहीं किया जा सकता । ब्रह्म तत्त्व यदि केवल औपनिषद है, तब अन्य किसी प्रत्यक्षादि प्रमाण का विषय न होने के कारण किसी पद की उसमें शक्ति का ज्ञान न हो सकेगा, जो पदार्थ ( पद का शक्यार्थ ) नहीं, वह वेदान्त-वाक्यार्थ क्योंकर होगा ? इस प्रश्न का उत्तर है—"स एष नेति-नेति आत्मा" इत्यात्मशब्दप्रयोगात्" । यद्यपि गवादि के समान आत्मा में प्रमाणान्तर-गोचरता नहीं, तथापि पदार्थभूत सोपाधि तत्त्व की उपाधि का निषेध करके वाक्यार्थता का शुद्ध ब्रह्म में सामञ्जस्य वैसे ही किया जा सकता है, जैसे कटक-कुण्डलादि उपाधियों का परिहाण करके सुवर्ण तत्त्व का । अवच्छेदद्यभूत स्वसंवेदनात्त्मक प्रकाश तत्त्व अवभासित नहीं होता—ऐसा नहीं, अपितु अवभासित होता है । उसी प्रकार उसकी अवच्छेदकीभूत शरीर-संघातरूप उपाधि नहीं प्रती। होती—ऐसा भी नहीं, अपितु प्रतीत होती है । फलतः "स एष नेति नेत्यात्मा'—इस प्रकार अवच्छेदकीभूत उपाधियों का निषेध करके ब्रह्म और आत्मा के रूप में निरूपित हो सकता है, क्योंकि वह बृहत् ( व्यापक ) एवं 'सर्वत्र अतति आप्नोति'—ऐसे व्यवहार का विषय है । "नेति नेति" वाक्यों के द्वारा उपाधियों के निषेध के समान उपहित आत्मा का भी निषेध क्यों नहीं माना जाता ? इस प्रश्न का उत्तर है—"आत्मनश्च प्रत्याख्यातुमशक्यत्वात्" । उपहित ( उपाधि से उपलक्षित ) प्रकाश तत्त्व सबका आत्मा होने के कारण निषेध्य नहीं हो सकता । अर्थात् आरोप-स्थल पर जैसे रजतादि आरोप्य पदार्थों का निषेध होता है, वैसे अधिष्ठानरूप शुक्ति तत्त्व का निषेध नहीं हो सकता । आत्मप्रकाश तत्त्व सकल अनात्म-भ्रान्ति का अधिष्ठान है, अधिष्ठान के बिना कोई भ्रान्ति हो ही नहीं सकती, रज्जु के अभाव में सर्प या धारादि का विभ्रम कभी नहीं देखा जाता । अपि च आत्म प्रकाश के प्रकाश से ही प्रपञ्च का प्रकाश होता है, जैसा कि श्रुति कहती है—"तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्" ( कौ. २।५।१५ ) । आत्मप्रकाश का प्रत्याख्यान कर देने पर प्रपञ्च की प्रथा ( प्रतीति ) ही नहीं हो सकती । अतः आत्मा का निषेध सम्भव न हो सकने के कारण वेदान्त-वाक्यों के द्वारा प्रमाणान्तरा-

ब्रह्मणोऽविनाशित्वम् ]हिन्दीसहितभामतीसंवलितम्१६१

एव निराकर्ता तस्यैवात्मत्वात् । नन्वात्माऽहंप्रत्ययविषयत्वादुपनिषत्स्वेव विज्ञायत इत्यनुपपन्नम् । न; तत्साक्षित्वेन प्रत्युक्तत्वात् । न ह्यहंप्रत्ययविषयकर्तृव्यतिरेकेण तत्साक्षी सर्वभूतस्थः सम एकः कूटस्थनित्यः पुरुषो विधिकारण्डे तर्कसमये वा केनचि-दधिगतः सर्वस्यात्मा, अतः स न केनचित्प्रत्याख्यातुं शक्यो विधिशेषत्वं वा नेतुम् । आत्मत्वादेव च सर्वेषां न हेयो नाप्युपादेयः । सर्वं हि विनश्यद्विकारजातं पुरुषान्तं

भामती

दात्मनः प्रत्याख्यानायोगाद्वेदान्तेभ्यः प्रमाणान्तरागोचरसर्वोपाधिरहितब्रह्मस्वरूपावगतिसिद्धिरित्यर्थः । उपनिषत्स्वेवावगत इत्यवधारणममृष्यमाण आक्षिपति ॐ नन्वात्मा इति ॐ । सर्वजनीनाह-म्प्रत्ययविषयो ह्यात्मा कर्त्ता भोक्ता च संसारी, तत्रैव च लौकिकपरीक्षकाणामात्मपदप्रयोगाद्, य एव लौकिकाः शब्दास्त एव वैदिकास्त एव च तेषामर्था इत्यौपनिषदमप्यात्मपदं तत्रैव प्रवर्त्तितुमर्हति नार्था-न्तरे तद्विपरीत इत्यर्थः । समाधत्ते ॐ नाहम्प्रत्ययविषय औपनिषदः पुरुषः ॐ । कुतः ? ॐ तत्साक्षित्वेना ॐ अहम्प्रत्ययविषयो यः कर्त्ता कार्य्यकरणसंघातोपहितो जीवात्मा तत्साक्षित्वेन, परमात्मनोऽहम्प्रत्ययविषय-त्वस्य ॐ प्रत्युक्तत्वात् ॐ । एतदुक्तं भवति - यद्यप्यनेन जीवेनात्मनेति जीवपरमात्मनोः पारमार्थिकमैक्यं तथापि तस्योपहितं रूपं जीवः शुद्धं तु रूपं तस्य साक्षि तच्च मानान्तरानधिगतमुपनिषदगोचर इति । एतदेव प्रपञ्चयति ॐ न ह्यहम्प्रत्ययविषयः इति ॐ । ॐ विधिशेषत्वं वा नेतुं न शक्यः ॐ । कुतः ? ॐ आत्मत्वादेव ॐ । न ह्यात्माऽन्यार्थोऽन्यत्तु सर्वमात्मार्थम् । तथा च श्रुतिः—'न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवति आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति' इति । अपि चातः सर्वेषामात्मत्वादेव न हेयो

भामती-व्याख्या

गोचर समस्त उपाधि-रहित ब्रह्मस्वरूप की अवगति सिद्ध हो जाती है । 'उपनिषत्स्वेव'—इस प्रकार के अवधारण से सहमत न होने के कारण पूर्वपक्षी शङ्का करता है—"ननु आत्मा अहं प्रत्ययविषयत्वादुपनिषत्स्वेव विज्ञायत इत्यनुपपन्नम्" । अर्थात् यह तथ्य सर्व-विदित है कि आत्मा 'अहंकरोमि'—इत्यादि प्रतीति का विषयीभूत कर्त्ता और भोक्तादि के रूप में अवगत है, क्योंकि कर्त्ता और भोक्ता में ही लौकिक और परीक्षक सभी व्यक्ति 'आत्मा' पद का प्रयोग करते हैं । लौकिक और वैदिक पद-पदार्थों का भेद नहीं होता, शबरस्वामी कहते हैं "य एव लौकिका शब्दाः, ते एव वैदिकाः, त एव च तेषामर्थाः" (जै. सू. भा. पृ. २९१) । अतः उपनिषद्वाक्य-घटक 'आत्मा' पद भी उसी कर्त्ता-भोक्ता तत्त्व का ही अभिधान करेगा, उससे भिन्न या विपरीत (शुद्ध तत्त्व) का बोधक कदापि नहीं हो सकता ।

उक्त शङ्का का समाधान करते हैं—"न"। अर्थात् अहंप्रत्यय का विषय औपनिषद पुरुष नहीं हो सकता, क्योंकि "तत्साक्षित्वेन" । अहंप्रत्यय का विषयीभूत कार्य-करण-संघातरूप जीव का साक्षी होने के कारण ब्रह्म में अहंप्रत्यय की विषयता नहीं हो सकती । आशय यह है कि यद्यपि "अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि" (छां. ६।३।२) इत्यादि श्रुतियों के आधार पर जीव और परमात्मा का पारमार्थिक ऐक्य ही सिद्ध होता है, तथापि उपाधि-विशिष्ट चेतन को जीव और उपाधि-रहित शुद्ध तत्त्व को ब्रह्म या साक्षी कहा जाता है, वह अन्य प्रमाणों का अविषय केवल उपनिषद्वाक्यों के द्वारा ही प्रतिपादित होता है । इसी रहस्य का विस्तार किया जाता है—"न ह्यहंप्रत्ययविषयकर्तृव्यतिरेकेण तत्साक्षी"। उस साक्षी तत्त्व को विधि का अङ्ग नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि "आत्मत्वा-देव"। समस्त भोग्यवर्ग आत्मा के लिए है, आत्मा अन्य किसी के लिए नहीं होता, जैसा कि श्रुति कहती है—"न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवति, आत्मनस्तु कामाय सर्वं

२१

१६२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

विनश्यति । पुरुषो विनाशहेत्वभावादविनाशी, विक्रियाहेत्वभावाच्च कूटस्थनित्यः, अत

भामती

नाप्युपादेयः । सर्वस्य हि प्रपञ्चजातस्य ब्रह्मैव तत्त्वमात्मा । न च स्वभावो हेयोऽशक्यहानत्वात् । न चोपादेयः, उपात्तत्वात् । तस्माद्धेयोपादेयविषयो विधिनिषेधो न तद्विपरीतमात्मतत्त्वं विषयीकुरुत इति सर्वस्य प्रपञ्चजातस्यात्मैव तत्त्वमिति । एतदुपपादयति ॐसर्वं विनश्यद्विकारजातं पुरुषान्तं विनश्यतिॐ । अयमर्थः—पुरुषो हि श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणतदविरुद्धन्यायव्यवस्थापितत्वात् परमार्थसन् । प्रपञ्चस्त्वनाद्यविद्योपदर्शितोऽपरमार्थसन् । यश्च परमार्थसन्नसौ प्रकृती रजतत्त्वमिव सर्पविभ्रमस्य विकारस्य । अत एवास्यानिवार्य्यत्त्वेनाध्रुवस्वभावस्य विनाशः । पुरुषस्तु परमार्थसन् नासौ कारणसहस्रेणाप्यसन् शक्यः कर्तुम् । न हि सहस्रमपि शिल्पिनो घटं पटयितुमीशत इत्युक्तम् । तस्मादविनाशिपुरुषान्तो विकारविनाशः शुक्तिरज्जुतत्त्वान्त इव रजतभुजङ्गविनाशः । पुरुष एव हि सर्वस्य प्रपञ्चविकारजातस्य तत्त्वम् । न च पुरुषस्यास्ति विनाशो यतोऽनन्तो विनाशः स्यादित्यत आह ॐ पुरुषो विनाशहेत्वभावाद् इति ॐ । न हि कारणानि सहस्रमप्यन्यदन्ययितुमीशत इत्युक्तम् । अथ मा भूत् स्वरूपेण पुरुषो हेय उपादेयो वा, तदीयस्तु कश्चिद्धर्मो हास्यते कश्चिच्चोपादास्यत इत्यत आह ॐ विक्रियाहेत्वभावाच्च कूटस्थनित्यः ॐ । त्रिविधोऽपि धर्मलक्षणावस्थापरिणामलक्षणो विकारो नास्तीत्युक्तम् । अपि चात्मनः परमार्थसतो धर्मोऽपि

भामती-व्याख्या

प्रियं भवति” ( बृह० उ० ४।५।६ )। समस्त प्रपञ्च का आत्मा होने के कारण किसी के द्वारा वह न हेय हो सकता है और न उपादेय । 'घटः सन्', 'पटः सन्' इत्यादि सद्रूप से प्रतीयमान ब्रह्म तत्त्व सभी घटादि सत्पदार्थों का स्वरूप है, स्वरूप का परित्याग कभी नहीं हो सकता, क्योंकि वह आगन्तुक पदार्थ नहीं । इसी प्रकार वह उपादेय नहीं, क्योंकि कभी अप्राप्त नहीं, सदैव प्राप्त है। इस प्रकार यह स्थिर हो जाता है कि विधि-निषेध वाक्य सदैव हेय और उपादेय वस्तु को विषय करते हैं, उनसे विपरीत ( हेयोपादेय-रहित ) आत्मतत्त्व को विषय नहीं कर सकते । समस्त हेयोपादेय प्रपञ्च का अधिष्ठान होने के कारण ब्रह्म प्रपञ्च का आत्मा कहलाता है। इस सिद्धान्त का उपपादन किया जाता है—"सर्वं हि विनश्यद्विकारजातं पुरुषान्तं विनश्यति"। अभिप्राय यह है कि पुरुषतत्त्व श्रुति, स्मृति, इतिहास, पुराण एवं श्रुत्याद्यविरुद्ध न्यायों के द्वारा व्यवस्थापित एक परमार्थसत् तत्त्व है, किन्तु प्रपञ्च अनादि अविद्या के द्वारा कल्पित अपरमार्थ पदार्थ है। जो परमार्थसत् तत्त्व है, वह समस्त विकार वर्ग की वैसे ही प्रकृति ( अधिष्ठान ) है, जैसे सर्प-विभ्रम की प्रकृति रज्जुतत्त्व होता है। अत एव यह प्रपञ्च अस्थिरस्वभाव का होने से विनश्वर किन्तु इसका अधिष्ठान परमार्थ तत्त्व स्थिर कूटस्थ नित्य परमार्थसत् अविनाशी है। यह किसी भी कारण-कलाप के द्वारा असत् नहीं किया जा सकता, क्योंकि यदि हजार शिल्पी एकत्र हो जाँय, तब भी घट को पट नहीं बना सकते यह कहा जा चुका है, अतः अविनाशी पुरुष को छोड़कर वहाँ तक का समस्त विकार-वर्ग वैसे नष्ट हो जाता है, जैसे शुक्ति और रज्जु तत्त्व-पर्यन्त रजत और सर्प-विभ्रम विनष्ट हो जाता है। तत्त्व का विनाश नहीं होता, समस्त विकार-वर्ग का पुरुष ही एकमात्र तत्त्व है। पुरुष तत्त्व का विनाश नहीं होता कि विनाश सीमित न होकर अनन्त हो जाता—"पुरुषो विनाशहेत्वभावादविनाशी"। किसी भी कारण पदार्थ की यह क्षमता नहीं कि नित्य तत्त्व को अनित्य बना सके—यह कई बार कहा जा चुका है। जैसे आकाशतत्त्व हेय और उपादेय नहीं, फिर भी उसका शब्दरूप धर्म हेय और उपादेय होता है, वैसे ही पुरुष तत्त्व का भी कोई धर्म हेय और उपादेय हो सकता है—ऐसी सम्भावना का निराकरण किया जा रहा है—विक्रियाहेत्वभावाच्च कूटस्थनित्यः"। धर्मपरिणाम, लक्षणपरिणाम और अवस्था-

वेदान्ते भूतोपदेशः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १६३

एव नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः। तस्मात् 'पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः' (काठ० १।३।११) 'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि' (बृह० ३।९।२६) इति चौपनिषदत्वविशेषणं पुरुषस्योपनिषत्सु प्राधान्येन प्रकाश्यमानत्व उपपद्यते। अतो भूतवस्तुपरो वेदभागो नास्तीति वचनं साहसमात्रम्।

यदपि शास्त्रतात्पर्यविदामनुक्रमणम्—'दृष्टो हि तस्यार्थः कर्मावबोधनम्' इत्येवमादि, तद्धर्मजिज्ञासाविषयत्वाद्विधिप्रतिषेधशास्त्राभिप्रायं द्रष्टव्यम्। अपि च 'आम्ना-


भामती

परमार्थसन्निति न तस्यात्मवदन्यथात्वं कारणैः शक्यं कर्तुम्। न च धर्मान्यथात्वाद्वन्यो विकारः। तदिदमुक्तम्—विक्रियाहेत्वभावादिति। सुगममन्यत्। यत् पुनरेकदेशिना शास्त्रविद्वचनं साक्षित्वेनानुक्रान्तं तदन्यथोपपादयति ॐ यदपि शास्त्रतात्पर्यविदामनुक्रमणम् इति ॐ। दृष्टो हि तस्यार्थः प्रयोजनवदर्थावबोधनमिति वक्तव्ये धर्मजिज्ञासायाः प्रकृतत्वाद्वर्मस्य च कर्मत्वात् कर्मावबोधनमित्युक्तम्। न तु सिद्धरूपब्रह्मावबोधनं व्यापारं वेदस्य वारयति। न हि सोमशर्मणि प्रकृते तद्गुणाभिधानं परिसञ्चष्टे विष्णुशर्मणो गुणवत्ताम्। विधिशास्त्रं विधीयमानकर्मविषयं प्रतिषेधशास्त्रं च प्रतिषिध्यमानकर्मविषयमित्युभयमपि कर्मावबोधपरम्। अपि चाम्नायस्य क्रियार्थत्वादिति शास्त्रकृद्वचनं तत्रार्थग्रहणं यद्यभिधेयवाचि ततो भूतार्थानां द्रव्यगुणकर्मणामानर्थक्यमनभिधेयत्वं प्रसज्येत, न हि ते क्रियार्था इत्यत आह ॐ अपि चाम्नायस्य इति ॐ। यद्युच्येत न हि क्रियार्थत्वं क्रियाभिधेयत्वमपि तु क्रियाप्रयोजनत्वं द्रव्यगुणशब्दानां च


भामती-व्याख्या

परिणाम—ये तीनों प्रकार के परिणाम या विकार कूटस्थनित्य तत्त्व के नहीं होते—यह भी कह चुके हैं। दूसरी बात यह भी है कि आकाश नित्य नहीं, अतः उसका धर्म भी नित्य नहीं, किन्तु पुरुषतत्त्व नित्य है, अतः उसका यदि कोई धर्म होगा, तब वह भी नित्य होगा, अतः उसका भी अन्यथाकरण सम्भव नहीं, धर्मान्यथात्व का नाम ही विकार है, अत एव कहा गया है—"विक्रियाहेत्वभावात्"। शेष भाष्य सुगम है।

एकदेशी ने जो शाबर वचन का अपने मत में साक्ष्य दिया था, उसका अन्यथा उपपादन किया जा रहा है—"यदपि शास्त्रतात्पर्यविदामनुक्रमणम्—'दृष्टो हि तस्यार्थः कर्मावबोधनं नाम' इत्येवमादि, तद्धर्मजिज्ञासाविषयत्वाद् विधिप्रतिषेधशास्त्राभिप्रायं द्रष्टव्यम्।" श्री शबरस्वामी ने जो यह कहा है कि "दृष्टो हि तस्यार्थः कर्मावबोधनं नाम" (जै. सू. भा. पृ. ६)। वहाँ 'दृष्टो हि तस्यार्थः प्रयोजनवदर्थावबोधनम्'—ऐसा कहना चाहिए था, किन्तु धर्मजिज्ञासा का प्रसङ्ग है, धर्म ही कर्म है, अतः 'कर्मावबोधनम्'—ऐसा कह दिया गया है। उसका तात्पर्य सिद्धरूप ब्रह्म के अवबोधनरूप व्यापार से वेद को विरत करना नहीं है। जैसे सोमशर्मा सामने है, अतः उसके गुणों का वर्णन कर दिया गया, उसका तात्पर्य विष्णुशर्मा की गुणवत्ता के निषेध में कदापि नहीं, वैसे ही प्रकृत में। विधि-शास्त्र विधीयमान कर्म को विषय करता है और निषेध-शास्त्र निषिध्यमान हिंसादि कर्मों को विषय करता है—इस प्रकार दोनों शास्त्र कर्मावबोधपरक होते हैं। यह जो जैमिनि-सूत्र उद्धृत किया गया है—"आम्नायस्य क्रियार्थत्वाद् आनर्थक्यमतदर्थानाम्" (जै. सू. १।२।१)। इसमें 'क्रियार्थत्वात्' और 'आनर्थक्यम्'—यहाँ पर 'अर्थ' पद अभिधेयपरक है? अथवा प्रयोजनपरक? यदि अभिधेयपरक है, तब 'ये ये क्रियार्था (क्रियारूपाभिधेयाः) ते ते सार्थकाः (अभिधेयाः)' ऐसी व्याप्ति फलित होती है। तब तो सिद्धस्वरूप द्रव्य, गुण और कर्म अनर्थक (अनभिधेय) हो जाते हैं, क्योंकि वे क्रियारूप अर्थ नहीं हैं, व्यापक के अभाव में व्याप्य का अभाव होना स्वाभाविक है, भाष्यकार कहते हैं—अपि "आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम्" इत्येतदेकान्तेनाभ्युपगच्छतां भूतोपदेशानर्थक्य प्रसङ्गः"। यदि कहा जाय कि 'क्रियार्थत्व' से 'क्रिया-

१६४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

यस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम्' इत्येतदेकान्तेनाभ्युपगच्छतां भूतोपदेशानर्थक्यप्रसङ्गः। प्रवृत्तिनिवृत्तिविधितच्छेषव्यतिरेकेण भूतं चेद्वस्तूपदिशति भव्यार्थत्वेन,

भामती

क्रियार्थत्वेनैव भूतद्रव्यगुणाभिधानं न स्वनिष्ठतया। यथाहुः शास्त्रविदः 'चोदना हि भूतं भवन्तम्' इत्यादि। एतदुक्तं भवति कार्यमर्थमवगमयन्ती चोदना तदर्थं भूतादिकमप्यर्थं गमयतीति, तत्राह प्रवृत्तिनिवृत्तिव्यतिरेकेण भूतं चेद् इति। अयमभिसन्धिः—न तावत् कार्यार्थ एव स्वार्थे पदानां सङ्गतिग्रहो नान्यार्थ इत्युपपादितं भूतेऽप्यर्थे व्युत्पत्तिं दर्शयद्भिः। नापि स्वार्थमात्रपरतैव पदानां, तथा सति न वाक्यार्थप्रत्ययः स्यात्। न हि प्रत्येकं स्वप्रधानतया गुणप्रधानभावरहितानामेकवाक्यता दृष्टा। तस्मात् पदानां स्वार्थमभिदधतामेकप्रयोजनवत् पदार्थापरतयैकवाक्यता। तथा च तत्तदर्थान्तरविशिष्टैकवाक्यार्थप्रत्यय उपपन्नो भवति, यथाहुः शास्त्रविदः—

साक्षाद्यद्यपि कुर्वन्ति पदार्थप्रतिपादनम् ।
वर्णास्तथापि नैतस्मिन् पर्यवस्यन्ति निष्फले ॥
वाक्यार्थमितये तेषां प्रवृत्तौ नान्तरीयकम् ।
पाके ज्वालेव काष्ठानां पदार्थप्रतिपादनम् ॥ इति ।

भामती-व्याख्या

भिधेयत्व विवक्षित नहीं, अपितु 'क्रियाप्रयोजनकत्व' विवक्षित है, सिद्धात्मक द्रव्य, गुण और कर्मादि का अभिधान क्रियाप्रयोजनकत्वेन ही होता है, स्वतन्त्र नहीं। श्री शबरस्वामी कहते हैं—"चोदना हि भूतं भवन्तं....शक्नोत्यवगमयितुम्” (शबर. पृ. १३)। आशय यह है कि कार्यरूप अर्थ का बोध कराती हुई चोदना (विधि) उस कार्य (क्रिया) के लिए भूत (सिद्ध) आदिरूप अर्थों का बोध कराती है—यही भाष्यकार कह रहे हैं—"प्रवृत्तिनिवृत्तिव्यतिरेकेण भूतं चेद् वस्तूपदिशति भव्यार्थत्वेन"। भाव यह है कि 'कार्यरूप अर्थ में ही शब्दों का शक्ति-ग्रह होता है, अन्य (सिद्धार्थ) में नहीं'—ऐसे नियम का निराकरण सिद्धार्थ में संगति-ग्रह दिखाते हुए पहले किया जा चुका है। यह भी कोई नियम नहीं कि पद केवल स्वार्थ का ही बोधक होता है, क्योंकि तब तो वाक्यार्थ में संसर्गरूप अर्थ का भान न हो सकेगा, क्योंकि वाक्यार्थ गुण-प्रधानादि के रूप में एकवाक्यतापन्न होता है, सभी पद यदि अपने-अपने अर्थों का प्रधानतया बोध कराते हैं, गुण-प्रधानभाव से नहीं, तब उनमें एकवाक्यता सम्भव न हो सकेगी। अतः वाक्य-घटक पद परस्पर-निरपेक्ष स्वार्थमात्र का प्रतिपादन न करके एक प्रयोजनवत्ता का निर्वाह करने के लिए गुण-प्रधानभावेन साकाङ्क्षपदार्थों का अभिधान करते हैं, जिससे नानागुणपदार्थ-विशिष्ट एक प्रधान अर्थ की गमकता वाक्य में उपपन्न हो जाती है, जैसा कि श्री कुमारिलभट्ट कहते हैं—

साक्षाद् यद्यपि कुर्वन्ति पदार्थप्रतिपादनम् ।
वर्णाः तथापि नैतस्मिन् पर्यवस्यन्ति निष्फले ॥
वाक्यार्थमितये तेषां प्रवृत्तौ नान्तरीकम् ।
पाके ज्वालेव काष्ठानां पदार्थप्रतिपादनम् ॥ (श्लो. वा. पृ. ९४३)

[वाक्य के घटकीभूत पद यद्यपि अपने शुद्ध (इतरार्थानन्वित) स्वार्थ के वाचक होते हैं, तथापि केवल स्वार्थ का प्रतिपादन कर देने से न तो वाक्यार्थ-बोध होता है और न प्रवृत्त्यादि, अतः प्रवृत्त्यादि का सम्पादन करने के लिए इतरार्थान्वित स्वार्थ की लक्षकता पदों में वैसे ही नान्तरीयक (अनिवार्य) होती है, जैसे ओदनादि का पाक सम्पादन करने के लिए चूल्हे में लगी सभी लकड़ियाँ एक ऐसी मिलित ज्वाला को जन्म देती हैं, जिससे पाक सम्पन्न होता

वेदान्ते भूतोपदेशः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १६५

कूटस्थनित्यं भूतं नोपदिशतीति को हेतुः ? न हि भूतमुपदिश्यमानं क्रिया भवति । अक्रियात्वेऽपि भूतस्य क्रियासाधनत्वात्क्रियार्थ एव भूतोपदेश इति चेत्, नैष दोषः; क्रियार्थत्वेऽपि क्रियानिर्वर्तनशक्तिमद्वस्तूपदिष्टमेव । क्रियार्थत्वं तु प्रयोजनं तस्य । न

भामती

तथा चार्थान्तरसंसर्गपरतामात्रेण वाक्यार्थप्रत्ययोपपत्तौ न कार्यसंसर्गपरत्वनियमः पदानाम् । एवं च सति कूटस्थनित्यब्रह्मरूपपरत्वेप्यदोष इति । ॐ भव्यं ॐ कार्यम् । ननु यद्भूव्यार्थं भूतमुपदिश्यते न तद् भूतं भव्यसंसर्गेण रूपेण तस्यापि भव्यत्वादित्यत आह ॐ न हि भूतमुपदिश्यमानम् इति ॐ । न तादात्म्यलक्षणः संसर्गः, किन्तु कार्येण सह प्रयोजनप्रयोजनिलक्षणोऽन्वयः । तद्विषयेण तु भावार्थेन भूतार्थानां क्रियाकारक लक्षण इति न भूतार्थानां क्रियार्थत्वमित्यर्थः । शङ्कते ॐ अक्रियात्वेऽपि इति ॐ । एवं चाक्रियार्थकूटस्थनित्यब्रह्मोपदेशानुपपत्तिरिति भावः । परिहरति ॐ नैष दोषः, क्रियार्थत्वेऽपि इति ॐ । न हि क्रियार्थं भूतमुपदिश्यमानमभूतं भवति । अपि तु क्रियानिर्वर्तनयोग्यं भूतमेव तत् । तथा च भूतेऽर्थेऽवधृतशक्तयः शब्दाः क्वचित् स्वनिष्ठभूतविषया दृश्यमाना मृत्वा शीर्खा वा न कथञ्चित् क्रिया-निष्ठतां गमयितुमुचिताः । नह्युपहितं शतशो दृष्टमप्यनुपहितं क्वचिद् दृष्टमदृष्टं भवति । तथा च वर्त्तमानापदेशा अस्तिक्रीयोपहिता अकार्यार्था अप्यटवीवर्णंकादयो लोके बहुलमुपलभ्यन्ते, एवं क्रियाऽनिष्ठा

भामती-व्याख्या

है ] । फलतः इतरार्थान्वित स्वार्थपरता के विना पदों के द्वारा वाक्यार्थावबोध ( संसर्गज्ञान ) सम्भव नहीं, अतः जब इतरार्थान्वय-ज्ञान के द्वारा बाक्यार्थ सम्पन्न हो जाता है, तब पदों में कार्यरूपार्थान्वयपरत्व का नियम व्यर्थ है । वेदान्त-वाक्य भी कूटस्थ नित्य ब्रह्म का समर्पण अवाध गति से कर सकते हैं, इसमें किसी प्रकार की बाधा नहीं। "भूतं चेद् वस्तूपदिशति भव्यार्थत्वेन" —इस भाष्य में 'भव्य' शब्द का अर्थ है—कार्य ( अपूर्व और उसकी साधनीभूत यागादि क्रिया ) श्री शबरस्वामी भी कहते हैं—"भव्यं कर्म, भूतं द्रव्यम्" ( शावर. पृ. १३४८ ) । जैसे मृत्तिका-संसृष्ट घटादि मृण्मय माने जाते हैं, वैसे भव्य-संसर्गी भूत ( द्रव्य ) पदार्थ भी भव्य क्यों नहीं ? इस प्रश्न का उत्तर है—"न हि भूतमुपदिश्यमानं क्रिया भवति ।" दृष्टान्त ( मृत्तिका और घट ) में तादात्म्य संसर्ग होने के कारण घट में मृण्मयता मानी जाती है, किन्तु भूत और भव्य का तादात्म्य संसर्ग नहीं माना जाता । 'भव्य' शब्द से अपूर्व और उसकी साधनीभूत यागादि क्रिया विवक्षित होती है । अपूर्व के साथ व्रीहि आदि द्रव्य का प्रयोजन-प्रयोजनीभाव एवं अपूर्व की जनकीभूत यागादि क्रिया के साथ क्रिया-कारकभाव सम्बन्ध होता है, तादात्म्य नहीं कि जिससे भूत में भव्यत्वापत्ति हो जाती ।

शङ्का—"अक्रियात्वेऽपि भूतस्य क्रियासाधनत्वात् क्रियार्थ एव भूतीपदेशः।" यह सत्य है कि व्रीह्यादि भूत पदार्थ कभी भव्य या क्रियारूप नहीं हो सकते, किन्तु वेद में उन्हीं भूत पदार्थों का उपदेश होता है, जो क्रिया के आश्रय या जनक होते हैं, ब्रह्म पदार्थ वैसा भूत नहीं, अतः उसका वेद-पदों के द्वारा प्रतिपादन क्योंकर होगा ?

समाधान—"नैष दोषः, क्रियार्थत्वेऽपि क्रियानिर्वर्तनशक्तिमद्वस्तूपदिष्टमेव" । अन्वितार्थ का पद लक्षक होता है, वाचक नहीं, वाचक शुद्ध ( इतरार्थानन्वित ) स्वार्थ का ही होता है, अतः मर-खप करके भूत वस्तु के साथ क्रियान्वयन का लाभ कर लेने पर भी शुद्ध भूतार्थ में भूत-पदों की शक्ति का अपलाप नहीं हो सकता । क्रिया-जनन शक्ति से युक्त होने पर भी भूत भूत ही रहता है, अतः भूत-पदों को भूतार्थ में अवधृत शक्ति अपने क्रिया-विशिष्ट अर्थ के समान उपहित ( उपाधि से उपलक्षित ) अर्थ का भी उपस्थापन कर सकती है। अतः एव अस्ति क्रिया से उपहित अटवी ( वन ) एवं पर्वतादि के वर्णन प्रचुररूप में उपलब्ध होते हैं, जैसे —

१६६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

चैतावता वस्त्वनुपदिष्टं भवति । यदि नामोपदिष्टं, किं तव तेन स्यादिति ? उच्यते— अनवगतात्मवस्तूपदेशश्च तथैव भवितुमर्हति । तदवगत्या मिथ्याज्ञानस्य संसारहेतोर्निवृत्तिः प्रयोजनं क्रियत इत्यविशिष्टमर्थवत्त्वं क्रियासाधनवस्तूपदेशेन । अपि च

भामती

अपि सम्बन्धमात्रपर्यवसायिनः, यथा कस्येष पुरुष इति प्रश्नोत्तरं राज्ञ इति, तथा प्रातिपदिकार्थमात्रनिष्ठा, यथा कीदृशास्तरव इति प्रश्नोत्तरं फलिन इति, न हि पृच्छता पुरुषस्य वा तरूणां वाऽस्तित्वनास्तित्वे प्रतिपित्सिते, किन्तु पुरुषस्य स्वामिभेदस्तरूणां च प्रकारभेदः । प्रष्टुरपेक्षितं चाचक्षाणः स्वामिभेदमेव च प्रकारभेदरूपमेव च प्रतिवक्ति, न पुनरस्तित्वं, तस्य तेनाप्रतिपित्सितत्वात् । उपपादिता च भूतेऽप्यर्थे व्युत्पत्तिः प्रयोजनवति पदानाम् ।

चोदयति ॐ यदि नामोपदिष्टं ॐ भूतं किं तव उपदेष्टुः श्रोतुर्वा प्रयोजनं ॐ स्यात् ॐ । तस्माद् भूतर्माप प्रयोजनवदेवोपदेष्टव्यं नाप्रयोजनम् , अप्रयोजनं च ब्रह्म तस्योदासीनस्य सर्वक्रियारहितत्वेनानुपकारकत्वादिति भावः । परिहरति ॐ अनवगतात्मोपदेशश्च ॐ तथैव प्रयोजनवानेव भवितुमर्हति ॐ । अप्यर्थश्चकारः । एतदुक्तं भवति — यद्यपि ब्रह्मोदासीनं तथापि तद्विषयं शाब्दज्ञानमवगतिपर्यन्तं विद्या स्वविरोधिनीं संसारमूलमविद्यामुच्छिन्दत् प्रयोजनवदित्यर्थं। अपि च येऽपि कार्यपरत्वं


भामती-व्याख्या

"अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः ।
पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य स्थितः पृथिव्यामिव मानदण्डः ॥"

इसी प्रकार 'क्रिया' पद का प्रयोग किए बिना ही सम्बन्धमात्र के उपस्थापक शब्द भी प्रयुक्त होते हैं, जैसे—'कस्यैष पुरुषः ?' इस प्रश्न का उत्तर है—'राज्ञः' । केवल प्रातिपदिकार्थ के बोधक पद भी होते हैं, जैसे 'कीदृशास्तरवः ?' इस प्रश्न का उत्तर है—'फलिनः' । यहाँ प्रश्न-कर्त्ता के द्वारा प्रथम प्रश्न में पुरुष और द्वितीय प्रश्न में तरु ( वृक्ष ) समूह के अस्तित्व या नास्तित्व की जिज्ञासा नहीं की गई कि उत्तर वाक्य में क्रिया-पद का प्रयोग आवश्यक होता । यहां तो केवल पुरुष के स्वामी और तरुओं के प्रकार की जिज्ञासा की गई है, अतः 'राज्ञः' और 'फलिनः'—इतना कह देना पर्याप्त माना जाता है, क्योंकि उत्तर-कर्त्ता जिज्ञासितमात्र का ही अभिधान किया करता है, अजिज्ञासित का नहीं । क्रिया-सम्बन्ध के बिना भी सिद्धार्थक पदों का शक्ति-ग्रह एवं सिद्धार्थ प्रयोजनवान् होता है—यह कह चुके हैं ।

पूर्वपक्षी शङ्का करता है—"यदि नामोपदिष्टम्, किं तव तेन स्यात् ?" अर्थात् यदि भूत ( सिद्ध ) वस्तु का उपदेश देखा जाता है, तब उससे वक्ता या श्रोता का क्या लाभ ? अतः उसी सिद्धार्थ का उपदेश करना चाहिए, जो सप्रयोजन हो, ब्रह्म अत्यन्त प्रयोजन-शून्य है, क्योंकि वह कूटस्थ, विभु और उदासीन है, उसमें किसी क्रिया का भी सम्बन्ध नहीं हो सकता, अतः उससे किसी प्रकार का उपकार सम्भव नहीं ।

उक्त शङ्का का परिहार किया जाता है—"अनवगतात्मवस्तूपदेशश्च तथैव भवितुमर्हति ।" 'तथैव' शब्द का यहाँ अर्थ है—प्रयोजनवान् । 'आत्मवस्तूपदेशश्च'—यहाँ चकार का प्रयोग 'अपि' के अर्थ में हुआ है । आशय यह है कि यद्यपि ब्रह्म कूटस्थ, विभु और उदासीन है, तथापि ब्रह्मविषयक अवगति-पर्यन्त ( साक्षात्कारात्मक ) बोध वह ब्रह्म-विद्या है, जो अपनी विरोधिनी संसार की मूलभूत अविद्या का समूल उच्छेद कर डालती है, इससे बढ़ कर और प्रयोजन या उपकार क्या होगा ?

दूसरी बात यह भी है कि जो आचार्य सभी पदों में कार्यपरत्व आवश्यक मानते हैं, वे

वेदान्ते भूतोपदेशः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १६७

भामती

सर्वेषां पदानामास्थिषत, तैरपि ब्राह्मणो न हन्तव्यो न सुरा पातव्येत्यादीनां न कार्यपरता शक्याऽऽस्थातुम् । कृत्युपहितमर्थ्यादं हि कार्यं कृत्या व्याप्तं तन्निवृत्तौ निवर्त्तते शिंशपात्वमिव वृक्षत्वनिवृत्तौ । कृतिर्हि पुरुषप्रयत्नः, स च विषयाधीननिरूपणः । विषयश्चास्य साध्यस्वभावतया भावार्थ एव पूर्वापरीभूतोऽन्योत्पादानुकूलो भवितुमर्हति, न द्रव्यगुणौ । साक्षात् कृतिव्याप्यो हि कृतेर्विषयः, न च द्रव्यगुणयोः सिद्धयोरस्ति कृतिव्याप्यता । अत एव शास्त्रकृद्वचः "भावार्थाः कर्मशब्दास्तेभ्यः क्रिया प्रतीयेत" इति । द्रव्यगुणशब्दानां नैमित्तिकावस्थायां कार्यविमर्शेऽपि भावस्य स्वतो द्रव्यगुणशब्दानां तु भावयोगात् कार्यविमर्श इति भावार्थेभ्य एवापूर्वावगतिर्न द्रव्यगुणशब्देभ्य इति । न च 'दध्ना जुहोति' 'सन्ततमाघारयति' इत्यादिषु द्रव्यादीनां कार्यविषयता । तत्रापि हि होमाधारभावार्थविषयमेव कार्यम् । न चैतावता सोमेन यजेतेतिवत् , दधिसन्ततादिविशिष्टहोमाधारविधानात् 'अग्निहोत्रं जुहोति' 'आधारमभिघारयति' इति तदनुवादः । यद्यप्यत्रापि भावार्थविषयमेव कार्यम् । तथापि भावार्थानुबन्धतया द्रव्यगुणाव-

भामती-व्याख्या

आचार्य भी “ब्राह्मणो न हन्तव्यः”, “न सुरा पातव्या”—इत्यादि निषेध-वाक्यों में कार्यपरत्व का उपपादन नहीं कर सकते, क्योंकि मनुष्य की कृति (प्रयत्न) से साध्य पदार्थ को कार्य कहा जाता है, अतः 'यद् यत्कार्यम्, तत्तत् कृतिसाध्यम्'—इस व्याप्ति के अनुसार कार्य व्याप्य और कृति व्यापक सिद्ध होती है । निषेध-स्थल पर कृतिरूप व्यापक की निवृत्ति हो जाने से कार्यत्व की भी निवृत्ति वैसे ही हो जाती है, जैसे शिंशपात्व की वहाँ निवृत्ति हो जाती है, जहाँ वृक्षत्व नहीं रहता, श्रीधर्मकीर्ति कहते हैं—“व्यापकानुपलब्धिर्यथा नात्र शिंशपा वृक्षाभावात्” (न्या. वि. पृ. १२९) । कृति नाम है—पुरुष के प्रयत्न का, कृति या प्रयत्न का निरूपण उसके विषय पर निर्भर है, कृति का विषय होता है—साध्यस्वरूप धात्वर्थ (पचनादि) श्री प्रभाकर मिश्र भी कहते हैं—“तस्य च विषयाधीनप्रतिपत्तित्वाद्, भावार्थानां विषयबोधकत्वात्” (बृहती पृ. २९७) । धात्वर्थ के लिए निरुक्तकार ने कहा है—“पूर्वापरीभूतं भावमाख्यातेनाचष्टे व्रजति, पचतीत्युपक्रमप्रभृत्यपवर्गपर्यन्तम्” (निरुक्त. पृ. ४) । न्यायभाष्यकार ने पचति का स्वरूप बताते हुए कहा है—“नानाविधा चैकार्था क्रिया पचतीति--स्थाल्यधिश्रयणम्, उदकासेचनम्, तण्डुलावपनम्, एधोऽपसर्पणम्, अग्न्यभिज्वालनम्, दर्वीघट्टनम्, मण्डस्रावणम्, अधोऽवतारणम्” (न्या. भा. पृ. ७४) । पौर्वापरीभूत पाक क्रिया तण्डुलगत विक्लेदन-जनक होती है । यही क्रिया कृति की विषय है, द्रव्य और गुणादि नहीं । महर्षि जैमिनि कहते हैं—“भावार्थाः कर्मशब्दाः, तेभ्यः क्रिया प्रतीयेत" एष ह्यर्थो विधीयते (जै. सू. २।१।१) । प्रभाकर की रीति से सूत्र का अर्थ यह है कि शाब्द बोध के अवसर पर प्रथम क्षण में प्रत्येक पद अपने सम्बन्धी शुद्ध अर्थ का स्मारक और द्वितीय क्षण में कार्यान्वित स्वार्थ का अभिधायक होता है । शुद्ध (अनन्वित) अर्थ को निमित्त और अन्वित (कार्यान्वित) अवस्था को नैमित्तिक कहा जाता है । नैमित्तिक अवस्था में तो द्रव्य, गुणादि के वाचक शब्द भी कार्यार्थक होते हैं, किन्तु शुद्ध अवस्था में केवल भावार्थक (धातु) शब्द ही विषयोपस्थापन के द्वारा कार्य (अपूर्व) का बोधक होता है, अतः यागादि क्रिया के वाचक (भावार्थ) शब्दों से ही क्रिया (अपूर्वरूप कार्य) का अभिधान माना जाता है और उसी (यागादि) का ही विधान किया जाता है ।

शङ्का—जैसे कार्य (अपूर्व) के विषयीभूत यागादि का विधान माना जाता है, वैसे ही “दध्ना जुहोति”, “सन्ततमाघारयति”—इत्यादि स्थलों पर दधिरूप द्रव्य एवं घृत का सन्तत (अटूट धारा के रूप में) क्षरणरूप गुण भी कार्य (अपूर्व) के विषय या अवच्छेदक

१६८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४

भामती

विषयावपि विधीयेते। भावार्थो हि कारकव्यापारमात्रतयाऽविशिष्टः कारकविशेषेण द्रव्यादिना विशेष्यत इति द्रव्यादस्तदनुबन्धः। तथा च भावार्थे विधीयमाने स एव सानुबन्धो विधीयत इति द्रव्यगुणाव-विषयावपि तदनुबन्धतया विहितौ भवतः। एवं च भावार्थप्रणालिकया द्रव्यादिसङ्क्रान्तो विधिर्गौरवाद् बिभ्यत् स्ववविषयस्य चान्यतः प्राप्तत्या तदनुवादेन तदनुबन्धीभूतद्रव्यादिपरो भवतीति सर्वत्र भावार्थ-विषय एव विधिः। एतेन यदाग्नेयोऽष्टाकपालो भवतीत्यत्र सम्बन्धविषयो विधिरिति परास्तम्। ननु न भवत्यर्थो विधेयः, सिद्धे भवितरि लब्धरूपस्य भवनं प्रत्यकर्तृत्वात्। न खलु गगनं भवति। नाप्यसिद्धेऽ-सिद्धस्यानियोज्यत्वाद्, गगनकुसुमवत्। तस्माद् भवनेन प्रयोज्यव्यापारेणाक्षिप्तः प्रयोजकस्य भावयितु-र्व्यापारो विधेयः। स च व्यापारो भावना कृतिः प्रयत्न इति। निर्विषयश्चासाववश्यप्रतिपत्तिरतो विषया-पेक्षायामाग्नेयशब्दोपस्थापितो द्रव्यदेवतासम्बन्ध एवास्य विषयः। ननु व्यापारविषयः पुरुषप्रयत्नः कथमव्यापाररूपं सम्बन्धं गोचरयेत्। नहि घटं कुर्वित्यत्रापि साक्षाक्षात्मार्थं घटं पुरुषप्रयत्नो गोचरयत्यपि

भामती-व्याख्या

होते हैं, अतः उनका भी विधान क्यों न किया जाय ?

समाधान— वहाँ भी जुहोत्यर्थ (होम) और आधार (क्षारण) रूप भावार्थ ही कार्य का विषय माना जाता है, अतः साक्षात् विषय का ही विधान न्याय-संगत है।

शङ्का— यदि दध्यादि में भी भावार्थ का ही विधान होता है, तब जैसे "सोमेन यजेत" (तै. सं. ३।२।२) इस वाक्य के द्वारा सोम-विशिष्ट याग का विधान होता है, वैसे ही "दध्ना जुहोति" और "सन्ततमाघारयति" इत्यादि वाक्य भी क्रमशः होम और आधार कर्म के विधायक हो जाएँगे और "अग्निहोत्रं जुहोति" (तै. सं. १।५।९।१) एवं "आधार-माघारयति" (तै. सं. २।५।११।६) इन दोनों वाक्यों को क्रमशः होम और आधार का अनुवादक मानना पड़ेगा।

समाधान— यद्यपि यहाँ पर भी कार्य (अपूर्व) भावार्थविषयक ही है, तथापि भावार्थ के विशेषक होने के कारण कार्य के अविषयीभूत भी द्रव्य और गुण विहित हो जाते हैं। द्रव्यादि से विशिष्ट भावार्थ का विधान गौरव-ग्रस्त होता है, अतः विशिष्ट-विधान वहाँ ही अगत्या माना जाता है, जहाँ वाक्यान्तर से कर्म का विधान न हो सकता हो, अग्निहोत्रं जुहोति-इत्यादि वाक्यों के द्वारा विहित भावार्थ के अनुवाद से "दध्ना जुहोति", "पयसा जुहोति"-इत्यादि वाक्यों के द्वारा केवल दध्यादि गुण का विधान मानने में ही लाघव होता है। "सोमेन यजेत"—यहाँ पर कोई वाक्यान्तर ऐसा उपलब्ध नहीं होता जो केवल भावार्थ का विधायक माना जा सके, अतः वहाँ अगत्या विशिष्ट विधान मानना पड़ता है, किन्तु प्रकृत में वैसा नहीं। फलतः सिद्धार्थ कहीं पर भी साक्षाद् विधेय नहीं होता, अपितु भावार्थ ही विधेय होता है। अत एव जो लोग "यदाग्नेयोऽष्टाकपालो भवति" (तै. सं. २।६।३३) यहाँ पर द्रव्य के साथ अग्न्यादि देवताओं के सम्बन्धमात्र का विधान मानते थे, उनका निराकरण हो जाता है, क्योंकि सम्बन्ध पदार्थ भी द्रव्यादि के समान सिद्धार्थ है, अतः वह साक्षाद् विधेय नहीं हो सकता।

शङ्का— उक्त स्थल पर यदि द्रव्य-देवता का सम्बन्ध विधीयमान नहीं, तब किसका विधान होता है? 'भवति' धातु के अर्थभूत भवन का विधान नहीं हो सकता, क्योंकि भवत्यर्थ का कर्त्ता सिद्ध है? अथवा असिद्ध? प्रथम कल्प में विधि ही व्यर्थ है, द्वितीय कल्प में कर्त्तारूप नियोज्य असिद्ध होने के कारण विधित्व सम्भव नहीं। परिशेषतः भवनरूप प्रयोज्य-व्यापार के द्वारा प्रयोजक के व्यापार का आक्षेप होता है, क्योंकि घटादिरूप

निषेधवाक्येषु कार्याभावः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १६९

भामती

तु दण्डादि हस्तादिना व्यापारयति। तस्माद् घटार्थी कृतिं व्यापारविषयामेव प्रतिपद्यते, न तु रूपतो घटविषयाम्, उद्देश्यतया त्वस्यामस्ति घटो न तु विषयतया, विषयतया तु हस्तादिव्यापार एव। अत एवाग्नेय इत्यत्रापि द्रव्यदेवतासम्बन्धाक्षिप्तो यजिरेव कार्यविषयो विधेयः। किमुक्तं भवति आग्नेयो भवतीति, आग्नेयेन यागेन भावयेदिति। अत एव 'य एवं विद्वान् पौर्णमासीं यजते', 'य एवं विद्वानमावास्यां यजते' इत्यनुवादो भवति यदाग्नेय इत्यादिविहितस्य यागषट्कस्य। अत एव च विहितानुष्ठितस्य तस्यैव दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेतेत्यधिकारसम्बन्धः। तस्मात् सर्वत्र कृतिप्रणालिकया भावार्थविषय एव विधिरित्येकान्तः। तथा च न हन्यान्न पिबेदित्यादिषु यदि कार्यमभ्युपेयेत ततस्तद्व्यापिका कृतिरुपेयेत। तद्व्यापकश्च भावार्थो विषयः। एवञ्च प्रजापतिव्रतन्यायेन पर्युदासवृत्त्याऽहननापानसङ्कल्पलक्षण्या तद्विषयो विधिः स्यात्। तथा च प्रसज्यप्रतिषेधो दत्तजलाञ्जलिः प्रसज्येत। न च सति


भामती-व्याख्या

उत्पद्यमान या प्रयोज्य का भवनरूप व्यापार तब तक सम्भव नहीं होता, जब तक प्रयोजक (उत्पादक) का भावन या उत्पादन व्यापार न हो। प्रयोजक के व्यापार को ही भावना, कृति या प्रयत्न कहा जाता है। निर्विषयक कृति की प्रतिपत्ति नहीं हो सकती, अतः विषय की आकांक्षा में 'आग्नेय' शब्द के द्वारा उपस्थापित द्रव्य-देवता का सम्बन्ध ही विषय ठहरता है, अतः उसे ही यहाँ विधेय मानना चाहिए।

समाधान—कृति या प्रयत्न सदैव क्रिया को ही विषय करता है, सम्बन्ध क्रिया रूप नहीं, अतः उसको विषय क्योंकर करेगा? जैसे कि "घटं कुरु"—ऐसे प्रयोग में कृतिरूप पुरुष-प्रयत्न घटादि सिद्ध पदार्थों को साक्षात् विषय नहीं कर सकता, अपितु वैसी आज्ञा सुनते ही पुरुष तुरन्त दण्डादि के द्वारा चाक घुमाने लग जाता है, अतः घटोत्पत्ति के अनुकूल कृति का उत्पादनादि व्यापार विषय माना जाता है, स्वरूपतः घटादि नहीं, क्योंकि 'घटं करोति'—इसका अर्थ होता है—'घटाय चक्रं व्यापारयति'। घट उस कृति का केवल उद्देश्य होता है, विषय नहीं। कृति का साक्षात् विषय तो हस्त, दण्ड और चक्रादि का व्यापार ही होता है। अत एव 'आग्नेयः' यहाँ पर भी द्रव्य-देवता-सम्बन्ध के द्वारा आक्षिप्त याग ही विधेय होता है। 'आग्नेयो भवति'—इस वाक्य का अर्थ होता है—'आग्नेयेन यागेनेष्टं भावयेत्'। इसीलिए "य एवंविद्वान् पौर्णमासीं यजते" (तै. सं. १।६।११।१)। "य एवंविद्वानमावास्यां यजते"—ये दोनों वाक्य आग्नेयादि याग के अनुवादक माने जाते हैं ['यदाग्नेयो भवति'—इत्यादि वाक्यों से पूर्णिमा में विहित 'आग्नेय', 'उपांशुयाज' और 'आग्नीषोमीय'—इन तीन यागों का 'पौर्णमासी' पद और अमावास्या में विहित 'आग्नेय' 'ऐन्द्र दधि' और 'ऐन्द्र पयः'—इन तीन कर्मों का अनुवाद 'अमावास्या'—पद के द्वारा माना जाता है, जिससे कि 'दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत'—इस अधिकार-वाक्य में द्विवचन की उपपत्ति हो जाती है। कर्म का फलविशेष के साथ सम्बन्ध-ज्ञान करानेवाले वाक्य को अधिकार-वाक्य कहा जाता है। फलतः सर्वत्र कृति के माध्यम से भावार्थ को ही विधि विषय किया करती है—ऐसा ऐकान्तिक नियम है। अतः "न हन्यात्", "न पिबेत्"—इत्यादि वाक्यों में यदि कोई कार्य माना जाता है, तब उसकी व्यापकीभूत कृति माननी होगी और कृति का व्यापक होता है—भावार्थरूप विषय। यदि यह सब कुछ मान लिया जाता है, तब उक्त वाक्यों से निषेध न होकर 'प्रजापति-व्रत-न्याय' (जै. सू. ४।१।३-९) के आधार पर 'अहनन' और 'अपानादि विषयक सङ्कल्प में उसकी लक्षणा मानकर उक्त सङ्कल्पविषयक विधि का उपपादन किया जायगा। तब तो सर्वत्र पर्युदास वृत्ति को अपनाकर प्रसज्य प्रतिषेध को तिलाञ्जलि ही देनी

२२

१७०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

'ब्राह्मणो न हन्तव्यः' इत्येवमाद्या निवृत्तिरुपदिश्यते । न च सा क्रिया । नापि क्रियासाधनम् । अक्रियार्थानामुपदेशोऽनर्थकश्चेत् 'ब्राह्मणो न हन्तव्यः' इत्यादिनिवृत्त्युपदेशानामानर्थक्यं प्राप्तम् । तच्चानिष्टम् । न च स्वभावप्राप्तहन्त्यर्थानुरागेण नञः

भामती

सम्भवे लक्षणा न्याय्या । नेक्षेतोद्यन्तमित्यादौ तु तस्य व्रतमित्यधिकारात् प्रसज्यप्रतिषेधासम्भवेन पर्युदासवृत्त्याऽनीक्षणसङ्कल्पलक्षणा युक्ता । तस्मान्न हन्यान्न पिबेदित्यादिषु प्रसज्यप्रतिषेधेषु भावार्थाभावात् तद्व्याप्तायाः कृतेरभावस्तदभावे च तद्व्याप्यस्य कार्यस्याभाव इति न कार्य्यपरत्वनियमः सर्वत्र वाक्ये इत्याह । ॐ ब्राह्मणो न हन्तव्य इत्येवमाद्या इति ॐ । ननु कस्मात् निवृत्तिरेव कार्य्यं न भवति, तत्साधनं वेत्यत आह । ॐ न च सा क्रिया इति ॐ । क्रियाशब्दः कार्य्यवचनः । एतदेव विभजते । ॐ अक्रियार्थानाम् इति ॐ ।

स्यादेतत्—विधिविभक्तिश्रवणात् कार्य्यं तावदत्र प्रतीयते, तच्च न भावार्थमन्तरेण । न च

भामती-व्याख्या

होगी । किसी अन्य गति के सम्भव होने पर लक्षणा न्याय-संगत नहीं मानी जाती, जैसा कि महर्षि जैमिनि कहते हैं— “गुणे त्वन्यायकल्पना” (जै. सू. १।३।१७) । अर्थात् गौणीभूत या अप्रधान अर्थ में ही अन्याय (लक्षणादि) की कल्पना की जाती है। जहाँ प्रसज्य प्रतिषेध सम्भव नहीं, वहाँ अगत्या प्रतिषेध की विधेयार्थ में लक्षणा की जाती है, जैसे—मनुस्मृति में स्नातक व्यक्ति के कर्त्तव्यों की प्रतिज्ञा की गई है—

अतोऽन्यतमया वृत्त्या जीवंस्तु स्नातको द्विजः।
स्वर्ग्यायुष्ययशस्यानि व्रतानीमानि धारयेत्॥ (मनु. ४।१३)

यहाँ 'व्रत' शब्द का अर्थ है—अनुष्ठेय कर्म । उन व्रतों की गणना में जो कहा गया है— “वेदोदितं स्वकं कर्म नित्यं कुर्यादतन्द्रितः” (मनु. ४।१४) वह उचित ही है, किन्तु यह जो कह दिया गया है कि : “नेक्षेतोद्यन्तमादित्यं नास्तं यन्तं कदाचन” (मनु. ४।३७) । वह सर्वथा अनुचित और विरुद्धाभिधान है, क्योंकि 'ईक्षण' (दर्शन) न करना कोई व्रत या अनुष्ठेय कर्म नहीं, अपितु निषेधात्मक है। कहीं-कहीं प्रतिज्ञा-वाक्य 'तस्य व्रतम्'—ऐसा पाया जाता है, उस प्रतिज्ञा-वाक्य से विरुद्ध होने के कारण यहाँ प्रसज्य-प्रतिषेधपरक 'नेक्षेत' पद की लक्षणा अनीक्षणविषयक सङ्कल्प में की जाती है, उसमें कर्त्तव्यता का निर्वाह हो जाता है। स्नातक के इन व्रतों को प्रजापति-व्रत कहा जाता है, इनका विचार जै. सू. (४।१।३) में किया गया है।

'न हन्यात्', 'न पिबेत्'—इत्यादि वाक्यों में किसी प्रकार का विरोध उपस्थित न होने के कारण निषेधपरता ही मानी जाती है। वहाँ निषेध्य पदार्थ ही होता है, कोई विधेय नहीं, जब विधेयभूत कोई धात्वर्थ ही वहाँ नहीं, तब भावार्थ-व्याप्त कृति का अभाव और कृति का अभाव होने से कृति-व्याप्त अपूर्वरूप कार्य (नियोग) का अभाव हो जाता है, अतः समस्त वैदिक वाक्यों में कार्यपरत्व का नियम भङ्ग हो जाता है, भाष्यकार यही कह रहे हैं— “ब्राह्मणो न हन्तव्य इत्येवमाद्या निवृत्तिरुपदिश्यते”। निवृत्ति को कार्य (नियोग) या कार्य की साधनीभूत भावार्थात्मक क्रिया क्यों नहीं माना जा सकता ? इस प्रश्न का उत्तर है— “न च सा क्रिया” । यहाँ 'क्रिया' शब्द कार्य (नियोग) का वाचक है। इसी का स्पष्टीकरण किया जा रहा है— “अक्रियार्थानामुपदेशोऽनर्थकश्चेद् ब्राह्मणो न हन्तव्य इत्यादिनिवृत्त्युपदेशानामानर्थक्यं प्राप्तम्” ।

शङ्का—'हन्तव्यः' इत्यादि पदों में श्रुत विध्यर्थक 'तव्य' प्रत्यय के द्वारा कार्यार्थ की

निषेधवाक्येषु कार्याभावः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १७१

शक्यमप्राप्तक्रियार्थत्वं कल्पयितुं हननक्रियानिवृत्त्यौदासीन्यव्यतिरेकेण । नञश्चैष स्वभावो यत्स्वसम्बन्धिनोऽभावं बोधयतीति । अभावबुद्धिश्चौदासीन्यकारणम् । सा च दग्धेन्धनाग्निवत्स्वयमेवोपशाम्यति । तस्मात्प्रसक्तक्रियानिवृत्त्यौदासीन्यमेव 'ब्राह्मणो न हन्तव्य-' इत्यादिषु प्रतिषेधार्थं मन्यामहे, अन्यत्र प्रजापतिव्रतादिभ्यः ।

भामती

रागतः प्रवृत्तस्य हननपानादावकस्मादौदासीन्यमनुपपद्यते विना विधारकप्रयत्नम् । तस्मात् स एव प्रवृत्त्युन्मुखानां मनोवाग्देहानां विधारकः प्रयत्नो निषेधविधिगोचरः क्रियेति नाक्रियापरमस्ति वाक्यं किञ्चिदपीत्याह ॐ न च हननक्रियानिवृत्त्यौदासीन्यव्यतिरेकेण नञः शक्यमप्राप्तक्रियार्थत्वं कल्पयितुम् ॐ । केन हेतुना न शक्यमित्यत आह ॐ स्वभावप्राप्तहन्त्यर्थानुरागेण नञः ॐ । अयमर्थः । हननपानपरो हि विधिप्रत्ययः प्रतीयमानस्ते एव विधत्त इत्युत्सर्गः । नचैते शक्ये विधातुम् । रागतः प्राप्तत्वात् । न च नञः प्रसज्यप्रतिषेधो विधेयः । तस्याप्यौदासीन्यरूपस्य सिद्धतया प्राप्तत्वात् । न च विधारकः प्रयत्नः । तस्याश्रुतत्वेन लक्ष्यमाणत्वात् । सति सम्भवे च लक्षणाया अन्याय्यत्वात् । विधिविभक्तेश्च रागतः प्राप्तप्रवृत्त्यनुवादकत्वेन विधिविषयत्वायोगात् । तस्माद् यत् पिबेद् हन्याद्वेत्यनूद्य तन्नेति निषिध्यते, तदभावो ज्ञाप्यते, न तु नञर्थो विधीयते । अभावश्च स्वविरोधिभावनिरूपणतया भावच्छायानुपातीति सिद्धे


भामती-व्याख्या

प्रतीति होती है। कार्य कभी भावार्थरूप क्रिया के बिना नहीं हो सकता, क्योंकि वह कार्य का विषय और साधन है। हननादि में प्रवृत्त पुरुष तब तक सहसा उदासीन (निवृत्त) नहीं हो सकता, जब तक उसकी प्रवृत्ति का विधारक (अवरोधक) प्रयत्न नहीं किया जाता, अतः प्रवृत्त्युन्मुख पुरुष के मन, वाणी और शरीर का धारक वही प्रयत्न निषेधविधि की विषयीभूत क्रिया माना जाता है। फलतः यह सिद्ध हो जाता है कि क्रियार्थ-निरपेक्ष कोई वाक्य और वाक्यार्थ नहीं होता।

समाधान—उक्त शङ्का का निषेध करते हुए भाष्यकार कहते हैं—“न च हननक्रियानिवृत्त्यौदासीन्यव्यतिरेकेण नञः शक्यमप्राप्तक्रियार्थत्वं कल्पयितुम्”। हनन क्रिया की निवृत्ति के द्वारा औदासीन्य (तटस्थभाव या उपेक्षा) ही उपलक्षित होता है, उससे भिन्न कोई अनुष्ठेय पदार्थ उपस्थित क्यों नहीं होता ? इस प्रश्न का उत्तर है—“स्वभावप्राप्तहन्त्यर्थानुरागेण नञः”। अभिप्राय यह है कि 'हन्तव्यः' और 'पातव्यः' इन पदों में तव्यरूप विधि-प्रत्यय से 'हनन' और 'पान' का विधान कर सकते हैं—यह सहज-सिद्ध है, किन्तु यहाँ हनन और पान का विधान नहीं किया जा सकता, क्योंकि रागतः प्राप्त है [द्वेष के कारण ब्राह्मणादि के हनन और राग के कारण सुरादि के पान में मनुष्य स्वयं प्रवृत्त हो जाता है, ऐसा करने में उसे किसी प्रकार की आज्ञा या प्रेरणा की आवश्यकता नहीं होती]। हननादि से निवृत्त होने के लिए किसी विधारक (प्रतिबन्धक या अवरोधक) प्रयत्न का विधान भी सम्भावित नहीं, क्योंकि यहाँ उसका वाचक कोई पद ही प्रयुक्त नहीं हुआ है। उसमें केवल लक्षणा हो सकती थी, उसका भी कोई निमित्त यहां उपस्थित नहीं, विना निमित्त के लक्षणा की कल्पना अन्याय है। फिर विधि प्रत्यय क्या करेगा? इस प्रश्न का सीधा-सा उत्तर है कि रागादि के द्वारा प्राप्त पानादि का वह अनुवाद कर देता है, किसी अज्ञात पदार्थ का विधान नहीं कर सकता। अतः 'यत् पिबेत्', 'यद् हन्यात्', तन्न-इस प्रकार निषेधमात्र किया जाता है। हनन-पानादि का अभाव भी 'नञ्' के द्वारा ज्ञापितमात्र होता है, विहित नहीं, क्योंकि अभाव पदार्थ वस्तुतः सर्वत्र विधेय नहीं होता, उसकी विधेयता का यहाँ भ्रम अवश्य हो जाता है, क्योंकि अभाव एक सप्रतियोगिक पदार्थ है, उसका स्वभाव भी प्रतियोगी के स्वभाव पर

१७२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

भामती

सिद्धवत् साध्ये च साध्यवद् भासत इति साध्यविषयो नञर्थः साध्यवद् भासत इति नञर्थः कार्यं इति भ्रमस्तविदमाह ꣸ नञश्चैष स्वभावः इति ꣸ । ननु बोधयतु सम्बन्धिनोऽभावं नञ् , प्रवृत्त्युन्मुखानान्तु मनोवाग्देहानां कुतोऽकस्मान्निवृत्तिरित्यत आह ꣸ अभावबुद्धिश्चौदासीन्यपालनकारणम् ꣸ । अयमभिप्रायः—ज्वरितः पथ्यमश्नीयाद् न सर्पायाङ्गुलिं दद्यादित्यादिवचनश्रवणसमनन्तरं प्रयोज्यवृद्धस्य पथ्याशने प्रवृत्तिं भुजङ्गाङ्गुलिदानोन्मुखस्य च ततो निवृत्तिमुपलभ्य बालो व्युत्पित्सुः प्रयोज्यवृद्धस्य प्रवृत्तिनिवृत्तिहेतू इच्छाद्वेषावनुमिमीते । तथाहीच्छाद्वेषहेतुके वृद्धस्य प्रवृत्तिनिवृत्ती, स्वतन्त्रप्रवृत्तिनिवृत्तित्वात् , मदीयस्वतन्त्रप्रवृत्तिनिवृत्तिवत् । कर्तव्यतैकार्थसमवेतेष्टानिष्टसाधनाभावावगमपूर्वकौ चास्येच्छाद्वेषौ, प्रवृत्तिनिवृत्तिहेतुभूतेच्छाद्वेषत्वात् , मत्प्रवृत्तिनिवृत्तिहेतुभूतेच्छाद्वेषवत् । न जातु मम शब्दतद्व्यापारपुरुषाशयत्रैकाल्यानवच्छिन्नभावनापूर्वप्रत्ययपूर्वाविच्छाद्वेषावभूताम् , अपि तु भूयोभूयः स्वगतमालोचयत उक्तकारणपूर्वादेव प्रत्यवभासेते । तस्माद्वृद्धस्य स्वतन्त्रप्रवृत्तिनिवृत्ती इच्छाद्वेषभेदौ च कर्तव्यतैकार्थसमवेतेष्टानिष्टसाधनाभावावगमपूर्वावित्यनुपूर्व्या सिद्धः कार्यकारणभाव इतीष्टानिष्टसाधनतावगममात्रप्रयोज्यवृद्धप्रवृत्तिनिवृत्तौ इति सिद्धम् । स चावगमः प्राग्भूतः शब्दश्रवणानन्तरमुपजायमानः शब्दश्रवणहेतुक इति प्रवर्तकेषु वाक्येषु यजेतेत्यादिषु शब्द एव कर्तव्यमिष्टसाधनं व्यापारमवगमयंस्तस्येष्टसाधनतां

भामती-व्याख्या

निर्भर है—प्रतियोगी यदि सिद्धार्थ है, तब उसका अभाव सिद्ध के समान और प्रतियोगी यदि असिद्ध या साध्य है, तब उसका अभाव भी साध्य-जैसा प्रतीत हो जाता है। प्रकृत में हननादिरूप प्रतियोगी सिद्ध (प्राप्त) होने के कारण उसका अभाव भी प्राप्त ही है—इस रहस्य का स्पष्टीकरण भाष्यकार कर रहे हैं— "नञश्चैष स्वभावो यत्स्वसम्बन्धिनोऽभावं बोधयति"। 'नञ्' का कुछ भी स्वभाव हो, यहाँ हननादि की प्रवृत्ति में अग्रसर व्यक्ति के मन, वाणी और शरीर का अकस्मात् अवरोध क्यों हो जाता है? इस प्रश्न का उत्तर है— "अभावबुद्धिश्चौदासीन्यकारणम्"। आशय यह है कि "ज्वरितः पथ्यमश्नीयात्", "न सर्पायाङ्गुलिं दद्याद्"—इत्यादि वचनों को सुनने के अनन्तर मध्यम वृद्ध की पथ्याहार में प्रवृत्ति और सर्प के बिल में अंगुलि-दानोन्मुखता से निवृत्ति को देख कर शिक्षार्थी बालक प्रवृत्ति और निवृत्ति की कारणीभूत इच्छा और द्वेष का अनुमान कर लेता है, जिसे शिक्षित-भाषा में इस प्रकार कहा जा सकता है— 'वृद्धस्य प्रवृत्तिनिवृत्ती इच्छाद्वेषहेतुके, स्वतन्त्रप्रवृत्तिनिवृत्तित्वात्, मदीयस्वतन्त्रप्रवृत्तिनिवृत्तिवत्'। मध्यम वृद्ध की इच्छा इष्ट-साधनता और द्वेष अनिष्ट-साधनता के ज्ञान से होता है, इष्ट-साधनता और अनिष्ट-साधनता सदैव उस पदार्थ में होती है, जो कार्य (कृति-साध्य) हो। अतः मध्य वृद्ध की इच्छा और द्वेष के विषय में ऐसा अनुमान किया जा सकता है— 'अस्येच्छाद्वेषौ कार्यनिष्ठेष्टानिष्टसाधनताज्ञानपूर्वकौ, प्रवृत्तिनिवृत्तिहेतुभूतेच्छाद्वेषत्वात्, मदीयप्रवृत्तिनिवृत्तिहेतुभूतेच्छाद्वेषवत्'। बालक ने भली प्रकार यह निश्चय कर रखा है कि हमारे इच्छा और द्वेष कभी भी शब्द (विधि प्रत्यय), शब्दगत व्यापार (शाब्दी भावना), पुरुषाशय (लौकिक प्रेरणा), त्रैकाल्यानवच्छिन्न भावना (वर्तमानादि त्रिकाल-विहित प्रत्यय से अजनित आर्थीभावना) और अपूर्व (नियोग) के ज्ञान से किसी विषय में उत्पन्न नहीं हुए, अपितु वर्तमान विषयों में बार-बार यह अनुभव कर लिया है कि इष्ट-साधनता के ज्ञान से इच्छा और अनिष्ट-साधनता के ज्ञान से द्वेष उत्पन्न होते हैं, अतः मध्यम वृद्ध की प्रवृत्ति-निवृत्ति और इच्छा-द्वेष उसके कृति-साध्यभूत पदार्थ में समुत्पन्न इष्ट-साधनता और अनिष्ट-साधनता के ज्ञान से समुद्भूत हुए हैं। मध्यम वृद्ध को वह ज्ञान शब्द-श्रवण से पहले नहीं था, शब्द-श्रवण के पश्चात् उत्पद्यमान होने के

निषेधवाक्येषु कार्याभावः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १७३


भामती

कर्त्तव्यतां चावगमयति, अनन्यलभ्यत्वादुभयोः, अनन्यलभ्यस्य च शब्दार्थत्वात् । यत्र तु कर्त्तव्यताऽन्यत एव लभ्यते, यथा न हन्यान्न पिबेदित्यादिषु हननपानप्रवृत्त्यो रागतः प्रतिलम्भात्तत्र तदनुवादेन नञ्समभिव्याहृता लिङादिविभक्तिरन्यतोऽप्राप्तमनयोरनर्थ-हेतु-भावमात्रमवगमयति । प्रत्यक्षं हि तयोरिष्टसाधनभावोऽवगम्यते, अन्यथा रागविषयत्वायोगात् । तस्माद्रागादिप्राप्तकर्त्तव्यानुवादेनानर्थसाधनता प्रज्ञापनपरं न हन्यान्न पिबेदित्यादिवाक्यं, न तु कर्त्तव्यतापरमिति सुष्ठूक्तमकार्यनिष्ठत्वं निषेधानाम् । निषेध्यानां चानर्थसाधनताबुद्धिरेव निषेध्याभावबुद्धिस्तथा खल्वयं चेतन आपाततो रमणीयतां पश्यन्नप्यायतिमालोच्य प्रवृत्त्यभावं निवृत्तिमवबुध्य निवर्त्तते, औदासीन्यमात्मनोऽवस्थापयतीति यावत् ।

स्यादेतत् — अभावबुद्धिश्चेदौदासीन्यस्थापनकारणं यावदौदासीन्यमनुवर्तेत न चानुवर्त्तते । नह्युदासीनोऽपि विषयान्तरव्यासक्तचित्तस्तद्भावबुद्धिमान् । न चावस्थापककारणाभावे कार्यावस्थानं दृष्टम् । नहि स्तम्भावपाते प्रासादोऽवतिष्ठतेऽत आह ꕤ सा च दग्धेन्धनाग्निवत् स्वयमेवोपशाम्यति ꕤ । तावदेव खल्वयं प्रवृत्त्युन्मुखो न यावदस्यानर्थहेतुभावमधिगच्छति । अनर्थहेतुत्वाधिगमोऽस्य समूलोद्धारं प्रवृत्ति-


भामती-व्याख्या

कारण शब्द-श्रवण से जनित होता है, अतः “यजेत” — इत्यादि प्रवर्त्तक वाक्यों में शब्द ही इष्ट-साधनभूत यागादिरूप अनुष्ठेय व्यापार का बोध कराता हुआ यागादिगत इष्ट-साधनता और कर्त्तव्यता का बोध कराता है, क्योंकि वहाँ इष्ट-साधनता और कर्त्तव्यता — ये दोनों शब्द को छोड़ कर अन्य किसी साधन से प्राप्त न होने के कारण शब्दार्थ कहलाते हैं, जैसा कि प्रसिद्ध न्याय है— “अनन्यलभ्यः शब्दार्थः” । इसके विपरीत जहाँ इष्ट-साधनतादि का ज्ञान अन्यतः (शब्द को छोड़ कर अन्य साधन से) हो जाता है, जैसे कि “न हन्यात्”, “न पिबेत्” — इत्यादि स्थलों पर हनन, पान में प्रवृत्ति द्वेष और राग के आधार पर ही उपपन्न हो जाती है, वहाँ लिङादि प्रत्यय उसी का अनुवाद करते हुए 'नञ्' का समभिव्याहार पाकर हनन-पान में केवल अनिष्ट-साधनता का बोध करा देते हैं । हनन-पान में इष्ट-साधनता तो प्रत्यक्षतः प्राप्त है, अन्यथा हनन-पान में द्वेष और राग की विषयता सम्भव न हो सकेगी । अतः रागादि के द्वारा प्राप्त हननादि की कर्त्तव्यता का अनुवाद करके अनिष्ट-साधनता के बोधक ही “न हन्यात्”, “न पिबेत्” — इत्यादि वाक्य होते हैं, कर्त्तव्यता के विधायक नहीं, अतः भाष्यकार ने अत्यन्त युक्ति-पूर्ण कहा है— “अकार्यनिष्ठत्वं निषेधानाम्” । हिंसादिरूप निषेध्यगत अनिष्ट-साधनता का ज्ञान ही निषेध्याभाव का ज्ञान है । यह चेतन पुरुष सुरा-पानादि में आपाततः रमणीयता देखता है, किन्तु उससे भविष्य में होनेवाले अनर्थ को सोचकर प्रवृत्त्यभावरूप निवृत्ति को अपनाता है, अर्थात् सुरा-पानादि से उदासीन (विरत) हो जाता है ।

शङ्का — प्रवृत्त्यभाव का ज्ञान यदि औदासीन्य की स्थापना का कारण होता, तब उस ज्ञान को तब तक बराबर रहना चाहिए था, जब तक कि उदासीनता रहती है, किन्तु नहीं रहता, क्योंकि सुरापानादि से विरत पुरुष को भी तब प्रवृत्त्यभाव का ज्ञान नहीं रहता, जबकि उसका चित्त अन्य विषय में व्यासक्त हो (लग) जाता है । जब किसी कार्य का अवस्थापक नहीं रहता, तब उस कार्य का अवस्थान कभी नहीं देखा जाता, जैसे कि स्तम्भों (खम्भों) के गिर जाने पर उनके आश्रित रहनेवाला भवन तुरन्त धराशायी हो जाता है ।

समाधान — उक्त शङ्का का समाधान करने के लिए ही भाष्यकार ने कहा है— “सा च दग्धेन्धनाग्निवत् स्वयमेवोपशाम्यति” । अर्थात् यह पुरुष तब तक ही सुरा-पानादि की ओर प्रवृत्त होता है, जब तक कि सुरा-पानादि की अनर्थकारिता का ज्ञान नहीं होता । उसकी