भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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औपनिषदपुरुषविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १५९

त्स्वेवाधिगतः पुरुषोऽसंसारी ब्रह्म, उत्पाद्यादिचतुर्विधद्रव्यविलक्षणः स्वप्रकरण-

भामती

पपन्नः । एवं च ब्रह्मस्वरूपज्ञानस्य परमपुरुषार्थहेतुभाववादनुपदिशतामपि पुरुषप्रवृत्तिनिवृत्तौ वेदान्तानां पुरुषहितानुशासनाच्छास्त्रत्वं सिद्धं भवति । तस्सिद्धमेतद् — विवादाध्यासितानि वचनानि भूतार्थविषयाणि, भूतार्थविषयप्रमाजनकत्वात् , यद्यद्विषयप्रमाजनकं तत्तद्विषयं, यथा रूपादिविषयं चक्षुरादि, तथा चैतानि, तस्मात्तथेति । तस्मात्सुष्ठूक्तं ॐ तन्नोपनिषदस्य पुरुषस्यानन्यशेषत्वाद् इति ॐ । उपनिपूर्वात्सदेर्विशरणार्थात् क्विप्युपनिषत्पदं व्युत्पादितमुपनीयाद्वयं ब्रह्म सवासनामविद्यां हिनस्तीति ब्रह्मविद्यामाह, तद्धेतुत्वाद्द्वेदान्ता अप्युपनिषदः, तत्र विदित औपनिषदः पुरुषः । एतदेव विभजते ॐ योऽसावुपनिषत्सु इति ॐ । अहम्प्रत्ययविषयाद्भिनत्ति ॐ असंसारी इति ॐ । अत एव क्रियारहितत्वाच्चतुर्विधद्रव्यविलक्षणः । अतश्च चतुर्विधद्रव्यविलक्षणो यदनन्यशेषः । अन्यशेषं हि भूतं द्रव्यं चिकीर्षितं सदुत्पत्त्याद्याप्यं सम्भवति । यथा यूपं तक्षतीत्यादि । यत् पुनरनन्यशेषं भूतभाष्युपयोगरहितं, यथा सुवर्णं भार्य्यं, सक्तून् जुहोतीत्यादि, न तस्योत्पत्त्याद्याप्यता । कस्मात्पुनरस्यानन्यशेषतेत्यत आह ॐ यतः स्वप्रकरणस्थः ॐ ।

भामती-व्याख्या

बात नहीं, अपितु सिद्धार्थक वाक्य भी कुतूहल और भयादि-निवृत्तिरूप प्रयोजन के जनक होने के कारण प्रयोजनवान् होते हैं, अत एव प्रेक्षावान् व्यक्तियों के द्वारा उनका लोक में बहुल प्रयोग किया जाता है । जब कि ब्रह्मस्वरूप ज्ञान में परम पुरुषार्थ की हेतुता निश्चित है, तब उसके बोधक वेदान्त-वाक्यों में भले ही प्रवृत्ति निवृत्ति की जनकता न हो, उनकी प्रामाणिकता और शास्त्ररूपता में सन्देह नहीं रह जाता, क्योंकि वे भी मुमुक्षु पुरुषों का हितानुशासन करते हैं, अतः यह अनुमान पर्यवसित होता है— “विवादाध्यासितानि (“ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति” इत्यादीनि ) सिद्धार्थबोधकानि, सिद्धार्थविषयकप्रमाजनकत्वात् । यद् यद्विषयकप्रमाजनकम् तत् तद्विषयकम्, यथा रूपादिविषयकं चक्षुरादि तथा चैतानि, तस्मात्तथा' । अतः भाष्यकार ने बहुत सुन्दर ही कहा है—'‘तन्न, औपनिषदस्य पुरुषस्यानन्यशेषत्वात्” । 'उप' और 'नि' इन दोनों उपसर्ग पदों के उत्तर ‘षदॢ विशरणगत्यवसादनेषु’ इस धातु से किप् प्रत्यय करके 'उपनिषत्' पद सम्पन्न हुआ है, 'अद्वयं ब्रह्मोपनीय सवासनामविद्यां सादयति हिनस्ती उपनिषत्, इस प्रकार उपनिषत्' पद ब्रह्म-विद्या का वाचक है । उस विद्या के हेतुभूत वेदान्त-वाक्य भी उपनिषत् कहे जाते हैं, उपनिषत्सु विदित इति औपनिषदः पुरुषः । यही “औपनिषद' पद की व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है— “योऽसावुपनिषत्स्वेवाधिगतः” । 'अहम्'-इस प्रतीति के विषयीभूत जीव से भिन्नता प्रदर्शित करने के लिए उक्त पुरुष को “असंसारी” कहा गया है । अत एव क्रिया-रहित होने के कारण उत्पाद्यादि चतुर्विध द्रव्य से वह विलक्षण है । चतुर्विध द्रव्य से विलक्षण होने के कारण किसी कर्म का शेष ( अङ्ग ) नहीं, किन्तु “अनन्यशेष” है । अन्य-शेष ( कर्म का अङ्गभूत द्रव्य उत्पत्त्यादि में से किसी एक क्रिया के द्वारा चिकीर्षित होकर उत्पाद्यादि चतुर्विध द्रव्यों में अन्यतम ) होता है, जैसे-“यूपं तक्षति” इत्यादि । जो द्रव्य अन्य शेष न होकर अतीत और अनागत क्रिया से रहित होता है, जैसे “सुवर्णं भार्यम्”, “सक्तून् जुहोति”—वह उत्पत्त्यादि क्रियाओं से रहित है । ब्रह्म अनन्यशेष क्यों ? इस प्रश्न का उत्तर है—“स्वप्रकरणस्थः” । उपनिषद्वाक्य आत्मा के प्रकरण का आरम्भ करके समाम्नात हैं, पौर्वापर्य की आलोचना से यह निश्चित हो जाता है कि उक्त पुरुष तत्त्व स्व-प्रकरणस्थ और प्रधान है । जैसे याग से बाहर जुहू पात्र नहीं होता, अत एव याग का अव्यभिचरित सम्बन्धी होता है, वैसे पुरुष तत्त्व क्रतु का अव्यभिचरित सम्बन्धी नहीं— यह पहले ही कहा जा चुका है। ऐसा प्रधानभूत पुरुष उपनिषद्वाक्यों से प्रतीयमान है, अतः