भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४
भामती व्युत्पन्नस्योन्नेतुं न शक्येत । न तावत्तत्परः प्रयोगो न दृश्यते लोके, कुतूहलभयादिनिवृत्त्यर्थानामाकार्य- पराणां पदसन्दर्भाणां प्रयोगस्य लोके बहुलमुपलब्धेः । तथाह्याऽऽखण्डलादिलोकपालचक्रवालदिवसतिः सिद्धविद्याधरगन्धर्वाप्सरःपरिवारो ब्रह्मलोकावतीर्णमन्दाकिनीपयःप्रवाहपातधौतकलधौतमयशिलातलो नन्दनादिप्रमदवनविहारिमणिमयशकुन्तककमनीयनिनादमनोहरः पर्वंतराजः सुमेरुरिति । नैष भुजङ्गो रज्जुरित्यादि ।
नापि भूतार्थबुद्धिव्युत्पन्नपुरुषवर्तिनी न शक्या समुन्नेतुं हर्षदिरन्यहेतोः सम्भवात् । तथाह्या- विदितार्थजनभाषार्थो द्रविड़ो नगरगमनोद्यतो राजमार्गभ्रणं देवदत्तमन्दिरमध्यासीनः प्रतिपन्नजनका- नन्दनिबन्धनपुत्रजन्मा वार्त्ताहारेण सह नगरस्थदेवदत्ताभ्याशमागतः पटवासोपायनार्पणपुरःसरं दिष्ट्या वर्धसे पुत्रस्ते जात इति वार्त्ताहारव्याहारश्रवणसमनन्तरमुपजातर रोमाञ्चकञ्चुकं विकसितनयनोत्पलमसि- स्मेरमुखमहोत्पलमवलोक्य देवदत्तमुत्पन्नप्रमोदमनुमिमीते, प्रमोदस्य च प्रागभूतस्य तद्व्याहारश्रवणसम- नन्तरं भवतस्तद्धेतुताम् । न चायमप्रतिपादयन् हर्षहेतुमर्थं हर्षाय कल्पत इत्यनेन हर्षहेतुरर्थ उक्त इति प्रतिपद्यते । हर्षहेत्वन्तरस्य चाप्रतीतेः पुत्रजन्मनेश्च तद्धेतोरवगमात्तदेव वार्त्ताहारेणाभ्यधायीति निश्चि- नोति । एवं भयशोकादयोऽप्युदाहार्याः । तथा च प्रयोजनवत्ता भूतार्थाभिधानस्य प्रेक्षावत्प्रयोगोऽप्यु-
भामती-व्याख्या सिद्धार्थ-बोधक शब्द-प्रयोग उपलब्ध न होता अथवा व्युत्पन्न पुरुष के द्वारा शब्दों में सिद्धार्थ- परत्व की ऊहा नहीं की जा सकती हो, किन्तु वे दोनों बातें नहीं, क्योंकि सिद्धार्थक पदों का प्रयोग लोक में भी होता देखा जाता है, जैसे सुमेरुपर्वत कैसा होगा ? इस प्रकार के कुतूहल को निवृत्त करने के लिए कहा जाता है—आखण्डल ( इन्द्र ) आदि लोक-पाल देवगणों का अधिवास जिस पर है; सिद्ध, विद्याधर, गन्धर्व और अप्सरादिसंज्ञक देवजातियाँ विहरण कर रही हैं जिस पर; ब्रह्म-लोक से अवतीर्ण मन्दाकिनी के धवल जल से प्रक्षालित हैं सुवर्णमय शिला-तल जिसके; नन्दनादि प्रमद-वन में क्रीडा-रत मणिमय पक्षियों के कमनीय कूजन से जो नितान्त मोहक है; ऐसा पर्वत-राज है—सुमेरु । सर्प-भ्रम-जनित भय की निवृत्ति के लिए कहा जाता है—"नैष भुजङ्गो रज्जुरियम्" ।
अन्य पुरुषों में समुत्पन्न सिद्धार्थविषयक ज्ञान की ऊहा भी सम्भव है, क्योंकि श्रोता के मुख पर लहराई हुई हर्ष की रेखाएँ ही श्रोता के हृदय में उठी हर्ष की तरङ्गों का समुन्नयन करा देती हैं, जैसे कि किसी अन्य प्रान्त की भाषा से अनभिज्ञ द्रविड़देश का कोई व्यक्ति अपने नगर में देवदत्त के घर पर पुत्र-जन्म का महोत्सव देख चुका था, किसी ऐसे सन्देशवाहक के साथ देशान्तर के लिए चल पड़ता है, जिसके हाथ में पुत्र-पद-लिप्त केसर की छापवाला वस्त्रोपहार था । अन्य प्रान्त के किसी नगर में अवस्थित देवदत्त के घर पर पहुँचता है । संदेश-वाहक ने देवदत्त के लिए लाया उक्त वस्त्रादि का उपहार देवदत्त के सामने रख कर कहता है—'दिष्ट्या वर्धसे पुत्रस्ते जातः' । सन्देश-वाहक का इतना कहना था कि देवदत्त के अन्दर उठीं हर्ष की उत्ताल तरङ्गं मुख-मण्डल पर लहराने लग जाती है, नेत्र-कमल सहसा खिल उठते हैं । इस पूरे दृश्य को देखकर वह देश भाषानभिज्ञ द्रविड़ देश-वासी व्यक्ति यह सोच लेता है कि यह देवदत्त सन्देश-वाहक के वाक्य को सुनकर जो हर्षविभोर हो गया, अवश्य ही इसके हर्ष का जनक अर्थ इस वाक्य के द्वारा प्रतिपादित है । प्रकृत में पुत्रोत्पत्ति ही हर्ष की जनक है, जो कि इस वाक्य के द्वारा अभिहित है, इस प्रकार लिङादि से अघटित वाक्य भी सिद्धार्थ का बोधक निश्चित हो जाता है । इसी प्रकार भय और शोकादि के जनक उदाहरण भी प्रस्तुत किए जा सकते हैं । प्रयोजनवत्ता भी कार्यार्थक वाक्यों में ही सीमित होती है—ऐसी