भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंऔपनिषदपुरुषविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १५७
४।४।१२) इति । 'एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत' (भ० गी० १५।२०) इति स्मृतिः । तस्मान्न प्रतिपत्तिविधिविषयतया ब्रह्मणः समर्पणम् ।
यदपि केचिदाहुः— 'प्रवृत्तिनिवृत्तिविधितच्छेषव्यतिरेकेण केवलवस्तुवादी वेदभागो नास्ति' इति, — तन्न; औपनिषदस्य पुरुषस्यानन्यशेषत्वात् । योऽसावुपनिष-
भामती
तप्येत । सुगममन्यत् । प्रकृतमुपसंहरति ॐ तस्मान्न प्रतिपत्ति इति ॐ । प्रकृतसिद्धयर्थमेकदेशिमंत दूषयितुमनुभाषते ॐ यदपि केचिदाहुः इति ॐ । दूषयति ॐ तन्न इति ॐ । इदमत्राकूतम्—
कार्यबोधे यथा चेष्टा लिङ्गं हर्षादयस्तथा ।
सिद्धबोधेऽर्थवत्त्वं च शास्त्रत्वं हितशासनात् ।
यदि हि पदानां कार्याभिधाने तदर्थार्थाभिधाने वा नियमेन वृद्धव्यवहारे सामर्थ्यमवधृतं भवेत्, न भवेत्, अहेयोपादेयभूतब्रह्मात्मतापरत्वमुपनिषदाम् । तत्राविदितसामर्थ्यत्वात् पदानां लोके तत्पूर्वकत्वाच्च वैदिकार्थप्रतीतेः । अथ तु भूतेऽप्यर्थे पदानां लोके शक्यः सङ्गतिग्रहस्तत उपनिषदां तत्परत्वं पौर्वापर्यपर्यालोचनयाऽवगम्यमानमपह्नुत्य न कार्यपरत्वं शक्यं कल्पयितुं, श्रुतहान्यश्रुतकल्पनाप्रसङ्गात् । तत्र तावदेवमकार्यार्थे न सङ्गतिग्रहः, यदि तत्परः प्रयोगो न लोके दृश्येत, तत्प्रत्ययो वा
भामती-व्याख्या
कर ले, तब और किस फल की इच्छा से अथवा अपने से भिन्न किस पुरुष के लिए शरीर-सन्ताप के द्वारा अनुसन्तप्त होगा ? ] 'अनुसंज्वरेत्' शब्द का अर्थ भाष्यकार ने ही श्रुति की व्याख्या में किया है— “शरीरमनुसंज्वरेत्, शरीरोपाधिकृतदुःखमनु दुःखी स्यात्, शरीरतापमनुतप्येत” (बृह. भा. पृ. ६७७) । प्रकरण का उपसंहार किया जाता है— “तस्मान्न प्रतिपत्तिविधिविषयतया ब्रह्मणः समर्पणम्” ।
अपने सिद्धान्त की दृढ़ता के लिए एकदेशी के दूषित मत का अनुवाद करते हैं— “यदपि केचिदाहुः” । उसमें दोषोद्भावन किया जा रहा है— “तन्न” । आशय यह है कि—
कार्यबोधे यथा चेष्टा लिङ्गं हर्षादयस्तथा ।
सिद्धबोधेऽर्थवत्त्वं शास्त्रत्वं हितशासनात् ॥
[ विगत पृ. १२६ पर एकदेशी की ओर से कहा गया था कि (१) 'अज्ञातसंगतित्व', (२) 'शास्त्रत्व', (३) 'अर्थवत्त्व' और (५) 'मननादिप्रतीत्या'—इन चार हेतुओं के द्वारा वेदान्त-क्षेत्र में भी कार्यानुप्रवेश आवश्यक है । उसी का यहाँ निराकरण किया जाता है कि संगति-ग्रह से लेकर तत्त्व-निश्चय करने तक वेदान्त में कहीं भी कार्यानुप्रवेश आवश्यक नहीं] । आनयनादि कार्यरूप अर्थ के बोध में जैसे चेष्टा (प्रवृत्ति) अपेक्षित है, वैसे ही पुत्रादि सिद्धरूप अर्थ के बोधन में “पुत्रस्ते जातः”—इत्यादि वाक्यों को सुनकर श्रोता के मुख-मण्डल पर बिखरी हुई हर्ष की रेखाएँ लिङ्ग (गमक) रूपेण अपेक्षित हैं । यदि कार्यार्थ के अभिधान में पदों को नियमतः उत्तम और मध्यम वृद्धों के व्यवहार अपेक्षित होते, तब हेयोपादेय-रहित ब्रह्म-परता वेदान्त-वाक्यों में नहीं होती, क्योंकि लोक में पदों का वैसा शक्ति-ग्रह सम्भव नहीं था और शक्ति-ग्रह पूर्वक ही वैदिकार्थ की प्रतीति होती है । यदि भूत (सिद्ध) अर्थ में पदों का शक्ति-ग्रह सम्भव है और उसके आधार पर उपनिषद्-ग्रन्थों में उपक्रमोपसंहारादि-न्याय का सहारा लेकर ब्रह्मपरता निश्चित है, तब उसका अपलाप करके कार्यार्थपरत्व की स्थापना कभी नहीं की जा सकती, अन्यथा श्रुत (सिद्धार्थपरत्व) की हानि और अश्रुत (कार्यपरत्व) की प्रसक्ति वेदान्त में होगी ।
अकार्य (सिद्ध) रूप अर्थ में तब शक्ति-ग्रह नहीं हो सकता था, जब कि लोक में