भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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१५६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४

अरे द्रष्टव्यः' इत्यादीनि । तस्यात्मान्वेषणाय प्रवृत्तस्याहेयमनुपादेयं चात्मतत्त्वमुपदिश्यते । 'इदं सर्वं यदयमात्मा' (बृह० २।४।६) 'यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत् केन कं विजानीयात्', 'विज्ञातारमरे केन विजानीयात्' (बृह० ४।५।१५) 'अयमात्मा ब्रह्म' (बृह० २।५।१९) इत्यादिभिः । यदप्यकर्तव्यप्रधानमात्मज्ञानं हानायोपादानाय वा न भवतीति, तत्तथैवेत्यभ्युपगम्यते अलंकारो ह्ययमस्माकं यद् ब्रह्मात्मावगतौ सत्यां सर्वकर्तव्यताहानिः कृतकृत्यता चेति । तथा च श्रुतिः—'आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः । किमिच्छन्कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ।' (बृह०


भामती

प्रयोजनः, प्रवृत्तिविशेषकरत्वात् । तथाहि—तत्तदिष्टानिष्टविषयेप्साजिहासापहृतहृदयतया बहिर्मुखो न प्रत्यगात्मनि समाधातुमर्हति । आत्मश्रवणादिविधिसरूपैस्तु वचनैर्मनसो विषयस्रोतः खिलीकृत्य प्रत्यगात्मस्रोतः उद्घाट्यते इति प्रवृत्तिविशेषकरत्वानुवादानास्तीति सप्रयोजनतया स्वाध्यायविध्यधीनग्रहणत्वमुपपद्यत इति ।

यच्च चोदितमात्मज्ञानमननुष्ठानाङ्गतत्वादपुरुषार्थमिति । तदयुक्तम्, स्वतोऽस्य पुरुषार्थत्वे सिद्धे यदनुष्ठानानङ्गत्वं तद् भूषणं न दूषणमित्याह ॐ यदपि इति ॐ । "अनुसंज्वरेत्" शरीरं परितप्यमानमनु-


भामती-व्याख्या

द्वारा गृहीत होने के कारण उक्त वाक्यों को अनर्थक नहीं कहा जा सकता । उक्त शङ्का का समाधान है — “स्वाभाविकप्रवृत्तिविषयविमुखीकरणार्थानि ब्रूमः” । वैषयिक सुख की लिप्सा में जीव की सहज प्रवृत्ति को रोकने के लिए "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यः" — ऐसा कह दिया गया है । वह भी विधि वाक्यों के द्वारा आत्म-साक्षात्कारार्थ श्रवणादि का विधान नहीं, अपितु अन्यतः (लोक-प्रसिद्ध अन्वय-व्यतिरेक के माध्यम से) जो श्रवणादि में साक्षात्कार-जनकत्व प्राप्त है, उसी का अनुवादमात्र कर दिया गया है। यह अनुवाद भी निरर्थक नहीं, श्रवणादिगत प्राशस्त्य का गमक होकर आत्म-श्रवणादि में रुचि और अनात्म-चिन्तन में अरुचि का जनक हो जाता है। विविध इष्ट विषयों की लिप्सा और अनिष्ट विषयों की जिहासा के मोहक प्रपञ्च में फँसा जीव आत्म-चिन्तन में मन को नहीं लगा सकता, कथित आत्मश्रवणादि-बोधक विध्याभासों के द्वारा विषयाभिमुख मानस प्रवाह को रोककर प्रत्यगात्माभिमुख प्रवृत्त किया जाता है। इस प्रकार सार्थक श्रवणादि-विषयक अनुवाद के गमक कथित विधि के समान रूपवाले "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यः"—इत्यादि वाक्यों का स्वाध्याय-विधि के द्वारा ग्रहण उपपन्न हो जाता है ।

यह जो आक्षेप किया था कि आत्म-ज्ञान किसी कर्मानुष्ठान का अङ्ग न होने के कारण निरर्थक है। वह आक्षेप युक्ति-युक्त नहीं, क्योंकि जब कि आत्म-ज्ञान स्वयं पुरुषार्थ सिद्ध हो जाता है, तब उसमें किसी कर्मानुष्ठान की अङ्गता आवश्यक नहीं—यह कहा जा रहा है— “यदपि अकर्त्तव्यप्रधानमात्मज्ञानं हानायोपादानाय न भवतीति, तत्तथैवेत्यभ्युपगम्यते, अलङ्कारो ह्ययमस्माकं यद् ब्रह्मात्मावगतौ सत्यां सर्वकर्त्तव्यताहानिः कृतकृत्यता च”। जैसे धर्म-ज्ञान के पश्चात् धर्म का अनुष्ठान अपेक्षित होता है, वैसे ब्रह्म-ज्ञान के पश्चात् किसी प्रकार का अनुष्ठान अवशिष्ट नहीं रहता—यह हमारे अद्वैत-सिद्धान्त में कोई दोष नहीं, अपितु गुण है, अलंकार है, महती कृतकृत्यता है, श्रुति भगवती का विजय-घोष हमारे पक्ष में है—

“आत्मानं चेद् विजानीयादयमस्मीति पूरुषः ।
किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥” (बृह. उ. ४।४।१२)

[ यदि यह पुरुष (जीव) अपने वास्तविक शुद्ध बुद्ध ब्रह्मस्वरूप का विज्ञान (साक्षात्कार)