भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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वेदान्तेषु लिङ्गादिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १५५

दिवद् ; अहेयानुपादेयवस्तुविषयत्वात् । किमर्थानि तर्हि 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः' (बृ. २।४।५ ) इत्यादीनि विधिच्छायानि वचनानि ? स्वाभाविकप्रवृत्तिविषय- विमुखीकरणार्थानीति ब्रूमः । यो हि बहिर्मुखः प्रवर्तते पुरुषः 'इष्टं मे भूयादनिष्टं मा भूद्' इति, न च तत्रात्यन्तिकं पुरुषार्थं लभते, तमात्यन्तिकपुरुषार्थवाञ्छिनं स्वाभाविक्रार्य- करणसंघातप्रवृत्तिगोचराद्विमुखीकृत्य प्रत्यगात्मस्रोतस्तया प्रवर्तयन्ति - 'आत्मा वा


भामती

विषयाः, तद्विषयत्वेऽप्रामाण्यप्रसङ्गात् । हेयोपादेयविषयो हि विधिः । स एव च हेय उपादेयो वा यं पुरुषः कर्तुमकर्त्तुमन्यथा वा कर्तुं शक्नोति । तत्रैव च समर्थः कर्ताऽधिकृतो नियोज्यो भवति । न चेव- म्भूतात्मात्मश्रवणमननोपासनदर्शनानीति विषयतदनुष्ठात्रोर्विधिव्यापकतयोरभावाद् विधेरभाव इति प्रयुक्ता अपि लिङादयः प्रवर्तनायामसमर्था उपल इव क्षुरतैक्ष्ण्यं कुण्ठप्रमाणीभवन्तीति । ॐ अनियोज्यविषय- त्वाद् इति ॐ । समर्थो हि कर्ताऽधिकारी नियोज्यः । असामर्थ्ये तु न कर्तृता ततोऽनधिकृतो न नियोज्य इत्यर्थः । यदि विधेरभावान्न विधिवचनानि, किमर्थानि तर्हि वचनान्येतानि विधिच्छायानीति पृच्छति ॐ किमर्थानि इति ॐ । न चानर्थकानि युक्तानि, स्वाध्यायविध्यधीनग्रहणत्वानुपपत्तेरिति भावः । उत्तरम् ॐ स्वाभाविक इति ॐ । अन्यतः प्राप्ता एव हि श्रवणादयो विधिसरूपैर्वाक्यैरनूद्यन्ते । न चानुवाद्योऽप्य-


भामती-व्याख्या

सार्थकता की पुष्टि में कहा जाता है— "तुल्यं च साम्प्रदायिकम्" (जै. सू. १।२।८) अर्थात् अध्ययनाध्यापन की परम्परा में अन्य विधि में वाक्यों के समान ही इन वाक्यों को मान्यता प्राप्त है, अतः इनकी विधिरूपता निश्चित है, तब आत्मोपासना का विधान क्यों नहीं माना जाता ?

समाधान — उक्त शङ्का का समाधान करते हुए भाष्यकार ने कहा है— "तद्विषये लिङादयः श्रूयमाणा अप्यनियोज्यविषयत्वात् कुण्ठीभवन्ति"। अर्थात् इस बात को कभी भी नकारा नहीं जा सकता कि आत्मोपासना-विधि-बोधक वाक्य उपलब्ध नहीं होते । ऐसे वाक्य अवश्य हैं, किन्तु उनका विधि में तात्पर्य मानने पर प्रामाण्य अक्षुण्ण नहीं रहता, क्योंकि विधि सदैव हेय और उपादेय विषय की होती है, हेय ( त्याज्य ) या उपादेय ( ग्राह्य ) वही होता है, जिस विषय का पुरुष अपनी इच्छा से त्याग या ग्रहण कर सके । जिस विषय के करण, अकरण या अन्यथाकरण में पुरुष सर्वथा समर्थ और स्वतन्त्र होता है, उसी विषय का पुरुष कर्त्ता, अधिकारी या नियोज्य माना जाता है । इस प्रकार यह एक नियम या व्याप्ति स्थिर होती है कि "यत्र यत्र पुरुषस्वातन्त्र्यं सनियोज्यत्वं तत्र तत्र विधेयत्वम्"। आत्मा के श्रवण, मनन और उपासन ( निदिध्यासन ) में विधेयत्व सम्भव नहीं, क्योंकि उनमें विधेयत्व का व्यापकीभूत हेयत्वोपादेयत्वरूप पुरुष-स्वातन्त्र्य एवं सनियोज्यत्व नहीं, व्यापक का अभाव होने पर व्याप्य का अभाव निश्चित है। लिङादि प्रत्यय अवश्य ही विधि या प्रवर्तना में शक्त होते हैं, किन्तु प्रवर्तना के अविषयीभूत पदार्थ के बोधन में प्रयुक्त लिङादि वैसे ही कुण्ठित या विवश हो जाते हैं, जैसे पत्थर को काटने के लिए चलाया गया छुरा, पत्थर काटने में समर्थ नहीं होता। अविषयीभूत पदार्थ में लिङादि प्रमाण या प्रवर्तक नहीं हो सकते, क्योंकि उस विषय का नियोज्य या अधिकारी व्यक्ति ही सुलभ नहीं, समर्थ कर्त्ता पुरुष को अधि- कारी या नियोज्य माना जाता है, जिस पदार्थ के सम्पादन में जो समर्थ नहीं, उसका वह न कर्त्ता हो सकता है और न नियोज्य ( अधिकारी ) । विधि के अभाव में विधि-वचन यदि प्रयुक्त नहीं हो सकते, तब "आत्मेत्येवोपासीत'—इस प्रकार श्रूयमाण विध्याभास-वचन किस लिए ? ऐसी शङ्का की जा रही है—किमर्थानि तर्हि "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्य" इत्येवमादीनि विधिच्छायानि वचनानि ?""स्वाध्यायोऽध्येतव्यः"—इस स्वाध्याय-विधि के