भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 172, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें१५४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४
पुरुषतन्त्रा च। या तु प्रसिद्धेऽग्नावग्निबुद्धिः, न सा चोदनातन्त्रा, नापि पुरुषतन्त्रा। किं तर्हि ? प्रत्यक्षविषयवस्तुतन्त्रैवेति ज्ञानमेवैतन्न क्रिया। एवं सर्वप्रमाणविषयवस्तुषु वेदितव्यम्। तत्रैवं सति यथाभूतब्रह्मात्मविषयमपि ज्ञानं न चोदनातन्त्रम्। तद्विषये लिङादयः श्रूयमाणा अप्यनियोज्यविषयत्वात्कुण्ठीभवन्ति, उपलादिषु प्रयुक्तक्षुरतैक्ष्ण्या-
भामती
तत्त्वस्य सदेव सोम्येदमित्यादेस्तत्त्वमसीत्यन्तात्सन्दर्भाद् ब्रह्मात्मभावज्ञानं शब्दप्रमाणसामर्थ्यात् । इन्द्रियार्थ-सन्निष्कर्षसामर्थ्यादिव प्रणिहितमनसः स्फीतालोकमध्यवर्तिकुम्भानुभवः। न ह्यसौ स्वसामग्रीबललब्धजन्मा मनुजेच्छयाऽन्यथाकर्तुमकर्तुं वा शक्यः, देवताध्यानवत्, येनार्थवानत्र विधिः स्यात्। न चोपासना वाऽनु-भवपर्यन्तता वाऽस्य विधेर्गोचरस्तयोरन्वयव्यतिरेकावधृतसामर्थ्ययोः साक्षात्कारे वाऽनाद्यविद्यापनये वा विधिमन्तरेण प्राप्तत्वेन पुरुषेच्छयाऽन्यथाकर्तुमकर्तुं वाऽशक्यत्वात् । तस्माद् ब्रह्मज्ञानं मानसी क्रियाऽपि न विधिगोचरः । पुरुषचित्तव्यापाराधीनायास्तु क्रियाया वस्तुस्वरूपनिरपेक्षता क्वचिदविरोधिनी, यथा देवताध्यानक्रियायाः । न ह्यत्र वस्तुस्वरूपेण कश्चिद्विरोधः । क्वचित्स्तुविरोधिनी, यथा योषित्पुरुषयो-रग्निबुद्धिरित्येतावता भेदेन निदर्शनमिथुनद्वयोपन्यासः । क्रियैवेत्येवकारेण वस्तुतन्त्रत्वमपाकरोति ।
नन्वात्मेत्येवोपासीतेत्यादयो विधयः श्रूयन्ते, न च प्रमत्तगीताः, तुल्यं हि साम्प्रदायिकं, तस्माद्वि-धेयेनात्र भवितव्यमित्यत आह ❖ तद्विषयं लिङादयः इति ❖। सत्यं श्रूयन्ते लिङादयः, न त्वमी विधि-
भामती-व्याख्या
व्यक्ति ने वेदान्त का अध्ययन किया है एवं पद-पदार्थ का संगति-ग्रह भी कर लिया है, उस व्यक्ति को “सदेव सोम्येदमग्रआसीत्”—यहाँ से लेकर “तत्त्वमसि”—यहाँ तक के सन्दर्भ (प्रकरण) से शब्द प्रमाण के बल पर वैसे ही ब्रह्म में आत्मत्व-बोध हो जाता है, जैसे इन्द्रियार्थ-सन्निकर्ष के बल पर समाहितमनवाले व्यक्ति की उज्ज्वल प्रकाश में अवस्थित घट का अनुभव हो जाता है, क्योंकि ऐसे घटानुभव का जो अपनी इन्द्रिय-सन्निकर्षादि-घटित सामग्री से उत्पन्न हुआ है, किसी पुरुष की इच्छा से न तो अन्यथा किया जा सकता है और न अकरण । यदि इसका इच्छामात्र के बल पर ध्यानादि के समान अन्यथाकरण या अकरण सम्भव होता, तब इसके विधान की सार्थकता हो सकती थी। इस ‘द्रष्टव्यः’ विधि के द्वारा उपासना (श्रावण ज्ञान की आवृत्ति) या अविद्यापनयनार्थ परोक्ष ज्ञान की साक्षात्कार-पर्यन्तता का विधान नहीं किया जा सकता, क्योंकि लोक-प्रसिद्ध अन्वय-व्यतिरेक के आधार पर उपासना (निरन्तरानुचिन्तन) में साक्षात्कार की एवं साक्षात्कार-पर्यन्त ज्ञान में अविद्या-निवृत्ति की जनकता विधि के बिना ही स्वतः सिद्ध है, पुरुष की इच्छा के द्वारा उसका अन्यथा-करणनहीं हो सकता। फलतः ब्रह्मज्ञान को मानस क्रिया मान लेने पर भी उसमें विधि-विषयता सम्भव नहीं। क्रिया में सर्वत्र वस्तुस्वरूप-निरपेक्षता का विरोध नहीं होता, कहीं-कहीं अविरोध भी होता है, जैसे देवताविषयक ध्यान क्रिया में, क्योंकि वस्तुस्वरूप (देवता-स्वरूप) के साथ इसका कोई विरोध नहीं होता । कहीं-कहीं क्रिया अवश्य ही वस्तुस्वरूप की विरोधिनी होती है, जैसे स्त्री और पुरुष में अग्नि का ध्यान । क्रियाओं के इस अन्तर को ध्यान में रख कर देवता-ध्यान और स्त्री आदि में अग्नि-ध्यान इन द्विविध ध्यान क्रियाओं का उदाहरण भाष्यकार ने दिया है। भाष्यकार ने जो कहा है ‘क्रियैव सा’। वहाँ एवकार के द्वारा क्रिया में वस्तु-तन्त्रता का निराकरण किया गया है।
शङ्का— “आत्मेत्येवोपासीत” (बृह० उ० १।४।७) इत्यादि विधि वाक्य जब वेदान्त-क्षेत्र में उपलब्ध होते हैं, तब उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती, क्योंकि ये वाक्य कोई प्रमत्त पुरुष के प्रलाप के समान निरर्थक नहीं, एवं अर्थवाद-वाक्यों की प्रामाणिकता और