भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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१६०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

स्थोऽनन्यशेषः- नासौ नास्ति नाधिगम्यत इति वा शक्यं वदितुम्, 'स एष नेति नेत्यात्मा' (बृह० ३।९।२६) इत्यात्मशब्दाद् आत्मनश्च प्रत्याख्यातुमशक्यत्वाद्, य

भामती

उपनिषदामनारभ्याधीतानां पौर्वापर्यपर्यालोचनया पुरुषप्रतिपादनपरत्वेन पुरुषस्यैव प्राधान्येनेदं प्रकरणं, न च जुह्वादिवदव्यभिचरितक्रतुसम्बन्धः पुरुष इत्युपपादितम् । अतः स्वप्रकरणस्थः सोऽयं तथाविध उपनिषद्बुद्धः प्रतीयमानो न नास्तीति शक्यो वक्तुमित्यर्थः ।

स्यादेतत्—मानान्तरागोचरत्वेनागृहीतसङ्गतितयाऽपदार्थस्य ब्रह्मणो वाक्यार्थत्वानुपपत्तेः कथमुपनिषदर्थतेत्यत आह ॐ स एष नेति नेत्यात्मेत्यात्मशब्दात् ॐ । यद्यपि गवाविवन्मानान्तरगोचरत्वमात्मनो नास्ति तथापि प्रकाशात्मन एव सतस्तत्तदुपाधिपरिहाण्या शक्यं वाक्यार्थत्वेन निरूपणं, हाटकस्येव कटककुण्डलादिपरिहाण्या । नहि प्रकाशः स्वसंवेदनो न भासते, नापि तदवच्छेदकः कार्यकारणसङ्घातः । तेन स एष नेति नेत्यात्मेति तत्तदवच्छेदपरिहाण्या बृहत्त्वाद्वापनाच्च स्वयम्प्रकाशः शक्यो वाक्याद् ब्रह्मेति चात्मेति च निरूपयितुमित्यर्थः । अथोपाधिनिरासवदुपहितमप्यात्मरूपं कस्मान्न निरस्यते इत्यत आह ॐ आत्मनश्च प्रत्याख्यातुमशक्यत्वात् ॐ । प्रकाशो हि सर्वस्यात्मा तदधिष्ठानत्वाच्च प्रपञ्चविभ्रमस्य, न चाधिष्ठानाभावे विभ्रमो भवितुमर्हति । न हि जातु रज्ज्वभावे रज्ज्वां भुजङ्ग इति वा धारेति वा विभ्रमो दृष्टपूर्वः । अपि चात्मनः प्रकाशस्य भासा प्रपञ्चस्य प्रथा । तथा हि श्रुतिः 'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' इति । न चात्मनः प्रकाशस्य प्रत्याख्याने प्रपञ्चप्रथा युक्ता । तस्मा-


भामती-व्याख्या

'नास्ति'—इस प्रकार उसकी सत्ता का अपलाप नहीं किया जा सकता । ब्रह्म तत्त्व यदि केवल औपनिषद है, तब अन्य किसी प्रत्यक्षादि प्रमाण का विषय न होने के कारण किसी पद की उसमें शक्ति का ज्ञान न हो सकेगा, जो पदार्थ ( पद का शक्यार्थ ) नहीं, वह वेदान्त-वाक्यार्थ क्योंकर होगा ? इस प्रश्न का उत्तर है—"स एष नेति-नेति आत्मा" इत्यात्मशब्दप्रयोगात्" । यद्यपि गवादि के समान आत्मा में प्रमाणान्तर-गोचरता नहीं, तथापि पदार्थभूत सोपाधि तत्त्व की उपाधि का निषेध करके वाक्यार्थता का शुद्ध ब्रह्म में सामञ्जस्य वैसे ही किया जा सकता है, जैसे कटक-कुण्डलादि उपाधियों का परिहाण करके सुवर्ण तत्त्व का । अवच्छेदद्यभूत स्वसंवेदनात्त्मक प्रकाश तत्त्व अवभासित नहीं होता—ऐसा नहीं, अपितु अवभासित होता है । उसी प्रकार उसकी अवच्छेदकीभूत शरीर-संघातरूप उपाधि नहीं प्रती। होती—ऐसा भी नहीं, अपितु प्रतीत होती है । फलतः "स एष नेति नेत्यात्मा'—इस प्रकार अवच्छेदकीभूत उपाधियों का निषेध करके ब्रह्म और आत्मा के रूप में निरूपित हो सकता है, क्योंकि वह बृहत् ( व्यापक ) एवं 'सर्वत्र अतति आप्नोति'—ऐसे व्यवहार का विषय है । "नेति नेति" वाक्यों के द्वारा उपाधियों के निषेध के समान उपहित आत्मा का भी निषेध क्यों नहीं माना जाता ? इस प्रश्न का उत्तर है—"आत्मनश्च प्रत्याख्यातुमशक्यत्वात्" । उपहित ( उपाधि से उपलक्षित ) प्रकाश तत्त्व सबका आत्मा होने के कारण निषेध्य नहीं हो सकता । अर्थात् आरोप-स्थल पर जैसे रजतादि आरोप्य पदार्थों का निषेध होता है, वैसे अधिष्ठानरूप शुक्ति तत्त्व का निषेध नहीं हो सकता । आत्मप्रकाश तत्त्व सकल अनात्म-भ्रान्ति का अधिष्ठान है, अधिष्ठान के बिना कोई भ्रान्ति हो ही नहीं सकती, रज्जु के अभाव में सर्प या धारादि का विभ्रम कभी नहीं देखा जाता । अपि च आत्म प्रकाश के प्रकाश से ही प्रपञ्च का प्रकाश होता है, जैसा कि श्रुति कहती है—"तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्" ( कौ. २।५।१५ ) । आत्मप्रकाश का प्रत्याख्यान कर देने पर प्रपञ्च की प्रथा ( प्रतीति ) ही नहीं हो सकती । अतः आत्मा का निषेध सम्भव न हो सकने के कारण वेदान्त-वाक्यों के द्वारा प्रमाणान्तरा-