भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
औपनिषदपुरुषविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १५९
त्स्वेवाधिगतः पुरुषोऽसंसारी ब्रह्म, उत्पाद्यादिचतुर्विधद्रव्यविलक्षणः स्वप्रकरण-
भामती
पपन्नः । एवं च ब्रह्मस्वरूपज्ञानस्य परमपुरुषार्थहेतुभाववादनुपदिशतामपि पुरुषप्रवृत्तिनिवृत्तौ वेदान्तानां पुरुषहितानुशासनाच्छास्त्रत्वं सिद्धं भवति । तस्सिद्धमेतद् — विवादाध्यासितानि वचनानि भूतार्थविषयाणि, भूतार्थविषयप्रमाजनकत्वात् , यद्यद्विषयप्रमाजनकं तत्तद्विषयं, यथा रूपादिविषयं चक्षुरादि, तथा चैतानि, तस्मात्तथेति । तस्मात्सुष्ठूक्तं ॐ तन्नोपनिषदस्य पुरुषस्यानन्यशेषत्वाद् इति ॐ । उपनिपूर्वात्सदेर्विशरणार्थात् क्विप्युपनिषत्पदं व्युत्पादितमुपनीयाद्वयं ब्रह्म सवासनामविद्यां हिनस्तीति ब्रह्मविद्यामाह, तद्धेतुत्वाद्द्वेदान्ता अप्युपनिषदः, तत्र विदित औपनिषदः पुरुषः । एतदेव विभजते ॐ योऽसावुपनिषत्सु इति ॐ । अहम्प्रत्ययविषयाद्भिनत्ति ॐ असंसारी इति ॐ । अत एव क्रियारहितत्वाच्चतुर्विधद्रव्यविलक्षणः । अतश्च चतुर्विधद्रव्यविलक्षणो यदनन्यशेषः । अन्यशेषं हि भूतं द्रव्यं चिकीर्षितं सदुत्पत्त्याद्याप्यं सम्भवति । यथा यूपं तक्षतीत्यादि । यत् पुनरनन्यशेषं भूतभाष्युपयोगरहितं, यथा सुवर्णं भार्य्यं, सक्तून् जुहोतीत्यादि, न तस्योत्पत्त्याद्याप्यता । कस्मात्पुनरस्यानन्यशेषतेत्यत आह ॐ यतः स्वप्रकरणस्थः ॐ ।
भामती-व्याख्या
बात नहीं, अपितु सिद्धार्थक वाक्य भी कुतूहल और भयादि-निवृत्तिरूप प्रयोजन के जनक होने के कारण प्रयोजनवान् होते हैं, अत एव प्रेक्षावान् व्यक्तियों के द्वारा उनका लोक में बहुल प्रयोग किया जाता है । जब कि ब्रह्मस्वरूप ज्ञान में परम पुरुषार्थ की हेतुता निश्चित है, तब उसके बोधक वेदान्त-वाक्यों में भले ही प्रवृत्ति निवृत्ति की जनकता न हो, उनकी प्रामाणिकता और शास्त्ररूपता में सन्देह नहीं रह जाता, क्योंकि वे भी मुमुक्षु पुरुषों का हितानुशासन करते हैं, अतः यह अनुमान पर्यवसित होता है— “विवादाध्यासितानि (“ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति” इत्यादीनि ) सिद्धार्थबोधकानि, सिद्धार्थविषयकप्रमाजनकत्वात् । यद् यद्विषयकप्रमाजनकम् तत् तद्विषयकम्, यथा रूपादिविषयकं चक्षुरादि तथा चैतानि, तस्मात्तथा' । अतः भाष्यकार ने बहुत सुन्दर ही कहा है—'‘तन्न, औपनिषदस्य पुरुषस्यानन्यशेषत्वात्” । 'उप' और 'नि' इन दोनों उपसर्ग पदों के उत्तर ‘षदॢ विशरणगत्यवसादनेषु’ इस धातु से किप् प्रत्यय करके 'उपनिषत्' पद सम्पन्न हुआ है, 'अद्वयं ब्रह्मोपनीय सवासनामविद्यां सादयति हिनस्ती उपनिषत्, इस प्रकार उपनिषत्' पद ब्रह्म-विद्या का वाचक है । उस विद्या के हेतुभूत वेदान्त-वाक्य भी उपनिषत् कहे जाते हैं, उपनिषत्सु विदित इति औपनिषदः पुरुषः । यही “औपनिषद' पद की व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है— “योऽसावुपनिषत्स्वेवाधिगतः” । 'अहम्'-इस प्रतीति के विषयीभूत जीव से भिन्नता प्रदर्शित करने के लिए उक्त पुरुष को “असंसारी” कहा गया है । अत एव क्रिया-रहित होने के कारण उत्पाद्यादि चतुर्विध द्रव्य से वह विलक्षण है । चतुर्विध द्रव्य से विलक्षण होने के कारण किसी कर्म का शेष ( अङ्ग ) नहीं, किन्तु “अनन्यशेष” है । अन्य-शेष ( कर्म का अङ्गभूत द्रव्य उत्पत्त्यादि में से किसी एक क्रिया के द्वारा चिकीर्षित होकर उत्पाद्यादि चतुर्विध द्रव्यों में अन्यतम ) होता है, जैसे-“यूपं तक्षति” इत्यादि । जो द्रव्य अन्य शेष न होकर अतीत और अनागत क्रिया से रहित होता है, जैसे “सुवर्णं भार्यम्”, “सक्तून् जुहोति”—वह उत्पत्त्यादि क्रियाओं से रहित है । ब्रह्म अनन्यशेष क्यों ? इस प्रश्न का उत्तर है—“स्वप्रकरणस्थः” । उपनिषद्वाक्य आत्मा के प्रकरण का आरम्भ करके समाम्नात हैं, पौर्वापर्य की आलोचना से यह निश्चित हो जाता है कि उक्त पुरुष तत्त्व स्व-प्रकरणस्थ और प्रधान है । जैसे याग से बाहर जुहू पात्र नहीं होता, अत एव याग का अव्यभिचरित सम्बन्धी होता है, वैसे पुरुष तत्त्व क्रतु का अव्यभिचरित सम्बन्धी नहीं— यह पहले ही कहा जा चुका है। ऐसा प्रधानभूत पुरुष उपनिषद्वाक्यों से प्रतीयमान है, अतः
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स्थोऽनन्यशेषः- नासौ नास्ति नाधिगम्यत इति वा शक्यं वदितुम्, 'स एष नेति नेत्यात्मा' (बृह० ३।९।२६) इत्यात्मशब्दाद् आत्मनश्च प्रत्याख्यातुमशक्यत्वाद्, य
भामती
उपनिषदामनारभ्याधीतानां पौर्वापर्यपर्यालोचनया पुरुषप्रतिपादनपरत्वेन पुरुषस्यैव प्राधान्येनेदं प्रकरणं, न च जुह्वादिवदव्यभिचरितक्रतुसम्बन्धः पुरुष इत्युपपादितम् । अतः स्वप्रकरणस्थः सोऽयं तथाविध उपनिषद्बुद्धः प्रतीयमानो न नास्तीति शक्यो वक्तुमित्यर्थः ।
स्यादेतत्—मानान्तरागोचरत्वेनागृहीतसङ्गतितयाऽपदार्थस्य ब्रह्मणो वाक्यार्थत्वानुपपत्तेः कथमुपनिषदर्थतेत्यत आह ॐ स एष नेति नेत्यात्मेत्यात्मशब्दात् ॐ । यद्यपि गवाविवन्मानान्तरगोचरत्वमात्मनो नास्ति तथापि प्रकाशात्मन एव सतस्तत्तदुपाधिपरिहाण्या शक्यं वाक्यार्थत्वेन निरूपणं, हाटकस्येव कटककुण्डलादिपरिहाण्या । नहि प्रकाशः स्वसंवेदनो न भासते, नापि तदवच्छेदकः कार्यकारणसङ्घातः । तेन स एष नेति नेत्यात्मेति तत्तदवच्छेदपरिहाण्या बृहत्त्वाद्वापनाच्च स्वयम्प्रकाशः शक्यो वाक्याद् ब्रह्मेति चात्मेति च निरूपयितुमित्यर्थः । अथोपाधिनिरासवदुपहितमप्यात्मरूपं कस्मान्न निरस्यते इत्यत आह ॐ आत्मनश्च प्रत्याख्यातुमशक्यत्वात् ॐ । प्रकाशो हि सर्वस्यात्मा तदधिष्ठानत्वाच्च प्रपञ्चविभ्रमस्य, न चाधिष्ठानाभावे विभ्रमो भवितुमर्हति । न हि जातु रज्ज्वभावे रज्ज्वां भुजङ्ग इति वा धारेति वा विभ्रमो दृष्टपूर्वः । अपि चात्मनः प्रकाशस्य भासा प्रपञ्चस्य प्रथा । तथा हि श्रुतिः 'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' इति । न चात्मनः प्रकाशस्य प्रत्याख्याने प्रपञ्चप्रथा युक्ता । तस्मा-
भामती-व्याख्या
'नास्ति'—इस प्रकार उसकी सत्ता का अपलाप नहीं किया जा सकता । ब्रह्म तत्त्व यदि केवल औपनिषद है, तब अन्य किसी प्रत्यक्षादि प्रमाण का विषय न होने के कारण किसी पद की उसमें शक्ति का ज्ञान न हो सकेगा, जो पदार्थ ( पद का शक्यार्थ ) नहीं, वह वेदान्त-वाक्यार्थ क्योंकर होगा ? इस प्रश्न का उत्तर है—"स एष नेति-नेति आत्मा" इत्यात्मशब्दप्रयोगात्" । यद्यपि गवादि के समान आत्मा में प्रमाणान्तर-गोचरता नहीं, तथापि पदार्थभूत सोपाधि तत्त्व की उपाधि का निषेध करके वाक्यार्थता का शुद्ध ब्रह्म में सामञ्जस्य वैसे ही किया जा सकता है, जैसे कटक-कुण्डलादि उपाधियों का परिहाण करके सुवर्ण तत्त्व का । अवच्छेदद्यभूत स्वसंवेदनात्त्मक प्रकाश तत्त्व अवभासित नहीं होता—ऐसा नहीं, अपितु अवभासित होता है । उसी प्रकार उसकी अवच्छेदकीभूत शरीर-संघातरूप उपाधि नहीं प्रती। होती—ऐसा भी नहीं, अपितु प्रतीत होती है । फलतः "स एष नेति नेत्यात्मा'—इस प्रकार अवच्छेदकीभूत उपाधियों का निषेध करके ब्रह्म और आत्मा के रूप में निरूपित हो सकता है, क्योंकि वह बृहत् ( व्यापक ) एवं 'सर्वत्र अतति आप्नोति'—ऐसे व्यवहार का विषय है । "नेति नेति" वाक्यों के द्वारा उपाधियों के निषेध के समान उपहित आत्मा का भी निषेध क्यों नहीं माना जाता ? इस प्रश्न का उत्तर है—"आत्मनश्च प्रत्याख्यातुमशक्यत्वात्" । उपहित ( उपाधि से उपलक्षित ) प्रकाश तत्त्व सबका आत्मा होने के कारण निषेध्य नहीं हो सकता । अर्थात् आरोप-स्थल पर जैसे रजतादि आरोप्य पदार्थों का निषेध होता है, वैसे अधिष्ठानरूप शुक्ति तत्त्व का निषेध नहीं हो सकता । आत्मप्रकाश तत्त्व सकल अनात्म-भ्रान्ति का अधिष्ठान है, अधिष्ठान के बिना कोई भ्रान्ति हो ही नहीं सकती, रज्जु के अभाव में सर्प या धारादि का विभ्रम कभी नहीं देखा जाता । अपि च आत्म प्रकाश के प्रकाश से ही प्रपञ्च का प्रकाश होता है, जैसा कि श्रुति कहती है—"तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्" ( कौ. २।५।१५ ) । आत्मप्रकाश का प्रत्याख्यान कर देने पर प्रपञ्च की प्रथा ( प्रतीति ) ही नहीं हो सकती । अतः आत्मा का निषेध सम्भव न हो सकने के कारण वेदान्त-वाक्यों के द्वारा प्रमाणान्तरा-
| ब्रह्मणोऽविनाशित्वम् ] | हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् | १६१ |
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एव निराकर्ता तस्यैवात्मत्वात् । नन्वात्माऽहंप्रत्ययविषयत्वादुपनिषत्स्वेव विज्ञायत इत्यनुपपन्नम् । न; तत्साक्षित्वेन प्रत्युक्तत्वात् । न ह्यहंप्रत्ययविषयकर्तृव्यतिरेकेण तत्साक्षी सर्वभूतस्थः सम एकः कूटस्थनित्यः पुरुषो विधिकारण्डे तर्कसमये वा केनचि-दधिगतः सर्वस्यात्मा, अतः स न केनचित्प्रत्याख्यातुं शक्यो विधिशेषत्वं वा नेतुम् । आत्मत्वादेव च सर्वेषां न हेयो नाप्युपादेयः । सर्वं हि विनश्यद्विकारजातं पुरुषान्तं
भामती
दात्मनः प्रत्याख्यानायोगाद्वेदान्तेभ्यः प्रमाणान्तरागोचरसर्वोपाधिरहितब्रह्मस्वरूपावगतिसिद्धिरित्यर्थः । उपनिषत्स्वेवावगत इत्यवधारणममृष्यमाण आक्षिपति ॐ नन्वात्मा इति ॐ । सर्वजनीनाह-म्प्रत्ययविषयो ह्यात्मा कर्त्ता भोक्ता च संसारी, तत्रैव च लौकिकपरीक्षकाणामात्मपदप्रयोगाद्, य एव लौकिकाः शब्दास्त एव वैदिकास्त एव च तेषामर्था इत्यौपनिषदमप्यात्मपदं तत्रैव प्रवर्त्तितुमर्हति नार्था-न्तरे तद्विपरीत इत्यर्थः । समाधत्ते ॐ नाहम्प्रत्ययविषय औपनिषदः पुरुषः ॐ । कुतः ? ॐ तत्साक्षित्वेना ॐ अहम्प्रत्ययविषयो यः कर्त्ता कार्य्यकरणसंघातोपहितो जीवात्मा तत्साक्षित्वेन, परमात्मनोऽहम्प्रत्ययविषय-त्वस्य ॐ प्रत्युक्तत्वात् ॐ । एतदुक्तं भवति - यद्यप्यनेन जीवेनात्मनेति जीवपरमात्मनोः पारमार्थिकमैक्यं तथापि तस्योपहितं रूपं जीवः शुद्धं तु रूपं तस्य साक्षि तच्च मानान्तरानधिगतमुपनिषदगोचर इति । एतदेव प्रपञ्चयति ॐ न ह्यहम्प्रत्ययविषयः इति ॐ । ॐ विधिशेषत्वं वा नेतुं न शक्यः ॐ । कुतः ? ॐ आत्मत्वादेव ॐ । न ह्यात्माऽन्यार्थोऽन्यत्तु सर्वमात्मार्थम् । तथा च श्रुतिः—'न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवति आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति' इति । अपि चातः सर्वेषामात्मत्वादेव न हेयो
भामती-व्याख्या
गोचर समस्त उपाधि-रहित ब्रह्मस्वरूप की अवगति सिद्ध हो जाती है । 'उपनिषत्स्वेव'—इस प्रकार के अवधारण से सहमत न होने के कारण पूर्वपक्षी शङ्का करता है—"ननु आत्मा अहं प्रत्ययविषयत्वादुपनिषत्स्वेव विज्ञायत इत्यनुपपन्नम्" । अर्थात् यह तथ्य सर्व-विदित है कि आत्मा 'अहंकरोमि'—इत्यादि प्रतीति का विषयीभूत कर्त्ता और भोक्तादि के रूप में अवगत है, क्योंकि कर्त्ता और भोक्ता में ही लौकिक और परीक्षक सभी व्यक्ति 'आत्मा' पद का प्रयोग करते हैं । लौकिक और वैदिक पद-पदार्थों का भेद नहीं होता, शबरस्वामी कहते हैं "य एव लौकिका शब्दाः, ते एव वैदिकाः, त एव च तेषामर्थाः" (जै. सू. भा. पृ. २९१) । अतः उपनिषद्वाक्य-घटक 'आत्मा' पद भी उसी कर्त्ता-भोक्ता तत्त्व का ही अभिधान करेगा, उससे भिन्न या विपरीत (शुद्ध तत्त्व) का बोधक कदापि नहीं हो सकता ।
उक्त शङ्का का समाधान करते हैं—"न"। अर्थात् अहंप्रत्यय का विषय औपनिषद पुरुष नहीं हो सकता, क्योंकि "तत्साक्षित्वेन" । अहंप्रत्यय का विषयीभूत कार्य-करण-संघातरूप जीव का साक्षी होने के कारण ब्रह्म में अहंप्रत्यय की विषयता नहीं हो सकती । आशय यह है कि यद्यपि "अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि" (छां. ६।३।२) इत्यादि श्रुतियों के आधार पर जीव और परमात्मा का पारमार्थिक ऐक्य ही सिद्ध होता है, तथापि उपाधि-विशिष्ट चेतन को जीव और उपाधि-रहित शुद्ध तत्त्व को ब्रह्म या साक्षी कहा जाता है, वह अन्य प्रमाणों का अविषय केवल उपनिषद्वाक्यों के द्वारा ही प्रतिपादित होता है । इसी रहस्य का विस्तार किया जाता है—"न ह्यहंप्रत्ययविषयकर्तृव्यतिरेकेण तत्साक्षी"। उस साक्षी तत्त्व को विधि का अङ्ग नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि "आत्मत्वा-देव"। समस्त भोग्यवर्ग आत्मा के लिए है, आत्मा अन्य किसी के लिए नहीं होता, जैसा कि श्रुति कहती है—"न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवति, आत्मनस्तु कामाय सर्वं
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विनश्यति । पुरुषो विनाशहेत्वभावादविनाशी, विक्रियाहेत्वभावाच्च कूटस्थनित्यः, अत
भामती
नाप्युपादेयः । सर्वस्य हि प्रपञ्चजातस्य ब्रह्मैव तत्त्वमात्मा । न च स्वभावो हेयोऽशक्यहानत्वात् । न चोपादेयः, उपात्तत्वात् । तस्माद्धेयोपादेयविषयो विधिनिषेधो न तद्विपरीतमात्मतत्त्वं विषयीकुरुत इति सर्वस्य प्रपञ्चजातस्यात्मैव तत्त्वमिति । एतदुपपादयति ॐसर्वं विनश्यद्विकारजातं पुरुषान्तं विनश्यतिॐ । अयमर्थः—पुरुषो हि श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणतदविरुद्धन्यायव्यवस्थापितत्वात् परमार्थसन् । प्रपञ्चस्त्वनाद्यविद्योपदर्शितोऽपरमार्थसन् । यश्च परमार्थसन्नसौ प्रकृती रजतत्त्वमिव सर्पविभ्रमस्य विकारस्य । अत एवास्यानिवार्य्यत्त्वेनाध्रुवस्वभावस्य विनाशः । पुरुषस्तु परमार्थसन् नासौ कारणसहस्रेणाप्यसन् शक्यः कर्तुम् । न हि सहस्रमपि शिल्पिनो घटं पटयितुमीशत इत्युक्तम् । तस्मादविनाशिपुरुषान्तो विकारविनाशः शुक्तिरज्जुतत्त्वान्त इव रजतभुजङ्गविनाशः । पुरुष एव हि सर्वस्य प्रपञ्चविकारजातस्य तत्त्वम् । न च पुरुषस्यास्ति विनाशो यतोऽनन्तो विनाशः स्यादित्यत आह ॐ पुरुषो विनाशहेत्वभावाद् इति ॐ । न हि कारणानि सहस्रमप्यन्यदन्ययितुमीशत इत्युक्तम् । अथ मा भूत् स्वरूपेण पुरुषो हेय उपादेयो वा, तदीयस्तु कश्चिद्धर्मो हास्यते कश्चिच्चोपादास्यत इत्यत आह ॐ विक्रियाहेत्वभावाच्च कूटस्थनित्यः ॐ । त्रिविधोऽपि धर्मलक्षणावस्थापरिणामलक्षणो विकारो नास्तीत्युक्तम् । अपि चात्मनः परमार्थसतो धर्मोऽपि
भामती-व्याख्या
प्रियं भवति” ( बृह० उ० ४।५।६ )। समस्त प्रपञ्च का आत्मा होने के कारण किसी के द्वारा वह न हेय हो सकता है और न उपादेय । 'घटः सन्', 'पटः सन्' इत्यादि सद्रूप से प्रतीयमान ब्रह्म तत्त्व सभी घटादि सत्पदार्थों का स्वरूप है, स्वरूप का परित्याग कभी नहीं हो सकता, क्योंकि वह आगन्तुक पदार्थ नहीं । इसी प्रकार वह उपादेय नहीं, क्योंकि कभी अप्राप्त नहीं, सदैव प्राप्त है। इस प्रकार यह स्थिर हो जाता है कि विधि-निषेध वाक्य सदैव हेय और उपादेय वस्तु को विषय करते हैं, उनसे विपरीत ( हेयोपादेय-रहित ) आत्मतत्त्व को विषय नहीं कर सकते । समस्त हेयोपादेय प्रपञ्च का अधिष्ठान होने के कारण ब्रह्म प्रपञ्च का आत्मा कहलाता है। इस सिद्धान्त का उपपादन किया जाता है—"सर्वं हि विनश्यद्विकारजातं पुरुषान्तं विनश्यति"। अभिप्राय यह है कि पुरुषतत्त्व श्रुति, स्मृति, इतिहास, पुराण एवं श्रुत्याद्यविरुद्ध न्यायों के द्वारा व्यवस्थापित एक परमार्थसत् तत्त्व है, किन्तु प्रपञ्च अनादि अविद्या के द्वारा कल्पित अपरमार्थ पदार्थ है। जो परमार्थसत् तत्त्व है, वह समस्त विकार वर्ग की वैसे ही प्रकृति ( अधिष्ठान ) है, जैसे सर्प-विभ्रम की प्रकृति रज्जुतत्त्व होता है। अत एव यह प्रपञ्च अस्थिरस्वभाव का होने से विनश्वर किन्तु इसका अधिष्ठान परमार्थ तत्त्व स्थिर कूटस्थ नित्य परमार्थसत् अविनाशी है। यह किसी भी कारण-कलाप के द्वारा असत् नहीं किया जा सकता, क्योंकि यदि हजार शिल्पी एकत्र हो जाँय, तब भी घट को पट नहीं बना सकते यह कहा जा चुका है, अतः अविनाशी पुरुष को छोड़कर वहाँ तक का समस्त विकार-वर्ग वैसे नष्ट हो जाता है, जैसे शुक्ति और रज्जु तत्त्व-पर्यन्त रजत और सर्प-विभ्रम विनष्ट हो जाता है। तत्त्व का विनाश नहीं होता, समस्त विकार-वर्ग का पुरुष ही एकमात्र तत्त्व है। पुरुष तत्त्व का विनाश नहीं होता कि विनाश सीमित न होकर अनन्त हो जाता—"पुरुषो विनाशहेत्वभावादविनाशी"। किसी भी कारण पदार्थ की यह क्षमता नहीं कि नित्य तत्त्व को अनित्य बना सके—यह कई बार कहा जा चुका है। जैसे आकाशतत्त्व हेय और उपादेय नहीं, फिर भी उसका शब्दरूप धर्म हेय और उपादेय होता है, वैसे ही पुरुष तत्त्व का भी कोई धर्म हेय और उपादेय हो सकता है—ऐसी सम्भावना का निराकरण किया जा रहा है—विक्रियाहेत्वभावाच्च कूटस्थनित्यः"। धर्मपरिणाम, लक्षणपरिणाम और अवस्था-
वेदान्ते भूतोपदेशः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १६३
एव नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः। तस्मात् 'पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः' (काठ० १।३।११) 'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि' (बृह० ३।९।२६) इति चौपनिषदत्वविशेषणं पुरुषस्योपनिषत्सु प्राधान्येन प्रकाश्यमानत्व उपपद्यते। अतो भूतवस्तुपरो वेदभागो नास्तीति वचनं साहसमात्रम्।
यदपि शास्त्रतात्पर्यविदामनुक्रमणम्—'दृष्टो हि तस्यार्थः कर्मावबोधनम्' इत्येवमादि, तद्धर्मजिज्ञासाविषयत्वाद्विधिप्रतिषेधशास्त्राभिप्रायं द्रष्टव्यम्। अपि च 'आम्ना-
भामती
परमार्थसन्निति न तस्यात्मवदन्यथात्वं कारणैः शक्यं कर्तुम्। न च धर्मान्यथात्वाद्वन्यो विकारः। तदिदमुक्तम्—विक्रियाहेत्वभावादिति। सुगममन्यत्। यत् पुनरेकदेशिना शास्त्रविद्वचनं साक्षित्वेनानुक्रान्तं तदन्यथोपपादयति ॐ यदपि शास्त्रतात्पर्यविदामनुक्रमणम् इति ॐ। दृष्टो हि तस्यार्थः प्रयोजनवदर्थावबोधनमिति वक्तव्ये धर्मजिज्ञासायाः प्रकृतत्वाद्वर्मस्य च कर्मत्वात् कर्मावबोधनमित्युक्तम्। न तु सिद्धरूपब्रह्मावबोधनं व्यापारं वेदस्य वारयति। न हि सोमशर्मणि प्रकृते तद्गुणाभिधानं परिसञ्चष्टे विष्णुशर्मणो गुणवत्ताम्। विधिशास्त्रं विधीयमानकर्मविषयं प्रतिषेधशास्त्रं च प्रतिषिध्यमानकर्मविषयमित्युभयमपि कर्मावबोधपरम्। अपि चाम्नायस्य क्रियार्थत्वादिति शास्त्रकृद्वचनं तत्रार्थग्रहणं यद्यभिधेयवाचि ततो भूतार्थानां द्रव्यगुणकर्मणामानर्थक्यमनभिधेयत्वं प्रसज्येत, न हि ते क्रियार्था इत्यत आह ॐ अपि चाम्नायस्य इति ॐ। यद्युच्येत न हि क्रियार्थत्वं क्रियाभिधेयत्वमपि तु क्रियाप्रयोजनत्वं द्रव्यगुणशब्दानां च
भामती-व्याख्या
परिणाम—ये तीनों प्रकार के परिणाम या विकार कूटस्थनित्य तत्त्व के नहीं होते—यह भी कह चुके हैं। दूसरी बात यह भी है कि आकाश नित्य नहीं, अतः उसका धर्म भी नित्य नहीं, किन्तु पुरुषतत्त्व नित्य है, अतः उसका यदि कोई धर्म होगा, तब वह भी नित्य होगा, अतः उसका भी अन्यथाकरण सम्भव नहीं, धर्मान्यथात्व का नाम ही विकार है, अत एव कहा गया है—"विक्रियाहेत्वभावात्"। शेष भाष्य सुगम है।
एकदेशी ने जो शाबर वचन का अपने मत में साक्ष्य दिया था, उसका अन्यथा उपपादन किया जा रहा है—"यदपि शास्त्रतात्पर्यविदामनुक्रमणम्—'दृष्टो हि तस्यार्थः कर्मावबोधनं नाम' इत्येवमादि, तद्धर्मजिज्ञासाविषयत्वाद् विधिप्रतिषेधशास्त्राभिप्रायं द्रष्टव्यम्।" श्री शबरस्वामी ने जो यह कहा है कि "दृष्टो हि तस्यार्थः कर्मावबोधनं नाम" (जै. सू. भा. पृ. ६)। वहाँ 'दृष्टो हि तस्यार्थः प्रयोजनवदर्थावबोधनम्'—ऐसा कहना चाहिए था, किन्तु धर्मजिज्ञासा का प्रसङ्ग है, धर्म ही कर्म है, अतः 'कर्मावबोधनम्'—ऐसा कह दिया गया है। उसका तात्पर्य सिद्धरूप ब्रह्म के अवबोधनरूप व्यापार से वेद को विरत करना नहीं है। जैसे सोमशर्मा सामने है, अतः उसके गुणों का वर्णन कर दिया गया, उसका तात्पर्य विष्णुशर्मा की गुणवत्ता के निषेध में कदापि नहीं, वैसे ही प्रकृत में। विधि-शास्त्र विधीयमान कर्म को विषय करता है और निषेध-शास्त्र निषिध्यमान हिंसादि कर्मों को विषय करता है—इस प्रकार दोनों शास्त्र कर्मावबोधपरक होते हैं। यह जो जैमिनि-सूत्र उद्धृत किया गया है—"आम्नायस्य क्रियार्थत्वाद् आनर्थक्यमतदर्थानाम्" (जै. सू. १।२।१)। इसमें 'क्रियार्थत्वात्' और 'आनर्थक्यम्'—यहाँ पर 'अर्थ' पद अभिधेयपरक है? अथवा प्रयोजनपरक? यदि अभिधेयपरक है, तब 'ये ये क्रियार्था (क्रियारूपाभिधेयाः) ते ते सार्थकाः (अभिधेयाः)' ऐसी व्याप्ति फलित होती है। तब तो सिद्धस्वरूप द्रव्य, गुण और कर्म अनर्थक (अनभिधेय) हो जाते हैं, क्योंकि वे क्रियारूप अर्थ नहीं हैं, व्यापक के अभाव में व्याप्य का अभाव होना स्वाभाविक है, भाष्यकार कहते हैं—अपि "आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम्" इत्येतदेकान्तेनाभ्युपगच्छतां भूतोपदेशानर्थक्य प्रसङ्गः"। यदि कहा जाय कि 'क्रियार्थत्व' से 'क्रिया-
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यस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम्' इत्येतदेकान्तेनाभ्युपगच्छतां भूतोपदेशानर्थक्यप्रसङ्गः। प्रवृत्तिनिवृत्तिविधितच्छेषव्यतिरेकेण भूतं चेद्वस्तूपदिशति भव्यार्थत्वेन,
भामती
क्रियार्थत्वेनैव भूतद्रव्यगुणाभिधानं न स्वनिष्ठतया। यथाहुः शास्त्रविदः 'चोदना हि भूतं भवन्तम्' इत्यादि। एतदुक्तं भवति कार्यमर्थमवगमयन्ती चोदना तदर्थं भूतादिकमप्यर्थं गमयतीति, तत्राह प्रवृत्तिनिवृत्तिव्यतिरेकेण भूतं चेद् इति। अयमभिसन्धिः—न तावत् कार्यार्थ एव स्वार्थे पदानां सङ्गतिग्रहो नान्यार्थ इत्युपपादितं भूतेऽप्यर्थे व्युत्पत्तिं दर्शयद्भिः। नापि स्वार्थमात्रपरतैव पदानां, तथा सति न वाक्यार्थप्रत्ययः स्यात्। न हि प्रत्येकं स्वप्रधानतया गुणप्रधानभावरहितानामेकवाक्यता दृष्टा। तस्मात् पदानां स्वार्थमभिदधतामेकप्रयोजनवत् पदार्थापरतयैकवाक्यता। तथा च तत्तदर्थान्तरविशिष्टैकवाक्यार्थप्रत्यय उपपन्नो भवति, यथाहुः शास्त्रविदः—
साक्षाद्यद्यपि कुर्वन्ति पदार्थप्रतिपादनम् ।
वर्णास्तथापि नैतस्मिन् पर्यवस्यन्ति निष्फले ॥
वाक्यार्थमितये तेषां प्रवृत्तौ नान्तरीयकम् ।
पाके ज्वालेव काष्ठानां पदार्थप्रतिपादनम् ॥ इति ।
भामती-व्याख्या
भिधेयत्व विवक्षित नहीं, अपितु 'क्रियाप्रयोजनकत्व' विवक्षित है, सिद्धात्मक द्रव्य, गुण और कर्मादि का अभिधान क्रियाप्रयोजनकत्वेन ही होता है, स्वतन्त्र नहीं। श्री शबरस्वामी कहते हैं—"चोदना हि भूतं भवन्तं....शक्नोत्यवगमयितुम्” (शबर. पृ. १३)। आशय यह है कि कार्यरूप अर्थ का बोध कराती हुई चोदना (विधि) उस कार्य (क्रिया) के लिए भूत (सिद्ध) आदिरूप अर्थों का बोध कराती है—यही भाष्यकार कह रहे हैं—"प्रवृत्तिनिवृत्तिव्यतिरेकेण भूतं चेद् वस्तूपदिशति भव्यार्थत्वेन"। भाव यह है कि 'कार्यरूप अर्थ में ही शब्दों का शक्ति-ग्रह होता है, अन्य (सिद्धार्थ) में नहीं'—ऐसे नियम का निराकरण सिद्धार्थ में संगति-ग्रह दिखाते हुए पहले किया जा चुका है। यह भी कोई नियम नहीं कि पद केवल स्वार्थ का ही बोधक होता है, क्योंकि तब तो वाक्यार्थ में संसर्गरूप अर्थ का भान न हो सकेगा, क्योंकि वाक्यार्थ गुण-प्रधानादि के रूप में एकवाक्यतापन्न होता है, सभी पद यदि अपने-अपने अर्थों का प्रधानतया बोध कराते हैं, गुण-प्रधानभाव से नहीं, तब उनमें एकवाक्यता सम्भव न हो सकेगी। अतः वाक्य-घटक पद परस्पर-निरपेक्ष स्वार्थमात्र का प्रतिपादन न करके एक प्रयोजनवत्ता का निर्वाह करने के लिए गुण-प्रधानभावेन साकाङ्क्षपदार्थों का अभिधान करते हैं, जिससे नानागुणपदार्थ-विशिष्ट एक प्रधान अर्थ की गमकता वाक्य में उपपन्न हो जाती है, जैसा कि श्री कुमारिलभट्ट कहते हैं—
साक्षाद् यद्यपि कुर्वन्ति पदार्थप्रतिपादनम् ।
वर्णाः तथापि नैतस्मिन् पर्यवस्यन्ति निष्फले ॥
वाक्यार्थमितये तेषां प्रवृत्तौ नान्तरीकम् ।
पाके ज्वालेव काष्ठानां पदार्थप्रतिपादनम् ॥ (श्लो. वा. पृ. ९४३)
[वाक्य के घटकीभूत पद यद्यपि अपने शुद्ध (इतरार्थानन्वित) स्वार्थ के वाचक होते हैं, तथापि केवल स्वार्थ का प्रतिपादन कर देने से न तो वाक्यार्थ-बोध होता है और न प्रवृत्त्यादि, अतः प्रवृत्त्यादि का सम्पादन करने के लिए इतरार्थान्वित स्वार्थ की लक्षकता पदों में वैसे ही नान्तरीयक (अनिवार्य) होती है, जैसे ओदनादि का पाक सम्पादन करने के लिए चूल्हे में लगी सभी लकड़ियाँ एक ऐसी मिलित ज्वाला को जन्म देती हैं, जिससे पाक सम्पन्न होता
वेदान्ते भूतोपदेशः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १६५
कूटस्थनित्यं भूतं नोपदिशतीति को हेतुः ? न हि भूतमुपदिश्यमानं क्रिया भवति । अक्रियात्वेऽपि भूतस्य क्रियासाधनत्वात्क्रियार्थ एव भूतोपदेश इति चेत्, नैष दोषः; क्रियार्थत्वेऽपि क्रियानिर्वर्तनशक्तिमद्वस्तूपदिष्टमेव । क्रियार्थत्वं तु प्रयोजनं तस्य । न
भामती
तथा चार्थान्तरसंसर्गपरतामात्रेण वाक्यार्थप्रत्ययोपपत्तौ न कार्यसंसर्गपरत्वनियमः पदानाम् । एवं च सति कूटस्थनित्यब्रह्मरूपपरत्वेप्यदोष इति । ॐ भव्यं ॐ कार्यम् । ननु यद्भूव्यार्थं भूतमुपदिश्यते न तद् भूतं भव्यसंसर्गेण रूपेण तस्यापि भव्यत्वादित्यत आह ॐ न हि भूतमुपदिश्यमानम् इति ॐ । न तादात्म्यलक्षणः संसर्गः, किन्तु कार्येण सह प्रयोजनप्रयोजनिलक्षणोऽन्वयः । तद्विषयेण तु भावार्थेन भूतार्थानां क्रियाकारक लक्षण इति न भूतार्थानां क्रियार्थत्वमित्यर्थः । शङ्कते ॐ अक्रियात्वेऽपि इति ॐ । एवं चाक्रियार्थकूटस्थनित्यब्रह्मोपदेशानुपपत्तिरिति भावः । परिहरति ॐ नैष दोषः, क्रियार्थत्वेऽपि इति ॐ । न हि क्रियार्थं भूतमुपदिश्यमानमभूतं भवति । अपि तु क्रियानिर्वर्तनयोग्यं भूतमेव तत् । तथा च भूतेऽर्थेऽवधृतशक्तयः शब्दाः क्वचित् स्वनिष्ठभूतविषया दृश्यमाना मृत्वा शीर्खा वा न कथञ्चित् क्रिया-निष्ठतां गमयितुमुचिताः । नह्युपहितं शतशो दृष्टमप्यनुपहितं क्वचिद् दृष्टमदृष्टं भवति । तथा च वर्त्तमानापदेशा अस्तिक्रीयोपहिता अकार्यार्था अप्यटवीवर्णंकादयो लोके बहुलमुपलभ्यन्ते, एवं क्रियाऽनिष्ठा
भामती-व्याख्या
है ] । फलतः इतरार्थान्वित स्वार्थपरता के विना पदों के द्वारा वाक्यार्थावबोध ( संसर्गज्ञान ) सम्भव नहीं, अतः जब इतरार्थान्वय-ज्ञान के द्वारा बाक्यार्थ सम्पन्न हो जाता है, तब पदों में कार्यरूपार्थान्वयपरत्व का नियम व्यर्थ है । वेदान्त-वाक्य भी कूटस्थ नित्य ब्रह्म का समर्पण अवाध गति से कर सकते हैं, इसमें किसी प्रकार की बाधा नहीं। "भूतं चेद् वस्तूपदिशति भव्यार्थत्वेन" —इस भाष्य में 'भव्य' शब्द का अर्थ है—कार्य ( अपूर्व और उसकी साधनीभूत यागादि क्रिया ) श्री शबरस्वामी भी कहते हैं—"भव्यं कर्म, भूतं द्रव्यम्" ( शावर. पृ. १३४८ ) । जैसे मृत्तिका-संसृष्ट घटादि मृण्मय माने जाते हैं, वैसे भव्य-संसर्गी भूत ( द्रव्य ) पदार्थ भी भव्य क्यों नहीं ? इस प्रश्न का उत्तर है—"न हि भूतमुपदिश्यमानं क्रिया भवति ।" दृष्टान्त ( मृत्तिका और घट ) में तादात्म्य संसर्ग होने के कारण घट में मृण्मयता मानी जाती है, किन्तु भूत और भव्य का तादात्म्य संसर्ग नहीं माना जाता । 'भव्य' शब्द से अपूर्व और उसकी साधनीभूत यागादि क्रिया विवक्षित होती है । अपूर्व के साथ व्रीहि आदि द्रव्य का प्रयोजन-प्रयोजनीभाव एवं अपूर्व की जनकीभूत यागादि क्रिया के साथ क्रिया-कारकभाव सम्बन्ध होता है, तादात्म्य नहीं कि जिससे भूत में भव्यत्वापत्ति हो जाती ।
शङ्का—"अक्रियात्वेऽपि भूतस्य क्रियासाधनत्वात् क्रियार्थ एव भूतीपदेशः।" यह सत्य है कि व्रीह्यादि भूत पदार्थ कभी भव्य या क्रियारूप नहीं हो सकते, किन्तु वेद में उन्हीं भूत पदार्थों का उपदेश होता है, जो क्रिया के आश्रय या जनक होते हैं, ब्रह्म पदार्थ वैसा भूत नहीं, अतः उसका वेद-पदों के द्वारा प्रतिपादन क्योंकर होगा ?
समाधान—"नैष दोषः, क्रियार्थत्वेऽपि क्रियानिर्वर्तनशक्तिमद्वस्तूपदिष्टमेव" । अन्वितार्थ का पद लक्षक होता है, वाचक नहीं, वाचक शुद्ध ( इतरार्थानन्वित ) स्वार्थ का ही होता है, अतः मर-खप करके भूत वस्तु के साथ क्रियान्वयन का लाभ कर लेने पर भी शुद्ध भूतार्थ में भूत-पदों की शक्ति का अपलाप नहीं हो सकता । क्रिया-जनन शक्ति से युक्त होने पर भी भूत भूत ही रहता है, अतः भूत-पदों को भूतार्थ में अवधृत शक्ति अपने क्रिया-विशिष्ट अर्थ के समान उपहित ( उपाधि से उपलक्षित ) अर्थ का भी उपस्थापन कर सकती है। अतः एव अस्ति क्रिया से उपहित अटवी ( वन ) एवं पर्वतादि के वर्णन प्रचुररूप में उपलब्ध होते हैं, जैसे —
| १६६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४ |
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चैतावता वस्त्वनुपदिष्टं भवति । यदि नामोपदिष्टं, किं तव तेन स्यादिति ? उच्यते— अनवगतात्मवस्तूपदेशश्च तथैव भवितुमर्हति । तदवगत्या मिथ्याज्ञानस्य संसारहेतोर्निवृत्तिः प्रयोजनं क्रियत इत्यविशिष्टमर्थवत्त्वं क्रियासाधनवस्तूपदेशेन । अपि च
भामती
अपि सम्बन्धमात्रपर्यवसायिनः, यथा कस्येष पुरुष इति प्रश्नोत्तरं राज्ञ इति, तथा प्रातिपदिकार्थमात्रनिष्ठा, यथा कीदृशास्तरव इति प्रश्नोत्तरं फलिन इति, न हि पृच्छता पुरुषस्य वा तरूणां वाऽस्तित्वनास्तित्वे प्रतिपित्सिते, किन्तु पुरुषस्य स्वामिभेदस्तरूणां च प्रकारभेदः । प्रष्टुरपेक्षितं चाचक्षाणः स्वामिभेदमेव च प्रकारभेदरूपमेव च प्रतिवक्ति, न पुनरस्तित्वं, तस्य तेनाप्रतिपित्सितत्वात् । उपपादिता च भूतेऽप्यर्थे व्युत्पत्तिः प्रयोजनवति पदानाम् ।
चोदयति ॐ यदि नामोपदिष्टं ॐ भूतं किं तव उपदेष्टुः श्रोतुर्वा प्रयोजनं ॐ स्यात् ॐ । तस्माद् भूतर्माप प्रयोजनवदेवोपदेष्टव्यं नाप्रयोजनम् , अप्रयोजनं च ब्रह्म तस्योदासीनस्य सर्वक्रियारहितत्वेनानुपकारकत्वादिति भावः । परिहरति ॐ अनवगतात्मोपदेशश्च ॐ तथैव प्रयोजनवानेव भवितुमर्हति ॐ । अप्यर्थश्चकारः । एतदुक्तं भवति — यद्यपि ब्रह्मोदासीनं तथापि तद्विषयं शाब्दज्ञानमवगतिपर्यन्तं विद्या स्वविरोधिनीं संसारमूलमविद्यामुच्छिन्दत् प्रयोजनवदित्यर्थं। अपि च येऽपि कार्यपरत्वं
भामती-व्याख्या
"अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः ।
पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य स्थितः पृथिव्यामिव मानदण्डः ॥"
इसी प्रकार 'क्रिया' पद का प्रयोग किए बिना ही सम्बन्धमात्र के उपस्थापक शब्द भी प्रयुक्त होते हैं, जैसे—'कस्यैष पुरुषः ?' इस प्रश्न का उत्तर है—'राज्ञः' । केवल प्रातिपदिकार्थ के बोधक पद भी होते हैं, जैसे 'कीदृशास्तरवः ?' इस प्रश्न का उत्तर है—'फलिनः' । यहाँ प्रश्न-कर्त्ता के द्वारा प्रथम प्रश्न में पुरुष और द्वितीय प्रश्न में तरु ( वृक्ष ) समूह के अस्तित्व या नास्तित्व की जिज्ञासा नहीं की गई कि उत्तर वाक्य में क्रिया-पद का प्रयोग आवश्यक होता । यहां तो केवल पुरुष के स्वामी और तरुओं के प्रकार की जिज्ञासा की गई है, अतः 'राज्ञः' और 'फलिनः'—इतना कह देना पर्याप्त माना जाता है, क्योंकि उत्तर-कर्त्ता जिज्ञासितमात्र का ही अभिधान किया करता है, अजिज्ञासित का नहीं । क्रिया-सम्बन्ध के बिना भी सिद्धार्थक पदों का शक्ति-ग्रह एवं सिद्धार्थ प्रयोजनवान् होता है—यह कह चुके हैं ।
पूर्वपक्षी शङ्का करता है—"यदि नामोपदिष्टम्, किं तव तेन स्यात् ?" अर्थात् यदि भूत ( सिद्ध ) वस्तु का उपदेश देखा जाता है, तब उससे वक्ता या श्रोता का क्या लाभ ? अतः उसी सिद्धार्थ का उपदेश करना चाहिए, जो सप्रयोजन हो, ब्रह्म अत्यन्त प्रयोजन-शून्य है, क्योंकि वह कूटस्थ, विभु और उदासीन है, उसमें किसी क्रिया का भी सम्बन्ध नहीं हो सकता, अतः उससे किसी प्रकार का उपकार सम्भव नहीं ।
उक्त शङ्का का परिहार किया जाता है—"अनवगतात्मवस्तूपदेशश्च तथैव भवितुमर्हति ।" 'तथैव' शब्द का यहाँ अर्थ है—प्रयोजनवान् । 'आत्मवस्तूपदेशश्च'—यहाँ चकार का प्रयोग 'अपि' के अर्थ में हुआ है । आशय यह है कि यद्यपि ब्रह्म कूटस्थ, विभु और उदासीन है, तथापि ब्रह्मविषयक अवगति-पर्यन्त ( साक्षात्कारात्मक ) बोध वह ब्रह्म-विद्या है, जो अपनी विरोधिनी संसार की मूलभूत अविद्या का समूल उच्छेद कर डालती है, इससे बढ़ कर और प्रयोजन या उपकार क्या होगा ?
दूसरी बात यह भी है कि जो आचार्य सभी पदों में कार्यपरत्व आवश्यक मानते हैं, वे
वेदान्ते भूतोपदेशः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १६७
भामती
सर्वेषां पदानामास्थिषत, तैरपि ब्राह्मणो न हन्तव्यो न सुरा पातव्येत्यादीनां न कार्यपरता शक्याऽऽस्थातुम् । कृत्युपहितमर्थ्यादं हि कार्यं कृत्या व्याप्तं तन्निवृत्तौ निवर्त्तते शिंशपात्वमिव वृक्षत्वनिवृत्तौ । कृतिर्हि पुरुषप्रयत्नः, स च विषयाधीननिरूपणः । विषयश्चास्य साध्यस्वभावतया भावार्थ एव पूर्वापरीभूतोऽन्योत्पादानुकूलो भवितुमर्हति, न द्रव्यगुणौ । साक्षात् कृतिव्याप्यो हि कृतेर्विषयः, न च द्रव्यगुणयोः सिद्धयोरस्ति कृतिव्याप्यता । अत एव शास्त्रकृद्वचः "भावार्थाः कर्मशब्दास्तेभ्यः क्रिया प्रतीयेत" इति । द्रव्यगुणशब्दानां नैमित्तिकावस्थायां कार्यविमर्शेऽपि भावस्य स्वतो द्रव्यगुणशब्दानां तु भावयोगात् कार्यविमर्श इति भावार्थेभ्य एवापूर्वावगतिर्न द्रव्यगुणशब्देभ्य इति । न च 'दध्ना जुहोति' 'सन्ततमाघारयति' इत्यादिषु द्रव्यादीनां कार्यविषयता । तत्रापि हि होमाधारभावार्थविषयमेव कार्यम् । न चैतावता सोमेन यजेतेतिवत् , दधिसन्ततादिविशिष्टहोमाधारविधानात् 'अग्निहोत्रं जुहोति' 'आधारमभिघारयति' इति तदनुवादः । यद्यप्यत्रापि भावार्थविषयमेव कार्यम् । तथापि भावार्थानुबन्धतया द्रव्यगुणाव-
भामती-व्याख्या
आचार्य भी “ब्राह्मणो न हन्तव्यः”, “न सुरा पातव्या”—इत्यादि निषेध-वाक्यों में कार्यपरत्व का उपपादन नहीं कर सकते, क्योंकि मनुष्य की कृति (प्रयत्न) से साध्य पदार्थ को कार्य कहा जाता है, अतः 'यद् यत्कार्यम्, तत्तत् कृतिसाध्यम्'—इस व्याप्ति के अनुसार कार्य व्याप्य और कृति व्यापक सिद्ध होती है । निषेध-स्थल पर कृतिरूप व्यापक की निवृत्ति हो जाने से कार्यत्व की भी निवृत्ति वैसे ही हो जाती है, जैसे शिंशपात्व की वहाँ निवृत्ति हो जाती है, जहाँ वृक्षत्व नहीं रहता, श्रीधर्मकीर्ति कहते हैं—“व्यापकानुपलब्धिर्यथा नात्र शिंशपा वृक्षाभावात्” (न्या. वि. पृ. १२९) । कृति नाम है—पुरुष के प्रयत्न का, कृति या प्रयत्न का निरूपण उसके विषय पर निर्भर है, कृति का विषय होता है—साध्यस्वरूप धात्वर्थ (पचनादि) श्री प्रभाकर मिश्र भी कहते हैं—“तस्य च विषयाधीनप्रतिपत्तित्वाद्, भावार्थानां विषयबोधकत्वात्” (बृहती पृ. २९७) । धात्वर्थ के लिए निरुक्तकार ने कहा है—“पूर्वापरीभूतं भावमाख्यातेनाचष्टे व्रजति, पचतीत्युपक्रमप्रभृत्यपवर्गपर्यन्तम्” (निरुक्त. पृ. ४) । न्यायभाष्यकार ने पचति का स्वरूप बताते हुए कहा है—“नानाविधा चैकार्था क्रिया पचतीति--स्थाल्यधिश्रयणम्, उदकासेचनम्, तण्डुलावपनम्, एधोऽपसर्पणम्, अग्न्यभिज्वालनम्, दर्वीघट्टनम्, मण्डस्रावणम्, अधोऽवतारणम्” (न्या. भा. पृ. ७४) । पौर्वापरीभूत पाक क्रिया तण्डुलगत विक्लेदन-जनक होती है । यही क्रिया कृति की विषय है, द्रव्य और गुणादि नहीं । महर्षि जैमिनि कहते हैं—“भावार्थाः कर्मशब्दाः, तेभ्यः क्रिया प्रतीयेत" एष ह्यर्थो विधीयते (जै. सू. २।१।१) । प्रभाकर की रीति से सूत्र का अर्थ यह है कि शाब्द बोध के अवसर पर प्रथम क्षण में प्रत्येक पद अपने सम्बन्धी शुद्ध अर्थ का स्मारक और द्वितीय क्षण में कार्यान्वित स्वार्थ का अभिधायक होता है । शुद्ध (अनन्वित) अर्थ को निमित्त और अन्वित (कार्यान्वित) अवस्था को नैमित्तिक कहा जाता है । नैमित्तिक अवस्था में तो द्रव्य, गुणादि के वाचक शब्द भी कार्यार्थक होते हैं, किन्तु शुद्ध अवस्था में केवल भावार्थक (धातु) शब्द ही विषयोपस्थापन के द्वारा कार्य (अपूर्व) का बोधक होता है, अतः यागादि क्रिया के वाचक (भावार्थ) शब्दों से ही क्रिया (अपूर्वरूप कार्य) का अभिधान माना जाता है और उसी (यागादि) का ही विधान किया जाता है ।
शङ्का—जैसे कार्य (अपूर्व) के विषयीभूत यागादि का विधान माना जाता है, वैसे ही “दध्ना जुहोति”, “सन्ततमाघारयति”—इत्यादि स्थलों पर दधिरूप द्रव्य एवं घृत का सन्तत (अटूट धारा के रूप में) क्षरणरूप गुण भी कार्य (अपूर्व) के विषय या अवच्छेदक
१६८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४
भामती
विषयावपि विधीयेते। भावार्थो हि कारकव्यापारमात्रतयाऽविशिष्टः कारकविशेषेण द्रव्यादिना विशेष्यत इति द्रव्यादस्तदनुबन्धः। तथा च भावार्थे विधीयमाने स एव सानुबन्धो विधीयत इति द्रव्यगुणाव-विषयावपि तदनुबन्धतया विहितौ भवतः। एवं च भावार्थप्रणालिकया द्रव्यादिसङ्क्रान्तो विधिर्गौरवाद् बिभ्यत् स्ववविषयस्य चान्यतः प्राप्तत्या तदनुवादेन तदनुबन्धीभूतद्रव्यादिपरो भवतीति सर्वत्र भावार्थ-विषय एव विधिः। एतेन यदाग्नेयोऽष्टाकपालो भवतीत्यत्र सम्बन्धविषयो विधिरिति परास्तम्। ननु न भवत्यर्थो विधेयः, सिद्धे भवितरि लब्धरूपस्य भवनं प्रत्यकर्तृत्वात्। न खलु गगनं भवति। नाप्यसिद्धेऽ-सिद्धस्यानियोज्यत्वाद्, गगनकुसुमवत्। तस्माद् भवनेन प्रयोज्यव्यापारेणाक्षिप्तः प्रयोजकस्य भावयितु-र्व्यापारो विधेयः। स च व्यापारो भावना कृतिः प्रयत्न इति। निर्विषयश्चासाववश्यप्रतिपत्तिरतो विषया-पेक्षायामाग्नेयशब्दोपस्थापितो द्रव्यदेवतासम्बन्ध एवास्य विषयः। ननु व्यापारविषयः पुरुषप्रयत्नः कथमव्यापाररूपं सम्बन्धं गोचरयेत्। नहि घटं कुर्वित्यत्रापि साक्षाक्षात्मार्थं घटं पुरुषप्रयत्नो गोचरयत्यपि
भामती-व्याख्या
होते हैं, अतः उनका भी विधान क्यों न किया जाय ?
समाधान— वहाँ भी जुहोत्यर्थ (होम) और आधार (क्षारण) रूप भावार्थ ही कार्य का विषय माना जाता है, अतः साक्षात् विषय का ही विधान न्याय-संगत है।
शङ्का— यदि दध्यादि में भी भावार्थ का ही विधान होता है, तब जैसे "सोमेन यजेत" (तै. सं. ३।२।२) इस वाक्य के द्वारा सोम-विशिष्ट याग का विधान होता है, वैसे ही "दध्ना जुहोति" और "सन्ततमाघारयति" इत्यादि वाक्य भी क्रमशः होम और आधार कर्म के विधायक हो जाएँगे और "अग्निहोत्रं जुहोति" (तै. सं. १।५।९।१) एवं "आधार-माघारयति" (तै. सं. २।५।११।६) इन दोनों वाक्यों को क्रमशः होम और आधार का अनुवादक मानना पड़ेगा।
समाधान— यद्यपि यहाँ पर भी कार्य (अपूर्व) भावार्थविषयक ही है, तथापि भावार्थ के विशेषक होने के कारण कार्य के अविषयीभूत भी द्रव्य और गुण विहित हो जाते हैं। द्रव्यादि से विशिष्ट भावार्थ का विधान गौरव-ग्रस्त होता है, अतः विशिष्ट-विधान वहाँ ही अगत्या माना जाता है, जहाँ वाक्यान्तर से कर्म का विधान न हो सकता हो, अग्निहोत्रं जुहोति-इत्यादि वाक्यों के द्वारा विहित भावार्थ के अनुवाद से "दध्ना जुहोति", "पयसा जुहोति"-इत्यादि वाक्यों के द्वारा केवल दध्यादि गुण का विधान मानने में ही लाघव होता है। "सोमेन यजेत"—यहाँ पर कोई वाक्यान्तर ऐसा उपलब्ध नहीं होता जो केवल भावार्थ का विधायक माना जा सके, अतः वहाँ अगत्या विशिष्ट विधान मानना पड़ता है, किन्तु प्रकृत में वैसा नहीं। फलतः सिद्धार्थ कहीं पर भी साक्षाद् विधेय नहीं होता, अपितु भावार्थ ही विधेय होता है। अत एव जो लोग "यदाग्नेयोऽष्टाकपालो भवति" (तै. सं. २।६।३३) यहाँ पर द्रव्य के साथ अग्न्यादि देवताओं के सम्बन्धमात्र का विधान मानते थे, उनका निराकरण हो जाता है, क्योंकि सम्बन्ध पदार्थ भी द्रव्यादि के समान सिद्धार्थ है, अतः वह साक्षाद् विधेय नहीं हो सकता।
शङ्का— उक्त स्थल पर यदि द्रव्य-देवता का सम्बन्ध विधीयमान नहीं, तब किसका विधान होता है? 'भवति' धातु के अर्थभूत भवन का विधान नहीं हो सकता, क्योंकि भवत्यर्थ का कर्त्ता सिद्ध है? अथवा असिद्ध? प्रथम कल्प में विधि ही व्यर्थ है, द्वितीय कल्प में कर्त्तारूप नियोज्य असिद्ध होने के कारण विधित्व सम्भव नहीं। परिशेषतः भवनरूप प्रयोज्य-व्यापार के द्वारा प्रयोजक के व्यापार का आक्षेप होता है, क्योंकि घटादिरूप
निषेधवाक्येषु कार्याभावः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १६९
भामती
तु दण्डादि हस्तादिना व्यापारयति। तस्माद् घटार्थी कृतिं व्यापारविषयामेव प्रतिपद्यते, न तु रूपतो घटविषयाम्, उद्देश्यतया त्वस्यामस्ति घटो न तु विषयतया, विषयतया तु हस्तादिव्यापार एव। अत एवाग्नेय इत्यत्रापि द्रव्यदेवतासम्बन्धाक्षिप्तो यजिरेव कार्यविषयो विधेयः। किमुक्तं भवति आग्नेयो भवतीति, आग्नेयेन यागेन भावयेदिति। अत एव 'य एवं विद्वान् पौर्णमासीं यजते', 'य एवं विद्वानमावास्यां यजते' इत्यनुवादो भवति यदाग्नेय इत्यादिविहितस्य यागषट्कस्य। अत एव च विहितानुष्ठितस्य तस्यैव दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेतेत्यधिकारसम्बन्धः। तस्मात् सर्वत्र कृतिप्रणालिकया भावार्थविषय एव विधिरित्येकान्तः। तथा च न हन्यान्न पिबेदित्यादिषु यदि कार्यमभ्युपेयेत ततस्तद्व्यापिका कृतिरुपेयेत। तद्व्यापकश्च भावार्थो विषयः। एवञ्च प्रजापतिव्रतन्यायेन पर्युदासवृत्त्याऽहननापानसङ्कल्पलक्षण्या तद्विषयो विधिः स्यात्। तथा च प्रसज्यप्रतिषेधो दत्तजलाञ्जलिः प्रसज्येत। न च सति
भामती-व्याख्या
उत्पद्यमान या प्रयोज्य का भवनरूप व्यापार तब तक सम्भव नहीं होता, जब तक प्रयोजक (उत्पादक) का भावन या उत्पादन व्यापार न हो। प्रयोजक के व्यापार को ही भावना, कृति या प्रयत्न कहा जाता है। निर्विषयक कृति की प्रतिपत्ति नहीं हो सकती, अतः विषय की आकांक्षा में 'आग्नेय' शब्द के द्वारा उपस्थापित द्रव्य-देवता का सम्बन्ध ही विषय ठहरता है, अतः उसे ही यहाँ विधेय मानना चाहिए।
समाधान—कृति या प्रयत्न सदैव क्रिया को ही विषय करता है, सम्बन्ध क्रिया रूप नहीं, अतः उसको विषय क्योंकर करेगा? जैसे कि "घटं कुरु"—ऐसे प्रयोग में कृतिरूप पुरुष-प्रयत्न घटादि सिद्ध पदार्थों को साक्षात् विषय नहीं कर सकता, अपितु वैसी आज्ञा सुनते ही पुरुष तुरन्त दण्डादि के द्वारा चाक घुमाने लग जाता है, अतः घटोत्पत्ति के अनुकूल कृति का उत्पादनादि व्यापार विषय माना जाता है, स्वरूपतः घटादि नहीं, क्योंकि 'घटं करोति'—इसका अर्थ होता है—'घटाय चक्रं व्यापारयति'। घट उस कृति का केवल उद्देश्य होता है, विषय नहीं। कृति का साक्षात् विषय तो हस्त, दण्ड और चक्रादि का व्यापार ही होता है। अत एव 'आग्नेयः' यहाँ पर भी द्रव्य-देवता-सम्बन्ध के द्वारा आक्षिप्त याग ही विधेय होता है। 'आग्नेयो भवति'—इस वाक्य का अर्थ होता है—'आग्नेयेन यागेनेष्टं भावयेत्'। इसीलिए "य एवंविद्वान् पौर्णमासीं यजते" (तै. सं. १।६।११।१)। "य एवंविद्वानमावास्यां यजते"—ये दोनों वाक्य आग्नेयादि याग के अनुवादक माने जाते हैं ['यदाग्नेयो भवति'—इत्यादि वाक्यों से पूर्णिमा में विहित 'आग्नेय', 'उपांशुयाज' और 'आग्नीषोमीय'—इन तीन यागों का 'पौर्णमासी' पद और अमावास्या में विहित 'आग्नेय' 'ऐन्द्र दधि' और 'ऐन्द्र पयः'—इन तीन कर्मों का अनुवाद 'अमावास्या'—पद के द्वारा माना जाता है, जिससे कि 'दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत'—इस अधिकार-वाक्य में द्विवचन की उपपत्ति हो जाती है। कर्म का फलविशेष के साथ सम्बन्ध-ज्ञान करानेवाले वाक्य को अधिकार-वाक्य कहा जाता है। फलतः सर्वत्र कृति के माध्यम से भावार्थ को ही विधि विषय किया करती है—ऐसा ऐकान्तिक नियम है। अतः "न हन्यात्", "न पिबेत्"—इत्यादि वाक्यों में यदि कोई कार्य माना जाता है, तब उसकी व्यापकीभूत कृति माननी होगी और कृति का व्यापक होता है—भावार्थरूप विषय। यदि यह सब कुछ मान लिया जाता है, तब उक्त वाक्यों से निषेध न होकर 'प्रजापति-व्रत-न्याय' (जै. सू. ४।१।३-९) के आधार पर 'अहनन' और 'अपानादि विषयक सङ्कल्प में उसकी लक्षणा मानकर उक्त सङ्कल्पविषयक विधि का उपपादन किया जायगा। तब तो सर्वत्र पर्युदास वृत्ति को अपनाकर प्रसज्य प्रतिषेध को तिलाञ्जलि ही देनी
२२
| १७० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४ |
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'ब्राह्मणो न हन्तव्यः' इत्येवमाद्या निवृत्तिरुपदिश्यते । न च सा क्रिया । नापि क्रियासाधनम् । अक्रियार्थानामुपदेशोऽनर्थकश्चेत् 'ब्राह्मणो न हन्तव्यः' इत्यादिनिवृत्त्युपदेशानामानर्थक्यं प्राप्तम् । तच्चानिष्टम् । न च स्वभावप्राप्तहन्त्यर्थानुरागेण नञः
भामती
सम्भवे लक्षणा न्याय्या । नेक्षेतोद्यन्तमित्यादौ तु तस्य व्रतमित्यधिकारात् प्रसज्यप्रतिषेधासम्भवेन पर्युदासवृत्त्याऽनीक्षणसङ्कल्पलक्षणा युक्ता । तस्मान्न हन्यान्न पिबेदित्यादिषु प्रसज्यप्रतिषेधेषु भावार्थाभावात् तद्व्याप्तायाः कृतेरभावस्तदभावे च तद्व्याप्यस्य कार्यस्याभाव इति न कार्य्यपरत्वनियमः सर्वत्र वाक्ये इत्याह । ॐ ब्राह्मणो न हन्तव्य इत्येवमाद्या इति ॐ । ननु कस्मात् निवृत्तिरेव कार्य्यं न भवति, तत्साधनं वेत्यत आह । ॐ न च सा क्रिया इति ॐ । क्रियाशब्दः कार्य्यवचनः । एतदेव विभजते । ॐ अक्रियार्थानाम् इति ॐ ।
स्यादेतत्—विधिविभक्तिश्रवणात् कार्य्यं तावदत्र प्रतीयते, तच्च न भावार्थमन्तरेण । न च
भामती-व्याख्या
होगी । किसी अन्य गति के सम्भव होने पर लक्षणा न्याय-संगत नहीं मानी जाती, जैसा कि महर्षि जैमिनि कहते हैं— “गुणे त्वन्यायकल्पना” (जै. सू. १।३।१७) । अर्थात् गौणीभूत या अप्रधान अर्थ में ही अन्याय (लक्षणादि) की कल्पना की जाती है। जहाँ प्रसज्य प्रतिषेध सम्भव नहीं, वहाँ अगत्या प्रतिषेध की विधेयार्थ में लक्षणा की जाती है, जैसे—मनुस्मृति में स्नातक व्यक्ति के कर्त्तव्यों की प्रतिज्ञा की गई है—
अतोऽन्यतमया वृत्त्या जीवंस्तु स्नातको द्विजः।
स्वर्ग्यायुष्ययशस्यानि व्रतानीमानि धारयेत्॥ (मनु. ४।१३)
यहाँ 'व्रत' शब्द का अर्थ है—अनुष्ठेय कर्म । उन व्रतों की गणना में जो कहा गया है— “वेदोदितं स्वकं कर्म नित्यं कुर्यादतन्द्रितः” (मनु. ४।१४) वह उचित ही है, किन्तु यह जो कह दिया गया है कि : “नेक्षेतोद्यन्तमादित्यं नास्तं यन्तं कदाचन” (मनु. ४।३७) । वह सर्वथा अनुचित और विरुद्धाभिधान है, क्योंकि 'ईक्षण' (दर्शन) न करना कोई व्रत या अनुष्ठेय कर्म नहीं, अपितु निषेधात्मक है। कहीं-कहीं प्रतिज्ञा-वाक्य 'तस्य व्रतम्'—ऐसा पाया जाता है, उस प्रतिज्ञा-वाक्य से विरुद्ध होने के कारण यहाँ प्रसज्य-प्रतिषेधपरक 'नेक्षेत' पद की लक्षणा अनीक्षणविषयक सङ्कल्प में की जाती है, उसमें कर्त्तव्यता का निर्वाह हो जाता है। स्नातक के इन व्रतों को प्रजापति-व्रत कहा जाता है, इनका विचार जै. सू. (४।१।३) में किया गया है।
'न हन्यात्', 'न पिबेत्'—इत्यादि वाक्यों में किसी प्रकार का विरोध उपस्थित न होने के कारण निषेधपरता ही मानी जाती है। वहाँ निषेध्य पदार्थ ही होता है, कोई विधेय नहीं, जब विधेयभूत कोई धात्वर्थ ही वहाँ नहीं, तब भावार्थ-व्याप्त कृति का अभाव और कृति का अभाव होने से कृति-व्याप्त अपूर्वरूप कार्य (नियोग) का अभाव हो जाता है, अतः समस्त वैदिक वाक्यों में कार्यपरत्व का नियम भङ्ग हो जाता है, भाष्यकार यही कह रहे हैं— “ब्राह्मणो न हन्तव्य इत्येवमाद्या निवृत्तिरुपदिश्यते”। निवृत्ति को कार्य (नियोग) या कार्य की साधनीभूत भावार्थात्मक क्रिया क्यों नहीं माना जा सकता ? इस प्रश्न का उत्तर है— “न च सा क्रिया” । यहाँ 'क्रिया' शब्द कार्य (नियोग) का वाचक है। इसी का स्पष्टीकरण किया जा रहा है— “अक्रियार्थानामुपदेशोऽनर्थकश्चेद् ब्राह्मणो न हन्तव्य इत्यादिनिवृत्त्युपदेशानामानर्थक्यं प्राप्तम्” ।
शङ्का—'हन्तव्यः' इत्यादि पदों में श्रुत विध्यर्थक 'तव्य' प्रत्यय के द्वारा कार्यार्थ की
निषेधवाक्येषु कार्याभावः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १७१
शक्यमप्राप्तक्रियार्थत्वं कल्पयितुं हननक्रियानिवृत्त्यौदासीन्यव्यतिरेकेण । नञश्चैष स्वभावो यत्स्वसम्बन्धिनोऽभावं बोधयतीति । अभावबुद्धिश्चौदासीन्यकारणम् । सा च दग्धेन्धनाग्निवत्स्वयमेवोपशाम्यति । तस्मात्प्रसक्तक्रियानिवृत्त्यौदासीन्यमेव 'ब्राह्मणो न हन्तव्य-' इत्यादिषु प्रतिषेधार्थं मन्यामहे, अन्यत्र प्रजापतिव्रतादिभ्यः ।
भामती
रागतः प्रवृत्तस्य हननपानादावकस्मादौदासीन्यमनुपपद्यते विना विधारकप्रयत्नम् । तस्मात् स एव प्रवृत्त्युन्मुखानां मनोवाग्देहानां विधारकः प्रयत्नो निषेधविधिगोचरः क्रियेति नाक्रियापरमस्ति वाक्यं किञ्चिदपीत्याह ॐ न च हननक्रियानिवृत्त्यौदासीन्यव्यतिरेकेण नञः शक्यमप्राप्तक्रियार्थत्वं कल्पयितुम् ॐ । केन हेतुना न शक्यमित्यत आह ॐ स्वभावप्राप्तहन्त्यर्थानुरागेण नञः ॐ । अयमर्थः । हननपानपरो हि विधिप्रत्ययः प्रतीयमानस्ते एव विधत्त इत्युत्सर्गः । नचैते शक्ये विधातुम् । रागतः प्राप्तत्वात् । न च नञः प्रसज्यप्रतिषेधो विधेयः । तस्याप्यौदासीन्यरूपस्य सिद्धतया प्राप्तत्वात् । न च विधारकः प्रयत्नः । तस्याश्रुतत्वेन लक्ष्यमाणत्वात् । सति सम्भवे च लक्षणाया अन्याय्यत्वात् । विधिविभक्तेश्च रागतः प्राप्तप्रवृत्त्यनुवादकत्वेन विधिविषयत्वायोगात् । तस्माद् यत् पिबेद् हन्याद्वेत्यनूद्य तन्नेति निषिध्यते, तदभावो ज्ञाप्यते, न तु नञर्थो विधीयते । अभावश्च स्वविरोधिभावनिरूपणतया भावच्छायानुपातीति सिद्धे
भामती-व्याख्या
प्रतीति होती है। कार्य कभी भावार्थरूप क्रिया के बिना नहीं हो सकता, क्योंकि वह कार्य का विषय और साधन है। हननादि में प्रवृत्त पुरुष तब तक सहसा उदासीन (निवृत्त) नहीं हो सकता, जब तक उसकी प्रवृत्ति का विधारक (अवरोधक) प्रयत्न नहीं किया जाता, अतः प्रवृत्त्युन्मुख पुरुष के मन, वाणी और शरीर का धारक वही प्रयत्न निषेधविधि की विषयीभूत क्रिया माना जाता है। फलतः यह सिद्ध हो जाता है कि क्रियार्थ-निरपेक्ष कोई वाक्य और वाक्यार्थ नहीं होता।
समाधान—उक्त शङ्का का निषेध करते हुए भाष्यकार कहते हैं—“न च हननक्रियानिवृत्त्यौदासीन्यव्यतिरेकेण नञः शक्यमप्राप्तक्रियार्थत्वं कल्पयितुम्”। हनन क्रिया की निवृत्ति के द्वारा औदासीन्य (तटस्थभाव या उपेक्षा) ही उपलक्षित होता है, उससे भिन्न कोई अनुष्ठेय पदार्थ उपस्थित क्यों नहीं होता ? इस प्रश्न का उत्तर है—“स्वभावप्राप्तहन्त्यर्थानुरागेण नञः”। अभिप्राय यह है कि 'हन्तव्यः' और 'पातव्यः' इन पदों में तव्यरूप विधि-प्रत्यय से 'हनन' और 'पान' का विधान कर सकते हैं—यह सहज-सिद्ध है, किन्तु यहाँ हनन और पान का विधान नहीं किया जा सकता, क्योंकि रागतः प्राप्त है [द्वेष के कारण ब्राह्मणादि के हनन और राग के कारण सुरादि के पान में मनुष्य स्वयं प्रवृत्त हो जाता है, ऐसा करने में उसे किसी प्रकार की आज्ञा या प्रेरणा की आवश्यकता नहीं होती]। हननादि से निवृत्त होने के लिए किसी विधारक (प्रतिबन्धक या अवरोधक) प्रयत्न का विधान भी सम्भावित नहीं, क्योंकि यहाँ उसका वाचक कोई पद ही प्रयुक्त नहीं हुआ है। उसमें केवल लक्षणा हो सकती थी, उसका भी कोई निमित्त यहां उपस्थित नहीं, विना निमित्त के लक्षणा की कल्पना अन्याय है। फिर विधि प्रत्यय क्या करेगा? इस प्रश्न का सीधा-सा उत्तर है कि रागादि के द्वारा प्राप्त पानादि का वह अनुवाद कर देता है, किसी अज्ञात पदार्थ का विधान नहीं कर सकता। अतः 'यत् पिबेत्', 'यद् हन्यात्', तन्न-इस प्रकार निषेधमात्र किया जाता है। हनन-पानादि का अभाव भी 'नञ्' के द्वारा ज्ञापितमात्र होता है, विहित नहीं, क्योंकि अभाव पदार्थ वस्तुतः सर्वत्र विधेय नहीं होता, उसकी विधेयता का यहाँ भ्रम अवश्य हो जाता है, क्योंकि अभाव एक सप्रतियोगिक पदार्थ है, उसका स्वभाव भी प्रतियोगी के स्वभाव पर
| १७२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४ |
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भामती
सिद्धवत् साध्ये च साध्यवद् भासत इति साध्यविषयो नञर्थः साध्यवद् भासत इति नञर्थः कार्यं इति भ्रमस्तविदमाह ꣸ नञश्चैष स्वभावः इति ꣸ । ननु बोधयतु सम्बन्धिनोऽभावं नञ् , प्रवृत्त्युन्मुखानान्तु मनोवाग्देहानां कुतोऽकस्मान्निवृत्तिरित्यत आह ꣸ अभावबुद्धिश्चौदासीन्यपालनकारणम् ꣸ । अयमभिप्रायः—ज्वरितः पथ्यमश्नीयाद् न सर्पायाङ्गुलिं दद्यादित्यादिवचनश्रवणसमनन्तरं प्रयोज्यवृद्धस्य पथ्याशने प्रवृत्तिं भुजङ्गाङ्गुलिदानोन्मुखस्य च ततो निवृत्तिमुपलभ्य बालो व्युत्पित्सुः प्रयोज्यवृद्धस्य प्रवृत्तिनिवृत्तिहेतू इच्छाद्वेषावनुमिमीते । तथाहीच्छाद्वेषहेतुके वृद्धस्य प्रवृत्तिनिवृत्ती, स्वतन्त्रप्रवृत्तिनिवृत्तित्वात् , मदीयस्वतन्त्रप्रवृत्तिनिवृत्तिवत् । कर्तव्यतैकार्थसमवेतेष्टानिष्टसाधनाभावावगमपूर्वकौ चास्येच्छाद्वेषौ, प्रवृत्तिनिवृत्तिहेतुभूतेच्छाद्वेषत्वात् , मत्प्रवृत्तिनिवृत्तिहेतुभूतेच्छाद्वेषवत् । न जातु मम शब्दतद्व्यापारपुरुषाशयत्रैकाल्यानवच्छिन्नभावनापूर्वप्रत्ययपूर्वाविच्छाद्वेषावभूताम् , अपि तु भूयोभूयः स्वगतमालोचयत उक्तकारणपूर्वादेव प्रत्यवभासेते । तस्माद्वृद्धस्य स्वतन्त्रप्रवृत्तिनिवृत्ती इच्छाद्वेषभेदौ च कर्तव्यतैकार्थसमवेतेष्टानिष्टसाधनाभावावगमपूर्वावित्यनुपूर्व्या सिद्धः कार्यकारणभाव इतीष्टानिष्टसाधनतावगममात्रप्रयोज्यवृद्धप्रवृत्तिनिवृत्तौ इति सिद्धम् । स चावगमः प्राग्भूतः शब्दश्रवणानन्तरमुपजायमानः शब्दश्रवणहेतुक इति प्रवर्तकेषु वाक्येषु यजेतेत्यादिषु शब्द एव कर्तव्यमिष्टसाधनं व्यापारमवगमयंस्तस्येष्टसाधनतां
भामती-व्याख्या
निर्भर है—प्रतियोगी यदि सिद्धार्थ है, तब उसका अभाव सिद्ध के समान और प्रतियोगी यदि असिद्ध या साध्य है, तब उसका अभाव भी साध्य-जैसा प्रतीत हो जाता है। प्रकृत में हननादिरूप प्रतियोगी सिद्ध (प्राप्त) होने के कारण उसका अभाव भी प्राप्त ही है—इस रहस्य का स्पष्टीकरण भाष्यकार कर रहे हैं— "नञश्चैष स्वभावो यत्स्वसम्बन्धिनोऽभावं बोधयति"। 'नञ्' का कुछ भी स्वभाव हो, यहाँ हननादि की प्रवृत्ति में अग्रसर व्यक्ति के मन, वाणी और शरीर का अकस्मात् अवरोध क्यों हो जाता है? इस प्रश्न का उत्तर है— "अभावबुद्धिश्चौदासीन्यकारणम्"। आशय यह है कि "ज्वरितः पथ्यमश्नीयात्", "न सर्पायाङ्गुलिं दद्याद्"—इत्यादि वचनों को सुनने के अनन्तर मध्यम वृद्ध की पथ्याहार में प्रवृत्ति और सर्प के बिल में अंगुलि-दानोन्मुखता से निवृत्ति को देख कर शिक्षार्थी बालक प्रवृत्ति और निवृत्ति की कारणीभूत इच्छा और द्वेष का अनुमान कर लेता है, जिसे शिक्षित-भाषा में इस प्रकार कहा जा सकता है— 'वृद्धस्य प्रवृत्तिनिवृत्ती इच्छाद्वेषहेतुके, स्वतन्त्रप्रवृत्तिनिवृत्तित्वात्, मदीयस्वतन्त्रप्रवृत्तिनिवृत्तिवत्'। मध्यम वृद्ध की इच्छा इष्ट-साधनता और द्वेष अनिष्ट-साधनता के ज्ञान से होता है, इष्ट-साधनता और अनिष्ट-साधनता सदैव उस पदार्थ में होती है, जो कार्य (कृति-साध्य) हो। अतः मध्य वृद्ध की इच्छा और द्वेष के विषय में ऐसा अनुमान किया जा सकता है— 'अस्येच्छाद्वेषौ कार्यनिष्ठेष्टानिष्टसाधनताज्ञानपूर्वकौ, प्रवृत्तिनिवृत्तिहेतुभूतेच्छाद्वेषत्वात्, मदीयप्रवृत्तिनिवृत्तिहेतुभूतेच्छाद्वेषवत्'। बालक ने भली प्रकार यह निश्चय कर रखा है कि हमारे इच्छा और द्वेष कभी भी शब्द (विधि प्रत्यय), शब्दगत व्यापार (शाब्दी भावना), पुरुषाशय (लौकिक प्रेरणा), त्रैकाल्यानवच्छिन्न भावना (वर्तमानादि त्रिकाल-विहित प्रत्यय से अजनित आर्थीभावना) और अपूर्व (नियोग) के ज्ञान से किसी विषय में उत्पन्न नहीं हुए, अपितु वर्तमान विषयों में बार-बार यह अनुभव कर लिया है कि इष्ट-साधनता के ज्ञान से इच्छा और अनिष्ट-साधनता के ज्ञान से द्वेष उत्पन्न होते हैं, अतः मध्यम वृद्ध की प्रवृत्ति-निवृत्ति और इच्छा-द्वेष उसके कृति-साध्यभूत पदार्थ में समुत्पन्न इष्ट-साधनता और अनिष्ट-साधनता के ज्ञान से समुद्भूत हुए हैं। मध्यम वृद्ध को वह ज्ञान शब्द-श्रवण से पहले नहीं था, शब्द-श्रवण के पश्चात् उत्पद्यमान होने के
निषेधवाक्येषु कार्याभावः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १७३
भामती
कर्त्तव्यतां चावगमयति, अनन्यलभ्यत्वादुभयोः, अनन्यलभ्यस्य च शब्दार्थत्वात् । यत्र तु कर्त्तव्यताऽन्यत एव लभ्यते, यथा न हन्यान्न पिबेदित्यादिषु हननपानप्रवृत्त्यो रागतः प्रतिलम्भात्तत्र तदनुवादेन नञ्समभिव्याहृता लिङादिविभक्तिरन्यतोऽप्राप्तमनयोरनर्थ-हेतु-भावमात्रमवगमयति । प्रत्यक्षं हि तयोरिष्टसाधनभावोऽवगम्यते, अन्यथा रागविषयत्वायोगात् । तस्माद्रागादिप्राप्तकर्त्तव्यानुवादेनानर्थसाधनता प्रज्ञापनपरं न हन्यान्न पिबेदित्यादिवाक्यं, न तु कर्त्तव्यतापरमिति सुष्ठूक्तमकार्यनिष्ठत्वं निषेधानाम् । निषेध्यानां चानर्थसाधनताबुद्धिरेव निषेध्याभावबुद्धिस्तथा खल्वयं चेतन आपाततो रमणीयतां पश्यन्नप्यायतिमालोच्य प्रवृत्त्यभावं निवृत्तिमवबुध्य निवर्त्तते, औदासीन्यमात्मनोऽवस्थापयतीति यावत् ।
स्यादेतत् — अभावबुद्धिश्चेदौदासीन्यस्थापनकारणं यावदौदासीन्यमनुवर्तेत न चानुवर्त्तते । नह्युदासीनोऽपि विषयान्तरव्यासक्तचित्तस्तद्भावबुद्धिमान् । न चावस्थापककारणाभावे कार्यावस्थानं दृष्टम् । नहि स्तम्भावपाते प्रासादोऽवतिष्ठतेऽत आह ꕤ सा च दग्धेन्धनाग्निवत् स्वयमेवोपशाम्यति ꕤ । तावदेव खल्वयं प्रवृत्त्युन्मुखो न यावदस्यानर्थहेतुभावमधिगच्छति । अनर्थहेतुत्वाधिगमोऽस्य समूलोद्धारं प्रवृत्ति-
भामती-व्याख्या
कारण शब्द-श्रवण से जनित होता है, अतः “यजेत” — इत्यादि प्रवर्त्तक वाक्यों में शब्द ही इष्ट-साधनभूत यागादिरूप अनुष्ठेय व्यापार का बोध कराता हुआ यागादिगत इष्ट-साधनता और कर्त्तव्यता का बोध कराता है, क्योंकि वहाँ इष्ट-साधनता और कर्त्तव्यता — ये दोनों शब्द को छोड़ कर अन्य किसी साधन से प्राप्त न होने के कारण शब्दार्थ कहलाते हैं, जैसा कि प्रसिद्ध न्याय है— “अनन्यलभ्यः शब्दार्थः” । इसके विपरीत जहाँ इष्ट-साधनतादि का ज्ञान अन्यतः (शब्द को छोड़ कर अन्य साधन से) हो जाता है, जैसे कि “न हन्यात्”, “न पिबेत्” — इत्यादि स्थलों पर हनन, पान में प्रवृत्ति द्वेष और राग के आधार पर ही उपपन्न हो जाती है, वहाँ लिङादि प्रत्यय उसी का अनुवाद करते हुए 'नञ्' का समभिव्याहार पाकर हनन-पान में केवल अनिष्ट-साधनता का बोध करा देते हैं । हनन-पान में इष्ट-साधनता तो प्रत्यक्षतः प्राप्त है, अन्यथा हनन-पान में द्वेष और राग की विषयता सम्भव न हो सकेगी । अतः रागादि के द्वारा प्राप्त हननादि की कर्त्तव्यता का अनुवाद करके अनिष्ट-साधनता के बोधक ही “न हन्यात्”, “न पिबेत्” — इत्यादि वाक्य होते हैं, कर्त्तव्यता के विधायक नहीं, अतः भाष्यकार ने अत्यन्त युक्ति-पूर्ण कहा है— “अकार्यनिष्ठत्वं निषेधानाम्” । हिंसादिरूप निषेध्यगत अनिष्ट-साधनता का ज्ञान ही निषेध्याभाव का ज्ञान है । यह चेतन पुरुष सुरा-पानादि में आपाततः रमणीयता देखता है, किन्तु उससे भविष्य में होनेवाले अनर्थ को सोचकर प्रवृत्त्यभावरूप निवृत्ति को अपनाता है, अर्थात् सुरा-पानादि से उदासीन (विरत) हो जाता है ।
शङ्का — प्रवृत्त्यभाव का ज्ञान यदि औदासीन्य की स्थापना का कारण होता, तब उस ज्ञान को तब तक बराबर रहना चाहिए था, जब तक कि उदासीनता रहती है, किन्तु नहीं रहता, क्योंकि सुरापानादि से विरत पुरुष को भी तब प्रवृत्त्यभाव का ज्ञान नहीं रहता, जबकि उसका चित्त अन्य विषय में व्यासक्त हो (लग) जाता है । जब किसी कार्य का अवस्थापक नहीं रहता, तब उस कार्य का अवस्थान कभी नहीं देखा जाता, जैसे कि स्तम्भों (खम्भों) के गिर जाने पर उनके आश्रित रहनेवाला भवन तुरन्त धराशायी हो जाता है ।
समाधान — उक्त शङ्का का समाधान करने के लिए ही भाष्यकार ने कहा है— “सा च दग्धेन्धनाग्निवत् स्वयमेवोपशाम्यति” । अर्थात् यह पुरुष तब तक ही सुरा-पानादि की ओर प्रवृत्त होता है, जब तक कि सुरा-पानादि की अनर्थकारिता का ज्ञान नहीं होता । उसकी
| १७४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४ |
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तस्मात्पुरुषार्थानुपयोग्युपाख्यानादिभूतार्थवादविषयमानर्थक्याभिधानं द्रष्टव्यम् ।
यदप्युक्तम्—कर्तव्यविध्यनुप्रवेशमन्तरेण वस्तुमात्रमुच्यमानमनर्थकं स्यात्, 'सप्तद्वीपा वसुमती' इत्यादिवदिति, तत्परिहृतम्, 'रज्जुरियं नायं सर्पः' इति वस्तुमात्रकथनेऽपि प्रयोजनस्य दृष्टत्वात् । ननु श्रुतब्रह्मणोऽपि यथापूर्वं संसारित्वदर्शनान्न रज्जुस्वरूपकथनवदर्थवत्त्वमित्युक्तम्, अत्रोच्यते—नावगतब्रह्मात्मभावस्य यथापूर्वं
भामती
मुद्धृत्य दग्धेन्धनाग्निवत् स्वयमेवोपशाम्यति । एतदुक्तं भवति—यथा प्रासादावस्थानकारणं स्तम्भो नैवमौदासीन्यावस्थानकारणमभावबुद्धिः, अपि त्वागन्तुकाविनाशहेतोस्त्राणेनावस्थानकारणम् । यथा कमठपृष्ठनिष्ठुरः कवचः शस्त्रप्रहारत्राणेन राजन्यजीवावस्थानहेतुः । न च कवचापगमे चासति च शस्त्रप्रहारे राजन्यजीवनाश इति । उपसंहरति ॐ तस्मात्प्रसक्तक्रियानिवृत्त्यौदासीन्यमेव इति ॐ । औदासीन्यमजानतोऽप्यस्तीति प्रसक्तक्रियानिवृत्त्योपलक्ष्य विशिनष्टि । तत् किमक्रियार्थत्वेनानर्थक्यमाशङ्क्य क्रियार्थत्वोपवर्णनं जैमिनीयमसमञ्जसमेवेत्युपसंहारव्याजेन परिहरति ॐ तस्मात् पुरुषार्थं इति ॐ । पुरुषार्थानुपयोग्युपाख्यानादिविषयावक्रियार्थतया क्रियार्थतया च पूर्वोत्तरपक्षौ, न तूपनिषद्विषयौ । उपनिषदां स्वयम्पुरुषार्थब्रह्मरूपावगमपर्यवसानादित्यर्थः । यदप्यौपनिषदात्मज्ञानमपुरुषार्थं मन्यमानेनोक्तं कर्तव्यमनुप्रवेशमन्तरेणेति । अत्र निगूढाभिसन्धिः पूर्वोक्तं परिहारं स्मारयति ॐ तत् परिहृतम् इति ॐ । अत्राक्षेप्ता स्वोक्तमर्थं स्मारयति ॐ ननु श्रुतब्रह्मणोऽपि इति ॐ ।
निगूढमभिसन्धि समाधातोद्घाटयति ॐ अत्रोच्यते । नावगतब्रह्मात्मभावस्य इति ॐ । सत्यं न
भामती-व्याख्या
अनर्थकारिता का ज्ञान प्रवृत्ति का समूल नाश करके जिसका ईन्धन समाप्त हो गया, उस अग्नि के समान स्वयं उपशान्त हो जाता है । आशय यह है कि जैसे भवन की अवस्थिति का कारण खम्भा होता है, वैसे उक्त अभाव-ज्ञान औदासीन्य के अवस्थान का कारण नहीं माना जाता, अपितु आगन्तुक विनाश-कारणों से रक्षण-प्रदान कर औदासीन्य को वैसे ही अभाव-ज्ञान बनाए रहता है, जैसे कछुवे की पीठ के समान कठोर कवच शस्त्र-प्रहारों से बचाता हुआ क्षत्रिय-वीरों को जीवन-प्रदान करता है । शस्त्र-प्रहार से योद्धा का जीवन तब तक नष्ट नहीं होता, जब तक कि कवच का अपगम (अभाव) न हो । प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं—"तस्मात् प्रसक्तक्रियानिवृत्त्यौदासीन्यमेव 'ब्राह्मणो न हन्तव्यः' इत्यादिषु प्रतिषेधार्थं मन्यामहे" । औदासीन्य का ज्ञान न रहने पर भी औदासीन्य रहता है, उस अज्ञात औदासीन्य का संग्रह करने के लिए 'प्रसक्तक्रियानिवृत्त्या उपलक्षितम्' कहा गया है । तब 'वैदिकवाक्यों में क्रियापरता न होने पर आनर्थक्य (अप्रामाण्य) की आशङ्का उठाकर महर्षि जैमिनि ने जो सभी वैदिक वाक्यों में क्रियार्थत्व का वर्णन किया, वह किस लिए ?' इस प्रश्न का उत्तर है—"तस्मात् पुरुषार्थानुपयोग्युपाख्यानादिभूतार्थवादविषयमानर्थक्याभिधानं द्रष्टव्यम्" । निष्कर्ष यह है कि पुरुषार्थानुपयोगी वैदिक उपाख्यानों में ही अक्रियार्थत्व का पूर्वपक्ष उठाकर क्रियार्थकत्व का सिद्धान्त उक्त अधिकरण में प्रस्तुत किया गया है, न कि उपनिषद्वाक्यों को अभिलक्ष्य करके, क्योंकि उपनिषद्वाक्यों में स्वयं पुरुषार्थभूत ब्रह्म के स्वरूप की समर्पकता पर्यवसित होती है । औपनिषद आत्मज्ञान को अपुरुषार्थ मानकर जो पूर्वपक्षी ने कहा है—"कर्तव्यविध्यनुप्रवेशमन्तरेण वस्तुमात्रमुच्यमानमनर्थकं स्यात्" । उसका अपने हृदय में रहस्य छिपाये सिद्धान्ती उसके परिहार का स्मरण दिलाता है—"तत् परिहृतम्" । आक्षेपवादी भी उक्त परिहार पर किये गये आक्षेप का स्मरण दिलाता है—"ननु श्रुतब्रह्मणोऽपि यथापूर्वंंसंसारित्वदर्शनात्" । सिद्धान्ती इस आक्षेप का अपना अनुभूत परिहार प्रस्तुत करता है—"अत्रोच्यते,
श्रुतब्रह्मणो विशेषः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १७५
संसारित्वं शक्यं दर्शयितुं, वेदप्रमाणजनितब्रह्मात्मभावविरोधात् । न हि शरीराद्यात्मा- भिमानिनो दुःखभयादिमत्त्वं दृष्टमिति तस्यैव वेदप्रमाणजनितब्रह्मात्मावगमे तदभि- माननिवृत्तौ तदेव मिथ्याज्ञाननिमित्तं दुःखभयादिमत्त्वं भवतीति शक्यं कल्पयितुम् । न हि धनिनो गृहस्थस्य धनाभिमानिनो धनापहारनिमित्तं दुःखं दृष्टमिति तस्यैव प्रव्रजितस्य धनाभिमानरहितस्य तदैव धनापहारनिमित्तं दुःखं भवति । न च कुण्ड- लिनः कुण्डलत्वाभिमाननिमित्तं सुखं दृष्टमिति तस्यैव कुण्डलवियुक्तस्य कुण्डलित्वा- भिमानरहितस्य तदेव कुण्डलत्वाभिमाननिमित्तं सुखं भवति । तदुक्तं श्रुत्या — ‘अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः’ ( छान्दो० ८।१२।१ ) इति । शरीरे पतितेऽ- शरीरत्वं स्यात् , न जीवत इति चेत् – न, सशरीरत्वस्य मिथ्याज्ञाननिमित्तत्वात् । न ह्यात्मनः शरीरात्माभिमानलक्षणं मिथ्याज्ञानं मुक्त्वाऽन्यतः सशरीरत्वं शक्यं कल्प- यितुम् । नित्यमशरीरत्वमकर्मनिमित्तत्वादित्यवोचाम । तत्कृतधर्माधर्मनिमित्तं सशरी-
भामती
ब्रह्मज्ञानमात्रं सांसारिकधर्मनिवृत्तिकारणमपि तु साक्षात्कारपर्यन्तम् । ब्रह्मसाक्षात्कारश्चान्तःकरणवृत्ति- भेदः श्रवणमननादिजनितसंस्कारसचिवमनोजन्मा षड्जादिभेदसाक्षात्कार इव गान्धर्वशास्त्रश्रवणाभ्यास- संस्कृतमनोयोनिः । स च निखिलप्रपञ्चमहेन्द्रजालसाक्षात्कारं समूलमुन्मूलयन्नात्मानमपि प्रपञ्चत्वाविशेषा- दुन्मूलयतीत्युपपादितमधस्तात् । तस्माद्रज्जुस्वरूपकथनतुल्यतैवात्रेति सिद्धम् । अत्र च वेदप्रमाणमूलतया वेदप्रमाणजनितेत्युक्तम् । अत्रैव सुखदुःखानुत्पादभेदेन निदर्शनद्वयमाह ॐ न हि धनिनः इति ॐ । श्रुति- मत्रोदाहरति ॐ तदुक्तम् इति ॐ । चोदयति । ॐ शरीरे पतिते इति ॐ । परिहरति ॐ न सशरीरत्वस्य इति ॐ । यदि वास्तवं सशरीरत्वं भवेन्न जीवतस्तन्निवर्तेत । मिथ्याज्ञाननिमित्तं तु तत् । तच्चोत्पन्न- तत्त्वज्ञानेन जीवतापि शक्यं निवर्त्तयितुम् । यत्पुनरशरीरत्वं तदस्य स्वभाव इति न शक्यं निवर्त्तयितुं, स्वभावहानेन भावविनाशप्रसङ्गादित्याह ॐ नित्यमशरीरत्वम् इति ॐ ।
भामती-व्याख्या
'नावगतब्रह्माभावस्य यथापूर्वं संसारित्वम्' । यह सत्य है कि ब्रह्मभाव का ज्ञानमात्र कर्तृत्वादि- रूप संसारित्व का निवर्तक नहीं होता, अपि तु साक्षात्कारात्मक ब्रह्मात्मावबोध अविद्या और अविद्या-प्रयुक्त संसारित्व का बाधक माना जाता है। वह साक्षात्कार श्रवण-मननादि-जनित संस्कारों से युक्त मन के द्वारा वैसे ही उत्पन्न होता है, जैसा कि गन्धर्व-शास्त्राभ्यास-जनित संस्कारों से युक्त मन के द्वारा षड्जादि स्वर समूह का साक्षात्कार समुत्पादित होता है। वह साक्षात्कार निखिल प्रपञ्चरूपी इन्द्रजाल के साक्षात्कार का समूल उन्मूलन करता हुआ अपने आपको भी प्रपञ्च के रूप में नष्ट करता है, यह पहले कहा जा चुका है। अतः रज्जु-स्वरूप-संकीर्तन के समान ही तत्त्वमसि आदि का उद्बोधन सार्थक है। उक्त साक्षात्कार वेदप्रमाणमूलक होने के कारण वेदप्रमाण-जनित कह दिया गया है। प्रस्तुत प्रसङ्ग में सुख और दुःख का अनुत्पाद ध्यान में रखकर दो उदाहरण दिये जाते हैं—"न हि धनिनः इत्यादि"। उसी प्रसङ्ग में श्रुति को उद्धृत किया जाता है—"तदुक्तं श्रुत्या"। शङ्का की जाती है कि "शरीरे पतिते अशरीरत्वं स्यात्"। उक्त शङ्का का परिहार किया जाता है—"न, सशरीरत्वस्य मिथ्याज्ञाननिमित्तत्वात्"। अर्थात् यदि आत्मा में सशरी- रत्व वास्तविक होता, तब अवश्य ही जीवन-काल में निवृत्त नहीं हो सकता था, किन्तु वह मिथ्याज्ञाननिमित्तक है, अतः जीवन-काल में ही अविद्या या मिथ्या ज्ञान की निवृत्ति से निवृत्त क्यों न होगा ? जो अशरीरत्व आत्मा में स्वाभाविक है, वह कभी निवृत्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि स्वभाव का परिहरण हो जाने पर भाव वस्तु का ही विनाश प्रसक्त होता
१७६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४
ृत्वमिति चेन्न; शरीरसंबन्धस्यासिद्धत्वाद्धर्माधर्मयोरात्मकृतत्वासिद्धेः । शरीरसंबन्धस्य धर्माधर्मयोस्तत्कृतत्वस्य चेतरेतराश्रयत्वप्रसङ्गादन्धपरंपरैषाऽनादित्वकल्पना । क्रियासमवायाभावाच्चात्मनः कर्तृत्वानुपपत्तेः ।
भामती
स्यादेतत् — न मिथ्याज्ञाननिमित्तं सशरीरत्वमपि तु धर्माधर्मनिमित्तं, तच्च स्वकारणधर्माधर्मनिवृत्तिमन्तरेण न निवर्त्तते । तन्निवृत्तौ च प्रयाणमेवेति न जीवतोऽशरीरत्वमिति शङ्कते ॐ तत्कृत इति ॐ । तदित्यात्मानं परामृशति । निराकरोति ॐ न, शरीरसम्बन्धस्य इति ॐ । न तावदात्मा साक्षाद्धर्माधर्मौ कर्तुमर्हति, वाग्बुद्धिशरीरारम्भजनितौ हि तौ नासति शरीरसम्बन्धे भवतः, ताभ्यां तु शरीरसम्बन्धं रोचयमानो व्यक्तं परस्पराश्रयदोषमावहति । तदिदमाह ॐ शरीरसम्बन्धस्य इति ॐ । यद्युच्येत सत्यमस्ति परस्पराश्रयः, न त्वेष दोषोऽनादित्वाद्वीजाङ्कुरवदित्यत आह ॐ अन्धपरम्परेषाऽनादित्वकल्पना ॐ । 'यस्तु मन्यते नेयमन्धपरम्परातुल्यानादिता, न हि यतो धर्माधर्मभेदा आत्मशरीरसम्बन्धभेदस्तत एव स धर्माधर्मभेदः, किन्त्वेष पूर्वस्मादात्मशरीरसम्बन्धात् पूर्वधर्माधर्मभेदजन्मनः, एष त्वात्मशरीरसम्बन्धोऽस्माद्धर्माधर्मभेदादिति' तं प्रत्याह ॐ क्रियासमवायाभावाद्" इति ।
भामती-व्याख्या
है, यह कहा जाता है—"नित्यमशरीरत्वमकर्मनिमित्तत्वादित्यवोचाम"। कोई शङ्का करता है कि सशरीरत्व मिथ्याज्ञाननिमित्तक नहीं, अपितु धर्माधर्मनिमित्तक है, अतः स्वकृत धर्माधर्म की निवृत्ति के बिना वह निवृत्त नहीं हो सकता और धर्माधर्म की निवृत्ति हो जाने पर मरण ही हो जाता है, अतः जीवित अवस्था में अशरीरत्व नहीं रह सकेगा—"तत्कृतधर्माधर्मनिमित्तं सशरीरत्वम्"। 'तत्कृत' शब्द का अर्थ है—आत्मकृत। केवल जड़ या शुद्ध चेतन के द्वारा धर्माधर्म नहीं किया जाता, अपितु शरीर-संहत आत्मा के द्वारा। उक्त शङ्का का निराकरण किया जाता है—'न शरीरसम्बन्धस्यासिद्धत्वात्'। आत्मा साक्षात् धर्माधर्म नहीं कर सकता, क्योंकि वाक्, बुद्धि और शरीर के द्वारा ही धर्माधर्म सम्पादित होते हैं, अतः शरीर-सम्बन्धी आत्मा ही धर्माधर्म का कर्त्ता माना जाता है। शरीर का आत्मा के साथ सम्बन्ध धर्माधर्म के माध्यम से ही होता है, इस प्रकार अन्योऽन्याश्रयता प्रसक्त होती है, भाष्यकार कहते हैं—"शरीरसम्बन्धस्य धर्माधर्मयोस्तत्कृतत्वस्य चेतरेतराश्रयत्वप्रसङ्गात्"। यह जो कहा जाता है कि अन्योऽन्याश्रय दोष अवश्य है, किन्तु यहाँ वह कोई दोष नहीं, क्योंकि बीज और अंकुर के समान शरीर-सम्बन्ध और धर्माधर्म अनादि हैं, अनादि पदार्थों में अन्योऽन्याश्रय दोष नहीं माना जाता। उसका परिहार किया जाता है—अन्धपरम्परैषा अनादित्वकल्पना।" अर्थात् यह अनादित्व की कल्पना प्रामाणिक नहीं। जो वादी इस कल्पना को प्रामाणिक मान कर कहता है कि यह अनादित्व-कल्पना अन्ध-परम्परा के समान नहीं, क्योंकि धर्माधर्म और शरीर-सम्बन्ध—दोनों एक-एक व्यक्त्यात्मक न होकर अनन्त व्यक्तिरूप माने जाते हैं। जिस धर्माधर्म व्यक्ति से शरीर-सम्बन्धरूप व्यक्ति उत्पन्न होती है उसी शरीर-सम्बन्ध व्यक्ति से वही धर्माधर्म व्यक्ति उत्पन्न नहीं होती, अपितु जो शरीर-सम्बन्ध जिस धर्माधर्म से उत्पन्न होता है, वही शरीर-सम्बन्ध उसी धर्माधर्म से उत्पन्न नहीं होता, अपितु अपनी पूर्वभावी भिन्न-भिन्न कारण व्यक्तियों से भिन्न-भिन्न कार्य व्यक्तियाँ जन्म लेती हैं, अतः अन्योऽन्याश्रयता प्रसक्त ही नहीं होती। उस वादी के लिए अन्य आपत्ति प्रदर्शित की जाती है—"क्रियासमवायाभावाच्चात्मनः कर्तृत्वानुपपत्तेः"। जिस कार्य की जनिका क्रिया जिस द्रव्य में समवेत हो, वही द्रव्य उस क्रिया का कर्त्ता माना जाता है, आत्मा में कोई भी क्रिया नहीं रहती, क्योंकि क्रिया अपने आश्रय को अवश्य विकृत कर देती है, आत्मा अविकारी पदार्थ है,
अहंप्रतीतेर्गौणत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंचालितम् १७७
संनिधानमात्रेण राजप्रभृतीनां दृष्टं कर्तृत्वमिति चेन्न; धनदानाद्युपार्जितभृत्य-संबन्धित्वात्तेषां कर्तृत्वोपपत्तेः, न त्वात्मनो धनदानादिवच्छरीरादिभिः स्वस्वामि-संबन्धनिमित्तं किंचिच्छक्यं कल्पयितुम्। मिथ्याभिमानस्तु प्रत्यक्षः संबन्धहेतुः। एतेन यजमानत्वमात्मनो व्याख्यातम्।
अत्राहुः—देहादिव्यतिरिक्तस्यात्मन आत्मीये देहादावभिमानो गौणो, न मिथ्येति चेन्न; प्रसिद्धवस्तुभेदस्य गौणत्वमुख्यत्वप्रसिद्धेः। यस्य हि प्रसिद्धो वस्तुभेदः,
भामती
शङ्कते ॐ संनिधानमात्रेण इति ॐ। परिहरति ॐ न इति ॐ। उपार्जनं स्वीकरणम्। न त्वियं विधाऽऽत्मनीत्याह ॐ न त्वात्मन इति ॐ। ये तु देहादावात्माभिमानो न मिथ्या, अपि तु गौणो माणवकादाविव सिंहाभिमान इति मन्यन्ते; तन्मतमुपन्यस्य दूषयति ॐ अत्राहुः इति ॐ। प्रसिद्धो वस्तु-भेदो यस्य पुरुषस्य स तथोक्तः। उपपादितं चैतदस्माभिरध्यासभाष्ये इति नेहोपपाद्यते। यथा मन्दान्धकारे
भामती-व्याख्या
अतः धर्माधर्म का कर्त्ता आत्मा नहीं हो सकता।
क्रिया-समवाय न होने पर भी कर्तृत्व की शङ्का उठाई जा रही है—"संनिधानमात्रेण राजप्रभृतीनां कर्तृत्वं दृष्टम्"। राजा में युद्धादि क्रिया न होने पर भी राजा भी युद्धादि का कर्त्ता माना जाता है, वैसे ही आत्मा में कोई क्रिया न होने पर भी धर्माधर्मादि का कर्तृत्व माना जा सकता है, [ जैसा कि श्री कुमारिल भट्ट कहते हैं—
"चालनेन ह्यसिं योद्धा प्रयुङ्क्ते छेदनं प्रति।
सेनापतिस्तु वाचैव भृत्यानां विनियोजकः ॥
राजा सन्निधिमात्रेण विनियुङ्क्ते कदाचन।
तस्मादचलतोऽपि स्याच्चलने कर्तृतात्मनः ॥" (श्लो. वा. पृ. ७१०)]।
जैसे युद्ध करनेवाले पुरुषों का सन्निधान पाकर राजा युद्धादि का कर्त्ता माना जाता है, वैसे ही धर्माधर्म के कर्त्ता शरीरादि का सन्निधान पाकर आत्मा भी धर्मादि का कर्त्ता माना जा सकता है। सन्निधान-प्रयुक्त कर्तृत्व का आत्मा में निराकरण करते हुए भाष्यकार ने कहा है—"न, धनदानाद्युपार्जितभृत्यसम्बन्धित्वात्"। उपार्जन का यहाँ अर्थ है—स्वीकार। राजा और उसके भृत्यों में धन-दान-प्रयुक्त जो स्वस्वामिभाव सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, उस सम्बन्ध को लेकर भृत्य का कर्तृत्व राजा में संक्रान्त हो जाता है, किन्तु आत्मा और शरीर के मध्य वैसा कोई सम्बन्ध सम्भव नहीं—"नत्वात्मनो धनदानादिवच्छरीरादिभिः स्वस्वामिसम्बन्धनिमित्तं किञ्चित् शक्यं कल्पयितुम्"। राजा और भृत्यों के मध्य में सम्बन्ध स्थापित होने के धनदानादि कई हेतु हो सकते हैं, किन्तु आत्मा और शरीर का जो सम्बन्ध है, उसका एक मात्र प्रत्यक्षभूत मिथ्या अभिमान ही हेतु है, अन्य कोई हेतु नहीं—"मिथ्याभि-मानस्तु प्रत्यक्षः सम्बन्धहेतुः"। यहाँ 'तु' शब्द का अर्थ 'एव' है, अर्थात् 'मिथ्याभिमान एव सम्बन्धहेतुः'। अध्यास को छोड़ कर असङ्ग आत्मा और शरीरादि के सम्बन्ध का नियामक और कोई नहीं हो सकता।
जो लोग ( प्रभाकरगण ) देहादि में आत्माभिमान को मिथ्या न मान कर वैसा ही गौण मानते हैं, जैसा कि माणवकादि में सिंहादि का अभिमान होता है। उनके मत का उपन्यास करके खण्डन किया जाता है, "अत्राहुः—देहादिव्यतिरिक्तस्यात्मन आत्मीये देहादावभिमानो गौणो, न मिथ्येति चेन्न, प्रसिद्धवस्तुभेदस्य गौणत्वमुख्यत्वप्रसिद्धेः"। अर्थात् "अहं गच्छामि"—इत्यादि स्थलों पर शरीरादि में जो 'अहम्' शब्द का प्रयोग है, वह गौण
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१७८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४
यथा केसरादिमानाकृतिविशेषोऽन्वयव्यतिरेकाभ्यां सिंहशब्दप्रत्ययभाङ्मुख्योऽन्यः प्रसिद्धः, ततश्चान्यः पुरुषः प्रायिकैः क्रौर्यशौर्यादिभिः सिंहगुणैः संपन्नः प्रसिद्धः, तस्य पुरुषे सिंहशब्दप्रत्ययौ गौणौ भवतो नाप्रसिद्धवस्तुभेदस्य । तस्य त्वन्यत्रान्यशब्द-प्रत्ययौ भ्रान्तिनिमित्तावेव भवतो न गौणौ । यथा मन्दान्धकारे स्थाणुरयमित्यगृह्य-माणविशेषे पुरुषशब्दप्रत्ययौ स्थाणुविषयौ, यथा वा शुक्तिकायामकस्माद्रजतमिदमिति
भामती
स्थाणुरयमित्यगृह्यमाणविशेषे वस्तुनि पुरुषात्सांशयिकौ पुरुषशब्दप्रत्ययौ स्थाणुविषयौ, तत्र तु पुरुषत्वम-नियतमपि समारोपितमेव । एवं संशये समारोपितमनिश्चितमुदाहृत्य विपर्ययज्ञाने निश्चितमुदाहरति ॐ यथा वा शुक्तिकायाम् इति ॐ । शुक्लभास्वरस्य द्रव्यस्य पुरःस्थितस्य सति शुक्तिकारजतसाधारण्ये यावदत्र रजतविनिश्चयो भवति तावत् कस्माच्छुक्तिविनिश्चय एव न भवति ? संशयो वा द्वेधा युक्तः, समानधर्मोपदर्शनाद्' उपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातो विशेषद्वयस्मृतेश्च संस्कारोन्मेषहेतोः, सादृश्यस्य द्विष्टत्वेनोभयत्र तुल्यमेतदिति । अत उक्तम् ॐ अकस्मात् इति ॐ । अनेन दृष्टस्य हेतोः समानत्वेऽप्यदृष्टं
भामती-व्याख्या
नहीं माना जा सकता, क्योंकि गौण व्यवहार उसी पुरुष का माना जाता है, जिसको गौण (माणवकादि) और मुख्य (सिंहादि) वस्तुओं का भेद निश्चित हो, प्रकृत में शरीरादि से भिन्न आत्मतत्त्व का स्वरूप ही स्थिर नहीं, अतः गौण-प्रयोग सम्भव नहीं, जैसा कि विगत पृ. १३ पर कहा जा चुका है कि “न त्वहंकारस्य मुख्योऽर्थो निर्लुंठितगर्भतया देहादिभ्यो भिन्नोऽनुभूयते, येन परशब्दः शरीरादौ गौणो भवेत्” । अतः यहाँ उसका पिष्ट-पेषण करना उचित नहीं। जिस पुरुष की दृष्टि में गौण और मुख्य पदार्थों का भेद स्थिर नहीं हुआ, उसके लिए अन्य शब्द का अन्यत्र प्रयोग गौण नहीं होता, जैसे कि मन्द अन्धकार में 'स्थाणुरयम्' — इस प्रकार का भेद-भान जिस वस्तु में नहीं हुआ, उस वस्तु में 'पुरुष' शब्द और पुरुष-प्रतीति दोनों गौण नहीं, अपितु भ्रान्तिमूलक होते हैं। यद्यपि शुक्ति में रजतत्व के समान स्थाणु में पुरुषत्व का निश्चय नहीं, संशय होता है। तथापि संशय में पाक्षिक समारोप होने के कारण संशय को भी भ्रम या अप्रमारूप ही माना जाता है। स्थाणु में पुरुषत्वरूप समारोपित पदार्थ निश्चित नहीं, अतः निश्चित समारोपित का उदाहरण दिखाते हैं— “यथा वा शुक्तिकायाम-कस्माद् रजतमदमिति निश्चितौ शब्दप्रत्ययौ”। [यहाँ 'अकस्मात्' शब्द का अर्थ 'कारण के विना'—ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि विपर्यय ज्ञान का भी अपना कारण निश्चित होता है, जैसा कि पहले कहा जा चुका है। अतः 'अकस्मात्' शब्द से दृष्ट कारण का निषेध करना अभीष्ट है। यहाँ जब कि शुक्लभास्वर (एक चमकीला) पदार्थ सामने है, जो कि शुक्ति और रजत का एक साधारण रूप है, तब जैसे 'रजतमिदम्'—ऐसा निश्चय होता है, वैसे ही 'शुक्तिरियम्' ऐसा निश्चय क्यों नहीं हो जाता ? अथवा उभय-साधारण धर्मी को देख कर संशय क्यों नहीं होता ? न्यायसूत्र में महर्षि गौतम ने संशय का लक्षण बताया है— “समानानेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषापेक्षो विमर्शः संशयः” (न्या. सू. १।१।२३)। संशय के कारण हैं—(१) समान (सादृश्य) धर्मवाले धर्मी का दर्शन (२) असाधारण धर्मवाले धर्मी का दर्शन, (३) विप्रतिपत्ति से (विपरीताथार्भिधायी वाक्यों को सुन कर), (४) एक वस्तु की उपलब्धि की अव्यवस्था और (५) अनुपलब्धि की अव्यवस्था। इनमें प्रथम और चतुर्थ—इन दो कारणों के आधार पर द्वेधा संशय होना चाहिए, किन्तु यहाँ न तो शुक्ति का निश्चय होता है और न संशय, अतः भाष्यकार ने "अकस्मात्" कहा है, जिसका अर्थ है—"अदृष्टविशेषात्"। इस शब्द के प्रयोग से यह