भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवेदान्ते भूतोपदेशः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १६७
भामती
सर्वेषां पदानामास्थिषत, तैरपि ब्राह्मणो न हन्तव्यो न सुरा पातव्येत्यादीनां न कार्यपरता शक्याऽऽस्थातुम् । कृत्युपहितमर्थ्यादं हि कार्यं कृत्या व्याप्तं तन्निवृत्तौ निवर्त्तते शिंशपात्वमिव वृक्षत्वनिवृत्तौ । कृतिर्हि पुरुषप्रयत्नः, स च विषयाधीननिरूपणः । विषयश्चास्य साध्यस्वभावतया भावार्थ एव पूर्वापरीभूतोऽन्योत्पादानुकूलो भवितुमर्हति, न द्रव्यगुणौ । साक्षात् कृतिव्याप्यो हि कृतेर्विषयः, न च द्रव्यगुणयोः सिद्धयोरस्ति कृतिव्याप्यता । अत एव शास्त्रकृद्वचः "भावार्थाः कर्मशब्दास्तेभ्यः क्रिया प्रतीयेत" इति । द्रव्यगुणशब्दानां नैमित्तिकावस्थायां कार्यविमर्शेऽपि भावस्य स्वतो द्रव्यगुणशब्दानां तु भावयोगात् कार्यविमर्श इति भावार्थेभ्य एवापूर्वावगतिर्न द्रव्यगुणशब्देभ्य इति । न च 'दध्ना जुहोति' 'सन्ततमाघारयति' इत्यादिषु द्रव्यादीनां कार्यविषयता । तत्रापि हि होमाधारभावार्थविषयमेव कार्यम् । न चैतावता सोमेन यजेतेतिवत् , दधिसन्ततादिविशिष्टहोमाधारविधानात् 'अग्निहोत्रं जुहोति' 'आधारमभिघारयति' इति तदनुवादः । यद्यप्यत्रापि भावार्थविषयमेव कार्यम् । तथापि भावार्थानुबन्धतया द्रव्यगुणाव-
भामती-व्याख्या
आचार्य भी “ब्राह्मणो न हन्तव्यः”, “न सुरा पातव्या”—इत्यादि निषेध-वाक्यों में कार्यपरत्व का उपपादन नहीं कर सकते, क्योंकि मनुष्य की कृति (प्रयत्न) से साध्य पदार्थ को कार्य कहा जाता है, अतः 'यद् यत्कार्यम्, तत्तत् कृतिसाध्यम्'—इस व्याप्ति के अनुसार कार्य व्याप्य और कृति व्यापक सिद्ध होती है । निषेध-स्थल पर कृतिरूप व्यापक की निवृत्ति हो जाने से कार्यत्व की भी निवृत्ति वैसे ही हो जाती है, जैसे शिंशपात्व की वहाँ निवृत्ति हो जाती है, जहाँ वृक्षत्व नहीं रहता, श्रीधर्मकीर्ति कहते हैं—“व्यापकानुपलब्धिर्यथा नात्र शिंशपा वृक्षाभावात्” (न्या. वि. पृ. १२९) । कृति नाम है—पुरुष के प्रयत्न का, कृति या प्रयत्न का निरूपण उसके विषय पर निर्भर है, कृति का विषय होता है—साध्यस्वरूप धात्वर्थ (पचनादि) श्री प्रभाकर मिश्र भी कहते हैं—“तस्य च विषयाधीनप्रतिपत्तित्वाद्, भावार्थानां विषयबोधकत्वात्” (बृहती पृ. २९७) । धात्वर्थ के लिए निरुक्तकार ने कहा है—“पूर्वापरीभूतं भावमाख्यातेनाचष्टे व्रजति, पचतीत्युपक्रमप्रभृत्यपवर्गपर्यन्तम्” (निरुक्त. पृ. ४) । न्यायभाष्यकार ने पचति का स्वरूप बताते हुए कहा है—“नानाविधा चैकार्था क्रिया पचतीति--स्थाल्यधिश्रयणम्, उदकासेचनम्, तण्डुलावपनम्, एधोऽपसर्पणम्, अग्न्यभिज्वालनम्, दर्वीघट्टनम्, मण्डस्रावणम्, अधोऽवतारणम्” (न्या. भा. पृ. ७४) । पौर्वापरीभूत पाक क्रिया तण्डुलगत विक्लेदन-जनक होती है । यही क्रिया कृति की विषय है, द्रव्य और गुणादि नहीं । महर्षि जैमिनि कहते हैं—“भावार्थाः कर्मशब्दाः, तेभ्यः क्रिया प्रतीयेत" एष ह्यर्थो विधीयते (जै. सू. २।१।१) । प्रभाकर की रीति से सूत्र का अर्थ यह है कि शाब्द बोध के अवसर पर प्रथम क्षण में प्रत्येक पद अपने सम्बन्धी शुद्ध अर्थ का स्मारक और द्वितीय क्षण में कार्यान्वित स्वार्थ का अभिधायक होता है । शुद्ध (अनन्वित) अर्थ को निमित्त और अन्वित (कार्यान्वित) अवस्था को नैमित्तिक कहा जाता है । नैमित्तिक अवस्था में तो द्रव्य, गुणादि के वाचक शब्द भी कार्यार्थक होते हैं, किन्तु शुद्ध अवस्था में केवल भावार्थक (धातु) शब्द ही विषयोपस्थापन के द्वारा कार्य (अपूर्व) का बोधक होता है, अतः यागादि क्रिया के वाचक (भावार्थ) शब्दों से ही क्रिया (अपूर्वरूप कार्य) का अभिधान माना जाता है और उसी (यागादि) का ही विधान किया जाता है ।
शङ्का—जैसे कार्य (अपूर्व) के विषयीभूत यागादि का विधान माना जाता है, वैसे ही “दध्ना जुहोति”, “सन्ततमाघारयति”—इत्यादि स्थलों पर दधिरूप द्रव्य एवं घृत का सन्तत (अटूट धारा के रूप में) क्षरणरूप गुण भी कार्य (अपूर्व) के विषय या अवच्छेदक