भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४
भामती
विषयावपि विधीयेते। भावार्थो हि कारकव्यापारमात्रतयाऽविशिष्टः कारकविशेषेण द्रव्यादिना विशेष्यत इति द्रव्यादस्तदनुबन्धः। तथा च भावार्थे विधीयमाने स एव सानुबन्धो विधीयत इति द्रव्यगुणाव-विषयावपि तदनुबन्धतया विहितौ भवतः। एवं च भावार्थप्रणालिकया द्रव्यादिसङ्क्रान्तो विधिर्गौरवाद् बिभ्यत् स्ववविषयस्य चान्यतः प्राप्तत्या तदनुवादेन तदनुबन्धीभूतद्रव्यादिपरो भवतीति सर्वत्र भावार्थ-विषय एव विधिः। एतेन यदाग्नेयोऽष्टाकपालो भवतीत्यत्र सम्बन्धविषयो विधिरिति परास्तम्। ननु न भवत्यर्थो विधेयः, सिद्धे भवितरि लब्धरूपस्य भवनं प्रत्यकर्तृत्वात्। न खलु गगनं भवति। नाप्यसिद्धेऽ-सिद्धस्यानियोज्यत्वाद्, गगनकुसुमवत्। तस्माद् भवनेन प्रयोज्यव्यापारेणाक्षिप्तः प्रयोजकस्य भावयितु-र्व्यापारो विधेयः। स च व्यापारो भावना कृतिः प्रयत्न इति। निर्विषयश्चासाववश्यप्रतिपत्तिरतो विषया-पेक्षायामाग्नेयशब्दोपस्थापितो द्रव्यदेवतासम्बन्ध एवास्य विषयः। ननु व्यापारविषयः पुरुषप्रयत्नः कथमव्यापाररूपं सम्बन्धं गोचरयेत्। नहि घटं कुर्वित्यत्रापि साक्षाक्षात्मार्थं घटं पुरुषप्रयत्नो गोचरयत्यपि
भामती-व्याख्या
होते हैं, अतः उनका भी विधान क्यों न किया जाय ?
समाधान— वहाँ भी जुहोत्यर्थ (होम) और आधार (क्षारण) रूप भावार्थ ही कार्य का विषय माना जाता है, अतः साक्षात् विषय का ही विधान न्याय-संगत है।
शङ्का— यदि दध्यादि में भी भावार्थ का ही विधान होता है, तब जैसे "सोमेन यजेत" (तै. सं. ३।२।२) इस वाक्य के द्वारा सोम-विशिष्ट याग का विधान होता है, वैसे ही "दध्ना जुहोति" और "सन्ततमाघारयति" इत्यादि वाक्य भी क्रमशः होम और आधार कर्म के विधायक हो जाएँगे और "अग्निहोत्रं जुहोति" (तै. सं. १।५।९।१) एवं "आधार-माघारयति" (तै. सं. २।५।११।६) इन दोनों वाक्यों को क्रमशः होम और आधार का अनुवादक मानना पड़ेगा।
समाधान— यद्यपि यहाँ पर भी कार्य (अपूर्व) भावार्थविषयक ही है, तथापि भावार्थ के विशेषक होने के कारण कार्य के अविषयीभूत भी द्रव्य और गुण विहित हो जाते हैं। द्रव्यादि से विशिष्ट भावार्थ का विधान गौरव-ग्रस्त होता है, अतः विशिष्ट-विधान वहाँ ही अगत्या माना जाता है, जहाँ वाक्यान्तर से कर्म का विधान न हो सकता हो, अग्निहोत्रं जुहोति-इत्यादि वाक्यों के द्वारा विहित भावार्थ के अनुवाद से "दध्ना जुहोति", "पयसा जुहोति"-इत्यादि वाक्यों के द्वारा केवल दध्यादि गुण का विधान मानने में ही लाघव होता है। "सोमेन यजेत"—यहाँ पर कोई वाक्यान्तर ऐसा उपलब्ध नहीं होता जो केवल भावार्थ का विधायक माना जा सके, अतः वहाँ अगत्या विशिष्ट विधान मानना पड़ता है, किन्तु प्रकृत में वैसा नहीं। फलतः सिद्धार्थ कहीं पर भी साक्षाद् विधेय नहीं होता, अपितु भावार्थ ही विधेय होता है। अत एव जो लोग "यदाग्नेयोऽष्टाकपालो भवति" (तै. सं. २।६।३३) यहाँ पर द्रव्य के साथ अग्न्यादि देवताओं के सम्बन्धमात्र का विधान मानते थे, उनका निराकरण हो जाता है, क्योंकि सम्बन्ध पदार्थ भी द्रव्यादि के समान सिद्धार्थ है, अतः वह साक्षाद् विधेय नहीं हो सकता।
शङ्का— उक्त स्थल पर यदि द्रव्य-देवता का सम्बन्ध विधीयमान नहीं, तब किसका विधान होता है? 'भवति' धातु के अर्थभूत भवन का विधान नहीं हो सकता, क्योंकि भवत्यर्थ का कर्त्ता सिद्ध है? अथवा असिद्ध? प्रथम कल्प में विधि ही व्यर्थ है, द्वितीय कल्प में कर्त्तारूप नियोज्य असिद्ध होने के कारण विधित्व सम्भव नहीं। परिशेषतः भवनरूप प्रयोज्य-व्यापार के द्वारा प्रयोजक के व्यापार का आक्षेप होता है, क्योंकि घटादिरूप