भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनिषेधवाक्येषु कार्याभावः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १६९
भामती
तु दण्डादि हस्तादिना व्यापारयति। तस्माद् घटार्थी कृतिं व्यापारविषयामेव प्रतिपद्यते, न तु रूपतो घटविषयाम्, उद्देश्यतया त्वस्यामस्ति घटो न तु विषयतया, विषयतया तु हस्तादिव्यापार एव। अत एवाग्नेय इत्यत्रापि द्रव्यदेवतासम्बन्धाक्षिप्तो यजिरेव कार्यविषयो विधेयः। किमुक्तं भवति आग्नेयो भवतीति, आग्नेयेन यागेन भावयेदिति। अत एव 'य एवं विद्वान् पौर्णमासीं यजते', 'य एवं विद्वानमावास्यां यजते' इत्यनुवादो भवति यदाग्नेय इत्यादिविहितस्य यागषट्कस्य। अत एव च विहितानुष्ठितस्य तस्यैव दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेतेत्यधिकारसम्बन्धः। तस्मात् सर्वत्र कृतिप्रणालिकया भावार्थविषय एव विधिरित्येकान्तः। तथा च न हन्यान्न पिबेदित्यादिषु यदि कार्यमभ्युपेयेत ततस्तद्व्यापिका कृतिरुपेयेत। तद्व्यापकश्च भावार्थो विषयः। एवञ्च प्रजापतिव्रतन्यायेन पर्युदासवृत्त्याऽहननापानसङ्कल्पलक्षण्या तद्विषयो विधिः स्यात्। तथा च प्रसज्यप्रतिषेधो दत्तजलाञ्जलिः प्रसज्येत। न च सति
भामती-व्याख्या
उत्पद्यमान या प्रयोज्य का भवनरूप व्यापार तब तक सम्भव नहीं होता, जब तक प्रयोजक (उत्पादक) का भावन या उत्पादन व्यापार न हो। प्रयोजक के व्यापार को ही भावना, कृति या प्रयत्न कहा जाता है। निर्विषयक कृति की प्रतिपत्ति नहीं हो सकती, अतः विषय की आकांक्षा में 'आग्नेय' शब्द के द्वारा उपस्थापित द्रव्य-देवता का सम्बन्ध ही विषय ठहरता है, अतः उसे ही यहाँ विधेय मानना चाहिए।
समाधान—कृति या प्रयत्न सदैव क्रिया को ही विषय करता है, सम्बन्ध क्रिया रूप नहीं, अतः उसको विषय क्योंकर करेगा? जैसे कि "घटं कुरु"—ऐसे प्रयोग में कृतिरूप पुरुष-प्रयत्न घटादि सिद्ध पदार्थों को साक्षात् विषय नहीं कर सकता, अपितु वैसी आज्ञा सुनते ही पुरुष तुरन्त दण्डादि के द्वारा चाक घुमाने लग जाता है, अतः घटोत्पत्ति के अनुकूल कृति का उत्पादनादि व्यापार विषय माना जाता है, स्वरूपतः घटादि नहीं, क्योंकि 'घटं करोति'—इसका अर्थ होता है—'घटाय चक्रं व्यापारयति'। घट उस कृति का केवल उद्देश्य होता है, विषय नहीं। कृति का साक्षात् विषय तो हस्त, दण्ड और चक्रादि का व्यापार ही होता है। अत एव 'आग्नेयः' यहाँ पर भी द्रव्य-देवता-सम्बन्ध के द्वारा आक्षिप्त याग ही विधेय होता है। 'आग्नेयो भवति'—इस वाक्य का अर्थ होता है—'आग्नेयेन यागेनेष्टं भावयेत्'। इसीलिए "य एवंविद्वान् पौर्णमासीं यजते" (तै. सं. १।६।११।१)। "य एवंविद्वानमावास्यां यजते"—ये दोनों वाक्य आग्नेयादि याग के अनुवादक माने जाते हैं ['यदाग्नेयो भवति'—इत्यादि वाक्यों से पूर्णिमा में विहित 'आग्नेय', 'उपांशुयाज' और 'आग्नीषोमीय'—इन तीन यागों का 'पौर्णमासी' पद और अमावास्या में विहित 'आग्नेय' 'ऐन्द्र दधि' और 'ऐन्द्र पयः'—इन तीन कर्मों का अनुवाद 'अमावास्या'—पद के द्वारा माना जाता है, जिससे कि 'दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत'—इस अधिकार-वाक्य में द्विवचन की उपपत्ति हो जाती है। कर्म का फलविशेष के साथ सम्बन्ध-ज्ञान करानेवाले वाक्य को अधिकार-वाक्य कहा जाता है। फलतः सर्वत्र कृति के माध्यम से भावार्थ को ही विधि विषय किया करती है—ऐसा ऐकान्तिक नियम है। अतः "न हन्यात्", "न पिबेत्"—इत्यादि वाक्यों में यदि कोई कार्य माना जाता है, तब उसकी व्यापकीभूत कृति माननी होगी और कृति का व्यापक होता है—भावार्थरूप विषय। यदि यह सब कुछ मान लिया जाता है, तब उक्त वाक्यों से निषेध न होकर 'प्रजापति-व्रत-न्याय' (जै. सू. ४।१।३-९) के आधार पर 'अहनन' और 'अपानादि विषयक सङ्कल्प में उसकी लक्षणा मानकर उक्त सङ्कल्पविषयक विधि का उपपादन किया जायगा। तब तो सर्वत्र पर्युदास वृत्ति को अपनाकर प्रसज्य प्रतिषेध को तिलाञ्जलि ही देनी
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