भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 188, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें| १७० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४ |
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'ब्राह्मणो न हन्तव्यः' इत्येवमाद्या निवृत्तिरुपदिश्यते । न च सा क्रिया । नापि क्रियासाधनम् । अक्रियार्थानामुपदेशोऽनर्थकश्चेत् 'ब्राह्मणो न हन्तव्यः' इत्यादिनिवृत्त्युपदेशानामानर्थक्यं प्राप्तम् । तच्चानिष्टम् । न च स्वभावप्राप्तहन्त्यर्थानुरागेण नञः
भामती
सम्भवे लक्षणा न्याय्या । नेक्षेतोद्यन्तमित्यादौ तु तस्य व्रतमित्यधिकारात् प्रसज्यप्रतिषेधासम्भवेन पर्युदासवृत्त्याऽनीक्षणसङ्कल्पलक्षणा युक्ता । तस्मान्न हन्यान्न पिबेदित्यादिषु प्रसज्यप्रतिषेधेषु भावार्थाभावात् तद्व्याप्तायाः कृतेरभावस्तदभावे च तद्व्याप्यस्य कार्यस्याभाव इति न कार्य्यपरत्वनियमः सर्वत्र वाक्ये इत्याह । ॐ ब्राह्मणो न हन्तव्य इत्येवमाद्या इति ॐ । ननु कस्मात् निवृत्तिरेव कार्य्यं न भवति, तत्साधनं वेत्यत आह । ॐ न च सा क्रिया इति ॐ । क्रियाशब्दः कार्य्यवचनः । एतदेव विभजते । ॐ अक्रियार्थानाम् इति ॐ ।
स्यादेतत्—विधिविभक्तिश्रवणात् कार्य्यं तावदत्र प्रतीयते, तच्च न भावार्थमन्तरेण । न च
भामती-व्याख्या
होगी । किसी अन्य गति के सम्भव होने पर लक्षणा न्याय-संगत नहीं मानी जाती, जैसा कि महर्षि जैमिनि कहते हैं— “गुणे त्वन्यायकल्पना” (जै. सू. १।३।१७) । अर्थात् गौणीभूत या अप्रधान अर्थ में ही अन्याय (लक्षणादि) की कल्पना की जाती है। जहाँ प्रसज्य प्रतिषेध सम्भव नहीं, वहाँ अगत्या प्रतिषेध की विधेयार्थ में लक्षणा की जाती है, जैसे—मनुस्मृति में स्नातक व्यक्ति के कर्त्तव्यों की प्रतिज्ञा की गई है—
अतोऽन्यतमया वृत्त्या जीवंस्तु स्नातको द्विजः।
स्वर्ग्यायुष्ययशस्यानि व्रतानीमानि धारयेत्॥ (मनु. ४।१३)
यहाँ 'व्रत' शब्द का अर्थ है—अनुष्ठेय कर्म । उन व्रतों की गणना में जो कहा गया है— “वेदोदितं स्वकं कर्म नित्यं कुर्यादतन्द्रितः” (मनु. ४।१४) वह उचित ही है, किन्तु यह जो कह दिया गया है कि : “नेक्षेतोद्यन्तमादित्यं नास्तं यन्तं कदाचन” (मनु. ४।३७) । वह सर्वथा अनुचित और विरुद्धाभिधान है, क्योंकि 'ईक्षण' (दर्शन) न करना कोई व्रत या अनुष्ठेय कर्म नहीं, अपितु निषेधात्मक है। कहीं-कहीं प्रतिज्ञा-वाक्य 'तस्य व्रतम्'—ऐसा पाया जाता है, उस प्रतिज्ञा-वाक्य से विरुद्ध होने के कारण यहाँ प्रसज्य-प्रतिषेधपरक 'नेक्षेत' पद की लक्षणा अनीक्षणविषयक सङ्कल्प में की जाती है, उसमें कर्त्तव्यता का निर्वाह हो जाता है। स्नातक के इन व्रतों को प्रजापति-व्रत कहा जाता है, इनका विचार जै. सू. (४।१।३) में किया गया है।
'न हन्यात्', 'न पिबेत्'—इत्यादि वाक्यों में किसी प्रकार का विरोध उपस्थित न होने के कारण निषेधपरता ही मानी जाती है। वहाँ निषेध्य पदार्थ ही होता है, कोई विधेय नहीं, जब विधेयभूत कोई धात्वर्थ ही वहाँ नहीं, तब भावार्थ-व्याप्त कृति का अभाव और कृति का अभाव होने से कृति-व्याप्त अपूर्वरूप कार्य (नियोग) का अभाव हो जाता है, अतः समस्त वैदिक वाक्यों में कार्यपरत्व का नियम भङ्ग हो जाता है, भाष्यकार यही कह रहे हैं— “ब्राह्मणो न हन्तव्य इत्येवमाद्या निवृत्तिरुपदिश्यते”। निवृत्ति को कार्य (नियोग) या कार्य की साधनीभूत भावार्थात्मक क्रिया क्यों नहीं माना जा सकता ? इस प्रश्न का उत्तर है— “न च सा क्रिया” । यहाँ 'क्रिया' शब्द कार्य (नियोग) का वाचक है। इसी का स्पष्टीकरण किया जा रहा है— “अक्रियार्थानामुपदेशोऽनर्थकश्चेद् ब्राह्मणो न हन्तव्य इत्यादिनिवृत्त्युपदेशानामानर्थक्यं प्राप्तम्” ।
शङ्का—'हन्तव्यः' इत्यादि पदों में श्रुत विध्यर्थक 'तव्य' प्रत्यय के द्वारा कार्यार्थ की