भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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निषेधवाक्येषु कार्याभावः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १७१

शक्यमप्राप्तक्रियार्थत्वं कल्पयितुं हननक्रियानिवृत्त्यौदासीन्यव्यतिरेकेण । नञश्चैष स्वभावो यत्स्वसम्बन्धिनोऽभावं बोधयतीति । अभावबुद्धिश्चौदासीन्यकारणम् । सा च दग्धेन्धनाग्निवत्स्वयमेवोपशाम्यति । तस्मात्प्रसक्तक्रियानिवृत्त्यौदासीन्यमेव 'ब्राह्मणो न हन्तव्य-' इत्यादिषु प्रतिषेधार्थं मन्यामहे, अन्यत्र प्रजापतिव्रतादिभ्यः ।

भामती

रागतः प्रवृत्तस्य हननपानादावकस्मादौदासीन्यमनुपपद्यते विना विधारकप्रयत्नम् । तस्मात् स एव प्रवृत्त्युन्मुखानां मनोवाग्देहानां विधारकः प्रयत्नो निषेधविधिगोचरः क्रियेति नाक्रियापरमस्ति वाक्यं किञ्चिदपीत्याह ॐ न च हननक्रियानिवृत्त्यौदासीन्यव्यतिरेकेण नञः शक्यमप्राप्तक्रियार्थत्वं कल्पयितुम् ॐ । केन हेतुना न शक्यमित्यत आह ॐ स्वभावप्राप्तहन्त्यर्थानुरागेण नञः ॐ । अयमर्थः । हननपानपरो हि विधिप्रत्ययः प्रतीयमानस्ते एव विधत्त इत्युत्सर्गः । नचैते शक्ये विधातुम् । रागतः प्राप्तत्वात् । न च नञः प्रसज्यप्रतिषेधो विधेयः । तस्याप्यौदासीन्यरूपस्य सिद्धतया प्राप्तत्वात् । न च विधारकः प्रयत्नः । तस्याश्रुतत्वेन लक्ष्यमाणत्वात् । सति सम्भवे च लक्षणाया अन्याय्यत्वात् । विधिविभक्तेश्च रागतः प्राप्तप्रवृत्त्यनुवादकत्वेन विधिविषयत्वायोगात् । तस्माद् यत् पिबेद् हन्याद्वेत्यनूद्य तन्नेति निषिध्यते, तदभावो ज्ञाप्यते, न तु नञर्थो विधीयते । अभावश्च स्वविरोधिभावनिरूपणतया भावच्छायानुपातीति सिद्धे


भामती-व्याख्या

प्रतीति होती है। कार्य कभी भावार्थरूप क्रिया के बिना नहीं हो सकता, क्योंकि वह कार्य का विषय और साधन है। हननादि में प्रवृत्त पुरुष तब तक सहसा उदासीन (निवृत्त) नहीं हो सकता, जब तक उसकी प्रवृत्ति का विधारक (अवरोधक) प्रयत्न नहीं किया जाता, अतः प्रवृत्त्युन्मुख पुरुष के मन, वाणी और शरीर का धारक वही प्रयत्न निषेधविधि की विषयीभूत क्रिया माना जाता है। फलतः यह सिद्ध हो जाता है कि क्रियार्थ-निरपेक्ष कोई वाक्य और वाक्यार्थ नहीं होता।

समाधान—उक्त शङ्का का निषेध करते हुए भाष्यकार कहते हैं—“न च हननक्रियानिवृत्त्यौदासीन्यव्यतिरेकेण नञः शक्यमप्राप्तक्रियार्थत्वं कल्पयितुम्”। हनन क्रिया की निवृत्ति के द्वारा औदासीन्य (तटस्थभाव या उपेक्षा) ही उपलक्षित होता है, उससे भिन्न कोई अनुष्ठेय पदार्थ उपस्थित क्यों नहीं होता ? इस प्रश्न का उत्तर है—“स्वभावप्राप्तहन्त्यर्थानुरागेण नञः”। अभिप्राय यह है कि 'हन्तव्यः' और 'पातव्यः' इन पदों में तव्यरूप विधि-प्रत्यय से 'हनन' और 'पान' का विधान कर सकते हैं—यह सहज-सिद्ध है, किन्तु यहाँ हनन और पान का विधान नहीं किया जा सकता, क्योंकि रागतः प्राप्त है [द्वेष के कारण ब्राह्मणादि के हनन और राग के कारण सुरादि के पान में मनुष्य स्वयं प्रवृत्त हो जाता है, ऐसा करने में उसे किसी प्रकार की आज्ञा या प्रेरणा की आवश्यकता नहीं होती]। हननादि से निवृत्त होने के लिए किसी विधारक (प्रतिबन्धक या अवरोधक) प्रयत्न का विधान भी सम्भावित नहीं, क्योंकि यहाँ उसका वाचक कोई पद ही प्रयुक्त नहीं हुआ है। उसमें केवल लक्षणा हो सकती थी, उसका भी कोई निमित्त यहां उपस्थित नहीं, विना निमित्त के लक्षणा की कल्पना अन्याय है। फिर विधि प्रत्यय क्या करेगा? इस प्रश्न का सीधा-सा उत्तर है कि रागादि के द्वारा प्राप्त पानादि का वह अनुवाद कर देता है, किसी अज्ञात पदार्थ का विधान नहीं कर सकता। अतः 'यत् पिबेत्', 'यद् हन्यात्', तन्न-इस प्रकार निषेधमात्र किया जाता है। हनन-पानादि का अभाव भी 'नञ्' के द्वारा ज्ञापितमात्र होता है, विहित नहीं, क्योंकि अभाव पदार्थ वस्तुतः सर्वत्र विधेय नहीं होता, उसकी विधेयता का यहाँ भ्रम अवश्य हो जाता है, क्योंकि अभाव एक सप्रतियोगिक पदार्थ है, उसका स्वभाव भी प्रतियोगी के स्वभाव पर