भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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१७२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

भामती

सिद्धवत् साध्ये च साध्यवद् भासत इति साध्यविषयो नञर्थः साध्यवद् भासत इति नञर्थः कार्यं इति भ्रमस्तविदमाह ꣸ नञश्चैष स्वभावः इति ꣸ । ननु बोधयतु सम्बन्धिनोऽभावं नञ् , प्रवृत्त्युन्मुखानान्तु मनोवाग्देहानां कुतोऽकस्मान्निवृत्तिरित्यत आह ꣸ अभावबुद्धिश्चौदासीन्यपालनकारणम् ꣸ । अयमभिप्रायः—ज्वरितः पथ्यमश्नीयाद् न सर्पायाङ्गुलिं दद्यादित्यादिवचनश्रवणसमनन्तरं प्रयोज्यवृद्धस्य पथ्याशने प्रवृत्तिं भुजङ्गाङ्गुलिदानोन्मुखस्य च ततो निवृत्तिमुपलभ्य बालो व्युत्पित्सुः प्रयोज्यवृद्धस्य प्रवृत्तिनिवृत्तिहेतू इच्छाद्वेषावनुमिमीते । तथाहीच्छाद्वेषहेतुके वृद्धस्य प्रवृत्तिनिवृत्ती, स्वतन्त्रप्रवृत्तिनिवृत्तित्वात् , मदीयस्वतन्त्रप्रवृत्तिनिवृत्तिवत् । कर्तव्यतैकार्थसमवेतेष्टानिष्टसाधनाभावावगमपूर्वकौ चास्येच्छाद्वेषौ, प्रवृत्तिनिवृत्तिहेतुभूतेच्छाद्वेषत्वात् , मत्प्रवृत्तिनिवृत्तिहेतुभूतेच्छाद्वेषवत् । न जातु मम शब्दतद्व्यापारपुरुषाशयत्रैकाल्यानवच्छिन्नभावनापूर्वप्रत्ययपूर्वाविच्छाद्वेषावभूताम् , अपि तु भूयोभूयः स्वगतमालोचयत उक्तकारणपूर्वादेव प्रत्यवभासेते । तस्माद्वृद्धस्य स्वतन्त्रप्रवृत्तिनिवृत्ती इच्छाद्वेषभेदौ च कर्तव्यतैकार्थसमवेतेष्टानिष्टसाधनाभावावगमपूर्वावित्यनुपूर्व्या सिद्धः कार्यकारणभाव इतीष्टानिष्टसाधनतावगममात्रप्रयोज्यवृद्धप्रवृत्तिनिवृत्तौ इति सिद्धम् । स चावगमः प्राग्भूतः शब्दश्रवणानन्तरमुपजायमानः शब्दश्रवणहेतुक इति प्रवर्तकेषु वाक्येषु यजेतेत्यादिषु शब्द एव कर्तव्यमिष्टसाधनं व्यापारमवगमयंस्तस्येष्टसाधनतां

भामती-व्याख्या

निर्भर है—प्रतियोगी यदि सिद्धार्थ है, तब उसका अभाव सिद्ध के समान और प्रतियोगी यदि असिद्ध या साध्य है, तब उसका अभाव भी साध्य-जैसा प्रतीत हो जाता है। प्रकृत में हननादिरूप प्रतियोगी सिद्ध (प्राप्त) होने के कारण उसका अभाव भी प्राप्त ही है—इस रहस्य का स्पष्टीकरण भाष्यकार कर रहे हैं— "नञश्चैष स्वभावो यत्स्वसम्बन्धिनोऽभावं बोधयति"। 'नञ्' का कुछ भी स्वभाव हो, यहाँ हननादि की प्रवृत्ति में अग्रसर व्यक्ति के मन, वाणी और शरीर का अकस्मात् अवरोध क्यों हो जाता है? इस प्रश्न का उत्तर है— "अभावबुद्धिश्चौदासीन्यकारणम्"। आशय यह है कि "ज्वरितः पथ्यमश्नीयात्", "न सर्पायाङ्गुलिं दद्याद्"—इत्यादि वचनों को सुनने के अनन्तर मध्यम वृद्ध की पथ्याहार में प्रवृत्ति और सर्प के बिल में अंगुलि-दानोन्मुखता से निवृत्ति को देख कर शिक्षार्थी बालक प्रवृत्ति और निवृत्ति की कारणीभूत इच्छा और द्वेष का अनुमान कर लेता है, जिसे शिक्षित-भाषा में इस प्रकार कहा जा सकता है— 'वृद्धस्य प्रवृत्तिनिवृत्ती इच्छाद्वेषहेतुके, स्वतन्त्रप्रवृत्तिनिवृत्तित्वात्, मदीयस्वतन्त्रप्रवृत्तिनिवृत्तिवत्'। मध्यम वृद्ध की इच्छा इष्ट-साधनता और द्वेष अनिष्ट-साधनता के ज्ञान से होता है, इष्ट-साधनता और अनिष्ट-साधनता सदैव उस पदार्थ में होती है, जो कार्य (कृति-साध्य) हो। अतः मध्य वृद्ध की इच्छा और द्वेष के विषय में ऐसा अनुमान किया जा सकता है— 'अस्येच्छाद्वेषौ कार्यनिष्ठेष्टानिष्टसाधनताज्ञानपूर्वकौ, प्रवृत्तिनिवृत्तिहेतुभूतेच्छाद्वेषत्वात्, मदीयप्रवृत्तिनिवृत्तिहेतुभूतेच्छाद्वेषवत्'। बालक ने भली प्रकार यह निश्चय कर रखा है कि हमारे इच्छा और द्वेष कभी भी शब्द (विधि प्रत्यय), शब्दगत व्यापार (शाब्दी भावना), पुरुषाशय (लौकिक प्रेरणा), त्रैकाल्यानवच्छिन्न भावना (वर्तमानादि त्रिकाल-विहित प्रत्यय से अजनित आर्थीभावना) और अपूर्व (नियोग) के ज्ञान से किसी विषय में उत्पन्न नहीं हुए, अपितु वर्तमान विषयों में बार-बार यह अनुभव कर लिया है कि इष्ट-साधनता के ज्ञान से इच्छा और अनिष्ट-साधनता के ज्ञान से द्वेष उत्पन्न होते हैं, अतः मध्यम वृद्ध की प्रवृत्ति-निवृत्ति और इच्छा-द्वेष उसके कृति-साध्यभूत पदार्थ में समुत्पन्न इष्ट-साधनता और अनिष्ट-साधनता के ज्ञान से समुद्भूत हुए हैं। मध्यम वृद्ध को वह ज्ञान शब्द-श्रवण से पहले नहीं था, शब्द-श्रवण के पश्चात् उत्पद्यमान होने के