भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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निषेधवाक्येषु कार्याभावः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १७३


भामती

कर्त्तव्यतां चावगमयति, अनन्यलभ्यत्वादुभयोः, अनन्यलभ्यस्य च शब्दार्थत्वात् । यत्र तु कर्त्तव्यताऽन्यत एव लभ्यते, यथा न हन्यान्न पिबेदित्यादिषु हननपानप्रवृत्त्यो रागतः प्रतिलम्भात्तत्र तदनुवादेन नञ्समभिव्याहृता लिङादिविभक्तिरन्यतोऽप्राप्तमनयोरनर्थ-हेतु-भावमात्रमवगमयति । प्रत्यक्षं हि तयोरिष्टसाधनभावोऽवगम्यते, अन्यथा रागविषयत्वायोगात् । तस्माद्रागादिप्राप्तकर्त्तव्यानुवादेनानर्थसाधनता प्रज्ञापनपरं न हन्यान्न पिबेदित्यादिवाक्यं, न तु कर्त्तव्यतापरमिति सुष्ठूक्तमकार्यनिष्ठत्वं निषेधानाम् । निषेध्यानां चानर्थसाधनताबुद्धिरेव निषेध्याभावबुद्धिस्तथा खल्वयं चेतन आपाततो रमणीयतां पश्यन्नप्यायतिमालोच्य प्रवृत्त्यभावं निवृत्तिमवबुध्य निवर्त्तते, औदासीन्यमात्मनोऽवस्थापयतीति यावत् ।

स्यादेतत् — अभावबुद्धिश्चेदौदासीन्यस्थापनकारणं यावदौदासीन्यमनुवर्तेत न चानुवर्त्तते । नह्युदासीनोऽपि विषयान्तरव्यासक्तचित्तस्तद्भावबुद्धिमान् । न चावस्थापककारणाभावे कार्यावस्थानं दृष्टम् । नहि स्तम्भावपाते प्रासादोऽवतिष्ठतेऽत आह ꕤ सा च दग्धेन्धनाग्निवत् स्वयमेवोपशाम्यति ꕤ । तावदेव खल्वयं प्रवृत्त्युन्मुखो न यावदस्यानर्थहेतुभावमधिगच्छति । अनर्थहेतुत्वाधिगमोऽस्य समूलोद्धारं प्रवृत्ति-


भामती-व्याख्या

कारण शब्द-श्रवण से जनित होता है, अतः “यजेत” — इत्यादि प्रवर्त्तक वाक्यों में शब्द ही इष्ट-साधनभूत यागादिरूप अनुष्ठेय व्यापार का बोध कराता हुआ यागादिगत इष्ट-साधनता और कर्त्तव्यता का बोध कराता है, क्योंकि वहाँ इष्ट-साधनता और कर्त्तव्यता — ये दोनों शब्द को छोड़ कर अन्य किसी साधन से प्राप्त न होने के कारण शब्दार्थ कहलाते हैं, जैसा कि प्रसिद्ध न्याय है— “अनन्यलभ्यः शब्दार्थः” । इसके विपरीत जहाँ इष्ट-साधनतादि का ज्ञान अन्यतः (शब्द को छोड़ कर अन्य साधन से) हो जाता है, जैसे कि “न हन्यात्”, “न पिबेत्” — इत्यादि स्थलों पर हनन, पान में प्रवृत्ति द्वेष और राग के आधार पर ही उपपन्न हो जाती है, वहाँ लिङादि प्रत्यय उसी का अनुवाद करते हुए 'नञ्' का समभिव्याहार पाकर हनन-पान में केवल अनिष्ट-साधनता का बोध करा देते हैं । हनन-पान में इष्ट-साधनता तो प्रत्यक्षतः प्राप्त है, अन्यथा हनन-पान में द्वेष और राग की विषयता सम्भव न हो सकेगी । अतः रागादि के द्वारा प्राप्त हननादि की कर्त्तव्यता का अनुवाद करके अनिष्ट-साधनता के बोधक ही “न हन्यात्”, “न पिबेत्” — इत्यादि वाक्य होते हैं, कर्त्तव्यता के विधायक नहीं, अतः भाष्यकार ने अत्यन्त युक्ति-पूर्ण कहा है— “अकार्यनिष्ठत्वं निषेधानाम्” । हिंसादिरूप निषेध्यगत अनिष्ट-साधनता का ज्ञान ही निषेध्याभाव का ज्ञान है । यह चेतन पुरुष सुरा-पानादि में आपाततः रमणीयता देखता है, किन्तु उससे भविष्य में होनेवाले अनर्थ को सोचकर प्रवृत्त्यभावरूप निवृत्ति को अपनाता है, अर्थात् सुरा-पानादि से उदासीन (विरत) हो जाता है ।

शङ्का — प्रवृत्त्यभाव का ज्ञान यदि औदासीन्य की स्थापना का कारण होता, तब उस ज्ञान को तब तक बराबर रहना चाहिए था, जब तक कि उदासीनता रहती है, किन्तु नहीं रहता, क्योंकि सुरापानादि से विरत पुरुष को भी तब प्रवृत्त्यभाव का ज्ञान नहीं रहता, जबकि उसका चित्त अन्य विषय में व्यासक्त हो (लग) जाता है । जब किसी कार्य का अवस्थापक नहीं रहता, तब उस कार्य का अवस्थान कभी नहीं देखा जाता, जैसे कि स्तम्भों (खम्भों) के गिर जाने पर उनके आश्रित रहनेवाला भवन तुरन्त धराशायी हो जाता है ।

समाधान — उक्त शङ्का का समाधान करने के लिए ही भाष्यकार ने कहा है— “सा च दग्धेन्धनाग्निवत् स्वयमेवोपशाम्यति” । अर्थात् यह पुरुष तब तक ही सुरा-पानादि की ओर प्रवृत्त होता है, जब तक कि सुरा-पानादि की अनर्थकारिता का ज्ञान नहीं होता । उसकी

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