भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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१७४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

तस्मात्पुरुषार्थानुपयोग्युपाख्यानादिभूतार्थवादविषयमानर्थक्याभिधानं द्रष्टव्यम् ।

यदप्युक्तम्—कर्तव्यविध्यनुप्रवेशमन्तरेण वस्तुमात्रमुच्यमानमनर्थकं स्यात्, 'सप्तद्वीपा वसुमती' इत्यादिवदिति, तत्परिहृतम्, 'रज्जुरियं नायं सर्पः' इति वस्तुमात्रकथनेऽपि प्रयोजनस्य दृष्टत्वात् । ननु श्रुतब्रह्मणोऽपि यथापूर्वं संसारित्वदर्शनान्न रज्जुस्वरूपकथनवदर्थवत्त्वमित्युक्तम्, अत्रोच्यते—नावगतब्रह्मात्मभावस्य यथापूर्वं


भामती

मुद्धृत्य दग्धेन्धनाग्निवत् स्वयमेवोपशाम्यति । एतदुक्तं भवति—यथा प्रासादावस्थानकारणं स्तम्भो नैवमौदासीन्यावस्थानकारणमभावबुद्धिः, अपि त्वागन्तुकाविनाशहेतोस्त्राणेनावस्थानकारणम् । यथा कमठपृष्ठनिष्ठुरः कवचः शस्त्रप्रहारत्राणेन राजन्यजीवावस्थानहेतुः । न च कवचापगमे चासति च शस्त्रप्रहारे राजन्यजीवनाश इति । उपसंहरति ॐ तस्मात्प्रसक्तक्रियानिवृत्त्यौदासीन्यमेव इति ॐ । औदासीन्यमजानतोऽप्यस्तीति प्रसक्तक्रियानिवृत्त्योपलक्ष्य विशिनष्टि । तत् किमक्रियार्थत्वेनानर्थक्यमाशङ्क्य क्रियार्थत्वोपवर्णनं जैमिनीयमसमञ्जसमेवेत्युपसंहारव्याजेन परिहरति ॐ तस्मात् पुरुषार्थं इति ॐ । पुरुषार्थानुपयोग्युपाख्यानादिविषयावक्रियार्थतया क्रियार्थतया च पूर्वोत्तरपक्षौ, न तूपनिषद्विषयौ । उपनिषदां स्वयम्पुरुषार्थब्रह्मरूपावगमपर्यवसानादित्यर्थः । यदप्यौपनिषदात्मज्ञानमपुरुषार्थं मन्यमानेनोक्तं कर्तव्यमनुप्रवेशमन्तरेणेति । अत्र निगूढाभिसन्धिः पूर्वोक्तं परिहारं स्मारयति ॐ तत् परिहृतम् इति ॐ । अत्राक्षेप्ता स्वोक्तमर्थं स्मारयति ॐ ननु श्रुतब्रह्मणोऽपि इति ॐ ।

निगूढमभिसन्धि समाधातोद्घाटयति ॐ अत्रोच्यते । नावगतब्रह्मात्मभावस्य इति ॐ । सत्यं न


भामती-व्याख्या

अनर्थकारिता का ज्ञान प्रवृत्ति का समूल नाश करके जिसका ईन्धन समाप्त हो गया, उस अग्नि के समान स्वयं उपशान्त हो जाता है । आशय यह है कि जैसे भवन की अवस्थिति का कारण खम्भा होता है, वैसे उक्त अभाव-ज्ञान औदासीन्य के अवस्थान का कारण नहीं माना जाता, अपितु आगन्तुक विनाश-कारणों से रक्षण-प्रदान कर औदासीन्य को वैसे ही अभाव-ज्ञान बनाए रहता है, जैसे कछुवे की पीठ के समान कठोर कवच शस्त्र-प्रहारों से बचाता हुआ क्षत्रिय-वीरों को जीवन-प्रदान करता है । शस्त्र-प्रहार से योद्धा का जीवन तब तक नष्ट नहीं होता, जब तक कि कवच का अपगम (अभाव) न हो । प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं—"तस्मात् प्रसक्तक्रियानिवृत्त्यौदासीन्यमेव 'ब्राह्मणो न हन्तव्यः' इत्यादिषु प्रतिषेधार्थं मन्यामहे" । औदासीन्य का ज्ञान न रहने पर भी औदासीन्य रहता है, उस अज्ञात औदासीन्य का संग्रह करने के लिए 'प्रसक्तक्रियानिवृत्त्या उपलक्षितम्' कहा गया है । तब 'वैदिकवाक्यों में क्रियापरता न होने पर आनर्थक्य (अप्रामाण्य) की आशङ्का उठाकर महर्षि जैमिनि ने जो सभी वैदिक वाक्यों में क्रियार्थत्व का वर्णन किया, वह किस लिए ?' इस प्रश्न का उत्तर है—"तस्मात् पुरुषार्थानुपयोग्युपाख्यानादिभूतार्थवादविषयमानर्थक्याभिधानं द्रष्टव्यम्" । निष्कर्ष यह है कि पुरुषार्थानुपयोगी वैदिक उपाख्यानों में ही अक्रियार्थत्व का पूर्वपक्ष उठाकर क्रियार्थकत्व का सिद्धान्त उक्त अधिकरण में प्रस्तुत किया गया है, न कि उपनिषद्वाक्यों को अभिलक्ष्य करके, क्योंकि उपनिषद्वाक्यों में स्वयं पुरुषार्थभूत ब्रह्म के स्वरूप की समर्पकता पर्यवसित होती है । औपनिषद आत्मज्ञान को अपुरुषार्थ मानकर जो पूर्वपक्षी ने कहा है—"कर्तव्यविध्यनुप्रवेशमन्तरेण वस्तुमात्रमुच्यमानमनर्थकं स्यात्" । उसका अपने हृदय में रहस्य छिपाये सिद्धान्ती उसके परिहार का स्मरण दिलाता है—"तत् परिहृतम्" । आक्षेपवादी भी उक्त परिहार पर किये गये आक्षेप का स्मरण दिलाता है—"ननु श्रुतब्रह्मणोऽपि यथापूर्वंंसंसारित्वदर्शनात्" । सिद्धान्ती इस आक्षेप का अपना अनुभूत परिहार प्रस्तुत करता है—"अत्रोच्यते,