भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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१६६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

चैतावता वस्त्वनुपदिष्टं भवति । यदि नामोपदिष्टं, किं तव तेन स्यादिति ? उच्यते— अनवगतात्मवस्तूपदेशश्च तथैव भवितुमर्हति । तदवगत्या मिथ्याज्ञानस्य संसारहेतोर्निवृत्तिः प्रयोजनं क्रियत इत्यविशिष्टमर्थवत्त्वं क्रियासाधनवस्तूपदेशेन । अपि च

भामती

अपि सम्बन्धमात्रपर्यवसायिनः, यथा कस्येष पुरुष इति प्रश्नोत्तरं राज्ञ इति, तथा प्रातिपदिकार्थमात्रनिष्ठा, यथा कीदृशास्तरव इति प्रश्नोत्तरं फलिन इति, न हि पृच्छता पुरुषस्य वा तरूणां वाऽस्तित्वनास्तित्वे प्रतिपित्सिते, किन्तु पुरुषस्य स्वामिभेदस्तरूणां च प्रकारभेदः । प्रष्टुरपेक्षितं चाचक्षाणः स्वामिभेदमेव च प्रकारभेदरूपमेव च प्रतिवक्ति, न पुनरस्तित्वं, तस्य तेनाप्रतिपित्सितत्वात् । उपपादिता च भूतेऽप्यर्थे व्युत्पत्तिः प्रयोजनवति पदानाम् ।

चोदयति ॐ यदि नामोपदिष्टं ॐ भूतं किं तव उपदेष्टुः श्रोतुर्वा प्रयोजनं ॐ स्यात् ॐ । तस्माद् भूतर्माप प्रयोजनवदेवोपदेष्टव्यं नाप्रयोजनम् , अप्रयोजनं च ब्रह्म तस्योदासीनस्य सर्वक्रियारहितत्वेनानुपकारकत्वादिति भावः । परिहरति ॐ अनवगतात्मोपदेशश्च ॐ तथैव प्रयोजनवानेव भवितुमर्हति ॐ । अप्यर्थश्चकारः । एतदुक्तं भवति — यद्यपि ब्रह्मोदासीनं तथापि तद्विषयं शाब्दज्ञानमवगतिपर्यन्तं विद्या स्वविरोधिनीं संसारमूलमविद्यामुच्छिन्दत् प्रयोजनवदित्यर्थं। अपि च येऽपि कार्यपरत्वं


भामती-व्याख्या

"अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः ।
पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य स्थितः पृथिव्यामिव मानदण्डः ॥"

इसी प्रकार 'क्रिया' पद का प्रयोग किए बिना ही सम्बन्धमात्र के उपस्थापक शब्द भी प्रयुक्त होते हैं, जैसे—'कस्यैष पुरुषः ?' इस प्रश्न का उत्तर है—'राज्ञः' । केवल प्रातिपदिकार्थ के बोधक पद भी होते हैं, जैसे 'कीदृशास्तरवः ?' इस प्रश्न का उत्तर है—'फलिनः' । यहाँ प्रश्न-कर्त्ता के द्वारा प्रथम प्रश्न में पुरुष और द्वितीय प्रश्न में तरु ( वृक्ष ) समूह के अस्तित्व या नास्तित्व की जिज्ञासा नहीं की गई कि उत्तर वाक्य में क्रिया-पद का प्रयोग आवश्यक होता । यहां तो केवल पुरुष के स्वामी और तरुओं के प्रकार की जिज्ञासा की गई है, अतः 'राज्ञः' और 'फलिनः'—इतना कह देना पर्याप्त माना जाता है, क्योंकि उत्तर-कर्त्ता जिज्ञासितमात्र का ही अभिधान किया करता है, अजिज्ञासित का नहीं । क्रिया-सम्बन्ध के बिना भी सिद्धार्थक पदों का शक्ति-ग्रह एवं सिद्धार्थ प्रयोजनवान् होता है—यह कह चुके हैं ।

पूर्वपक्षी शङ्का करता है—"यदि नामोपदिष्टम्, किं तव तेन स्यात् ?" अर्थात् यदि भूत ( सिद्ध ) वस्तु का उपदेश देखा जाता है, तब उससे वक्ता या श्रोता का क्या लाभ ? अतः उसी सिद्धार्थ का उपदेश करना चाहिए, जो सप्रयोजन हो, ब्रह्म अत्यन्त प्रयोजन-शून्य है, क्योंकि वह कूटस्थ, विभु और उदासीन है, उसमें किसी क्रिया का भी सम्बन्ध नहीं हो सकता, अतः उससे किसी प्रकार का उपकार सम्भव नहीं ।

उक्त शङ्का का परिहार किया जाता है—"अनवगतात्मवस्तूपदेशश्च तथैव भवितुमर्हति ।" 'तथैव' शब्द का यहाँ अर्थ है—प्रयोजनवान् । 'आत्मवस्तूपदेशश्च'—यहाँ चकार का प्रयोग 'अपि' के अर्थ में हुआ है । आशय यह है कि यद्यपि ब्रह्म कूटस्थ, विभु और उदासीन है, तथापि ब्रह्मविषयक अवगति-पर्यन्त ( साक्षात्कारात्मक ) बोध वह ब्रह्म-विद्या है, जो अपनी विरोधिनी संसार की मूलभूत अविद्या का समूल उच्छेद कर डालती है, इससे बढ़ कर और प्रयोजन या उपकार क्या होगा ?

दूसरी बात यह भी है कि जो आचार्य सभी पदों में कार्यपरत्व आवश्यक मानते हैं, वे