भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवेदान्ते भूतोपदेशः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १६५
कूटस्थनित्यं भूतं नोपदिशतीति को हेतुः ? न हि भूतमुपदिश्यमानं क्रिया भवति । अक्रियात्वेऽपि भूतस्य क्रियासाधनत्वात्क्रियार्थ एव भूतोपदेश इति चेत्, नैष दोषः; क्रियार्थत्वेऽपि क्रियानिर्वर्तनशक्तिमद्वस्तूपदिष्टमेव । क्रियार्थत्वं तु प्रयोजनं तस्य । न
भामती
तथा चार्थान्तरसंसर्गपरतामात्रेण वाक्यार्थप्रत्ययोपपत्तौ न कार्यसंसर्गपरत्वनियमः पदानाम् । एवं च सति कूटस्थनित्यब्रह्मरूपपरत्वेप्यदोष इति । ॐ भव्यं ॐ कार्यम् । ननु यद्भूव्यार्थं भूतमुपदिश्यते न तद् भूतं भव्यसंसर्गेण रूपेण तस्यापि भव्यत्वादित्यत आह ॐ न हि भूतमुपदिश्यमानम् इति ॐ । न तादात्म्यलक्षणः संसर्गः, किन्तु कार्येण सह प्रयोजनप्रयोजनिलक्षणोऽन्वयः । तद्विषयेण तु भावार्थेन भूतार्थानां क्रियाकारक लक्षण इति न भूतार्थानां क्रियार्थत्वमित्यर्थः । शङ्कते ॐ अक्रियात्वेऽपि इति ॐ । एवं चाक्रियार्थकूटस्थनित्यब्रह्मोपदेशानुपपत्तिरिति भावः । परिहरति ॐ नैष दोषः, क्रियार्थत्वेऽपि इति ॐ । न हि क्रियार्थं भूतमुपदिश्यमानमभूतं भवति । अपि तु क्रियानिर्वर्तनयोग्यं भूतमेव तत् । तथा च भूतेऽर्थेऽवधृतशक्तयः शब्दाः क्वचित् स्वनिष्ठभूतविषया दृश्यमाना मृत्वा शीर्खा वा न कथञ्चित् क्रिया-निष्ठतां गमयितुमुचिताः । नह्युपहितं शतशो दृष्टमप्यनुपहितं क्वचिद् दृष्टमदृष्टं भवति । तथा च वर्त्तमानापदेशा अस्तिक्रीयोपहिता अकार्यार्था अप्यटवीवर्णंकादयो लोके बहुलमुपलभ्यन्ते, एवं क्रियाऽनिष्ठा
भामती-व्याख्या
है ] । फलतः इतरार्थान्वित स्वार्थपरता के विना पदों के द्वारा वाक्यार्थावबोध ( संसर्गज्ञान ) सम्भव नहीं, अतः जब इतरार्थान्वय-ज्ञान के द्वारा बाक्यार्थ सम्पन्न हो जाता है, तब पदों में कार्यरूपार्थान्वयपरत्व का नियम व्यर्थ है । वेदान्त-वाक्य भी कूटस्थ नित्य ब्रह्म का समर्पण अवाध गति से कर सकते हैं, इसमें किसी प्रकार की बाधा नहीं। "भूतं चेद् वस्तूपदिशति भव्यार्थत्वेन" —इस भाष्य में 'भव्य' शब्द का अर्थ है—कार्य ( अपूर्व और उसकी साधनीभूत यागादि क्रिया ) श्री शबरस्वामी भी कहते हैं—"भव्यं कर्म, भूतं द्रव्यम्" ( शावर. पृ. १३४८ ) । जैसे मृत्तिका-संसृष्ट घटादि मृण्मय माने जाते हैं, वैसे भव्य-संसर्गी भूत ( द्रव्य ) पदार्थ भी भव्य क्यों नहीं ? इस प्रश्न का उत्तर है—"न हि भूतमुपदिश्यमानं क्रिया भवति ।" दृष्टान्त ( मृत्तिका और घट ) में तादात्म्य संसर्ग होने के कारण घट में मृण्मयता मानी जाती है, किन्तु भूत और भव्य का तादात्म्य संसर्ग नहीं माना जाता । 'भव्य' शब्द से अपूर्व और उसकी साधनीभूत यागादि क्रिया विवक्षित होती है । अपूर्व के साथ व्रीहि आदि द्रव्य का प्रयोजन-प्रयोजनीभाव एवं अपूर्व की जनकीभूत यागादि क्रिया के साथ क्रिया-कारकभाव सम्बन्ध होता है, तादात्म्य नहीं कि जिससे भूत में भव्यत्वापत्ति हो जाती ।
शङ्का—"अक्रियात्वेऽपि भूतस्य क्रियासाधनत्वात् क्रियार्थ एव भूतीपदेशः।" यह सत्य है कि व्रीह्यादि भूत पदार्थ कभी भव्य या क्रियारूप नहीं हो सकते, किन्तु वेद में उन्हीं भूत पदार्थों का उपदेश होता है, जो क्रिया के आश्रय या जनक होते हैं, ब्रह्म पदार्थ वैसा भूत नहीं, अतः उसका वेद-पदों के द्वारा प्रतिपादन क्योंकर होगा ?
समाधान—"नैष दोषः, क्रियार्थत्वेऽपि क्रियानिर्वर्तनशक्तिमद्वस्तूपदिष्टमेव" । अन्वितार्थ का पद लक्षक होता है, वाचक नहीं, वाचक शुद्ध ( इतरार्थानन्वित ) स्वार्थ का ही होता है, अतः मर-खप करके भूत वस्तु के साथ क्रियान्वयन का लाभ कर लेने पर भी शुद्ध भूतार्थ में भूत-पदों की शक्ति का अपलाप नहीं हो सकता । क्रिया-जनन शक्ति से युक्त होने पर भी भूत भूत ही रहता है, अतः भूत-पदों को भूतार्थ में अवधृत शक्ति अपने क्रिया-विशिष्ट अर्थ के समान उपहित ( उपाधि से उपलक्षित ) अर्थ का भी उपस्थापन कर सकती है। अतः एव अस्ति क्रिया से उपहित अटवी ( वन ) एवं पर्वतादि के वर्णन प्रचुररूप में उपलब्ध होते हैं, जैसे —