भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 182
१६४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

यस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम्' इत्येतदेकान्तेनाभ्युपगच्छतां भूतोपदेशानर्थक्यप्रसङ्गः। प्रवृत्तिनिवृत्तिविधितच्छेषव्यतिरेकेण भूतं चेद्वस्तूपदिशति भव्यार्थत्वेन,

भामती

क्रियार्थत्वेनैव भूतद्रव्यगुणाभिधानं न स्वनिष्ठतया। यथाहुः शास्त्रविदः 'चोदना हि भूतं भवन्तम्' इत्यादि। एतदुक्तं भवति कार्यमर्थमवगमयन्ती चोदना तदर्थं भूतादिकमप्यर्थं गमयतीति, तत्राह प्रवृत्तिनिवृत्तिव्यतिरेकेण भूतं चेद् इति। अयमभिसन्धिः—न तावत् कार्यार्थ एव स्वार्थे पदानां सङ्गतिग्रहो नान्यार्थ इत्युपपादितं भूतेऽप्यर्थे व्युत्पत्तिं दर्शयद्भिः। नापि स्वार्थमात्रपरतैव पदानां, तथा सति न वाक्यार्थप्रत्ययः स्यात्। न हि प्रत्येकं स्वप्रधानतया गुणप्रधानभावरहितानामेकवाक्यता दृष्टा। तस्मात् पदानां स्वार्थमभिदधतामेकप्रयोजनवत् पदार्थापरतयैकवाक्यता। तथा च तत्तदर्थान्तरविशिष्टैकवाक्यार्थप्रत्यय उपपन्नो भवति, यथाहुः शास्त्रविदः—

साक्षाद्यद्यपि कुर्वन्ति पदार्थप्रतिपादनम् ।
वर्णास्तथापि नैतस्मिन् पर्यवस्यन्ति निष्फले ॥
वाक्यार्थमितये तेषां प्रवृत्तौ नान्तरीयकम् ।
पाके ज्वालेव काष्ठानां पदार्थप्रतिपादनम् ॥ इति ।

भामती-व्याख्या

भिधेयत्व विवक्षित नहीं, अपितु 'क्रियाप्रयोजनकत्व' विवक्षित है, सिद्धात्मक द्रव्य, गुण और कर्मादि का अभिधान क्रियाप्रयोजनकत्वेन ही होता है, स्वतन्त्र नहीं। श्री शबरस्वामी कहते हैं—"चोदना हि भूतं भवन्तं....शक्नोत्यवगमयितुम्” (शबर. पृ. १३)। आशय यह है कि कार्यरूप अर्थ का बोध कराती हुई चोदना (विधि) उस कार्य (क्रिया) के लिए भूत (सिद्ध) आदिरूप अर्थों का बोध कराती है—यही भाष्यकार कह रहे हैं—"प्रवृत्तिनिवृत्तिव्यतिरेकेण भूतं चेद् वस्तूपदिशति भव्यार्थत्वेन"। भाव यह है कि 'कार्यरूप अर्थ में ही शब्दों का शक्ति-ग्रह होता है, अन्य (सिद्धार्थ) में नहीं'—ऐसे नियम का निराकरण सिद्धार्थ में संगति-ग्रह दिखाते हुए पहले किया जा चुका है। यह भी कोई नियम नहीं कि पद केवल स्वार्थ का ही बोधक होता है, क्योंकि तब तो वाक्यार्थ में संसर्गरूप अर्थ का भान न हो सकेगा, क्योंकि वाक्यार्थ गुण-प्रधानादि के रूप में एकवाक्यतापन्न होता है, सभी पद यदि अपने-अपने अर्थों का प्रधानतया बोध कराते हैं, गुण-प्रधानभाव से नहीं, तब उनमें एकवाक्यता सम्भव न हो सकेगी। अतः वाक्य-घटक पद परस्पर-निरपेक्ष स्वार्थमात्र का प्रतिपादन न करके एक प्रयोजनवत्ता का निर्वाह करने के लिए गुण-प्रधानभावेन साकाङ्क्षपदार्थों का अभिधान करते हैं, जिससे नानागुणपदार्थ-विशिष्ट एक प्रधान अर्थ की गमकता वाक्य में उपपन्न हो जाती है, जैसा कि श्री कुमारिलभट्ट कहते हैं—

साक्षाद् यद्यपि कुर्वन्ति पदार्थप्रतिपादनम् ।
वर्णाः तथापि नैतस्मिन् पर्यवस्यन्ति निष्फले ॥
वाक्यार्थमितये तेषां प्रवृत्तौ नान्तरीकम् ।
पाके ज्वालेव काष्ठानां पदार्थप्रतिपादनम् ॥ (श्लो. वा. पृ. ९४३)

[वाक्य के घटकीभूत पद यद्यपि अपने शुद्ध (इतरार्थानन्वित) स्वार्थ के वाचक होते हैं, तथापि केवल स्वार्थ का प्रतिपादन कर देने से न तो वाक्यार्थ-बोध होता है और न प्रवृत्त्यादि, अतः प्रवृत्त्यादि का सम्पादन करने के लिए इतरार्थान्वित स्वार्थ की लक्षकता पदों में वैसे ही नान्तरीयक (अनिवार्य) होती है, जैसे ओदनादि का पाक सम्पादन करने के लिए चूल्हे में लगी सभी लकड़ियाँ एक ऐसी मिलित ज्वाला को जन्म देती हैं, जिससे पाक सम्पन्न होता