भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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वेदान्ते भूतोपदेशः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १६३

एव नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः। तस्मात् 'पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः' (काठ० १।३।११) 'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि' (बृह० ३।९।२६) इति चौपनिषदत्वविशेषणं पुरुषस्योपनिषत्सु प्राधान्येन प्रकाश्यमानत्व उपपद्यते। अतो भूतवस्तुपरो वेदभागो नास्तीति वचनं साहसमात्रम्।

यदपि शास्त्रतात्पर्यविदामनुक्रमणम्—'दृष्टो हि तस्यार्थः कर्मावबोधनम्' इत्येवमादि, तद्धर्मजिज्ञासाविषयत्वाद्विधिप्रतिषेधशास्त्राभिप्रायं द्रष्टव्यम्। अपि च 'आम्ना-


भामती

परमार्थसन्निति न तस्यात्मवदन्यथात्वं कारणैः शक्यं कर्तुम्। न च धर्मान्यथात्वाद्वन्यो विकारः। तदिदमुक्तम्—विक्रियाहेत्वभावादिति। सुगममन्यत्। यत् पुनरेकदेशिना शास्त्रविद्वचनं साक्षित्वेनानुक्रान्तं तदन्यथोपपादयति ॐ यदपि शास्त्रतात्पर्यविदामनुक्रमणम् इति ॐ। दृष्टो हि तस्यार्थः प्रयोजनवदर्थावबोधनमिति वक्तव्ये धर्मजिज्ञासायाः प्रकृतत्वाद्वर्मस्य च कर्मत्वात् कर्मावबोधनमित्युक्तम्। न तु सिद्धरूपब्रह्मावबोधनं व्यापारं वेदस्य वारयति। न हि सोमशर्मणि प्रकृते तद्गुणाभिधानं परिसञ्चष्टे विष्णुशर्मणो गुणवत्ताम्। विधिशास्त्रं विधीयमानकर्मविषयं प्रतिषेधशास्त्रं च प्रतिषिध्यमानकर्मविषयमित्युभयमपि कर्मावबोधपरम्। अपि चाम्नायस्य क्रियार्थत्वादिति शास्त्रकृद्वचनं तत्रार्थग्रहणं यद्यभिधेयवाचि ततो भूतार्थानां द्रव्यगुणकर्मणामानर्थक्यमनभिधेयत्वं प्रसज्येत, न हि ते क्रियार्था इत्यत आह ॐ अपि चाम्नायस्य इति ॐ। यद्युच्येत न हि क्रियार्थत्वं क्रियाभिधेयत्वमपि तु क्रियाप्रयोजनत्वं द्रव्यगुणशब्दानां च


भामती-व्याख्या

परिणाम—ये तीनों प्रकार के परिणाम या विकार कूटस्थनित्य तत्त्व के नहीं होते—यह भी कह चुके हैं। दूसरी बात यह भी है कि आकाश नित्य नहीं, अतः उसका धर्म भी नित्य नहीं, किन्तु पुरुषतत्त्व नित्य है, अतः उसका यदि कोई धर्म होगा, तब वह भी नित्य होगा, अतः उसका भी अन्यथाकरण सम्भव नहीं, धर्मान्यथात्व का नाम ही विकार है, अत एव कहा गया है—"विक्रियाहेत्वभावात्"। शेष भाष्य सुगम है।

एकदेशी ने जो शाबर वचन का अपने मत में साक्ष्य दिया था, उसका अन्यथा उपपादन किया जा रहा है—"यदपि शास्त्रतात्पर्यविदामनुक्रमणम्—'दृष्टो हि तस्यार्थः कर्मावबोधनं नाम' इत्येवमादि, तद्धर्मजिज्ञासाविषयत्वाद् विधिप्रतिषेधशास्त्राभिप्रायं द्रष्टव्यम्।" श्री शबरस्वामी ने जो यह कहा है कि "दृष्टो हि तस्यार्थः कर्मावबोधनं नाम" (जै. सू. भा. पृ. ६)। वहाँ 'दृष्टो हि तस्यार्थः प्रयोजनवदर्थावबोधनम्'—ऐसा कहना चाहिए था, किन्तु धर्मजिज्ञासा का प्रसङ्ग है, धर्म ही कर्म है, अतः 'कर्मावबोधनम्'—ऐसा कह दिया गया है। उसका तात्पर्य सिद्धरूप ब्रह्म के अवबोधनरूप व्यापार से वेद को विरत करना नहीं है। जैसे सोमशर्मा सामने है, अतः उसके गुणों का वर्णन कर दिया गया, उसका तात्पर्य विष्णुशर्मा की गुणवत्ता के निषेध में कदापि नहीं, वैसे ही प्रकृत में। विधि-शास्त्र विधीयमान कर्म को विषय करता है और निषेध-शास्त्र निषिध्यमान हिंसादि कर्मों को विषय करता है—इस प्रकार दोनों शास्त्र कर्मावबोधपरक होते हैं। यह जो जैमिनि-सूत्र उद्धृत किया गया है—"आम्नायस्य क्रियार्थत्वाद् आनर्थक्यमतदर्थानाम्" (जै. सू. १।२।१)। इसमें 'क्रियार्थत्वात्' और 'आनर्थक्यम्'—यहाँ पर 'अर्थ' पद अभिधेयपरक है? अथवा प्रयोजनपरक? यदि अभिधेयपरक है, तब 'ये ये क्रियार्था (क्रियारूपाभिधेयाः) ते ते सार्थकाः (अभिधेयाः)' ऐसी व्याप्ति फलित होती है। तब तो सिद्धस्वरूप द्रव्य, गुण और कर्म अनर्थक (अनभिधेय) हो जाते हैं, क्योंकि वे क्रियारूप अर्थ नहीं हैं, व्यापक के अभाव में व्याप्य का अभाव होना स्वाभाविक है, भाष्यकार कहते हैं—अपि "आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम्" इत्येतदेकान्तेनाभ्युपगच्छतां भूतोपदेशानर्थक्य प्रसङ्गः"। यदि कहा जाय कि 'क्रियार्थत्व' से 'क्रिया-