भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १६२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४ |
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विनश्यति । पुरुषो विनाशहेत्वभावादविनाशी, विक्रियाहेत्वभावाच्च कूटस्थनित्यः, अत
भामती
नाप्युपादेयः । सर्वस्य हि प्रपञ्चजातस्य ब्रह्मैव तत्त्वमात्मा । न च स्वभावो हेयोऽशक्यहानत्वात् । न चोपादेयः, उपात्तत्वात् । तस्माद्धेयोपादेयविषयो विधिनिषेधो न तद्विपरीतमात्मतत्त्वं विषयीकुरुत इति सर्वस्य प्रपञ्चजातस्यात्मैव तत्त्वमिति । एतदुपपादयति ॐसर्वं विनश्यद्विकारजातं पुरुषान्तं विनश्यतिॐ । अयमर्थः—पुरुषो हि श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणतदविरुद्धन्यायव्यवस्थापितत्वात् परमार्थसन् । प्रपञ्चस्त्वनाद्यविद्योपदर्शितोऽपरमार्थसन् । यश्च परमार्थसन्नसौ प्रकृती रजतत्त्वमिव सर्पविभ्रमस्य विकारस्य । अत एवास्यानिवार्य्यत्त्वेनाध्रुवस्वभावस्य विनाशः । पुरुषस्तु परमार्थसन् नासौ कारणसहस्रेणाप्यसन् शक्यः कर्तुम् । न हि सहस्रमपि शिल्पिनो घटं पटयितुमीशत इत्युक्तम् । तस्मादविनाशिपुरुषान्तो विकारविनाशः शुक्तिरज्जुतत्त्वान्त इव रजतभुजङ्गविनाशः । पुरुष एव हि सर्वस्य प्रपञ्चविकारजातस्य तत्त्वम् । न च पुरुषस्यास्ति विनाशो यतोऽनन्तो विनाशः स्यादित्यत आह ॐ पुरुषो विनाशहेत्वभावाद् इति ॐ । न हि कारणानि सहस्रमप्यन्यदन्ययितुमीशत इत्युक्तम् । अथ मा भूत् स्वरूपेण पुरुषो हेय उपादेयो वा, तदीयस्तु कश्चिद्धर्मो हास्यते कश्चिच्चोपादास्यत इत्यत आह ॐ विक्रियाहेत्वभावाच्च कूटस्थनित्यः ॐ । त्रिविधोऽपि धर्मलक्षणावस्थापरिणामलक्षणो विकारो नास्तीत्युक्तम् । अपि चात्मनः परमार्थसतो धर्मोऽपि
भामती-व्याख्या
प्रियं भवति” ( बृह० उ० ४।५।६ )। समस्त प्रपञ्च का आत्मा होने के कारण किसी के द्वारा वह न हेय हो सकता है और न उपादेय । 'घटः सन्', 'पटः सन्' इत्यादि सद्रूप से प्रतीयमान ब्रह्म तत्त्व सभी घटादि सत्पदार्थों का स्वरूप है, स्वरूप का परित्याग कभी नहीं हो सकता, क्योंकि वह आगन्तुक पदार्थ नहीं । इसी प्रकार वह उपादेय नहीं, क्योंकि कभी अप्राप्त नहीं, सदैव प्राप्त है। इस प्रकार यह स्थिर हो जाता है कि विधि-निषेध वाक्य सदैव हेय और उपादेय वस्तु को विषय करते हैं, उनसे विपरीत ( हेयोपादेय-रहित ) आत्मतत्त्व को विषय नहीं कर सकते । समस्त हेयोपादेय प्रपञ्च का अधिष्ठान होने के कारण ब्रह्म प्रपञ्च का आत्मा कहलाता है। इस सिद्धान्त का उपपादन किया जाता है—"सर्वं हि विनश्यद्विकारजातं पुरुषान्तं विनश्यति"। अभिप्राय यह है कि पुरुषतत्त्व श्रुति, स्मृति, इतिहास, पुराण एवं श्रुत्याद्यविरुद्ध न्यायों के द्वारा व्यवस्थापित एक परमार्थसत् तत्त्व है, किन्तु प्रपञ्च अनादि अविद्या के द्वारा कल्पित अपरमार्थ पदार्थ है। जो परमार्थसत् तत्त्व है, वह समस्त विकार वर्ग की वैसे ही प्रकृति ( अधिष्ठान ) है, जैसे सर्प-विभ्रम की प्रकृति रज्जुतत्त्व होता है। अत एव यह प्रपञ्च अस्थिरस्वभाव का होने से विनश्वर किन्तु इसका अधिष्ठान परमार्थ तत्त्व स्थिर कूटस्थ नित्य परमार्थसत् अविनाशी है। यह किसी भी कारण-कलाप के द्वारा असत् नहीं किया जा सकता, क्योंकि यदि हजार शिल्पी एकत्र हो जाँय, तब भी घट को पट नहीं बना सकते यह कहा जा चुका है, अतः अविनाशी पुरुष को छोड़कर वहाँ तक का समस्त विकार-वर्ग वैसे नष्ट हो जाता है, जैसे शुक्ति और रज्जु तत्त्व-पर्यन्त रजत और सर्प-विभ्रम विनष्ट हो जाता है। तत्त्व का विनाश नहीं होता, समस्त विकार-वर्ग का पुरुष ही एकमात्र तत्त्व है। पुरुष तत्त्व का विनाश नहीं होता कि विनाश सीमित न होकर अनन्त हो जाता—"पुरुषो विनाशहेत्वभावादविनाशी"। किसी भी कारण पदार्थ की यह क्षमता नहीं कि नित्य तत्त्व को अनित्य बना सके—यह कई बार कहा जा चुका है। जैसे आकाशतत्त्व हेय और उपादेय नहीं, फिर भी उसका शब्दरूप धर्म हेय और उपादेय होता है, वैसे ही पुरुष तत्त्व का भी कोई धर्म हेय और उपादेय हो सकता है—ऐसी सम्भावना का निराकरण किया जा रहा है—विक्रियाहेत्वभावाच्च कूटस्थनित्यः"। धर्मपरिणाम, लक्षणपरिणाम और अवस्था-