भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४
यथा केसरादिमानाकृतिविशेषोऽन्वयव्यतिरेकाभ्यां सिंहशब्दप्रत्ययभाङ्मुख्योऽन्यः प्रसिद्धः, ततश्चान्यः पुरुषः प्रायिकैः क्रौर्यशौर्यादिभिः सिंहगुणैः संपन्नः प्रसिद्धः, तस्य पुरुषे सिंहशब्दप्रत्ययौ गौणौ भवतो नाप्रसिद्धवस्तुभेदस्य । तस्य त्वन्यत्रान्यशब्द-प्रत्ययौ भ्रान्तिनिमित्तावेव भवतो न गौणौ । यथा मन्दान्धकारे स्थाणुरयमित्यगृह्य-माणविशेषे पुरुषशब्दप्रत्ययौ स्थाणुविषयौ, यथा वा शुक्तिकायामकस्माद्रजतमिदमिति
भामती
स्थाणुरयमित्यगृह्यमाणविशेषे वस्तुनि पुरुषात्सांशयिकौ पुरुषशब्दप्रत्ययौ स्थाणुविषयौ, तत्र तु पुरुषत्वम-नियतमपि समारोपितमेव । एवं संशये समारोपितमनिश्चितमुदाहृत्य विपर्ययज्ञाने निश्चितमुदाहरति ॐ यथा वा शुक्तिकायाम् इति ॐ । शुक्लभास्वरस्य द्रव्यस्य पुरःस्थितस्य सति शुक्तिकारजतसाधारण्ये यावदत्र रजतविनिश्चयो भवति तावत् कस्माच्छुक्तिविनिश्चय एव न भवति ? संशयो वा द्वेधा युक्तः, समानधर्मोपदर्शनाद्' उपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातो विशेषद्वयस्मृतेश्च संस्कारोन्मेषहेतोः, सादृश्यस्य द्विष्टत्वेनोभयत्र तुल्यमेतदिति । अत उक्तम् ॐ अकस्मात् इति ॐ । अनेन दृष्टस्य हेतोः समानत्वेऽप्यदृष्टं
भामती-व्याख्या
नहीं माना जा सकता, क्योंकि गौण व्यवहार उसी पुरुष का माना जाता है, जिसको गौण (माणवकादि) और मुख्य (सिंहादि) वस्तुओं का भेद निश्चित हो, प्रकृत में शरीरादि से भिन्न आत्मतत्त्व का स्वरूप ही स्थिर नहीं, अतः गौण-प्रयोग सम्भव नहीं, जैसा कि विगत पृ. १३ पर कहा जा चुका है कि “न त्वहंकारस्य मुख्योऽर्थो निर्लुंठितगर्भतया देहादिभ्यो भिन्नोऽनुभूयते, येन परशब्दः शरीरादौ गौणो भवेत्” । अतः यहाँ उसका पिष्ट-पेषण करना उचित नहीं। जिस पुरुष की दृष्टि में गौण और मुख्य पदार्थों का भेद स्थिर नहीं हुआ, उसके लिए अन्य शब्द का अन्यत्र प्रयोग गौण नहीं होता, जैसे कि मन्द अन्धकार में 'स्थाणुरयम्' — इस प्रकार का भेद-भान जिस वस्तु में नहीं हुआ, उस वस्तु में 'पुरुष' शब्द और पुरुष-प्रतीति दोनों गौण नहीं, अपितु भ्रान्तिमूलक होते हैं। यद्यपि शुक्ति में रजतत्व के समान स्थाणु में पुरुषत्व का निश्चय नहीं, संशय होता है। तथापि संशय में पाक्षिक समारोप होने के कारण संशय को भी भ्रम या अप्रमारूप ही माना जाता है। स्थाणु में पुरुषत्वरूप समारोपित पदार्थ निश्चित नहीं, अतः निश्चित समारोपित का उदाहरण दिखाते हैं— “यथा वा शुक्तिकायाम-कस्माद् रजतमदमिति निश्चितौ शब्दप्रत्ययौ”। [यहाँ 'अकस्मात्' शब्द का अर्थ 'कारण के विना'—ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि विपर्यय ज्ञान का भी अपना कारण निश्चित होता है, जैसा कि पहले कहा जा चुका है। अतः 'अकस्मात्' शब्द से दृष्ट कारण का निषेध करना अभीष्ट है। यहाँ जब कि शुक्लभास्वर (एक चमकीला) पदार्थ सामने है, जो कि शुक्ति और रजत का एक साधारण रूप है, तब जैसे 'रजतमिदम्'—ऐसा निश्चय होता है, वैसे ही 'शुक्तिरियम्' ऐसा निश्चय क्यों नहीं हो जाता ? अथवा उभय-साधारण धर्मी को देख कर संशय क्यों नहीं होता ? न्यायसूत्र में महर्षि गौतम ने संशय का लक्षण बताया है— “समानानेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषापेक्षो विमर्शः संशयः” (न्या. सू. १।१।२३)। संशय के कारण हैं—(१) समान (सादृश्य) धर्मवाले धर्मी का दर्शन (२) असाधारण धर्मवाले धर्मी का दर्शन, (३) विप्रतिपत्ति से (विपरीताथार्भिधायी वाक्यों को सुन कर), (४) एक वस्तु की उपलब्धि की अव्यवस्था और (५) अनुपलब्धि की अव्यवस्था। इनमें प्रथम और चतुर्थ—इन दो कारणों के आधार पर द्वेधा संशय होना चाहिए, किन्तु यहाँ न तो शुक्ति का निश्चय होता है और न संशय, अतः भाष्यकार ने "अकस्मात्" कहा है, जिसका अर्थ है—"अदृष्टविशेषात्"। इस शब्द के प्रयोग से यह