भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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जीवतोऽशरीरत्वम् } हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १७९

निश्चितौ शब्दप्रत्ययौ, तद्देहादिसंघातेऽहमिति निरुपचारेण शब्दप्रत्ययावात्मानात्मा- विवेकेनोत्पद्यमानौ कथं गौणौ शक्यौ वदितुम् ? आत्मानात्मविवेकिनामपि पण्डिताना- मजाविपालानामिवाविविक्तौ शब्दप्रत्ययौ भवतः। तस्माद्देहादिव्यतिरिक्तात्मास्ति- त्ववादिनां देहादावहंप्रत्ययो मिथ्यैव, न गौणः। तस्मान्मिथ्याप्रत्ययनिमित्तत्वात्स- शरीरत्वस्य सिद्धं जीवतोऽपि विदुषोऽशरीरत्वम्। तथा च ब्रह्मविद्विषया श्रुतिः 'तद्यथाहिनिर्व्वयनी वल्मीके मृता प्रत्यस्ता शयीतैवमेवेदं शरीरं शेते। अथायमशरीरोऽमृतः प्राणो ब्रह्मैव तेज एव' (बृह० ४।४।७) इति। 'सचक्षुरचक्षुरिव सकर्णोऽकर्ण इव सवागवागिव समना अमना इव सप्राणोऽप्राण इव' इति च। स्मृतिरपि च - 'स्थितप्रज्ञस्य का भाषा' (भ० गी० २।५४) इत्याद्या स्थितप्रज्ञलक्षणा- न्याचक्षाणा विदुषः सर्वप्रवृत्त्यसंबन्धं दर्शयति। तस्मान्नावगतब्रह्मात्मभावस्य यथापूर्वं संसारित्वम्। यस्य तु यथापूर्वं संसारित्वं नासाववगतब्रह्मात्मभाव इत्यनवद्यम्। यत्पुनरुक्तं श्रवणात्पराचीनयोर्मनननिदिध्यासनयोर्दर्शनाद्विधिशेषत्वं ब्रह्मणो न स्वरूप-

भामती

हेतुरुक्तः। तच्च कार्यदर्शनान्नेयत्वेनासाधारणमिति भावः। ॐ आत्मानात्मविवेकिनाम् इति ॐ। श्रवण- मननकुशलतामात्रेण पण्डितानामनुत्पन्नतत्त्वसाक्षात्काराणामिति यावत्। तदुक्तम्—पश्वादिभिश्चाविशेषा- दिति। शेषमतिरोहितार्थम्। जीवतो विदुषोऽशरीरत्वे च श्रुतिस्मृती उदाहरति ॐ तथा च इति ॐ। सुबोधम् प्रकृतमुपसंहरति ॐ तस्मान्नावगतब्रह्मात्मभावस्य इति ॐ। ननूक्तं यदि जीवस्य ब्रह्मात्मत्वावगतिरेव सांसारिकधर्मनिवृत्तिहेतुः, हन्त मननादिविधानानानर्थक्यं, तस्मात्प्रतिपत्तिविधिपरा वेदान्ता इति, तदनुभाष्यं दूषयति ॐ यत् पुनरुक्तं श्रवणात्पराचीनयोरिति ॐ।

भामती-व्याख्या

ध्वनित किया है कि यहाँ यद्यपि दृष्ट सामग्री समान है, उससे शुक्ति का भी पूर्णतया या आंशिक भान होना चाहिए। तथापि कोई अदृष्ट हेतु ऐसा है, जिसके द्वारा 'रजतमिदम्'— ऐसा ही विपर्यय ज्ञान होता है, क्योंकि कार्य को देखकर कारण का अनुमान किया जाता है, प्रकृत में जब कि "रजतमिदम्"—ऐसा ज्ञान होता है, तब वह अदृष्ट (संस्काररूप) हेतु इसी ज्ञान का असाधारण कारण है। 'आत्मानात्मविवेकिनाम्'—इस भाष्य के द्वारा ऐसे व्यक्ति विवक्षित हैं, जिन्होंने आत्मा का श्रवण और मनन करके कुछ कुशलता तो प्राप्त कर ली है किन्तु आत्मा का साक्षात्कार प्राप्त नहीं किया है। जैसा कि भाष्यकार पहले (पृ० ४६ पर) कह चुके हैं—"पश्वादिभिश्चाविशेषात्। अर्थात् व्यवहार-दशा में विपर्यय ज्ञानादि एक विद्वान् को भी होता है। जीवन-काल में ही विद्वान् (आत्मतत्त्वज्ञ पुरुष) की अशरीरता का प्रतिपादक प्रमाण प्रस्तुत करते हैं—'तथा च ब्रह्मविद्विषया श्रुतिः—"तद्यथाहिनिर्व्वयनी वल्मीके मृता प्रत्यस्ता शयीतैवमेवेदं शरीरं शेते" (बृह० उ० ४।४।७)। श्रुति का अर्थ अत्यन्त स्पष्ट है कि जैसे साँप की केंचुली साँप के शरीर से पृथक् होकर वल्मीक (बाँबी) में फेंकी पड़ी रहती है, ऐसे ही विद्वान् का शरीर भी आसक्ति-रहित हो जाता है, और विद्वान् जीवन काल में ही अशरीर कहा जाता है। प्रकृत का उपसंहार किया जाता है—"तस्मान्नाव- गतब्रह्मात्मभावस्य यथापूर्वं संसारित्वम्"।

शङ्का—यदि जीव की ब्रह्मात्मत्वावगति ही आत्मा के सांसारिक धर्म निवृत्त कर देती है, तब वह तो श्रवण मात्र से हो जाती है, मनन और निदिध्यासन का विधान व्यर्थ हो जाता है, उसकी सार्थकता इसी में है कि वेदान्त-वाक्यों को प्रतिपत्ति-विधि (उपासना- विधि) का प्रतिपादक माना जाय।