भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १८० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४ |
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पर्यवसायित्वमिति। न; अवगंत्यर्थत्वान्मनननिदिध्यासनयोः। यदि ह्यवगतं ब्रह्मान्यत्र विनियुज्येत भवेत्तदा विधिशेषत्वम्। न तु तदस्ति; मनननिदिध्यासनयोरपि श्रवणवदवगंत्यर्थत्वात्। तस्मान्न प्रतिपत्तिविधिविषयतया शास्त्रप्रमाणकत्वं ब्रह्मणः संभवतीत्यतः स्वतन्त्रमेव ब्रह्म शास्त्रप्रमाणकं वेदान्तवाक्यसमन्वयादिति सिद्धम्। एवं च सति 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इति तद्विषयः पृथक्शास्त्रारम्भ उपपद्यते। प्रतिपत्तिवि-
भामती
मनननिदिध्यासनयोरपि न विधिस्तयोरन्वयव्यतिरेकसिद्धसाक्षात्कारफलयोर्विधिसरूपैर्वचनैरनुवादात्। तदिदमुक्तम् ॐ अवगंत्यर्थत्वाद् इति ॐ। ब्रह्मसाक्षात्कारोऽवगतिस्तदर्थत्वं मनननिदिध्यासनयोरन्वयव्यतिरेकसिद्धमित्यर्थः। अथ कस्मान्मननादिविधिरेव न भवतीत्यत आह ॐ यदि ह्यवगतम् इति ॐ। न तावन्मनननिदिध्यासने प्रधानकर्मणी अपूर्वविषये अमृतत्वफले इत्युक्तमधस्तात्। अतो गुणकर्मत्वमनयोरवघातप्रोक्षणादिवत् परिशिष्यते। तदप्ययुक्तम्, अन्यत्रोपयुक्तोपयोक्ष्यमाणत्वाभावादात्मनः। विशेषतस्त्वौपनिषदस्य कर्मानुष्ठानविरोधादित्यर्थः। प्रकृतमुपसंहरति ॐ तस्माद् इति ॐ। एवं सिद्धरूपब्रह्मपरत्वमुपनिषदां ब्रह्मणः शास्त्रार्थस्य धर्मादन्यत्वाद्भिन्नविषयत्वेन शास्त्रभेदाद् “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा” इत्यस्य शास्त्रारम्भत्वमुपपद्यत इत्याह ॐ एवं च सति इति ॐ। इतरथा तु धर्मजिज्ञासैवेति न शास्त्रा-
भामती-व्याख्या
समाधान — उक्त आशङ्का का अनुवाद करके दोषोद्भावन किया जाता है-“यत्पुनरुक्तं श्रवणात् पराचीनयोर्मनननिदिध्यासनयोर्दर्शनाद् विधिशेषत्वम् ब्रह्मणः”। आत्मसाक्षात्कार के लिए मनन और निदिध्यासन का विधान नहीं हो सकता, क्योंकि अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा ही उनमें साक्षात्कार की हेतुता निश्चित है, अतः विधि के समानरूपवाले वेदान्त-पदों के द्वारा उनका अनुवादमात्र किया जाता है, यह कहा जा रहा है—“अवगत्यर्थत्वात्”। यहाँ 'अवगति' पद से ब्रह्म-साक्षात्कार विवक्षित है, उसकी साधनता मनन और निदिध्यासन में अन्वय-व्यतिरेक से ही सिद्ध है। मनन और निदिध्यासन की विधि क्यों नहीं ? इस प्रश्न का उत्तर है— “यदि ह्यवगतं ब्रह्मान्यत्र विनियुज्येत, भवेत्तदा विधिशेषत्वम्”। मनन और निदिध्यासन को स्वतन्त्र अपूर्वार्थक प्रधान कर्म नहीं माना जा सकता—यह पहले कहा जा चुका है, अतः अवघात और प्रोक्षण के समान इन्हें गुण कर्म ही मानना शेष रह जाता है। वह भी असंगत है, क्योंकि अन्यत्र कर्म में ब्रह्म न तो उपयुक्त है और न उपयोक्ष्यमाण [ द्रव्य दो प्रकार का हो सकता है:-(१) किसी कर्म में उपयुक्त अथवा (२) उपयोक्ष्यमाण, उसके संस्कार कर्मों को गुणकर्म कहते हैं, जैसे देवता के लिए हविष्प्रदान में उपयुक्त पुरोडाशादि का इडानामक पात्र में रखकर भक्षण कर लेना। व्रीह्यादि उपयोक्ष्यमाण हैं, अवघातादि के द्वारा निष्पन्न तण्डुलों का पुरोडाशादि के निर्माण में उपयोग होगा, अतः अवघातादि को उपयोक्ष्यमाण द्रव्य का संस्कारक माना जाता है]। विशेषतः औपनिषद असङ्ग पुरुष कर्मानुष्ठान का उपयोगी न होकर विरुद्ध पड़ जाता है। प्रसङ्ग का उपसंहार किया जा रहा है— “तस्मान्न प्रतिपत्तिविधिविषयतया शास्त्रप्रमाणकत्वं ब्रह्मणः”। इस प्रकार उपनिषद्-वाक्यों में सिद्धरूप ब्रह्म की प्रतिपादकता स्थिर हो जाती है, वेदान्त-प्रतिपाद्य ब्रह्म धर्म से भिन्न है, अतः धर्मशास्त्र से वेदान्त-शास्त्र का भेद होना अनिवार्य है, फलतः “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा”—इस सूत्र के द्वारा भिन्न शास्त्र का आरम्भ करना अत्यन्त उचित और न्याय-संगत है—“एवं च सति 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इति तद्विषयः पृथक् शास्त्रारम्भ उपपद्यते”। यदि ब्रह्म धर्म से भिन्न न होकर प्रतिपत्ति-विधि का शेष (अङ्ग) हो जाता, तब उसका प्रतिपादन 'अथातो धर्मजिज्ञासा' (जै. सू. १।१।१) से ही प्रतिज्ञात हो जाता,