भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअहंप्रतीतेर्गौणत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंचालितम् १७७
संनिधानमात्रेण राजप्रभृतीनां दृष्टं कर्तृत्वमिति चेन्न; धनदानाद्युपार्जितभृत्य-संबन्धित्वात्तेषां कर्तृत्वोपपत्तेः, न त्वात्मनो धनदानादिवच्छरीरादिभिः स्वस्वामि-संबन्धनिमित्तं किंचिच्छक्यं कल्पयितुम्। मिथ्याभिमानस्तु प्रत्यक्षः संबन्धहेतुः। एतेन यजमानत्वमात्मनो व्याख्यातम्।
अत्राहुः—देहादिव्यतिरिक्तस्यात्मन आत्मीये देहादावभिमानो गौणो, न मिथ्येति चेन्न; प्रसिद्धवस्तुभेदस्य गौणत्वमुख्यत्वप्रसिद्धेः। यस्य हि प्रसिद्धो वस्तुभेदः,
भामती
शङ्कते ॐ संनिधानमात्रेण इति ॐ। परिहरति ॐ न इति ॐ। उपार्जनं स्वीकरणम्। न त्वियं विधाऽऽत्मनीत्याह ॐ न त्वात्मन इति ॐ। ये तु देहादावात्माभिमानो न मिथ्या, अपि तु गौणो माणवकादाविव सिंहाभिमान इति मन्यन्ते; तन्मतमुपन्यस्य दूषयति ॐ अत्राहुः इति ॐ। प्रसिद्धो वस्तु-भेदो यस्य पुरुषस्य स तथोक्तः। उपपादितं चैतदस्माभिरध्यासभाष्ये इति नेहोपपाद्यते। यथा मन्दान्धकारे
भामती-व्याख्या
अतः धर्माधर्म का कर्त्ता आत्मा नहीं हो सकता।
क्रिया-समवाय न होने पर भी कर्तृत्व की शङ्का उठाई जा रही है—"संनिधानमात्रेण राजप्रभृतीनां कर्तृत्वं दृष्टम्"। राजा में युद्धादि क्रिया न होने पर भी राजा भी युद्धादि का कर्त्ता माना जाता है, वैसे ही आत्मा में कोई क्रिया न होने पर भी धर्माधर्मादि का कर्तृत्व माना जा सकता है, [ जैसा कि श्री कुमारिल भट्ट कहते हैं—
"चालनेन ह्यसिं योद्धा प्रयुङ्क्ते छेदनं प्रति।
सेनापतिस्तु वाचैव भृत्यानां विनियोजकः ॥
राजा सन्निधिमात्रेण विनियुङ्क्ते कदाचन।
तस्मादचलतोऽपि स्याच्चलने कर्तृतात्मनः ॥" (श्लो. वा. पृ. ७१०)]।
जैसे युद्ध करनेवाले पुरुषों का सन्निधान पाकर राजा युद्धादि का कर्त्ता माना जाता है, वैसे ही धर्माधर्म के कर्त्ता शरीरादि का सन्निधान पाकर आत्मा भी धर्मादि का कर्त्ता माना जा सकता है। सन्निधान-प्रयुक्त कर्तृत्व का आत्मा में निराकरण करते हुए भाष्यकार ने कहा है—"न, धनदानाद्युपार्जितभृत्यसम्बन्धित्वात्"। उपार्जन का यहाँ अर्थ है—स्वीकार। राजा और उसके भृत्यों में धन-दान-प्रयुक्त जो स्वस्वामिभाव सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, उस सम्बन्ध को लेकर भृत्य का कर्तृत्व राजा में संक्रान्त हो जाता है, किन्तु आत्मा और शरीर के मध्य वैसा कोई सम्बन्ध सम्भव नहीं—"नत्वात्मनो धनदानादिवच्छरीरादिभिः स्वस्वामिसम्बन्धनिमित्तं किञ्चित् शक्यं कल्पयितुम्"। राजा और भृत्यों के मध्य में सम्बन्ध स्थापित होने के धनदानादि कई हेतु हो सकते हैं, किन्तु आत्मा और शरीर का जो सम्बन्ध है, उसका एक मात्र प्रत्यक्षभूत मिथ्या अभिमान ही हेतु है, अन्य कोई हेतु नहीं—"मिथ्याभि-मानस्तु प्रत्यक्षः सम्बन्धहेतुः"। यहाँ 'तु' शब्द का अर्थ 'एव' है, अर्थात् 'मिथ्याभिमान एव सम्बन्धहेतुः'। अध्यास को छोड़ कर असङ्ग आत्मा और शरीरादि के सम्बन्ध का नियामक और कोई नहीं हो सकता।
जो लोग ( प्रभाकरगण ) देहादि में आत्माभिमान को मिथ्या न मान कर वैसा ही गौण मानते हैं, जैसा कि माणवकादि में सिंहादि का अभिमान होता है। उनके मत का उपन्यास करके खण्डन किया जाता है, "अत्राहुः—देहादिव्यतिरिक्तस्यात्मन आत्मीये देहादावभिमानो गौणो, न मिथ्येति चेन्न, प्रसिद्धवस्तुभेदस्य गौणत्वमुख्यत्वप्रसिद्धेः"। अर्थात् "अहं गच्छामि"—इत्यादि स्थलों पर शरीरादि में जो 'अहम्' शब्द का प्रयोग है, वह गौण
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