भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४
ृत्वमिति चेन्न; शरीरसंबन्धस्यासिद्धत्वाद्धर्माधर्मयोरात्मकृतत्वासिद्धेः । शरीरसंबन्धस्य धर्माधर्मयोस्तत्कृतत्वस्य चेतरेतराश्रयत्वप्रसङ्गादन्धपरंपरैषाऽनादित्वकल्पना । क्रियासमवायाभावाच्चात्मनः कर्तृत्वानुपपत्तेः ।
भामती
स्यादेतत् — न मिथ्याज्ञाननिमित्तं सशरीरत्वमपि तु धर्माधर्मनिमित्तं, तच्च स्वकारणधर्माधर्मनिवृत्तिमन्तरेण न निवर्त्तते । तन्निवृत्तौ च प्रयाणमेवेति न जीवतोऽशरीरत्वमिति शङ्कते ॐ तत्कृत इति ॐ । तदित्यात्मानं परामृशति । निराकरोति ॐ न, शरीरसम्बन्धस्य इति ॐ । न तावदात्मा साक्षाद्धर्माधर्मौ कर्तुमर्हति, वाग्बुद्धिशरीरारम्भजनितौ हि तौ नासति शरीरसम्बन्धे भवतः, ताभ्यां तु शरीरसम्बन्धं रोचयमानो व्यक्तं परस्पराश्रयदोषमावहति । तदिदमाह ॐ शरीरसम्बन्धस्य इति ॐ । यद्युच्येत सत्यमस्ति परस्पराश्रयः, न त्वेष दोषोऽनादित्वाद्वीजाङ्कुरवदित्यत आह ॐ अन्धपरम्परेषाऽनादित्वकल्पना ॐ । 'यस्तु मन्यते नेयमन्धपरम्परातुल्यानादिता, न हि यतो धर्माधर्मभेदा आत्मशरीरसम्बन्धभेदस्तत एव स धर्माधर्मभेदः, किन्त्वेष पूर्वस्मादात्मशरीरसम्बन्धात् पूर्वधर्माधर्मभेदजन्मनः, एष त्वात्मशरीरसम्बन्धोऽस्माद्धर्माधर्मभेदादिति' तं प्रत्याह ॐ क्रियासमवायाभावाद्" इति ।
भामती-व्याख्या
है, यह कहा जाता है—"नित्यमशरीरत्वमकर्मनिमित्तत्वादित्यवोचाम"। कोई शङ्का करता है कि सशरीरत्व मिथ्याज्ञाननिमित्तक नहीं, अपितु धर्माधर्मनिमित्तक है, अतः स्वकृत धर्माधर्म की निवृत्ति के बिना वह निवृत्त नहीं हो सकता और धर्माधर्म की निवृत्ति हो जाने पर मरण ही हो जाता है, अतः जीवित अवस्था में अशरीरत्व नहीं रह सकेगा—"तत्कृतधर्माधर्मनिमित्तं सशरीरत्वम्"। 'तत्कृत' शब्द का अर्थ है—आत्मकृत। केवल जड़ या शुद्ध चेतन के द्वारा धर्माधर्म नहीं किया जाता, अपितु शरीर-संहत आत्मा के द्वारा। उक्त शङ्का का निराकरण किया जाता है—'न शरीरसम्बन्धस्यासिद्धत्वात्'। आत्मा साक्षात् धर्माधर्म नहीं कर सकता, क्योंकि वाक्, बुद्धि और शरीर के द्वारा ही धर्माधर्म सम्पादित होते हैं, अतः शरीर-सम्बन्धी आत्मा ही धर्माधर्म का कर्त्ता माना जाता है। शरीर का आत्मा के साथ सम्बन्ध धर्माधर्म के माध्यम से ही होता है, इस प्रकार अन्योऽन्याश्रयता प्रसक्त होती है, भाष्यकार कहते हैं—"शरीरसम्बन्धस्य धर्माधर्मयोस्तत्कृतत्वस्य चेतरेतराश्रयत्वप्रसङ्गात्"। यह जो कहा जाता है कि अन्योऽन्याश्रय दोष अवश्य है, किन्तु यहाँ वह कोई दोष नहीं, क्योंकि बीज और अंकुर के समान शरीर-सम्बन्ध और धर्माधर्म अनादि हैं, अनादि पदार्थों में अन्योऽन्याश्रय दोष नहीं माना जाता। उसका परिहार किया जाता है—अन्धपरम्परैषा अनादित्वकल्पना।" अर्थात् यह अनादित्व की कल्पना प्रामाणिक नहीं। जो वादी इस कल्पना को प्रामाणिक मान कर कहता है कि यह अनादित्व-कल्पना अन्ध-परम्परा के समान नहीं, क्योंकि धर्माधर्म और शरीर-सम्बन्ध—दोनों एक-एक व्यक्त्यात्मक न होकर अनन्त व्यक्तिरूप माने जाते हैं। जिस धर्माधर्म व्यक्ति से शरीर-सम्बन्धरूप व्यक्ति उत्पन्न होती है उसी शरीर-सम्बन्ध व्यक्ति से वही धर्माधर्म व्यक्ति उत्पन्न नहीं होती, अपितु जो शरीर-सम्बन्ध जिस धर्माधर्म से उत्पन्न होता है, वही शरीर-सम्बन्ध उसी धर्माधर्म से उत्पन्न नहीं होता, अपितु अपनी पूर्वभावी भिन्न-भिन्न कारण व्यक्तियों से भिन्न-भिन्न कार्य व्यक्तियाँ जन्म लेती हैं, अतः अन्योऽन्याश्रयता प्रसक्त ही नहीं होती। उस वादी के लिए अन्य आपत्ति प्रदर्शित की जाती है—"क्रियासमवायाभावाच्चात्मनः कर्तृत्वानुपपत्तेः"। जिस कार्य की जनिका क्रिया जिस द्रव्य में समवेत हो, वही द्रव्य उस क्रिया का कर्त्ता माना जाता है, आत्मा में कोई भी क्रिया नहीं रहती, क्योंकि क्रिया अपने आश्रय को अवश्य विकृत कर देती है, आत्मा अविकारी पदार्थ है,