भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
११२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ३
( बृह० २।४।१० ) इत्यादिश्रुतेः । तस्य महतो भूतस्य निरतिशयं सर्वज्ञत्वं सर्वशक्तिमत्त्वं चेति । इति प्रथमवर्णकम् ॥
भामती
नुकरणम् । यथा हि यादृशं गात्रचलनादि नर्तकः करोति तादृशमेव शिक्ष्यमाणाऽनुकराति नर्तकी, न तु तदेव व्यनक्ति । एवं यादृशीमानुपूर्वी वैदिकानां वर्णपदादीनां करोत्यध्यापयिता तादृशीमेवानुकरोति माणवकः, न तु तामेवोच्चारयति । आचार्यव्यक्तिभ्यो माणवकव्यक्तीनामन्यत्वात् । तस्मान्नित्यानित्यवर्णवादिनां न लौकिकवैदिकपदवाक्यादिपौरुषेयत्वे विवादः, केवलं वेदवाक्येषु पुरुषस्वातन्त्र्यास्वातन्त्र्ये विप्रतिपत्तिः । यथाहूः—'यत्नतः प्रतिषेध्या नः पुरुषाणां स्वतन्त्रता' ।
तत्र सृष्टिप्रलयमनिच्छन्तो जैमिनीया वेदाध्ययनं प्रत्यस्माद्दशगुरुशिष्यपरम्परामविच्छिन्नामनादिमाचक्षते । वैयासिकं तु मतमनुवर्तमान्तानाः श्रुतिस्मृतीतिहासादिप्रसिद्धसृष्टिप्रलयानुसारेणानाद्यविद्योपधानलब्धसर्वशक्तिज्ञानस्यापि परमात्मनो नित्यस्य वेदानां योनेरपि न तेषु स्वातन्त्र्यं, पूर्वपूर्वसर्गानुसारेण तादृशतादृशानुपूर्वीविरचनात् । तथा हि यागादिब्रह्महत्यादयोऽर्थानर्थहेतवो ब्रह्मविवर्त्ता अपि स र्गान्तरे विपरीयन्ते, न हि जातु क्वचित् सर्गे ब्रह्महत्याऽर्थहेतुरनर्थहेतुश्चाश्वमेधो भवति, अग्निंर्वा क्लेदयति, आपो वा दहन्ति, तद्वत् । यथाऽत्र सर्गे नियतानुपूर्व्यं वेदाध्ययनमभ्युदयनिःश्रेयसहेतुरन्यथा तदेव वाग्वज्रतयाऽ-
भामती-व्याख्या
पदादि का अनुकरण भी भिन्न होता है, क्योंकि जैसा शरीर को नर्तक मटकाता है, वैसा ही सीखनेवाली नर्तकी भी मटकाती है, नर्तक के नृत्य की ही अभिव्यक्ति नर्तकी में नहीं मानी जाती । उसी प्रकार अध्यापक वैदिक वर्णों और पदों की जैसी आनुपूर्वी का उच्चारण करता है, वैसी ही आनुपूर्वी का अनुकरण माणवक करता है, अध्यापकोच्चारित आनुपूर्वी का ही उच्चारण नहीं करता, क्योंकि आचार्य की आनुपूर्वी व्यक्ति से मणिवक की आनुपूर्वी व्यक्ति भिन्न होती है। अतः नित्यवर्णवादी और अनित्यवर्णवादियों का वैदिक पदों और वाक्यों की पौरुषेयता में विवाद नहीं, केवल वैदिक वाक्यों में पुरुष के स्वातन्त्र्यास्वातन्त्र्य में वैमत्य है, जैसा कि श्री कुमारिलभट्ट कहते हैं—"यत्नतः प्रतिषेध्या नः पुरुषाणां स्वतन्त्रता" (श्लो. वा. पृ. ८०२)। [लौकिक पदों के उच्चारण में पुरुष स्वतन्त्र है, अतः पुरुष के दोष उसके शब्द में संक्रान्त हो जाते हैं, किन्तु वैदिक शब्दों में पुरुष का स्वातन्त्र्य न होने के कारण पुरुष के दोष उनमें संक्रान्त नहीं होते ]। महासृष्टि और महाप्रलय न माननेवाले जैमिनिमतावलम्बी आचार्यगण वेदाध्ययन की गुरु-शिष्य-परम्परा को अनन्त और अनादि मानते हैं, किन्तु व्यासमतावलम्बी वेदान्तिगणों के मत में श्रुति, स्मृति, इतिहासादि-प्रसिद्ध सृष्टि और प्रलय के अनुसार अनादि अविद्यारूप उपाधि के द्वारा सर्वज्ञत्व पाकर भी नित्य परमात्मा वेदों की रचना करके भी उसमें स्वतन्त्र नहीं माना जाता, क्योंकि पूर्व-पूर्व सृष्टि में प्रचलित आनुपूर्वी की ही वह रचना कर देता है, नूतन आनुपूर्वी का निर्माण नहीं करता । यह ध्रुव सत्य है कि इष्ट-साधनीभूत यागादि और अनिष्ट-साधनीभूत ब्रह्म-हत्यादि कर्म ब्रह्म के विवर्त्त होकर भी अन्य सृष्टि में विपरीत स्वभाव के नहीं होते, क्योंकि किसी भी सृष्टि में ब्रह्महत्या कर्म स्वर्गादिरूप इष्ट का और अश्वमेध नरकादिरूप अनिष्ट का, या अग्नि क्लेदन (आर्द्रीकरण) का अथवा जल दहन का करण नहीं होता । वैसे ही वेदों में पुरुष का स्वातन्त्र्य कभी नहीं रहता । जैसे इस समय आनुपूर्वी विशेष से युक्त वेदों का अध्ययन अभ्युदय और निःश्रेयस (मोक्ष) का साधन होता है, अन्यथा (स्वर और वर्णादि-क्रम का व्युत्क्रम हो जाने पर) वेद-मन्त्र वज्र बन कर यजमान का ही हिंसक हो जाता है, जैसा कि शिक्षाकार कहते हैं—
"मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह ।
स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ॥" (पाणि. शिक्षा)
शास्त्रकर्तृत्वविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ११३
भामती नर्थहेतुः, एवं सर्गान्तरेष्वपीति, तदनुरोधात् सर्वज्ञोऽपि सर्वशक्तिरपि पूर्वपूर्वसर्गानुसारेण वेदान् विरचयन्न स्वतन्त्रः । पुरुषस्वातन्त्र्यमात्रं चापौरुषेयत्वं रोचयन्ते जैमिनीया अपि, तच्चास्माकमपि समानमन्यत्राभिनिवेशात् । न चैकस्य प्रतिभानेऽनाश्वास इति युक्तम्, न हि बहूनामप्यज्ञानां विज्ञानां वाऽऽशयदोषवतां प्रतिभाने युक्त आश्वासः । तत्त्वज्ञानवतश्चापास्तसमस्तदोषस्यैकस्यापि प्रतिभाने युक्त एवाश्वासः । सर्गादिभुवां प्रजापतिदेवर्षीणां धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यसम्पन्नानामुपपद्यते तत् स्वरूपावधारणं, तत्प्रत्ययेन चार्वाचीनानामपि तत्र सम्प्रत्यय इत्युपपन्नं ब्रह्मणः शास्त्रयोनित्वं शास्त्रस्य चापौरुषेयत्वं प्रामाण्यं चेति ।
भामती-व्याख्या [ तैत्तिरीयसंहिता (२।५) में आख्यायिका आती है कि त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप की इन्द्र ने हत्या कर दी । त्वष्टा ने इन्द्र को मार डालनेवाले पुत्र की लिप्सा से सोमयाग का अनुष्ठान किया । उसमें इन्द्र का भाग नहीं रखा । इन्द्र ने स्वयं यज्ञ में आ कर बलपूर्वक सोमरस का पान किया । त्वष्टा ने सोमपात्र में बचे सोम-रस की आहुति डालते हुए मन्त्र पढ़ा— “स्वाहेन्द्रशत्रुर्वर्धस्व” । वहाँ 'इन्द्रस्य शत्रुः'—ऐसे षष्ठी तत्पुरुष का स्वर न बोल कर 'इन्द्रः शत्रुर्यस्य'—इस प्रकार बहुव्रीहि समास के स्वर का प्रयोग कर डाला । उसका फल यह हुआ कि उस याग से उत्पन्न वृत्रासुर नाम के पुत्र का हन्ता इन्द्र ही हो गया ] । अतः अन्य सृष्टि के आरम्भ में सर्वज्ञ परमेश्वर भी पूर्व-प्रचलित आनुपूर्वी के अनुसार ही वेदों का प्रचार कर देता है, उनकी नूतन रचना न करने के कारण परमात्मा को स्वतन्त्र नहीं माना जाता । वेदों में पुरुष की स्वतन्त्रता का न होना ही वेदों की अपौरुषेयता है—ऐसा जैमिनीय मत के आचार्य भी मानते हैं। वैसा ही हमारे वेदान्त में भी समानरूप से माना जाता है, किसी प्रकार के आग्रह की बात और है ।
शङ्का—एक ईश्वर ही यदि वेद-प्रवर्तक माना जाता है, तब यह भी सन्देह हो सकता हैं कि वह पूर्वप्रचलित वेदों का उपदेश करता है ? अथवा अपने नूतन रचित वेदों का प्रचार करता है ? अतः एक ईश्वर पर निर्भर न रह कर बहुत पुरुषों पर ही अध्ययनाध्यापन की परम्परा निर्भर रखनी चाहिए [ जैसा कि वार्तिककार कहते हैं—
अन्यथाकरणे चास्य बहुभ्यः स्यान्निवारणम् ।
एकस्य प्रतिभातं तु कृतकान्न विशिष्यते ॥
अतश्च सम्प्रदाये च नैकः पुरुष इष्यते ।
बहवः परतन्त्राः स्युः सर्वे ह्यद्यतवन्नराः ॥ ( श्लो. वा. पृ. ९०-९१ )
अर्थात् पूर्व-काल में जैसे वेदों का कोई एक पुरुष कर्त्ता नहीं रहा, वैसे ही सम्प्रदाय-प्रवर्तक भी कोई एक ईश्वर नहीं रहा, किन्तु आज-कल के समान ही अनेक परतन्त्र व्यक्तियों की परम्परा में वेद की अध्ययन-धारा प्रवाहित होती आ रही है ] ।
समाधान—यदि एक पुरुष पर विश्वास नहीं किया जा सकता, तब अनेक पुरुषों पर भी विश्वास नहीं किया जा सकता, क्योंकि यदि अज्ञानी पुरुषों की एक लम्बी परम्परा अथवा अनेक ज्ञानवान् किन्तु वञ्चक पुरुषों की परम्परा में जो बात आ रही है, वह कभी भी विश्वसनीय नहीं होती । यदि एक व्यक्ति भी तत्त्वज्ञ, विवेकी और आप्त पुरुष है, तब उसके प्रतिभान पर विश्वास किया जा सकता है। यदि हम लोग ईश्वर के स्वरूप का अवधारण नहीं कर सकते, तब भी सृष्टि के आरम्भ में होनेवाले प्रजापति, देव और ऋषिगण धर्म, ज्ञान, वैराग्य और पूर्ण ऐश्वर्य से सम्पन्न होते हैं, वे उस (ईश्वर) के स्वरूप का अवधारण भली प्रकार कर सकते हैं । उन पर पूर्ण विश्वास रखनेवाले अर्वाचीन व्यक्तियों को भी ईश्वर का स्वरूपावधारण सुलभ हो जाता है । फलतः वेदरूप शास्त्रों की कारणता ब्रह्म में, शास्त्रों
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अथवा,—यथोक्तमृग्वेदादि शास्त्रं योनिः कारणं प्रमाणमस्य ब्रह्मणो यथावत्स्वरूपाधिगमे। शास्त्रादेव प्रमाणाज्जगतो जन्मादिकारणं ब्रह्माधिगम्यत इत्यभिप्रायः। शास्त्रमुदाहृतं पूर्वसूत्रे—‘यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते’ इत्यादि। किमर्थं तर्हीदं सूत्रं ? यावता पूर्वसूत्र एवैवंजातीयकं शास्त्रमुदाहरता शास्त्रयोनित्वं ब्रह्मणो दर्शितम्। उच्यते,—तत्र पूर्वसूत्राक्षरेण स्पष्टं शास्त्रस्यानुपादानाज्जन्मादि केवलमनुमानमुपन्यस्तमित्याशङ्क्येत, तमाशङ्कां निवर्तयितुमिदं सूत्रं प्रववृते—शास्त्रयोनित्वादिति ॥ ३ ॥
भामती
वर्णकान्तरमारभते ॐ अथवा इति ॐ। पूर्वेणाधिकरणेन ब्रह्मस्वरूपलक्षणासम्भवशङ्कां व्युदस्य लक्षणसम्भव उक्तः, तस्यैव तु लक्षणस्यानेनानुमानत्वशङ्कामपाकृत्यागमोपदर्शनेन ब्रह्मणि शास्त्रं प्रमाणमुक्तम्। अक्षराथंस्वतिरोहितः ॥ ३ ॥
भामती-व्याख्या
में अपौरुषेयत्व और प्रामाण्य उपपन्न हो जाता है। इस सूत्र में 'शास्त्रस्य योनिः' और 'शास्त्रं योनिरस्य'—इस प्रकार द्विविध समास का अवलम्बन कर इस एक ही अधिकरण के दो वर्णक (अधिकरण-प्रकार भेद) हो जाते हैं, उनमें यहाँ तक प्रथम वर्णक समाप्त हो जाता है। [इस वर्णक का विषय वाक्य होता है—तस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद् यदृग्वेदः' (बृह. उ. २।४।१०)। यहाँ संशय होता है कि यह वाक्य ब्रह्म में शास्त्रप्रणेतृत्व का प्रतिपादक नहीं है ? अथवा है ? पूर्व पक्ष इस प्रकार किया गया कि वेद अपौरुषेय है, अतः वेदकर्तृत्व ब्रह्म में सम्भव नहीं और सिद्धान्त हो जाता है—"शास्त्रयोनित्वात्" । पुरुष-स्वातन्त्र्याभावरूप अपौरुषेयता का निर्वाह इस प्रकार भी हो जाता है कि सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर विगत सृष्टि में प्रचलित वेद का ही उपदेश करता है, नूतन रचना नहीं करता। अतः ब्रह्म में वेदकर्तृत्वरूप शास्त्रयोनित्व सम्भव हो जाता है, यह सब कुछ ब्रह्म में सर्वज्ञत्व के बिना समझस नहीं होता, अतः ब्रह्म में सर्वज्ञत्व पर्यवसित हो जाता है]।
द्वितीय वर्णक का आरम्भ किया जाता है—"अथवा"। पूर्व ('जन्माद्यस्य यतः'—इस) अधिकरण के द्वारा 'ब्रह्मणः स्वरूपलक्षणासम्भव'—इस प्रकार की शङ्का का निराकरण करके स्वरूपलक्षण को सम्भावित किया, 'जगज्जन्मादिकर्तृत्वरूप लक्षण' में अनुमानत्व की आशङ्का को इस अधिकरण के प्रथम वर्णक से निरस्त किया गया। इस अधिकरण के द्वितीय वर्णक के द्वारा ब्रह्म में शास्त्रप्रमाणकत्व प्रतिपादित किया गया, इससे ब्रह्म में अनुमान प्रमाण का निरास करके शास्त्र प्रमाण प्रदर्शित हो जाता है। इस वर्णक में सूत्र और भाष्य नितान्त सुस्पष्ट और सुगम है। [जैसे धर्म के लक्षण और प्रमाण की जिज्ञासा "चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मे" (जै. सू. १।१।२) इस एक ही सूत्र के द्वारा शान्त की गई है, वार्तिककार कहते हैं—
द्वयमेकेन सूत्रेण श्रुत्यर्थाभ्यां निरूप्यते ।
स्वरूपेऽपि हि तस्योक्तं प्रमाणं कथ्यतेऽर्थतः ॥ (श्लो. वा. पृ. ४५)
वैसे ही ब्रह्मणः किं स्वरूपम् ? इस प्रश्न का उत्तर "जन्माद्यस्य यतः" और ब्रह्मणि किं प्रमाणम् ? इसका उत्तर है—यह द्वितीय वर्णक 'शास्त्रयोनि' या 'शास्त्रलक्षणं ब्रह्म'। जगज्जन्मादिकारणत्व का अर्थ श्री सुरेश्वराचार्य ने जगदुपादानाश्रयत्व किया है—
अस्य द्वैतेन्द्रजालस्य यदुपादानकारणम् ।
अज्ञानं तदुपाश्रित्य ब्रह्म कारणमुच्यते ॥ (बृह. वा. पृ. ५०५)
वेदान्तसमन्वयविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ११५
( ४—समन्वयाधिकरणम् । सू० ४ )
कथं पुनर्ब्रह्मणः शास्त्रप्रमाणकत्वमुच्यते, यावता 'आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम्' ( जै० सू० १।२।१ ) इति क्रियापरत्वं शास्त्रस्य प्रदर्शितम् । अतो
भामती
शास्त्रप्रमाणकत्वमुक्तं ब्रह्मणः प्रतिज्ञामात्रेण, तदनेन सूत्रेण प्रतिपादनीयमित्युत्सूत्रं पूर्वपक्षमारभयति भाष्यकारः ॐ कथं पुनः इति ॐ । किमाक्षेपे । शुद्धबुद्धोदासीनस्वभावतयोपेक्षणीयं ब्रह्म भूतमभिदधतां वेदान्तानामपुरुषार्थोपदेशिनामप्रयोजनत्वापत्तेः, भूतार्थत्वेन च प्रत्यक्षादिभिः समानविषयतया लौकिकवाक्यवत् तदर्थानुवादकत्वेनाप्रामाण्यप्रसङ्गात् । न खलु लौकिकानि वाक्यानि प्रमाणान्तरविषयमर्थमवबोधयन्ति स्वतः प्रमाणम्, एवं वेदान्ता अपीत्यनपेक्षत्वलक्षणं प्रामाण्यमेषां व्याहन्येत । न च तैरप्रमाणैर्भवितुं युक्तम् । न चाप्रयोजनैः, स्वाध्यायाध्ययनविध्यापादितप्रयोजनवत्वनियमात् । तस्मात्तत्-
भामती-व्याख्या
इसी प्रकार अज्ञातज्ञापकत्वरूप प्रामाण्य शास्त्रों में ही माना गया है—
प्रमाणानि च शास्त्राणि तत्प्रामाण्यं न चान्यतः ।
अज्ञातात्मावबोधित्वात् तथा पूर्वमवादिषम् ॥ ( बृह. वा. पृ. ५१५ )
फलतः ब्रह्मणि प्रमाणं नास्ति ? अस्ति वा ? इस सन्देह का निराकरण इस द्वितीय वर्णक में किया गया है ] ।
पूर्व अधिकरण के द्वितीय वर्णक में जो कहा गया कि ब्रह्म में शास्त्र ( वेद ) प्रमाण है, वह केवल एक प्रतिज्ञामात्र है, उसका उपपादन इस समन्वयाधिकरण में करना है । उपपादन का अर्थ होता है—आक्षेपपूर्वक समाधान । इस सूत्र में केवल समाधान है, आक्षेप नहीं, अतः भाष्यकार सूत्र की परिधि से बाहर रह कर आक्षेप या पूर्व पक्ष की रचना कर रहे हैं—“कथं पुनः” । यहाँ जिस 'किम्' पद से 'थमु' प्रत्यय करके 'कथम्' शब्द बनाया गया है, वह 'किम्' पद आक्षेपार्थक है, प्रश्नादि का वाचक नहीं। इस प्रकार 'कथं पुनः ब्रह्मणः शास्त्रप्रमाणकत्वमुच्यत ?' इस वाक्य का अर्थ होता है—“यदुक्तं शास्त्रप्रमाणकं ब्रह्मेति, तन्न”। अतः पूर्व अधिकरण से इस अधिकरण की आक्षेपिकी संगति फलित होती है। आक्षेपवादी प्रमेय ( ब्रह्म ) और प्रमाण ( वेदान्त ) दोनों में अनौचित्य का प्रदर्शन करता है—ब्रह्म शुद्ध, बुद्ध और उदासीनस्वभाव का होने से न हेय और न उपादेय, किन्तु उपेक्षणीयमात्र है। इस प्रकार के निष्प्रयोजन और सिद्ध ब्रह्म के उपदेशक वेदान्त-वाक्य भी निरर्थक हैं। केवल निरर्थक ही नहीं, अपितु प्रत्यक्षादि प्रमाणों के विषयीभूत सिद्ध ब्रह्म का बोधन करना अनुवाद मात्र है, अनुवादक वाक्य गृहीतग्राही होने के कारण प्रमाण भी नहीं माने जाते । जो कहा जाता है कि वेद स्वतःप्रमाण है, वह भी संगत नहीं क्योंकि जैसे प्रमाणान्तरविषय-विषयक लौकिक वाक्य स्वतः प्रमाण नहीं माने जाते, वैसे ही उसी प्रकार के वैदिक वाक्य भी स्वतःप्रमाण क्योंकर होंगे ? महर्षि जैमिनि ने शब्द में प्रमाणता के लिए इतरप्रमाणानपेक्षत्व आवश्यक माना है—“औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धः, तस्य ज्ञानमुपदेशोऽव्यतिरेकश्चार्थेऽनुपलब्धे तत्प्रमाणं बादरायणस्यानपेक्षत्वात्” ( जै. सू. १।१।५ ) । वेदान्त-वाक्यों को जब अपने अर्थ के बोधन में प्रत्यक्षादि की अपेक्षा हो जाती है, तब उनमें अनपेक्षत्व नहीं रहता । वेदान्त-वाक्यों को अप्रमाण या निष्प्रयोजन भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि “स्वाध्यायोऽध्येतव्यः” ( शत. ब्रा. ११।५।६ ) इस विधि वाक्य के द्वारा वेदों में प्रयोजनवत्ता का आपादन किया जाता है, क्योंकि निष्प्रयोजनभूत वाक्यों के अध्ययन का विधान सम्भव नहीं । फलतः
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वेदान्तानामानर्थक्यम्; अक्रियार्थत्वात्। कर्तृदेवतादिप्रकाशनार्थत्वेन वा क्रियाविधि- शेषत्वम्; उपासनादिक्रियान्तरविधानार्थत्वं वा। न हि परिनिष्ठितवस्तुप्रतिपादनं संभवति; प्रत्यक्षादिविषयत्वात्परिनिष्ठितवस्तुनः; तत्प्रतिपादने च हेयोपादेयरहिते पुरुषार्थाभावात्। अत एव 'सोऽरोदीद्' इत्येवमादीनामानर्थक्यं मा भूदिति 'विधिना त्वेकवाक्यत्वात्स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः' (जै० सू० १।२।७) इति स्तावकत्वेनार्थव-
भामती
विहितकर्मापेक्षितकर्तृदेवतादिप्रतिपादनपरत्वेनैव क्रियार्थत्वम्। यदि त्वसन्निधानात्तत्परत्वं न रोचयन्ते, ततः सन्निहितोपासनादिक्रियापरत्वं वेदान्तानाम्। एवं हि प्रत्यक्षाद्यनधिगतगोचरत्वेनानपेक्षतया प्रामाण्यं च प्रयोजनवत्त्वं च सिध्यतीति तात्पर्यार्थः। पारमर्षसूत्रोपन्यासस्तु पूर्वपक्षदाढर्याय। आनर्थक्यं चाप्रयो- जनत्वम्, सापेक्षतया प्रमानुत्पादकत्वं चानुवादकत्वादिति। ॐ अतः ॐ इत्यादि ॐ वा ॐ इत्यन्तं ग्रहणक-
भामती-व्याख्या
विहित कर्मों में अपेक्षित कर्त्ता और देवतादि का प्रतिपादन कर वेदान्त-वाक्य कर्म (धर्म) के अङ्ग हो सकते हैं। यदि कर्म-काण्ड से दूर पठित होने के कारण वेदान्त कर्मार्थक नहीं हो सकते, तब उपनिषत्काण्ड में प्रतिपादित प्राणादि की उपासना में वेदान्त-वाक्यों का उपयोग माना जा सकता है। इस प्रकार प्रत्यक्षादि प्रमाणों से अनधिगत पदार्थों के प्रतिपादक वेदान्त- वाक्यों में अनपेक्षत्व, प्रामाण्य और प्रयोजनवत्त्व सिद्ध हो जाता है।
भाष्यकार ने महर्षि जैमिनि के सूत्र का उपन्यास पूर्व पक्ष को दृढ़ बनाने के लिए किया है [ आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानार्थक्यमतदर्थानां तस्मादनित्यमुच्यते'' (जै. सू. १।२।१) यह सूत्र यद्यपि अर्थवादाधिकरण का पूर्वपक्ष-सूत्र है, सिद्धान्त-सूत्र नहीं, तथापि यहाँ भी पूर्वपक्ष की दृढ़ता के लिए ही प्रयुक्त हुआ है। उसका अर्थ यह है कि आम्नाय (समस्त वेद) क्रिया (अग्निहोत्रादि कर्मों) के विधान में ही पर्यवसित होता है। वेदान्त-वाक्यों के समान जो वाक्य क्रियापरक नहीं, वे अनर्थक हैं, अतः अनित्य (अप्रमाण) माने जाते हैं]। वेदान्त- वाक्यों में जो आनर्थक्य कहा गया है, उसका अर्थ अप्रयोजनवत्त्व अथवा प्रत्यक्षादि-सापेक्ष एवं अनुवादकमात्र होने के कारण प्रमानुत्पादकत्व ही आनर्थक्य कहा गया है—'अतः' से लेकर 'वा' तक ["अतो वेदान्तानामानर्थक्यमक्रियार्थत्वात्, कर्तृदेवतादिप्रकाशनार्थत्वेन वा क्रियाविधिशेषत्वम्, उपासनादिक्रियान्तरविधानार्थत्वं वा"-यह] वाक्य ग्रहणक वाक्य (संग्रह, संक्षिप्त या व्याख्येय भाष्य) है और उसका व्याख्यान भाष्य है—"'न हि" से लेकर "उपपन्नो वा" यहाँ तक। [उसका तात्पर्य यह कहा जा चुका है कि परिनिष्ठित (सिद्ध) पदार्थ का प्रतिपादन सम्भव नहीं, क्योंकि सिद्ध पदार्थ प्रत्यक्ष प्रमाण का विषय होता है, सिद्ध पदार्थ न तो हेय होता है और न उपादेय, अतः उसके प्रतिपादन से कोई भी पुरुषार्थ सिद्ध नहीं होता, अत एव वेद में परिगृहीत सिद्धार्थक आख्यानों का कर्म की स्तुति या निन्दा में तात्पर्य मान कर विधि वाक्यों से एक-वाक्यता स्थापित किया जाता है, जैसे-सोऽरोदीद् यदरौदीत्तद्रुद्रस्य रुद्रत्वम्" (तै. सं. १।५।१)। अर्थात् 'देवता और असुर परस्पर युद्ध करने के लिए सन्नद्ध हैं, देवतागण अपना चाँदी-सोना अग्निदेव के पास धरोहर रख देते हैं। युद्ध जीत कर आते हैं, अपनी धरोहर अग्निदेव से माँगते हैं, वह धन लेकर भागता है, पीछा करनेवाले देवगण उसे मारने लगते हैं। अग्नि एक स्थान पर बैठ कर रोने लगता है। उसके नेत्रों से जो आँसू निकलते हैं, वे पृथिवी पर पड़ते ही रजत बन जाते हैं, रजत ने अग्निदेव से रुदन कराया, अतः उसका नाम 'रुद्र' है, यज्ञ में रजत की दक्षिणा नहीं दी जाती।' इस आख्यायिका की "बर्हिषि रजतं न देयम्"-इस निषेध वाक्य के साथ एकवाक्यता की जाती
वेदान्तसमन्वयविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ११७
त्त्वमुक्तम्। मन्त्राणां च 'इषे त्वा' इत्यादीनां क्रियातत्साधनाभिधायित्वेन कर्मसमवायि- त्त्वमुक्तम्। न क्वचिदपि वेदवाक्यानां विधिसंस्पर्शमन्तरेणार्थवत्ता दृष्टोपपन्ना वा।
भामती
वाक्यम्। अस्य विभागभाष्यं ॐ न हि ॐ इत्यादि ॐ उपपन्ना वा ॐ इत्यन्तम्।
स्यादेतत् — अक्रियार्थत्वेऽपि ब्रह्मस्वरूपविधिपरा वेदान्ता भविष्यन्ति, तथा च विधिना त्वेक- वाक्यत्वादिति सिद्धान्तसूत्रमनुग्रहीष्यते। न खल्वप्रवृत्तप्रवर्त्तनमेव विधिः। उत्पत्तिविधेरज्ञातज्ञापनाथं- त्वात्। वेदान्तानां चाज्ञातं ब्रह्म ज्ञापयतां तथाभावदित्यत आह ॐ न च परिनिष्ठित इति ॐ। अना- गतोत्पाद्यभावविषय एव हि सर्वो विधिरूपेयोऽधिकारविनियोगप्रयोगोत्पत्तिरूपाणां परस्पराविनाभावात्, सिद्धे च तेषामसम्भवात्। तद्वाक्यानां त्वैदमर्थ्यं भिद्यते। यथाऽग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकाम इत्यादि- भ्योऽधिकारविनियोगप्रयोगाणां प्रतिलम्भादग्निहोत्रं जुहोतीत्युत्पत्तिमात्रपरं वाक्यम्। न त्वत्र विनि- योगादयो न सन्ति, सन्तोऽप्यन्यतो लब्धत्वात् केवलमविवक्षिताः। तस्माद् भावनाविषयो विधानं सिद्धे
भामती-व्याख्या
है—'यस्माद्रजतं रोदितवान्, तस्माद् यागे दक्षिणारूपेण न देयम्।'
इसी प्रकार "इषे त्वा उर्जे त्वा" (माध्यन्दिन. १।१) इत्यादि मन्त्रों का 'इषे त्वेति छिनत्ति"—इत्यादि पलाश-शाखा-छेदनादि कर्मों में उपयोग करने के लिए सभी अर्थवाद- वाक्यों की विधि वाक्यों से एकवाक्यता की जाती है—"विधिना त्वेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः" (जै. सू. १.२।७) अर्थात् अर्थवाद वाक्य विधि वाक्यों के साथ एकवाक्यतापन्न होकर विधेय पदार्थ की स्तुति और निषेध्य पदार्थ की निन्दा में उपयोगी होते हैं]।
शङ्का—यद्यपि वेदान्त-वाक्य किसी क्रिया (कर्म) का प्रतिपादन नहीं करते, तथापि ब्रह्मस्वरूप के विधायक हो सकेंगे, ऐसा मानने पर "विधिना त्वेकवाक्यत्वात्" (जै. सू. १।२।७) यह सिद्धान्त सूत्र भी अनुपालित हो जाता है। अप्रवृत्त पुरुष के प्रवर्तक वाक्य को ही विधि वाक्य नहीं कहते, क्योंकि 'यदाग्नेयोऽष्टाकपालः (तै. सं. २।६।३।३) इत्यादि उत्पत्ति विधि (कर्म के स्वरूपभूत द्रव्य और देवता के प्रकाशक) वाक्य किसी के प्रवर्तक न होकर केवल अज्ञात अर्थ के प्रकाशकमात्र होते हैं। वेदान्त-वाक्य भी अज्ञात ब्रह्म का प्रतिपादन करते हैं, अतः ब्रह्म-स्वरूप के विधायक हो सकते हैं।
समाधान—उक्त शङ्का का निरास करने के लिए भाष्यकार कहते हैं—"न च परिनिष्ठिते वस्तुस्वरूपे विधिः सम्भवति"। सभी विधि वाक्यों का भविष्य में उत्पन्न होनेवाला भावनारूप कार्य ही विषय होता है, क्योंकि अधिकार, विनियोग, प्रयोग और उत्पत्ति विधियों का परस्पर अविनाभाव होता है, सिद्ध वस्तु में अधिकारादि (अप्रवृत्त-प्रवर्त्तनादि) सम्भावित नहीं। कर्मों के प्रकरण में प्रायः सभी वाक्य होते हैं, जहाँ सब नहीं होते, कोई एक ही वाक्य होता है, वहाँ भी सभी वाक्यों की कल्पना कर ली जाती है, क्योंकि सबका प्रयोजन भिन्न- भिन्न होता है। जैसे "अग्निहोत्रं जुहोति"—इत्यादि वाक्यों से अधिकार, विनियोग और प्रयोग विधियों का लाभ हो जाता है। "अग्निहोत्रं जुहोति"—यह वाक्य कर्म की उत्पत्ति- मात्र का प्रतिपादक है, किन्तु यहाँ विनियोगादि नहीं हैं अथवा अन्यतः प्राप्त हो जाने से अविवक्षितार्थक हैं—यह बात नहीं। [सभी चार प्रकार के विधि वाक्य होते हैं—(१) उत्पत्ति विधि, (२) विनियोग विधि, (३) अधिकार विधि और (४) प्रयोग विधि। कर्म के दो रूप होते हैं—द्रव्य और देवता, क्योंकि किसी देवता के उद्देश्य से किसी द्रव्य का त्याग ही यागादि कर्म कहलाता है। कर्म के रूपों का बोधक वाक्य उत्पत्ति विधि है, जैसे—'अग्निहोत्रं जुहोति" (तै. सं. १।५।९।१)। कर्म के अङ्गों का विधायक वाक्य विनियोग विधि है, जैसे—
११८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४
न च परिनिष्ठिते वस्तुस्वरूपे विधिः संभवति, क्रियाविषयत्वाद्धि विधेः। तस्मात्कर्मापे- क्षितकर्तृस्वरूपदेवतादिप्रकाशनेन क्रियाविधिशेषत्वं वेदान्तानाम्। अथ प्रकरणान्तर- भयान्नैतदभ्युपगम्यते, तथापि स्ववाक्यगतोपासनादिकर्मपरत्वम्। तस्मान्न ब्रह्मणः शास्त्रयोनित्वमिति प्राप्ते उच्यते,—
तत्तु समन्वयात् ॥ ४ ॥
तुशब्दः पूर्वपक्षव्यावृत्त्यर्थः। तद् ब्रह्म सर्वज्ञं सर्वशक्ति जगदुत्पत्तिस्थितिलय- कारणं वेदान्तशास्त्रादेवावगम्यते। कथम्? समन्वयात्। सर्वेषु हि वेदान्तेषु
भामती
वस्तुनि भवितुमर्हतीति। उपसंहरति ॐ तस्माद् इति ॐ। अत्रारुचिकारणमुक्त्वा पक्षान्तरमुपसंक्रामति। ॐ अथ इति ॐ। एवं च सत्युपक्रमे भङ्गेण शब्दस्यातात्पर्यात् प्रमाणान्तरेण यादृशमस्य रूपं व्यव- स्थाप्यते न तच्छब्देन विरुध्यते, तस्योपासनापरत्वात्, समारोपेण चोपासनाया उपपत्तेरिति। प्रकृतमुप- संहरति ॐ तस्मान्न ॐ इति। सूत्रेण सिद्धान्तयति ॐ एवं प्राप्त उच्यते ॐ तत्तु समन्वयात्।
तदेतद् व्याचष्टे ॐ तुशब्दः इति ॐ। तदित्युत्तरपक्षप्रतिज्ञां विभजते ॐ तद् ब्रह्म इति ॐ। पूर्वपक्षवादी कर्कशाशयः पृच्छति ॐ कथम् ॐ। कुतः प्रकारादित्यर्थः। सिद्धान्ती स्वपक्षे हेतुं प्रकार- मेवमाह ॐ समन्वयात् ॐ। सम्यगन्वयः समन्वयस्तस्मात्। एतदेव विभजते ॐ सर्वेषु हि वेदान्तेषु
भामती-व्याख्या
"दध्ना जुहोति" इत्यादि। कर्म का उसके फल विशेष के साथ सम्बन्ध-बोधक वाक्य अधिकार विधि है, जैसे—"अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः"। इन सभी वाक्यों की एकवाक्यता करके जो महावाक्य सम्पन्न होता है, उसे प्रयोग विधि कहते हैं। विनियोग वाक्य के (१) श्रुति, (२) लिङ्ग, (३) वाक्य, (४) प्रकरण, (५) स्थान और (६) समाख्या— ये छः प्रमाण सहायक होते हैं और प्रयोग विधि के सहायक प्रमाण होते हैं—(१) श्रुति, (२) अर्थ, (३) पाठ, (४) स्थान, (३) मुख्य और (६) प्रवृत्ति। इनकी चर्चा आती ही रहती है]। फलतः विधि सदैव साध्यरूप भावनाविषयक होती है, ब्रह्मादिरूप सिद्ध पदार्थों की विधि नहीं हो सकती विधि वाक्यों की क्रियापरता का उपसंहार किया जाता है—"तस्मात् कर्मापेक्षितकर्तृस्वरूपदेवतादिप्रकाशनेन क्रियाविधिशेषत्वं वेदान्तानाम्"।
वेदान्त-वाक्यों की कर्मपरता में अरुचि के कारण उपासनापरत्वरूप पक्षान्तर का उपन्यास किया जाता है—"अथ प्रकरणान्तरभयान्नैतदभ्युपगम्यते, तथापि स्ववाक्यगतो- पासनादिकर्मपरत्वम्"। इस प्रकार यह निष्कर्ष निकलता है कि कथित (शुद्ध, बुद्ध, सिद्ध- स्वभावक ब्रह्म में वेदान्त-वाक्यों का तात्पर्य नहीं और उपक्रमादि प्रमाणों के आधार पर जो जीव-ब्रह्माभेदरूप अर्थ व्यवस्थापित होता है, वह वेदान्त-वाक्यों के उपासना परकत्व-पक्ष में विरुद्ध नहीं पड़ता, क्योंकि उपासना तो आरोप के द्वारा भी हो सकती है, जीव में ब्रह्मरूपता का आरोप कर "तत्त्वमसि" आदि महावाक्यों का सामञ्जस्य स्थापित किया जा सकता है। अतः सिद्ध ब्रह्म में शास्त्रप्रमाणकत्व सम्भव नहीं।
उक्त आक्षेप का निराकरण करने के लिए इस सूत्र को सिद्धान्त के रूप में प्रस्तुत किया जाता है—"एवं प्राप्ते उच्यते तत्तु समन्वयात्"। इसकी व्याख्या की जाती है—"तु शब्दः पूर्वपक्षव्यावृत्त्यर्थः"। उत्तर सूत्र में 'तत्' पद से जो प्रतिज्ञा की गई, उसका स्पष्टी- करण किया जाता है—"तद् ब्रह्म"। अर्थात् ब्रह्म शास्त्रप्रमाणक है। पूर्व पक्षी कर्कश आशय से पूछता है—"कथम् ?" अर्थात् "केन प्रकारेण ब्रह्म शास्त्रप्रमाणकमुच्यते?" सिद्धान्ती अपनी प्रतिज्ञा के उचित हेतु का प्रदर्शन करता है ब्रह्म में शास्त्रप्रमाणकत्व की सिद्धि का
वेदान्तसमन्वयविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ११९
वाक्यानि तात्पर्येणैतस्यार्थस्य प्रतिपादकत्वेन समनुगतानि । 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' । एकमेवाद्वितीयम् (छान्दो० ६।२।१) 'आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्' (ऐत० १।१।१।१ ) 'तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यम्' । 'अयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः' ( बृह० २।५।१९) 'ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्तात्' (मुण्ड० २।२।११) इत्यादीनि । न च तद्गतानां पदानां
भामती
इति ॐ : वेदान्तानामाभ्यासिकीं ब्रह्मपरतामाचिख्यासुर्बहूनि वाक्यान्युदाहरति ॐ सदेव इति ॐ । यतो वा इमानि भूतानीति तु वाक्यं पूर्वमुपाहृतं जगदुत्पत्तिस्थितिनाशाकारणमिति चेह स्मारितमिति न पठितम् । येन हि वाक्यमुपक्रम्यते येन चोपसंह्रियते, तदेव वाक्यार्थ इति शाब्दाः । यथोपांशुयाजवाक्येऽनूचोः पुरोडाशयोर्जा मितादोषसङ्कीर्त्तनपूर्वकमुपांशुयाजविधाने तत्प्रतिसमाधानोपसंहारे चापूर्वोपांशुयाजकर्मविधिपरतयैकवाक्यताबलादाधिता, एवमत्रापि सदेव सोम्येदमिति ब्रह्मोपक्रमात् तत्त्वमसीति च जीवस्य ब्रह्मात्मतोपसंहारात् तत्परतैव वाक्यस्य । एवं वाक्यान्तराणामपि पौर्वापर्य्यालोचनया ब्रह्मपरत्वमवगन्तव्यम् । न च तत्परत्वस्य दृष्टस्य सति सम्भवेऽन्यपरताऽदृष्टा युक्ता कल्पयितुम्, अतिप्रसङ्गात् । न केवलं
भामती-व्याख्या
प्रकार बता रहा है—"समन्वयात्" । 'शास्त्रं ब्रह्मणि प्रमाणम्, तात्पर्यतः ब्रह्मणि समनुगतत्वात्'—इस प्रकार के अनुमान में हेतुगत पक्षधर्मता का प्रतिपादन 'समन्वय' पद के द्वारा किया गया है, अतः 'सम्यग् अन्वयः, समन्वयः'—यहाँ सम्यक् शब्द का अर्थ होता है—तात्पर्यतः । वेदान्त-वाक्यों की नियमतः ब्रह्मपरता दिखाने के लिए वैसे बहुत-से वाक्यों का उदाहरण प्रस्तुत किया गया है—“सदेव सौम्य ! इदमग्र आसीत्” (छां. ६।२।१) । सूत्रकार ने 'तत्' पद के द्वारा द्वितीय सूत्रोपात्त जगज्जन्मादिकारणीभूतब्रह्म-बोधक वाक्य का स्मरण दिला दिया, अतः सूत्र में उस वाक्य के रखने की आवश्यकता नहीं। भाष्योदाहृत वेदान्तवाक्य में ब्रह्मपरकत्व का प्रकार यह है कि जिस पदार्थ का उपक्रम कर जिस अर्थ में प्रकरण का उपसंहार किया जाता है, वही पदार्थ उस प्रकरण का मुख्य अर्थ माना जाता है, जैसे [ 'जामि वा एतद् यज्ञस्य क्रियते यदन्वञ्चौ पुरोडाशौ, उपांशुयाजमन्तरा यजति, विष्णुरुपांशु यष्टव्योऽजामित्वाय, प्रजापतिरुपांशु यष्टव्योऽजामित्वायाग्नीषोमावुपांशु यष्टव्यावजामित्वाय” ( तै. सं. २।६।६ ) । इस वाक्य को लेकर मीमांसा दर्शन ( २।१।४ ) में संशय किया गया है कि “उपांशुयाजमन्तरा यजति”—इस वाक्य के द्वारा विष्ण्वादिवाक्यों में विहित तीनों यागों का अनुवाद किया गया है? या उपांशुयाजसंज्ञक नूतन कर्म का विधान किया गया है? अनुवादकत्व का पूर्व पक्ष करने के अनन्तर सिद्धांत किया गया है कि ] उपांशुयाज के विधायक उक्त वाक्य में कहा गया है कि पौर्णमाससंज्ञक 'आग्नेय', 'अग्नीषोमीय' और 'उपांशु'—इन तीनों यागों में प्रथम दो याग पुरोडाश द्रव्य और उपांशुयाज घृत से किया जाता है । पुरोडाशद्रव्यक दोनों भागों को निरन्तर ( अव्यवहित ) करने पर एक ही द्रव्य को लेकर जामित्व ( आलस्य ) आ जाता है, अतः उस दोष से बचने के लिए उन दोनों भागों के मध्य में घृतद्रव्यवाला उपांशुयाज करना चाहिए । अतः उपक्रम में जामित्व दोष दिखाकर मध्य में उपांशु याज के विधान से उक्त दोष का समाधान ( निस्तार ) दिखाया गया, अतः उक्त वाक्य पूरा एक है और उसका तात्पर्य उपांशुयाज के विधान में माना जाता है । वैसे ही प्रकृत में भी ब्रह्म का उपक्रम कर 'तत्त्वमसि' पद के द्वारा जीव से ब्रह्म का अभेद प्रदर्शित कर ब्रह्म में ही उपसंहार किया गया, अतः छान्दोग्योपनिषत् के इस प्रकरण का तात्पर्य ब्रह्म में निश्चित होता है । इसी प्रकार भाष्योदाहृत अन्य वाक्यों के पौर्वापर्य का पर्यालोचन वाक्यों में ब्रह्मपरता का निश्चय कर
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ब्रह्मस्वरूपविषये निश्चिते समन्वयेऽवगम्यमानेऽर्थान्तरकल्पना युक्ता; श्रुतहान्यश्रुतकल्पनाप्रसङ्गात् । न च तेषां कर्तृस्वरूपप्रतिपादनपरतावसीयते, ‘तत्केन कं पश्येत्’ ( बृह० २।४।१३ ) इत्यादिक्रियाकारकफलनिराकरणश्रुतेः । न च परिनिष्ठितवस्तुस्वरूपत्वेऽपि प्रत्यक्षादिविषयत्वं ब्रह्मणः; ‘तत्त्वमसि’ ( छान्दो० ६।८।७ ) इति ब्रह्मात्म-
भामती
कर्तृपरता तेषामदृष्टाऽनुपपन्ना चेत्याह ॐ न च तेषाम् इति ॐ । सापेक्षत्वेनाप्रामाण्यं पूर्वपक्षबीजं दूषयति ॐ न च परिनिष्ठितवस्तुस्वरूपत्वेऽपि इति ।
अयमाभिसन्धिः—पुंवाक्यनिदर्शनेन हि भूतार्थतया वेदान्तानां सापेक्षत्वमाशङ्क्यते, तत्रेवं भवान् पृष्टो व्याचष्टाम्, किं पुंवाक्यानां सापेक्षता भूतार्थत्वेनाहो पौरुषेयत्वेन ? यदि भूतार्थत्वेन ततः प्रत्यक्षादीनामपि परम्परापेक्षत्वेनाप्रामाण्यप्रसङ्गः, तान्यपि हि भूतार्थान्येव । अथ पुरुषबुद्धिप्रभवतया पुंवाक्यं सापेक्षम्, एवं तर्हि तदपूर्वकाणां वेदान्तानां भूतार्थानामपि नाप्रामाण्यं प्रत्यक्षादीनामिव नियतेन्द्रियलिङ्गादिजन्मनाम् । यद्युच्येत सिद्धे किलापौरुषेयत्वे वेदान्तानामनपेक्षतया प्रामाण्यं सिद्ध्येत्, तदेव तु भूतार्थत्वेन न सिद्धयति, भूतार्थस्य शब्दानपेक्षेण पुरुषेण मानान्तरतः शक्यज्ञानत्वाद् बुद्धिपूर्वविरचनोपपत्तेः, वाक्यत्वादिलिङ्गकस्य वेदपौरुषेयत्वानुमानस्याप्रत्यूहमुत्पत्तेः । तस्मात् पौरुषेयत्वेन सापेक्षत्वं दुर्वारं, त तु भूतार्थत्वेन । कार्यार्थत्वे तु कार्यस्यापूर्वस्य मानान्तरागोचरतयाऽत्यन्ताननुभूतपूर्वस्य तत्त्वेन समारोपेण वा पुरुषबुद्धावनारोहात् तदर्थानां वेदान्तानामशक्यरचनतया पौरुषेयत्वाभावादनपेक्षं
भामती-व्याख्या
लेना चाहिए । वेदान्त-वाक्यों में जब ब्रह्मपरता दृष्ट और सम्भव है, तब अदृष्ट क्रियापरत्वादि की कल्पना युक्त नहीं, अन्यथा कर्मपरक वाक्यों को ब्रह्मपरक मानने का अतिप्रसङ्ग भी उपस्थित हो जायगा । वेदान्त-वाक्यों में कर्तृभोक्तृ-प्रतिपादकता केवल अदृष्ट ही नहीं, अनुपपन्न भी है—‘न च तेषां कर्तृस्वरूपप्रतिपादनपरताऽवसीयते ।
पूर्वपक्षी ने वेदान्त-वाक्यों में जो प्रत्यक्षादि-सापेक्षत्वेन अनपेक्षत्वात्मक प्रामाण्य का अभाव प्रसक्त किया था, उसकी निवृत्ति की जा रही है—‘न च परिनिष्ठितवस्तुस्वरूपत्वेऽपि’ । आशय यह है कि पूर्वपक्षी ने सिद्धार्थ-प्रतिपादक पौरुषेय वाक्यों का उदाहरण देकर वेदान्त-वाक्यों में सापेक्षत्व की आशङ्का की थी, वहाँ यह प्रश्न उठता है कि पुरुष के वाक्यों में सापेक्षता भूतार्थत्वेन प्रसक्त की जाती है ? अथवा पुरुष-कृतत्वेन ? यदि सिद्धार्थविषयकत्वेन सापेक्षत्व और अप्रामाण्य माना जाता है, तब प्रत्यक्षादि प्रमाणों में भी परस्पर-सापेक्षता होने के कारण अप्रामाण्य होना चाहिए, क्योंकि वे भी सिद्धार्थविषयक होते हैं । यदि पौरुषेय वाक्य पुरुष-कृत होने के कारण पौरुषेय वाक्य सापेक्ष माने जाते हैं, तब वेदान्त-वाक्यों में पुरुष-कृतत्व न होने के कारण सिद्धार्थकत्व मानने पर भी वैसे ही अप्रामाण्य प्रसक्त नहीं होता, जैसे कि नियत इन्द्रिय और लिङ्गादि से जनित प्रत्यक्षादि प्रमाणों में ।
**शङ्का—**यदि कहा जाय कि वेदान्त-वाक्यों में अपौरुषेयत्व सिद्ध हो जाने पर ही अनपेक्षत्वात्मक प्रामाण्य सिद्ध होगा, वह अपौरुषेयत्व ही सिद्धार्थविषयकत्वेन सिद्ध नहीं होता, क्योंकि सिद्ध वस्तु का ज्ञान शब्द के बिना ही प्रत्यक्षादि प्रमाणों के द्वारा सम्पादित करके पुरुष तद्बोधक वाक्य की रचना स्वयं कर सकता है, वेद में भी वाक्यत्वरूप लिङ्ग के द्वारा पौरुषेयत्व का अनुमान हो जाता है—‘वेदाः पौरुषेयाः वाक्यत्वाद् भारतादिवाक्यवत्’ । अतः वेदान्त-वाक्यों में पौरुषेयत्वेन सापेक्षत्व प्रसक्त होता है, भूतार्थत्वेन नहीं । जब वेदान्त-वाक्यों को कार्यपरक माना जाता है, तब कार्यरूप पदार्थ अपूर्व होने के कारण प्रमाणान्तर का विषय नहीं होता, अत्यन्त अननुभूत वस्तु का बुद्धि में न तो तत्त्वेन आरोहण
सिद्धार्थंत्वविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १२१
भामती
प्रमाणत्वं सिध्यतीति प्रामाण्याय वेदान्तानां कार्यपरत्वमातिष्ठामहे ।
अत्र ब्रूमः—किं पुनरिदं कार्यमभिमतमायुष्मतः यदशक्यं पुरुषेण ज्ञातुम् ? अपूर्वमिति चेत् , हन्त कुतस्त्यमस्य लिङाद्यर्थत्वं, तेनालौकिकेन सङ्गतिसंवेदनविरहात् ? लोकानुसारतः क्रियाया एव लौकिक्याः कार्याया लिङादेरवगमात् । स्वर्गकामो यजेतेति साध्यस्वर्गविशिष्टो नियोज्योऽवगम्यते, स च तदेव कार्यमवगच्छति यत् स्वर्गानुकूलं, न च क्रिया क्षणभङ्गुराऽऽमुष्मिकाय स्वर्गाय कल्पत इति परिशेषाद्भवत एवापूर्वं कार्ये लिङादीनां सम्बन्धग्रह इति चेत् , हन्त चैत्यवन्दनादिवाक्येष्वपि स्वर्गकामादिवदसम्बन्धादपूर्वकार्यत्वप्रसङ्गस्तथा च तेषामप्यशक्यरचनत्वेनापौरुषेयत्वापातः। स्वप्नदृष्टेन पौरुषेयत्वेन वा तेषामपूर्वार्थत्वप्रतिषेधे वाक्यत्वादिनो लिङ्गेन वेदानामपि पौरुषेयत्वमनुमितमित्यपूर्वार्थता न स्यात् । अन्यतस्तु वाक्यत्वादिनानुमानाभासत्वोपपादने कृतमपूर्वार्थत्वेनात्र तदुपपादनेन ? उपपादितं चापौरुषेयत्वमस्माभिर्न्यायकणिकायाम् , इह तु विस्तरभयान्नोक्तम् । तेनापौरुषेयत्वेऽसिद्धे भूतार्थानामपि
भामती-व्याख्या
होता है और न अतत्त्वेन ( अन्यरूपारोपेण ) । कार्यार्थक वेदान्त-वाक्यों की रचना पुरुष के द्वारा नहीं हो सकती, अपौरुषेयत्व होने के कारण अनपेक्षत्वात्मक प्रामाण्य सिद्ध हो जाता है, अतः एव वेदान्त-वाक्यों को हम कार्यपरक मानते हैं ।
समाधान—वह कार्य पदार्थ क्या है, जिसे पुरुष जान नहीं सकता ? यदि प्रभाकर-सम्मत अपूर्व ( अदृष्ट ) को कार्य कहा जाता है, तब वह लिङादि विधि प्रत्ययों का वाच्य नहीं हो सकता, क्योंकि लोक में अप्रसिद्ध अर्थ के साथ किसी भी शब्द का शक्ति-ग्रह नहीं होता । लोक में तो लिङादि शब्दों के द्वारा लौकिक क्रिया का ही अभिधान होता है ।
शङ्का—"स्वर्गकामो यजेत" इस वाक्य से स्वर्गादिरूप साध्य की कामना से विशिष्ट नियोज्य ( अधिकारी ) प्रतीत होता है, वह उसी पदार्थ को अपना कार्य ( कृति-साध्य ) समझता है, जो स्वर्ग का उत्पादन कर सके । यागादि क्रिया तो क्षण-भङ्गुर है, जन्मान्तर में होनेवाले स्वर्गादि फलों का उत्पादन नहीं कर सकती, परिशेषतः स्वर्गकामपद-समभिव्याहार-संज्ञक तर्क से सहकृत वैदिक वाक्यों के द्वारा ही अलौकिक कार्य के साथ लिङादि का संगति-ग्रह हो जाता है, जैसा कि शालिकनाथ मिश्र कहते हैं—
तस्मान्नियोज्यसम्बन्धसमर्थं विधिवाचिभिः ।
कार्यं कालान्तरास्थायि क्रियातो भिन्नमुच्यते ॥
तस्माल्लोकानुसारेण व्युत्पत्तिः कार्यमात्रके ।
तस्य त्वपूर्वरूपत्वं वेदवाक्यानुसारतः ॥ ( प्र. पं. पृ. ४२६,४८ )
समाधान—यदि 'स्वर्गकाम' पद से समभिव्याहृत लिङादि अपूर्व कार्य का बोध करा देते हैं, तब "चैत्यमभिवन्देत स्वर्गकामः"—इत्यादि वाक्यों में भी स्वर्गकाम पद-समभिव्याहृत लिङादि से अपूर्व कार्य का बोध होना चाहिए । यदि वैसा वहाँ भी मान लिया जाता है, तब ऐसे बौद्ध वाक्यों की भी रचना किसी पुरुष के द्वारा सम्भव नहीं, अतः इन वाक्यों को भी वेदों के समान ही अपौरुषेय मानना होगा । यदि स्वप्नादि में अपूर्वार्थक वाक्यों की पौरुषेयता देखकर बौद्ध वाक्यों में पौरुषेयत्व सिद्ध किया जाता है, तब वैदिक वाक्यों में भी वाक्यत्वादि लिङ्गों के द्वारा पौरुषेयत्व का अनुमान हो जाने पर उनकी भी अपूर्वार्थकता समाप्त हो जाती है । यदि 'वेदः पौरुषेयः, वाक्यत्वात्, कालिदासादिवाक्यवत्'—इस अनुमान में स्मर्यमाणकर्तृकत्वरूप उपाधि का उद्भावन कर अनुमानाभासता सिद्ध की जाती है, तब वेदान्त-वाक्यों में अस्मर्यमाणकर्तृकत्व होने के कारण ही अनपेक्षत्व और प्रामाण्य सिद्ध हो जाता है, अतः
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| १२२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४ |
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भावस्य शास्त्रमन्तरेणानवगम्यमानत्वात् । यत्तु—हेयोपादेयरहितत्वादुपदेशानर्थक्यमिति, नैष दोषः; हेयोपादेयशून्यब्रह्मात्मतावगमादेव सर्वक्लेशप्रहाणात्पुरुषार्थ-
भामती
वेदान्तानां न सापेक्षतया प्रामाण्यविघातः, न चानधिगतगन्तृता नास्ति येन प्रामाण्यं न स्याज्जीवस्य ब्रह्मताया अन्यतोऽनधिगमात्, तदिदमुक्तं, ॐ न च परिनिष्ठितवस्तुस्वरूपत्वेऽपीति ॐ । द्वितीयं पूर्वपक्षबीजं स्मारयित्वा दूषयति ॐ "यत्तु हेयोपादेयरहितत्वाद् इति ॐ । विध्यर्थावगमात् खलु पारम्पर्येण पुरुषार्थप्रतिलम्भः, इह तु तत्त्वमसीत्यवगतिपर्यन्तवाक्यार्थज्ञानाद् बाह्यानुष्ठानानपेक्षात्साक्षादेव पुरुषार्थप्रतिलम्भो नायं सर्पो रज्जुरियमिति ज्ञानादिवेति । सोऽयमस्य विध्यर्थज्ञानात् प्रकर्षः ।
एतदुक्तं भवति—द्विविधं हीप्सितं पुरुषस्य किञ्चिदप्राप्तं ग्रामादि, किञ्चित् पुनः प्राप्तमपि भ्रमवशादप्राप्तमित्यवगतं, यथा स्वग्रीवावनद्धं ग्रैवेयकम् । एवं जिहासितमपि द्विविधं, किञ्चिदहीनं जिहासति, यथा वलयितचरणं फणिनं, किञ्चित् पुनर्हानमेव जिहासति, यथा चरणाभरणे नूपुरे फणिनमारोपितम् ।
भामती-व्याख्या
वेदान्त-वाक्यों में अनपेक्षत्व सिद्ध करने के लिए कार्यार्थकत्व मानने की क्या आवश्यकता ? वेदों में अपौरुषेयत्व का विस्तारपूर्वक उपपादन न्यायकलिका में किया गया है, अतः यहाँ अनावश्यक विस्तार के भय से उसका विशेषतः उपपादन नहीं किया जाता। वेदों में पौरुषेयत्व सिद्ध न होने के कारण सिद्धार्थक वेदान्त-वाक्यों में भी न प्रत्यक्षादि-सापेक्षत्व प्रसक्त होता है और अनपेक्षत्वात्मक प्रामाण्य का विघात होता है, क्योंकि अज्ञातार्थज्ञापकत्व ही प्रामाण्य का प्रयोजक है, वह तो वेदान्त-वाक्यों में विद्यमान ही है, अतः प्रामाण्य क्यों न होगा ? वेदान्त को छोड़ कर अन्य कोई ऐसा प्रमाण नहीं, जिसके द्वारा जीव में ब्रह्मरूपता का ज्ञान प्रथमतः उत्पन्न किया जा सके, अतः प्रमाणान्तर से अनधिगत जीव और ब्रह्म के अभेद का बोध कराने के कारण "तत्त्वमसि" आदि वेदान्त-वाक्य परमार्थतः प्रमाणभूत हैं। यही तथ्य भाष्यकार के शब्दों में व्यक्त किया गया है—"न च परिनिष्ठितवस्तुस्वरूपत्वेऽपि प्रत्यक्षादिविषयत्वं ब्रह्मणः, "तत्त्वमसि" (छां. ६।८।७) इति ब्रह्मात्मभावस्य शास्त्रमन्तरेणानवगम्यमानत्वात् ।"
पूर्वपक्ष के द्वितीय तर्क का स्मरण दिला कर निराकरण किया जाता है—"यत्तु हेयोपादेयरहितत्वात्तदुपदेशानर्थक्यमिति, नैष दोषः, हेयोपादेयशून्यब्रह्मात्मतावगमादेव सर्वक्लेशप्रहाणात्पुरुषार्थसिद्धेः" । अर्थात् कर्मरूप साध्यार्थ के विधि वाक्य से कर्म का ज्ञान और उस ज्ञान के पश्चात् कर्मानुष्ठान होता है, तब कहीं उससे स्वर्गादि के साधनीभूत अदृष्टरूप पुरुषार्थ की सिद्धि होती है, किन्तु प्रकृत में "तत्त्वमसि"—इस वेदान्त-वाक्य के द्वारा जीव में ब्रह्मरूपता के साक्षात्कार मात्र से वैसे ही परम पुरुषार्थ की सिद्धि हो जाती है, जैसे "नायं सर्पः, रज्जुरियम्"—इस प्रकार के ज्ञान से सर्प-भ्रम सदैव के लिए दूर हो जाता है। जीव में ब्रह्मरूपता अथवा रज्जु में रज्जुरूपता का ज्ञान हो जाने के पश्चात् किसी प्रकार के अनुष्ठान की अपेक्षा नहीं रहती। साध्यार्थ-ज्ञान की अपेक्षा सिद्धार्थ-ज्ञान का यह महान् प्रकर्ष (वैशिष्ट्य) है, जिसको भाष्यकार ने 'प्रहाण' पद में 'प्र' के प्रयोग से ध्वनित किया है।
कहने का अभिप्राय यह है कि जैसे पुरुष (के ईप्सित उपादेय) पदार्थों में दो प्रकार के पदार्थ आते हैं—(१) अप्राप्त पदार्थ, जैसे ग्रामादि और (२) प्राप्त पदार्थ, जैसे गले में पहना हुआ हार, जो कि किसी भ्रम के कारण खोया हुआ समझ लिया गया था। वैसे ही जिहासित (त्याज्य या हेय) पदार्थ भी द्विविध ही होते हैं—(१) अहीन (अत्यक्त या प्राप्त) पदार्थ, जैसे पैर में लिपटा हुआ सर्प और (२) हीन (अप्राप्त) पदार्थ, जैसे पायजेब में
सिद्धार्थत्वविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १२३
सिद्धेः । देवतादिप्रतिपादनस्य तु स्ववाक्यगतोपासनाद्यर्थत्वेऽपि न कश्चिद्विरोधः । न तु तथा ब्रह्मण उपासनाविधिशेषत्वं संभवति; एकत्वे हेयोपादेयशून्यतया क्रियाकार-
भामती
तत्राप्राप्तप्राप्तौ चात्यक्तत्यागे च बाह्योपायानुष्ठानसाध्यत्वात् तदुपायतत्त्वज्ञानादस्ति पराचीनानुष्ठानापेक्षा । न जातु ज्ञानमात्रं वस्त्वपनयति । न हि सहस्रमपि रज्जुप्रत्यया वस्तुसन्तं फणिनमपनयितुमीशते । समारोपिते तु प्रेप्सितजिहासिते तत्त्वसाक्षात्कारमात्रेण बाह्यानुष्ठानानपेक्षेण शक्येते प्राप्तुमिव हातुमिव । समारोपमात्रजीविते हि ते, समारोपितं च तत्त्वसाक्षात्कारः समूलघातमुपहन्तीति । तथेहाप्यविद्यासमारोपितजीवभावे ब्रह्मण्यानन्दे वस्तुतः शोकदुःखादिरहिते समारोपितनिवन्धनस्तद्भावस्तत्त्वमसीतिवाक्या-त्थंतत्त्वज्ञानावगतिपर्यन्तान्निवर्त्तते । तन्निवृत्तौ प्राप्तमप्यानन्दरूपमप्राप्तमिव प्राप्तं भवति, त्यक्तमपि शोकदुःखाद्यत्यक्तमिव त्यक्तं भवति, तदिदमुक्तं ❀ ब्रह्मात्मावगमादेव ❀ । जीवस्य सर्वक्लेशस्य सवासनस्य विपर्य्यासस्य, स हि क्लिश्नाति जन्तूनतः क्लेशः, तस्य प्रकर्षेण हानात् पुरुषार्थस्य दुःखनिवृत्तिसुखाति-लक्षणस्य सिद्धेरिति । यत्त्वात्मेत्येवोपासीतात्मानमेव लोकमुपासीतेत्युपासनावाक्यगतदेवतादिप्रतिपादनेनो-पासनापरत्वं वेदान्तानामुक्तं, तद् दूषयति ❀ देवतादिप्रतिपादनस्य तु ❀ आत्मेत्येतावन्मात्रस्य । ❀ स्ववा-क्यगतोपासनाथंत्त्वेऽपि न कश्चिद्विरोधः ❀ । यदि न विरोधः, सन्तु तर्हि वेदान्ता देवताप्रतिपादनद्वारेणो-पासनाविधिपरा एवेत्यत आह ❀ न तु तथा ब्रह्मणः इति ❀ । उपास्योपासकोपासनादिभेदप्रसिद्धयधीनो-
भामती-व्याख्या
आरोपित सर्प। इनमें अप्राप्त पदार्थ की प्राप्ति और अत्यक्त का त्याग बाह्य अनुष्ठान (व्यापार) की अपेक्षा करता है, केवल साधन तत्त्व के ज्ञान से साध्य नहीं होता, अपितु उपायभूत वस्तु का ज्ञान हो जाने के पश्चात् अनुष्ठान (क्रिया या व्यापार) की अपेक्षा होती है, क्योंकि प्राप्त अत्यक्त पदार्थ का ज्ञानमात्र से परिहाण लोक में नहीं देखा जाता, जैसे कि रज्जु तत्त्व के हजारों ज्ञानों के द्वारा भी पैर में लिपटे वास्तविक (अनारोपित) सर्प की निवृत्ति नहीं कर सकते, हाँ, जीव में नित्य प्राप्त किन्तु विस्मृत ब्रह्मरूपता की प्राप्ति और पायजेब में आरोपित सर्प की निवृत्ति वस्तु तत्त्व के साक्षात्कार मात्र से हो जाती है, उसके लिए किसी प्रकार के बाह्य व्यापार की अपेक्षा नहीं होतो, क्योंकि जो पदार्थ केवल भ्रमतः आरोपित मात्र होते हैं, उनका तत्त्व-साक्षात्कार से समूल नाश हो जाता है। प्रकृत में वैसा ही है कि आनन्द ब्रह्म में अविद्या के द्वारा आरोपित जीवभाव एवं जन्म-मरणादि अनन्त दुःख केवल 'तत्त्वमसि'-इत्यादि वेदान्त-वाक्यों से जनित तत्त्व-साक्षात्कार से निवृत्त हो जाता है। उसकी निवृत्ति हो जाने पर प्राप्त आनन्दरूपता भी प्राप्त-जैसी और त्यक्त दुःख-राशि त्यक्त-जैसी हो जाती है, भाष्यकार यही कह रहे हैं- “ब्रह्मात्मावगमादेव”। जीव के वासना-सहित विपर्यय रूप क्लेश की निवृत्ति हो जाती है। वह विपर्यय (मिथ्या ज्ञान) ही क्लेश है, जो कि जीवों को क्लेशित (दुःखी) करता है। उस क्लेश की निवृत्ति से दुःख-निवृत्ति और परमा-नन्द-प्राप्तिरूप पुरुषार्थ की सिद्धि हो जाती है।
यह जो पूर्वपक्षी ने कहा था कि "आत्मेत्येवोपासीत" (बृह० उ० १।४।७), आत्मान-मेव लोकमुपासीत' (बृह० उ० १।४।१५) इत्यादि उपासना-वाक्यगत देवतादि चेतन पदार्थों के प्रतिपादन में वेदान्त-वाक्यों का उपयोग है। उस पक्ष को दूषित किया जाता है- "देवतादि प्रतिपादनस्य तु न कश्चिद् विरोधः"। यदि किसी प्रकार का विरोध नहीं, तब वेदान्त-वाक्यों में देवतादि-प्रतिपादन के द्वारा उपासना-विधि-परत्व मान लेना चाहिए इस शङ्का का निराकरण किया गया है-"न तु तथा उपासनाविधिशेषत्वम्"। (फिर भी ब्रह्म उपासना-विधि का अङ्ग क्यों नहीं? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि उपाश्य, उपासक
| १२४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४ |
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काद्वैतविज्ञानापमर्दोपपत्तेः । न ह्येकत्वविज्ञानेनोन्मथितस्य द्वैतविज्ञानस्य पुनः संभवो- ऽस्ति, येनोपासनाविधिशेषत्वं ब्रह्मणः प्रतिपद्येत । यद्यप्यन्यत्र वेदवाक्यानां न विधि- संस्पर्शमन्तरेण प्रमाणत्वं दृष्टम् ; तथाप्यात्मविज्ञानस्य फलपर्यन्तत्वान्न तद्विषयस्य
भामती
पासना न निरस्तसमस्तभेदप्रपञ्चे वेदान्तवेद्ये ब्रह्मणि सम्भवतीति नोपासनाविधिशेषत्वम्, वेदान्तानां तद्वि- रोधित्वादित्यर्थः ।
स्यादेतत्—यदि विधिविरहेऽपि वेदान्तानां प्रामाण्यं, हन्त तर्हि सोऽरोदीदित्यादीनामप्यस्तु स्वतन्त्राणामेवोपेक्षणीयार्थानां प्रामाण्यम् , न हि हानोपादानबुद्धी एव प्रमाणस्य फले, उपेक्षाबुद्धेरपि तत्फलत्वेन प्रामाणिकैरभ्युपेतत्वादिति कृतं बर्हिषि रजतं न देयमित्यादिनिषेधविधिपरत्वेनैतेषामित्यत आह ॐ यद्यपि इति ॐ । स्वाध्यायविध्यधीनग्रहणतया हि सर्वो वेदराशिः पुरुषार्थतन्त्र इत्यवगतं, तत्रैकेनापि वर्णेन नापुरुषार्थेन भवितुं युक्तं, किं पुनरियता सोऽरोदीत्यादिना पदप्रबन्धेन । न च वेदान्तेभ्य इव तदर्थावगममात्रादेव कश्चित् पुरुषार्थं उपलभ्यते, तेनैष पदसन्दर्भः साकाङ्क्ष एवास्ते पुरुषार्थमुदीक्ष- माणः । बर्हिषि रजतं न देयमित्ययमपि निषेधविधिः स्वनिषेध्यस्य निन्दामपेक्षते, न ह्यन्यथा ततश्चेतनः शक्यो निवर्तयितुम् । तद्यदि दूरतोऽपि न निन्दामवाप्स्यत्ततो निषेधविधिरेव रजतनिषेधे च निन्दायां च बर्विहोमवत् सामर्थ्यद्वयमकल्पयिष्यत् । तदेवमुक्तसयोः सोऽरोदीदिति च बर्हिषि रजतं न देयमिति च पदसन्दर्भयोर्लक्ष्यमाणनिन्दाद्वारेण नष्टाश्वदग्धरथवत् परस्परं समन्वयः । न त्वेवं वेदान्तेषु पुरुषार्थापेक्षा,
भामती-व्याख्या
और उपासना का भेद सिद्ध हो जाने पर ही उपासना सम्भव हो सकती है, किन्तु समस्त भेद-प्रपञ्च का निरास जिस अद्वैत ब्रह्म तत्त्व में किया जाता है, उसमें उपासना-विधि की शेषता ( अङ्गता ) सम्भावित नहीं, क्योंकि वेदान्त-वाक्य भेद के सर्वथा विरोधी हैं।
शङ्का—विधि-सम्पर्क के बिना यदि वेदान्त-वाक्यों को प्रमाण माना जाता है, तब तो 'सोऽरोदीत्'—इत्यादि उपेक्षणीयार्थक अर्थवाद वाक्यों में भी विधि वाक्य से एकवाक्यता के बिना स्वातन्त्र्येण प्रामाण्य मानना चाहिए, क्योंकि केवल हान और उपादान का ज्ञान ही प्रमाण का फल नहीं माना जाता, किन्तु उपेक्षा-ज्ञान को भी वेदान्तियों ने प्रमाण-फल के रूप में स्वीकार कर लिया है, अतः “बर्हिषि रजतं न देयम्'—इत्यादि निषेध-विधि की शेषता ( अङ्गता ) उक्त अर्थवाद वाक्यों में माननी व्यर्थ है।
समाधान—भाष्यकार कहते हैं कि "यद्यपि अन्यत्र वेदवाक्यानां न विधिसंस्पर्शमन्तरेण प्रमाणत्वं दृष्टम्” । आशय यह है कि “स्वाध्यायोऽध्येतव्यः”—इस स्वाध्याय विधि के द्वारा गृहीत होने के कारण समस्त वेद-राशि पुरुषार्थ की साधन है—यह भली प्रकार अवगत हो चुका है, अतः वेद का एक वर्ण भी अपुरुषार्थ नहीं हो सकता, तब भला "सोऽरोदीद् यदरोदीत् तद्रुद्रस्य रुद्रत्वम्”—इतना बड़ा पद-सन्दर्भ निरर्थक और अप्रमाण क्योंकर होगा ? वेदान्त वाक्यों के समान अर्थवाद वाक्यों के द्वारा किसी पदार्थ के ज्ञानमात्र से किसी पुरुषार्थ की सिद्धि भी नहीं होती, अतः 'किमर्थोऽयं पदसन्दर्भः ?' इस प्रकार की आकांक्षा एवं “बर्हिषि रजतं न देयम्—इस विधि की 'कस्मात्'—इस प्रकार की आकांक्षा है, नष्टाश्वदग्धरथ-न्याय का सहारा लेकर उक्त अर्थवाद वाक्य का रजत की निन्दा में तात्पर्य मानकर अर्थवाद और विधि—दोनों की एकवाक्यता पर्यवसित होती है। विधि वाक्य को अपने विधेय की प्रशंसा और निषेध वाक्य को अपने निषेध्य की निन्दा निसर्गतः अपेक्षित होती है। विधि वाक्यों को जहाँ समीप या दूर के किसी अर्थवाद की सहायता नहीं मिलती, वहाँ अगत्या विधि वाक्य से ही प्रशंसा और निन्दा की कल्पना वैसे ही हो जाती है, जैसे “दविहोमं कुर्यात्” (जै० सू० ८।४।१९) से ।
उपासनाविधिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १२५
शास्त्रस्य प्रामाण्यं शक्यं प्रत्याख्यातुम्। न चानुमानगम्यं शास्त्रप्रामाण्यं, येनान्यत्र- दृष्टं निदर्शनमपेक्षेत। तस्मात्सिद्धं ब्रह्मणः शास्त्रप्रमाणकत्वम्। अत्रापरे प्रत्यवतिष्ठन्ते—यद्यपि शास्त्रप्रमाणकं ब्रह्म, तथापि प्रतिपत्तिविधि-
भामती
तदर्थावगमादेवानपेक्षात् परमपुरुषार्थलाभादित्यर्थम्।
ननु विध्यसंस्पर्शिनो वेदस्यान्त्यस्य न प्रामाण्यं दृष्टमिति कथं वेदान्तानां तदस्पृशां तद्भविष्यतीत्यत आह ॐ न चानुमानगम्यम् इति ॐ। अबाधितानधिगतासन्दिग्धबोधजनकत्वं हि प्रमाणत्वं प्रमाणानां, तच्च स्वत इत्युपपादितम्। यद्यपि चैषामोद्बुद्धबोधजनकत्वं कार्यार्थापत्तिसमधिगम्यं तथापि तद्बोधोपजनने मानान्तरं नापेक्षन्ते, नापीमामेवार्थार्पत्तिं, परस्पराश्रयप्रसङ्गादिति स्वत इत्युक्तम्। ईदृग्बोधजनकत्वं च कार्य इव विधीनां वेदान्तानां ब्रह्मण्यस्तीति दृष्टान्तानपेक्षं तेषां ब्रह्मणि प्रामाण्यं सिद्धं भवति। अन्यथा नेन्द्रियान्तराणां रूपप्रकाशनं दृष्टमिति चक्षुरपि न रूपं प्रकाशयेदिति। प्रकृतमुपसंहरति ॐ तस्माद् इति ॐ।
आचार्यदेशीयानां मतमुत्थापयति — ॐ अत्रापरे प्रत्यवतिष्ठन्ते इति ॐ। तथाहि—अज्ञातसङ्गति-
भामती-व्याख्या
वेदान्त-वाक्यों में यह बात नहीं कि किसी विधि के साथ समन्वय की आवश्यकता हो, वे तो स्वयं अन्य प्रमाणों से निरपेक्ष होकर परम पुरुषार्थ के साधन होते हैं।
यदि कहा जाय कि वेदान्त से भिन्न अन्य किसी वैदिक वाक्य में विधि-सम्पर्क के विना प्रामाण्य नहीं देखा जाता, अतः किस उदाहरण के द्वारा वेदान्त-वाक्यों में प्रामाण्य का अनुमान किया जायगा ? इस प्रश्न का उत्तर है—"न चानुमानगम्यं शास्त्रप्रामाण्यं येनान्यत्र दृष्टं निदर्शनमपेक्षेत"। ज्ञानगत अबाधित, अनधिगत और असन्दिग्ध अर्थ की बोधकता ही प्रामाण्य पदार्थ है, जो कि वैदिक वाक्य-जनित ज्ञानों में स्वतः सिद्ध होता है—यह कहा जा चुका है, अतः किसी अनुमानादि प्रमाण के द्वारा प्रामाण्य की सिद्धि अपेक्षित ही नहीं, जिसके लिए किसी उदाहरण-घटित अनुमान की आवश्यकता हो। यद्यपि ज्ञान की अबाधितार्थकता रूप प्रमाणता सफलप्रवृत्तिरूप कार्य के द्वारा अवगत होती है, अतः वेदान्त-वाक्यों में सफल प्रवृत्ति-जनक बोध की जनकता कार्यलिङ्गक अनुमान के द्वारा ही सिद्ध होती है, अतः वेदान्त-वाक्यों को भी अनुमान की अपेक्षा अनिवार्य है—'वेदान्त-वाक्यं प्रमाज्ञानजनकम्, सफलप्रवृत्तिहेतुभूतज्ञानजनकत्वात्, सम्प्रतिपन्नवत्'। तथापि प्रमात्मक बोध की उत्पत्ति में वेदान्त-वाक्य इतर प्रमाण की अपेक्षा नहीं करते। कार्यलिङ्गक अनुमानरूप अर्थापत्ति की भी अपेक्षा नहीं, क्योंकि वह तो प्रमारूप कार्य हो जाने के पश्चात् प्रवृत्त होगा, पहले उसकी सत्ता ही सम्भव नहीं कि वेदान्त-वाक्य बोध की उत्पत्ति में उसकी अपेक्षा करते, अन्यथा अन्योऽन्याश्रयता प्रसक्त होती है। फलतः वेदान्त-वाक्यों में बोधजनकत्व इतर प्रमाण-निरपेक्ष स्वतः ही होता है। जैसे विधि वाक्य कार्यरूप अर्थ का ज्ञान दृष्टान्त-निरपेक्ष स्वतः ही उत्पन्न करते हैं, वैसे ही वेदान्त-वाक्य भी ब्रह्म का ज्ञान किसी दृष्टान्त की अपेक्षा के विना ही उत्पन्न करते हैं, अतः ब्रह्म में वेदान्त-वाक्यों को प्रमाण माना जाता है। यदि इसमें भी दृष्टान्त की अपेक्षा आवश्यक है, तब चक्षुरादि में भी रूपादि-ज्ञान की जनकता सिद्ध न होगी, क्योंकि अन्य इन्द्रियों में वह नहीं देखी जाती कि जिसे दृष्टान्त बनाकर चक्षुरादि में रूपादि-ज्ञान की जनकता सिद्ध करते। प्रकरण का उपसंहार किया जाता है—"तस्मात् सिद्धं ब्रह्मणः शास्त्रप्रमाणकत्वम्"।
एकदेशिमत—वेदान्त के ही कतिपय माननीय आचार्यों का कहना है कि—
१२६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४
भामती स्वेन शास्त्रत्वेनार्थवत्तया। मननाविप्रतीत्या च कार्यार्थाद् ब्रह्मनिश्चयः॥ न खलु वेदान्ताः सिद्धब्रह्मरूपपरा भवितुमर्हन्ति, तत्राविवित्सितसङ्गतित्वाद्, यत्र हि शब्दा लोकेन प्रयुज्यन्ते तत्र तेषां सङ्गतिग्रहः। न चाहेय-मनुपादेयं रूपमात्रं कश्चिद्विवक्षति प्रेक्षावान्, तस्यानुभुत्सितत्वात्। अनुभुत्सितावबोधने च प्रेक्षावत्ता-विधातात्। तस्मात् प्रतिपित्सितं प्रतिपिपादयिषन्नयं लोकः प्रवृत्तिनिवृत्तिहेतुभूतमेवार्थं प्रतिपादयेत्, कार्यं चावगतं तद्धेतुरिति तदेव बोधयेत्। एवं च वृद्धव्यवहारप्रयोगात् पदानां कार्यपरत्वमवगच्छति। तत्र किञ्चित्साक्षात्कार्याभिधायकं, किञ्चित्कार्यार्थस्वार्थाभिधायकं, न तु भूतार्थपरता पदानाम्। अपि च नरान्तरस्य व्युत्पन्नस्यार्थप्रत्ययमनुमाय तस्य च शब्दभावाभावानुविधानमवगम्य शब्दस्य तद्विषयबोधकत्वं निश्चेतव्यं, न च भूतार्थरूपमात्रप्रत्यये परनरवर्त्तिनि किञ्चिल्लिङ्गमस्ति। कार्यप्रत्यये तु नरान्तरवर्त्तिनि प्रवृत्तिनिवृत्ती [स्तो हेतु इत्यज्ञातसङ्गतित्वान्न ब्रह्मरूपपरा वेदान्ताः। अपि च वेदान्तानां वेदत्वात् शास्त्रत्वप्रसिद्धिरस्ति, प्रवृत्तिनिवृत्तिपराणां च सन्दर्भाणां शास्त्रत्वम्। यथाहूः—
प्रवृत्तिर्वा निवृत्तिर्वा नित्येन कृतकेन वा।
पुंसां येनोपदिश्येत तच्छास्त्रमभिधीयते ॥ इति।
भामती-व्याख्या
अज्ञातसंगतित्वेन शास्त्रत्वेनार्थवत्तया।
मननादिप्रतीत्या च कार्यार्थाद् ब्रह्मनिश्चयः॥
(१) अज्ञातसंगतित्व, (२) शास्त्रत्व, (३) अर्थवत्त्व और (४) मननादि-विधान—इन चार हेतुओं के द्वारा ब्रह्म में उपासना-विधि-शेषत्व निश्चित होता है—
(१) वेदान्त-वाक्यों का सिद्ध ब्रह्म में संगति-ग्रह (शक्ति-ज्ञान) सम्भव नहीं, क्योंकि जिस अर्थ में लोग शब्दों का प्रयोग नहीं करते, उस अर्थ में शब्दों का संगति-ग्रह नहीं हो सकता, लोकतः संगति-ग्रह के आधार पर ही वैदिक शब्दों से अर्थ-बोध होता है, जैसा कि मण्डन मिश्र कहते हैं—"लोकावगतसामर्थ्यः शब्दो वेदेऽपि बोधकः" (ब्र. सि. पृ. ८२)। लोक में कोई भी प्रेक्षावान् व्यक्ति हेय और उपादेय से रहित वस्तुमात्र की विवक्षा नहीं करता, क्योंकि ऐसी वस्तु बुभुत्सित (जिज्ञासित) ही नहीं होती। यदि अजिज्ञासित पदार्थ का कोई प्रतिपादन करता है, तब उसे प्रेक्षावान् (बुद्धिपूर्वककारी) नहीं कहा जायगा, अतः बुद्धिमान् मनुष्य प्रतिपित्सित (बुभुत्सित या जिज्ञासित) अर्थ की विवक्षा से प्रवृत्ति और निवृत्ति के हेतुभूत अर्थ का ही प्रतिपादन किया करता है। कार्य वस्तु ही वह पदार्थ है, जो अवगत होकर प्रवृत्ति का हेतु होता है, अतः कार्यरूप अर्थ का ही प्रतिपादन करना चाहिए। वृद्ध पुरुषों के व्यवहार की सहायता से पदों की शक्ति कार्यरूप अर्थ में ही निश्चित होती है। उनमें कुछ पद साक्षात् कार्य के अभिधायक होते हैं और कुछ पद कार्यार्थक स्वार्थ के अभिधायक होते हैं, सिद्धार्थपरता पदों में अवगत ही नहीं होती। दूसरी बात यह है कि मध्यम (प्रवृत्त होने वाले) वृद्ध के अन्दर अवस्थित प्रवर्तक ज्ञान का अनुमान करके शब्द विशेष के होने पर ही वह ज्ञान उत्पन्न होता है, अन्यथा नहीं—इस प्रकार अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा शब्द में उस बोध की जनकता निश्चित की जाती है, किन्तु जिस ज्ञान से कोई प्रवृत्ति या निवृत्ति नहीं होती, ऐसे अन्यपुरुषगत सिद्धार्थविषयक ज्ञान का अनुमान नहीं हो सकता। कार्यविषयक ज्ञान के अनुमापक तो प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप लिङ्ग सुलभ हो जाते हैं। अतः वेदान्त शब्दों का ब्रह्म में संगति-ग्रह न हो सकने के कारण उनमें ब्रह्मपरता सम्भव नहीं।
(२) वेदान्त-वाक्य वेद होने के कारण शास्त्र कहे जाते हैं और प्रवृत्ति निवृत्तिपरक पद-संदर्भ ही शास्त्र की परिभाषा में आता है, जैसा कि श्रीकुमारिल भट्ट ने कहा है—
उपासनाविधिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १२७
भामती
तस्माच्छास्त्रत्वप्रसिद्ध्या व्याहतमेषां स्वरूपपरत्वम्। अपि च न ब्रह्मरूपप्रतिपादनपराणामेषामर्थवत्त्वं पश्यामः। न च रज्जुरियं न भुजङ्ग इति यथाकथञ्चिल्लक्षणया वाक्यार्थतत्त्वनिश्चये यथा भयकम्पादिनिवृत्तिः, एवं तत्त्वमसीतिवाक्यार्थावगमान्निवृत्तिर्भवति सांसारिकाणां धर्मांणाम्; श्रुतवाक्यार्थस्यापि पुंसस्तेषां तादवस्थ्यात्। अपि च यदि श्रुतब्रह्मणो भवति सांसारिकधर्मनिवृत्तिः कस्मात् पुनः श्रवणस्योपरि मननादयः श्रूयन्ते? तस्मात्तेषां वैयर्थ्यप्रसङ्गादपि न ब्रह्मस्वरूपपरा वेदान्ताः, किन्त्वात्मप्रतिपत्तिविषयकार्यपराः। तच्च कार्यं स्वात्मनि नियोज्यं नियुञ्जानं नियोग इति च मानान्तरापूर्वत्वाऽपूर्वमिति चाख्यायते। न च विषयानुष्ठानं विना तत्सिद्धिरिति स्वसिद्धयर्थं तदेव कार्यं स्वविषयस्य करणस्यात्मज्ञानस्यानुष्ठानमाक्षिपति। यथा च कार्यं स्वविषयाधीननिरूपणमिति ज्ञानेन विषयेण निरूप्यते, एवं
भामती-व्याख्या
प्रवृत्तिर्वा निवृत्तिर्वा नित्येन कृतकेन वा।
पुंसां येनोपदिश्येत तच्छास्त्रमभिधीयते॥ (श्लो. वा. पृ० ४०६)
[जिस नित्य (अपौरुषेय) अथवा कृतक (पौरुषेय) पद-सन्दर्भ के द्वारा पुरुषों की किसी विषय में प्रवृत्ति या किसी विषय से निवृत्ति होती है, उस पद-सन्दर्भ को शास्त्र कहा जाता है, इसकी चर्चा पहले आ चुकी है]। अतः वेदान्त-वाक्यों में शास्त्रत्व की प्रसिद्धि होने के कारण सिद्धार्थपरता सम्भव नहीं।
(३) वेदान्त-वाक्य यदि ब्रह्मस्वरूप के ही प्रतिपादक माने जाते हैं, तब इनमें अर्थवत्ता (प्रयोजनवत्ता) नहीं रहती। यह जो कहा जाता है कि 'रज्जुरियं न सर्पः'—इत्यादि सिद्धार्थक शब्दों से यथाकथञ्चित् वाक्यार्थ का निश्चय हो जाने पर जैसे भय और कम्पादि की निवृत्ति देखी जाती है, वैसे ही "तत्त्वमसि"—इत्यादि शब्दों से वाक्यार्थ का निश्चय हो जाने पर कर्तृत्ववादि सांसारिक धर्मों की निवृत्ति हो जाती है। वह कहना भी संगत नहीं, क्योंकि जिन वेदान्तियों ने "तत्त्वमसि"—इत्यादि वाक्यों से वाक्यार्थ का बोध प्राप्त कर लिया है, वे भी अपने को पहले की भांति ही कर्त्ता-भोक्ता मानते हैं, अतः उक्त वाक्यार्थ बोध से कर्तृत्ववादि सांसारिक धर्मों की निवृत्ति नहीं होती।
(४) यदि वेदान्त-वाक्यों के श्रवणमात्र से पुरुषार्थ की सिद्धि हो जाती है, तब “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यः" (बृह. उ. २।४।५) इत्यादि श्रुति वाक्यों में श्रवण के पश्चात् मननादि का विधान किस प्रयोजन के लिए किया गया? अतः श्रवणादि की व्यर्थतापत्ति का परिहार करने के लिए भी मानना पड़ता है कि वेदान्त-वाक्य ब्रह्म-स्वरूपमात्र के के बोधक नहीं माने जा सकते, अपितु आत्मा की प्रतिपत्ति (ज्ञान) को विषय करनेवाले कार्य पदार्थ के बोधन में ही वेदान्त-वाक्यों का तात्पर्य स्थिर होता है। वह कार्य पदार्थ अपनी उत्पत्ति में नियोज्य (अधिकारी) पुरुष का नियोजक होने के कारण नियोग एवं प्रमाणान्तर से अनधिगत होने के कारण अपूर्व भी कहलाता है, जैसा कि श्री शालिकनाथ मिश्र कहते हैं—
क्रियादिभिन्नं यत्कार्यं वेद्यं मानान्तरैर्न तत्।
अतो मानान्तरापूर्वमपूर्वमिति गीयते॥
कार्यत्वेन वियोज्यं च स्वात्मनि प्रेरयन्नसौ।
नियोग इति मीमांसानिष्णा तैरभिधीयते॥ (प्र. पं. पृ. ४४१)
उस नियोगरूप कार्य की सिद्धि उसकी विषयीभूत आत्मप्रतिपत्ति के अनुष्ठान से विना सम्भव नहीं, अतः वह कार्य अपनी सिद्धि के लिए अपनी विषयीभूत आत्मप्रतिपत्ति
१२८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४
विषयतयैव शास्त्रेण ब्रह्म समर्प्यते । यथा-यूपादहवनीयादीन्यलौकिकान्यपि विधिशेषतया शास्त्रेण समर्प्यन्ते, तद्वत् । कुत एतत् ? प्रवृत्तिनिवृत्तिप्रयोजनत्वा-
भामती
ज्ञानमपि स्वविषयमात्मानमन्तरेणाशक्यनिरूपणमिति तन्निरूपणाय तादृशमात्मानमाक्षिपति तदेव कार्यम् । यथाहुः—'यत्तु तत्सिद्धयर्थमुपादीयते आक्षिप्यते तदपि विधेयमिति तन्त्रे व्यवहारः' इति । विधेयता च नियोगविषयस्य ज्ञानस्य भावार्थतयाऽनुष्ठेयता, तद्विषयस्य स्वात्मनः स्वरूपसत्ताविनिश्चितिः । आरोपिततद्भावस्य त्वन्यस्य निरूपकत्वे तेन तन्निरूपितं न स्यात् । तस्मात्तादृगात्मप्रतिपत्तिविधिपरेभ्यो वेदान्तेभ्यस्तादृगात्मविनिश्चयः । तदेतस्सर्वमाह ॐ यद्यपि इति ॐ । विधिपरेभ्योऽपि वस्तुतत्त्वविनिश्चय इत्यत्र निदर्शनमुक्तं ॐ यथा यूप इति ॐ । यूपे पशुं बध्नातीति बन्धनाय विनियुक्ते यूपे तस्यालौकिकत्वात् कोऽसौ यूप इत्यपेक्षिते खादिरो यूपो भवति, यूपं तक्षति, यूपमष्टाश्रीकरोतीत्यादिभिर्वार्क्षस्तक्षणादिविधिपरैरपि संस्काराविष्टं विशिष्टसंस्थानं दारु यूप इति गम्यते । एवमाहवनीयादयोऽप्यवगन्तव्याः । प्रवृत्तिनिवृत्तिपरस्य शास्त्रत्वं न स्वरूपपरस्य, कार्य एव सम्बन्धो न स्वरूपे, इति हेतुद्वयं भाष्यवाक्येनोपपादितं
भामती-व्याख्या
(आत्मज्ञान) के अनुष्ठान का आक्षेपक (कल्पक) होता है। जैसे कार्य (नियोग) अपने विषयीभूत आत्मज्ञान के द्वारा निरूपित होता है—'आत्मज्ञानविषयो नियोगः'। वैसे ही ज्ञान भी अपने विषयीभूत आत्मा के विना निरूपित नहीं हो सकता, अतः ज्ञान का निरूपण करने के लिए वैसे ही आत्मा का आक्षेप वही कार्य (नियोग) करता है, जैसा कि श्री प्रभाकर मिश्र कहते हैं—"यस्मिन्नयं पुरुषो नियुज्यते, स तद्विषयः। तस्मान्नैव विधिः कर्त्तव्यतामाह, विषयतया त्पादत्ते। तस्माद् यद्यदुपदीयते तत्तद्विधेयमिति तन्त्रे व्यवहारः" (बृहती. पृ. ३९)। यहाँ 'उपादीयते' का अर्थ 'आक्षिप्यते' है। यद्यपि नियोग का विषयीभूत ज्ञान सिद्ध पदार्थ होने से विधेय नहीं, तथापि धात्वर्थत्वेन विधेयत्व बन जाता है अर्थात् यहाँ ज्ञान का अर्थ उपासना है, जो कि स्वरूपत अनुष्ठेय पदार्थ है। उस ज्ञान के विषयीभूत आत्मा की विधेयता है—आत्मस्वरूप की सत्ता का विनिश्चय, क्योंकि यहाँ विधेयता अज्ञातज्ञप्तिरूप मानी गई है, आत्मस्वरूप-सत्ता का निश्चय अज्ञातार्थ-ज्ञापक होता है। यहाँ अनात्मपदार्थों में आरोपित आत्मा ज्ञान का विषय नहीं, अतः आत्म-प्रतिपत्ति की विधि के बोधक वेदान्त-वाक्यों से वैसे (अनारोपित) आत्मा का निश्चय होता है। भाष्यकार इसी भाव की अभिव्यक्ति कर रहे हैं—"यद्यपि शास्त्रप्रमाणकं ब्रह्म"। विधिपरक वाक्यों से भी वस्तुतत्त्व का निश्चय होता है—इसमें दृष्टान्त देते हैं—"यथा यूपादहवनीयादीन्यलौकिकान्यपि विधिशेषतया शास्त्रेण समर्प्यन्ते, तद्वत्"। "यूपे पशुं बध्नाति"—इस प्रकार विहित बन्धन को सम्पन्न करने के लिए विनियुक्त यूप एक अलौकिक पदार्थ माना जाता है, क्योंकि तक्षणादि दृष्ट और प्रोक्षणादि अदृष्ट संस्कारों से युक्त यूप पदार्थ केवल लौकिक नहीं माना जा सकता, किन्तु लोक में अप्रसिद्ध होने के कारण अलौकिक माना जाता है। वहाँ 'कोऽसौ यूपः?' इस प्रकार की आकांक्षा में "खादिरो यूपो भवति", 'यूपं तक्षति', 'यूपमष्टाश्रीकरोति'—इत्यादि वाक्यों के द्वारा खैर की लकड़ी को छील एवं आठ पहलूवाले एक खम्भे को प्रस्तुत किया जाता है। इसी प्रकार "यदाहवनीये जुहोति"—इस विधि वाक्य में 'क आहवनीयः' ऐसे प्रश्न के उत्तर में कहा जाता है कि "वसन्ते ब्राह्मणोऽग्नीनादधीत" इत्यादि श्रुतियों से विहित आधानादि संस्कारों से विशिष्ट लोकोत्तर अग्नि की अवगति 'आहवनीय' शब्द से होती है। यूप और आहवनीयादि के समान ही ब्रह्म वस्तु की अवगति विधिपरक वेदान्त-वाक्यों से हो सकती है।
उपासनाविधिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १२९
च्छास्त्रस्य । तथा हि शास्त्रतात्पर्य्यविद आहुः—‘दृष्टो हि तस्यार्थः कर्मावबोधनम्’ (जै० सू० १।१।१) इति । ‘चोदनेति क्रियायाः प्रवर्तकं वचनम्’ । ‘तस्य ज्ञानमुपदेशः’ (जै० सू० १।१।५) । ‘तद्भूतानां क्रियार्थेन समाम्नायः’ (जै० सू० १।१।२५) । ‘आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम्’ (जै० सू० १।२।१) इति च । अतः पुरुषं कचिद्विषयविशेषे प्रवर्त्तयत् कुतश्चिद्विषयविशेषात्निवर्त्तयच्चार्थवच्छास्त्रम् । तच्छेषतया चान्यदुपयुक्तम् । तत्सामान्याद्वेदान्तानामपि तथैवार्थवत्त्वं स्यात् । सति
भामती
❄ प्रवृत्तिनिवृत्तिप्रयोजनत्वाद् ❄ इत्यादिना ❄ तत्सामान्याद्वेदान्तानामपि तथैवार्थवत्त्वं स्याद् ❄ इत्यन्तेन । न च स्वतन्त्रं कार्यं नियोज्यमधिकारिणमनुष्ठातारमन्तरेणेति नियोज्यभेदमाह ❄ सति च विधिपरत्वे इति ❄ । ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवतीति सिद्धवदर्थवादावगतस्यापि ब्रह्मभवनस्य नियोज्यविशेषाकाङ्क्षायां ब्रह्मबुभूषोर्नियोज्यविशेषस्य रात्रिसत्त्रन्यायेन प्रतिलम्भः । पिण्डपितृयज्ञन्यायेन तु स्वर्गकामस्य नियोज्यस्य कल्पनायामर्थवादस्यासमवेतार्थतयात्यन्तपरोक्षा वृत्तिः स्यादिति । ब्रह्मभावश्चामृतत्वमिति
भामती-व्याख्या
प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप कार्य के प्रतिपादक पद-सन्दर्भ को शास्त्र कहा जाता है एवं कार्यरूप अर्थ में ही शब्दों का संगति-ग्रह होता है—ये दो हेतु भाष्यवाक्य के द्वारा उपपादित हुए हैं—‘‘प्रवृत्तिनिवृत्ति-प्रयोजनत्वात्’’—यहाँ से लेकर ‘‘तत्सामान्याद् वेदान्तानामपि तथैवार्थवत्त्वं स्यात्’’—यहाँ तक। नियोगरूप कार्य अपने नियोज्य (अधिकारी या अनुष्ठाता) पुरुष के बिना स्वतन्त्र नहीं हो सकता, अतः नियोज्य विशेष का कथन किया जाता है—‘‘सति च विधिपरत्वे।’’ जैसे स्वर्ग-कामनावान् नियोज्य के लिए अग्निहोत्रादि साधन पदार्थों का विधान किया जाता है, वैसे ही अमृतत्व-कामनावान् नियोज्य के लिए ब्रह्म-ज्ञान का विधान अत्यन्त युक्ति-युक्त है। अर्थात् जैसे ‘‘प्रतितिष्ठन्ति ह वैता रात्रीरुपयन्ति’’—इत्यादि अर्थवाद-वाक्य के द्वारा अवगत प्रतिष्ठाकामनावान् व्यक्ति रात्रिसत्र कर्म का नियोज्य माना जाता है, वैसे ही ‘‘ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति’’—इस अर्थवाद वाक्य के द्वारा प्रतिपादित ब्रह्म-बुभूषु अथवा अमृतत्व-कामनावान् व्यक्ति ब्रह्म-ज्ञान का नियोज्य सिद्ध होता है।
यदि रात्रिसत्र-न्याय को छोड़ कर पिण्डपितृयज्ञन्याय का अवलम्बन किया जाता है, तब ब्रह्म-ज्ञान का स्वर्ग फल मानना होगा [अत्यन्त अश्रुत फल की कल्पना में पिण्डपितृयज्ञ-न्याय या विश्वजिन्त्याय को अपनाया जाता है, इन दोनों न्यायों का पर्यवसान लगभग समान अर्थ में माना जाता है। ‘‘अमावास्यायामपराह्णे पिण्डपितृयज्ञेन चरन्ति’’—इस प्रकार के अनारभ्याधीत वाक्य के द्वारा विहित पिण्डपितृयज्ञ के विषय में सन्देह होता है कि पिण्ड-पितृयज्ञ कर्म क्या दर्शपूर्णमास कर्म का अङ्गभूत कर्म है? अथवा स्वतन्त्र कर्म है? पूर्वपक्षी ने कहा—‘‘य एवं विद्वानमावास्यां यजते’’ इत्यादि वाक्यों के द्वारा निर्णय किया गया है कि ‘अमावास्या’ शब्द अमावास्या तिथि में विहित ‘आग्नेयः’, ‘ऐन्द्रं दधि’ और ‘ऐन्द्रं पयः’ इन तीन कर्मों की संज्ञा है, अतः पिण्डपितृयज्ञ कर्म ‘अमावास्या’ कर्म का अङ्ग है। वहाँ सिद्धान्त-सूत्र है—‘‘पिण्डपितृयज्ञः स्वकालत्वादनाङ्गं स्यात्’’ (जै. सू. ४।४।१९)। अर्थात् ‘‘अमावा-स्यायामपराह्णे’’—इस प्रकार ‘अपराह्न’ शब्द कालविशेष का वाचक है, अतः इस पद के समभिव्याहार में श्रुत ‘अमावास्या’ शब्द भी तिथि विशेष का ही बोधक है, दर्शपूर्णमास-घटक ‘अमावास्या’ नाम के कर्म का नहीं, फलतः पिण्डपितृयज्ञ किसी कर्म का अङ्ग न होकर स्वतन्त्र कर्म है और विश्वजिन्त्याय के आधार पर इस कर्म का स्वर्गरूप फल माना जाता है। प्रकृत में ब्रह्म-ज्ञान के लिए भी यही कहा जा सकता है कि ‘‘सः स्वर्गः स्यात् सर्वान् प्रत्यविशिष्टत्वात्’’
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१३० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४
न विधिपरत्वे यथा स्वर्गादिकामस्याग्निहोत्रादिसाधनं विधीयत एवममृतत्वकामस्य ब्रह्मज्ञानं विधीयत इति युक्तम् । नन्विह जिज्ञास्यवैलक्षण्यमुक्तम्—कर्मकाण्डे भव्यो धर्मो जिज्ञास्यः; इह तु भूतं नित्यनिर्वृत्तं ब्रह्म जिज्ञास्यमिति; तत्र धर्मज्ञानफलादनुष्ठानापेक्षाद्विलक्षणं ब्रह्मज्ञानफलं भवितुमर्हति । नार्हत्येवं भवितुम्; कार्यविधिप्रयुक्तस्यैव’
भामती
❖ अमृतत्वकामस्य ❖ । इत्युक्तम् । अमृतत्वं चामृतत्वादेव न कृतकत्वेन शक्यमनित्यमनुमातुम्, आगमविरोधादिति भावः ।
उक्तेन धर्मब्रह्मज्ञानयोर्वैलक्षण्येन विध्यविषयत्वं चोदयति ❖ ननु इति ❖ । परिहरति ❖ नार्हत्येवम् इति ❖ । अत्र चात्मदर्शनं न विधेयम् । तद्धि दृष्टोपलब्धिवचनत्वात् श्रावणं वा स्यात् प्रत्यक्षं
भामती-व्याख्या
(जै. सू. ४।३।१३) अर्थात् ऐसे कर्मों का स्वर्ग फल मानना सर्वाभीष्ट है ]। किन्तु ऐसा मानने पर “ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति”—इस अर्थवाद वाक्य के द्वारा ब्रह्मभाव या अमृतत्वरूप फल एवं अमृतत्वकामनावान् नियोज्य का प्रतिपादन अत्यन्त असम्बद्ध हो जाता है, अतः रात्रिसत्रन्याय के द्वारा अमृतत्वरूप फल एवं अमृतत्वकामनावान् नियोज्य की कल्पना ही उचिततर है, अन्यथा “ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति”—यह अर्थवाद वाक्य नितान्त निराधार, गौणार्थक एवं अविवक्षितवृत्तिक हो जाता है। यहाँ ब्रह्मभाव ही अमृतत्व है, अत एव भाष्यकार ने कहा है— “अमृतत्वकामस्य ब्रह्मज्ञानं विधीयते।” यहाँ कोई व्यक्ति 'ब्रह्मभावोऽनित्यः, कृतकत्वात्'—इस प्रकार ब्रह्मभाव की अनित्यता का अनुमान न कर सके, इस लिए ब्रह्मभाव का 'अमृतत्व' पद के द्वारा अभिधान किया गया है। 'अमृत' पद के द्वारा उत्पाद और विनाश से रहित वस्तु का अभिधान होता है, ब्रह्मभाव कृतक या उत्पन्न नहीं होता, केवल अभिव्यक्त होता है—“ब्रह्म सन् ब्रह्माप्येति”। इसी प्रकार “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” इत्यादि वाक्यों में अनन्तता को ही ब्रह्मभाव कहा गया है।
शङ्का—पूर्व मीमांसा में जिज्ञास्य धर्म और उत्तर मीमांसा में जिज्ञास्य ब्रह्म के ज्ञान का वैलक्षण्य पहले (विगत पृ. ८० पर) कहा गया—अभ्युदयफलं धर्मज्ञानम्, तच्चानुष्ठानापेक्षम्, निःश्रेयसफलं तु ब्रह्मज्ञानं न चानुष्ठानान्तरापेक्षम्।” अतः धर्म और धर्म-ज्ञान में विधिविषयता होने पर भी ब्रह्म-ज्ञान में विधि-विषयता (विधेयता) नहीं हो सकती [ यद्यपि विगत पृ. ८० पर भाष्यकार ने धर्म और ब्रह्मरूप जिज्ञास्य पदार्थों का वैलक्षण्य कहा है और उनके ज्ञानों का भी, तथापि यहाँ प्रकृत शङ्का की साधनता के रूप में भाष्यकार जिज्ञास्य-वैलक्षण्य का स्मरण करते हैं—“ननु इह जिज्ञास्यवैलक्षण्यमुक्तम्” किन्तु वाचस्पति मिश्र धर्म-ज्ञान और ब्रह्म-ज्ञान के वैलक्षण्य को प्रकृत शङ्का का उपोद्वलक मानते हैं—‘धर्मब्रह्मज्ञानयोर्वैलक्षण्येन विध्यविषयत्वं चोदयति।’ श्री वाचस्पति मिश्र भाष्याक्षर की परिधि के इधर-उधर वहाँ ही पैर रखते हैं, जहाँ कहीं पौर्वापर्यादि का सामञ्जस्य सहज गति से नहीं हो पाता। यहाँ वस्तु-स्थिति यह है कि भाष्यकार ने “तत्र धर्मज्ञानफलाद् विलक्षणं ब्रह्मज्ञानफलं भवितुमर्हति”—इस शङ्का-वाक्य के द्वारा यह प्रतिज्ञा सूचित की है कि 'ब्रह्मज्ञानं धर्मज्ञानफलाद् विलक्षणफलकम्' ऐसी प्रतिज्ञा का साधन जिज्ञास्य-वैलक्षण्य नहीं हो सकता, क्योंकि पक्षधर्मतादि का सामञ्जस्य उसमें नहीं होता, अतः 'ब्रह्मज्ञानं धर्मज्ञानफलाद्विलक्षणफलकम्, धर्मज्ञानाद्विलक्षणत्वात्'—इस प्रकार के सुसंगत प्रयोग का आविष्कार करने के लिए वाचस्पति मिश्र ने साक्षात् ज्ञान-वैलक्षण्य का निर्देश किया और भाष्यकार ने विषय-वैलक्षण्य के द्वारा ज्ञान-वैलक्षण्य ध्वनित किया है ]।
उपासनाविधिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १३१
ब्रह्मणः प्रतिपाद्यमानत्वात् । 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' (बृह० २।४।५) इति । 'य आत्माऽपहतपाप्मा', 'सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः' (छान्दो० ८।७।१), 'आत्मैत्येवोपासीत' (बृ० १।४।७) 'आत्मानमेव लोकमुपासीत' (बृ० १।४।१५) । 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' (मुण्ड० २।२।९) इत्यादिविधानेषु सत्सु 'कोऽसावात्मा, किं तद् ब्रह्म?'
भामती
वा । प्रत्यक्षमपि लौकिकमहंप्रत्ययो वा, भावनाप्रकर्षपर्यन्तजं वा ? तत्र श्रावणं न विधेयं, स्वाध्यायविधिनेवास्य प्राप्तित्वात्, कर्मश्रावणवत् । नापि लौकिकं प्रत्यक्षं, तस्य नैसर्गिकत्वात् । न चौपनिषदात्मविषयं भावनाध्येयवैशद्यं विधेयं, तस्योपासनविधानादेव वाजिनवदनुनिष्पादितत्वात् । तस्मादौपनिषदात्मोपासनाऽमृतत्वकाम नियोज्यं प्रति विधीयते । द्रष्टव्य इत्यादयस्तु विधिसरूपा न विधय इति । तवि-
भामती-व्याख्या
समाधान—एकदेशी आचार्य का कहना है कि "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" (तै. उ. २।१।१) इत्यादि वाक्यों के द्वारा स्वतन्त्र ब्रह्म का प्रतिपादन नहीं किया जाता, अपितु "आत्मैत्येवोपासीत्" (बृह. उ. १।४।७) इत्यादि वेदान्त-वाक्यों के द्वारा विहित उपासना की विषय-वस्तु का प्रस्तुतीकरण किया गया है। यहाँ ज्ञानगत विधेयता के कथन का तात्पर्य उपासना की विधेयता में ही है, क्योंकि "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः, श्रोतव्यो मन्तव्यः" (बृह. उ. २।४।५) यहाँ आत्मज्ञान दो प्रकार का अभिहित हुआ है—(१) प्रत्यक्षात्मक और (२) श्रावणादिरूप परोक्षज्ञान ! इनमें श्रावण ज्ञान यहाँ विधेय नहीं हो सकता, क्योंकि उसकी प्राप्ति "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः" इस विधि वाक्य से वैसे ही सम्पन्न हो जाती है, जैसे धर्म-ज्ञान की। प्रत्यक्ष ज्ञान दो प्रकार का होता है—(१) लौकिक और (२) अलौकिक (निरन्तरानुचिन्तन-जनित ।) लौकिक प्रत्यक्ष ज्ञान तो निसर्गतः अपनी इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षादि-घटित सामग्री से ही उत्पन्न होने के कारण विधेय नहीं होता। औपनिषद आत्मा की निदिध्यासनात्मक भावना (उपासना) से जनित अलौकिक आत्म-प्रत्यक्ष भी विधेय नहीं होता, क्योंकि आत्मोपासना का विधान कर देने से वैसे ही उस (ब्रह्मात्मप्रत्यक्ष) की अनुनिष्पत्ति हो जाती है, जैसे आमिक्षा बनाने के लिए तप्त दूध में डाले गए दधि से वाजिन अपने-आप निष्पन्न हो जाता है ["तप्ते पयसि दध्यानयति सा वैश्वदेव्यामिक्षा"। प्रतप्त दूध में दधि डालने से दूध फट कर दो भागों में विभक्त हो जाता है—(१) पनीर और (२) पानी। जमे हुए (घनीभूत) भाग को पनीर या आमिक्षा कहते हैं और पानी को वाजिन कहा जाता है। वहाँ यह संशय होता है कि दध्यानयन (दधि डालने) का उद्देश्य क्या आमिक्षा है? अथवा वाजिन ? पूर्वपक्ष किया गया है—"एकनिष्पत्तेः सर्वं समं स्यात्" (जै. सू. ४।१।२२) अर्थात् तपते दूध में दही डालने पर आमिक्षा और वाजिन—दोनों की एक साथ निष्पत्ति होती है, अतः समानरूप से दोनों पदार्थ ही दध्यानयन के प्रयोजक होते हैं, किन्तु सिद्धान्त किया गया है—"संसर्गरसनिष्पत्तेरामिक्षा वा प्रधानं स्यात्" (जै. सू. ४।१।२३) अर्थात् "तप्ते पयसि दध्यानयति सा वैश्वदेव्यामिक्षा"—इस विधि वाक्य में दधि-संसर्ग से निष्पन्न आमिक्षा का ही निर्देश 'सा वैश्वदेवो आमिक्षा'—इस वाक्य के द्वारा किया गया है, अतः प्रधानभूत आमिक्षा तत्त्व का विधान किया जाता है, वाजिन का नहीं, वह तो स्वयं अनुनिष्पन्न हो जाता है। फलतः यहाँ अमृतत्त्व-कामनावान् नियोज्य पुरुष के प्रति औपनिषद आत्मा की उपासना का विधान किया जाता है। "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः" (बृह. उ. २।४।५) इस वाक्य के द्वारा ज्ञान का विधान नहीं किया जाता, क्योंकि यहाँ 'द्रष्टव्यः' पद में 'तव्य' प्रत्यय विध्यर्थक नहीं, केवल उसका अनुकरण विधि के समान प्रतीत होनेवाला विधि-सरूपमात्र है। पूर्व (पृ. १२६ पर)