भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 237, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 237

आनन्दमयस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २१९

पदिकार्थमात्रमेव हि सर्वत्राभ्यस्यते—'रसो वै सः, रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी- भवति, को ह्येवान्यात्कः प्राण्यात्, यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्' । 'सैषाऽऽन- न्दस्य मीमांसा भवति' । 'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कुतश्चनेति' (तै० २।७,८,९ ) 'आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्' ( तै० ६।६ ) इति च । यदि च आनन्दमयशब्दस्य ब्रह्म- विषयत्वं निश्चितं भवेत्, तत उत्तरेष्वा नन्दमात्रप्रयोगेष्वप्यानन्दमयाभ्यासः कल्प्येत । न त्वानन्दमयस्य ब्रह्मत्वमस्ति, प्रियशिरस्त्वादिभिर्हेतुभिरित्यवोचाम । तस्माच्छ्रुत्यन्तरे 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' ( बृ० ३।९।२८ ) इत्यानन्दप्रातिपदिकस्य ब्रह्मणि प्रयोगद- र्शनात् । 'यदेष आकाश आनन्दो न स्याद्' इत्यादिर्ब्रह्मविषयः प्रयोगो न त्वानन्दमया- भ्यास इत्यवगन्तव्यम् । यस्त्वयं मयडन्तस्यैवानन्दशब्दस्याभ्यासः—'एतमानन्दमय- मात्मानमुपसंक्रामति' ( तै० २।८ इति, न तस्य ब्रह्मविषयत्वमस्ति, विकारात्मना- मेवान्नमयादीनामनात्मनामुपसंक्रमितव्यानां प्रवाहे पतितत्वात् । नन्वानन्दमयस्योप-

भामती

चान्नमयादिविकारवाचिप्रायपठितं विकारवाचि वा, कथञ्चित् प्रचुरानन्दवाचि वा ब्रह्मण्यप्रसिद्धं कया- चिद् वृत्त्या ब्रह्मणि व्याख्यायताम् ? आनन्दपदाभ्यासेन च ज्योतिष्पदेनेव ज्योतिष्टोम आनन्दमयो लक्ष्यत्ताम्, उतानन्दमयपदं विकारार्थमस्तु, ब्रह्मपदं च ब्रह्मण्येव स्वार्थेऽस्तु, आनन्दपदाभ्यासश्च स्वार्थे, पुच्छपद- मात्रमवयवप्रायलेखितमधिकरणपरतया व्याक्रियतामिति कृतबुद्धय एव विदाङ्कुर्वन्तु । तत्र

प्रायपाठपरित्यागो मुख्यत्रितयलङ्घनम् ।
पूर्वस्मिन्नुत्तरे पक्षे प्रायपाठस्य बाधनम् ॥

पुच्छपदं हि वालधौ मुख्यं सदानन्दमयावयवे गौणमेवेति मुख्यशब्दार्थलङ्घनम् अवयवपरतायाम- धिकरणपरतायां च तुल्यम् । अवयवप्रायलेखबाधश्च विकारप्रायलेखबाधेन तुल्यः । ब्रह्मपदमानन्दमयपदम्

भामती-व्याख्या

प्राय-पाठ देख कर क्या यह मान लिया जाय कि अवयवार्थक पुच्छं पद-समभिव्याहृत 'ब्रह्म' पद अपने विशुद्धचिदात्मरूप वाच्यार्थ को छोड़ कर अवयवरूप अर्थ को कहता है ? या 'आनन्दमय' पद विकारार्थक पदों के प्रवाह में पठित होने के कारण विकार-वाची है ? या किसी प्रकार प्रचुर आनन्द का वाचक है ? या ब्रह्म में अप्रसिद्ध होने पर भी किसी वृत्ति के द्वारा ब्रह्मपरक है ? या जैसे अभ्यस्त 'ज्योति पद की ज्योतिष्टोम में लक्षणा होती है, वैसे ही अभ्यस्त 'आनन्द' पद की आनन्दमय में लक्षणा की जाय ? अथवा 'आनन्दमय' पद विकारार्थक ही रहे, ब्रह्म' पद भी अपने स्वार्थभूत ब्रह्म का ही वाचक रहे, 'आनन्द' पद का अभ्यास भी अपने स्वार्थमात्र का समर्थक रहे, केवल 'पुच्छ' पद अवयवार्थक पदों के प्रवाह में प्रविष्ट होने के कारण अधिकरणार्थक मान लिया जाय ? इन प्रश्नों पर विवेचकों को अपना विचार प्रस्तुत करना चाहिए । उन पक्षों में —

प्रायपाठपरित्यागो मुख्यत्रितयलङ्घनम् ।
पूर्वस्मिन्नुत्तरे पक्षे प्रायपाठस्य बाधनम् ॥

[ 'मयट्' प्रत्यय विकारार्थ में, 'ब्रह्म' शब्द ब्रह्मरूप अर्थ में और अभ्यस्यमान 'आनन्द' शब्द प्रकृत्यर्थ में स्वभावतः मुख्य है, इन तीनों स्वभावों का पूर्व पक्ष में उल्लङ्घन और 'आनन्दमय' पद का विकारार्थक पदों के प्राय में पाठ उपेक्षित हो जाता है । उत्तर पक्ष में केवल 'पुच्छ' पद का अवयव-प्राय-पाठ बाधित होता है, मुख्यार्थक तीनों पदों पर किसी प्रकार का आघात नहीं आता ] अर्थात् 'पुच्छ' पद पशु की बालधि ( लाङ्गूल ) में मुख्य होकर आनन्दमय के अवयवार्थ में गौण ही माना जाता है। मुख्य शब्दार्थ का उल्लङ्घन अवयवपरता ओर