भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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२२०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १९

संक्रमितव्यस्यान्नमयादिवदब्रह्मत्वे सति नैव विदुषो ब्रह्मप्राप्तिः फलं निर्दिष्टं भवेत्। नैष दोषः, आनन्दमयोपसंक्रमणनिर्देशेनैव पुच्छप्रतिष्ठाभूतब्रह्मप्राप्तेः फलस्य निर्दिष्टत्वात्। 'तदप्येष श्लोको भवति। यतो वाचो निवर्तन्ते' इत्यादिना च प्रपञ्च्यमानत्वात्। या त्वानन्दमयसंनिधाने 'सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेयेति' इयं श्रुतिरुदाहृता, सा 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा' इत्यनेन संनिहिततरेण ब्रह्मणा संबध्यमाना नानन्दमयस्य ब्रह्मतां प्रतिबोधयति। तदपेक्षत्वाच्चोत्तरस्य ग्रन्थस्य 'रसो वै सः' इत्यादेर्नानन्दमयविषयता। ननु 'सोऽकामयत' इति ब्रह्मणि पुंल्लिङ्गनिर्देशो नोपपद्यते। नायं दोषः, 'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः' इत्यत्र पुंल्लिङ्गेनाप्यात्मशब्देन ब्रह्मणः प्रकृतत्वात्। या तु भार्गवी वारुणी विद्या 'आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानाद्' इति, तस्यां मयडश्रवणात्, प्रियशिरस्त्वाद्यश्रवणाच्च युक्तमानन्दस्य ब्रह्मत्वम्। तस्मादणुमात्रमपि विशेषमनाश्रित्य न स्वत एव प्रियशिरस्त्वादि ब्रह्मण उपपद्यते। नचेह सविशेषं ब्रह्म प्रतिपिपादयिषितं, वाङ्मनसगोचरातिक्रमश्रुतेः। तस्मादन्नमयादिष्वि-

भामती

आनन्दपदमिति त्रितयलङ्घनं त्वधिकं, तस्मान्मुख्यत्रितयलङ्घनादसाधीयान् पूर्वः पक्षः। मुख्यत्रयानुगुण्येन तूत्तर एव पक्षो युक्तः। अपि चानन्दमयपदस्य ब्रह्मार्थत्वे ब्रह्म पुच्छमिति न समञ्जसम्। नहि तदेवावयव्यवयवश्चेति युक्तम्। आधारपरत्वे च पुच्छशब्दस्य प्रतिष्ठेत्येतदप्युपपन्नतरं भवति। आनन्दमयस्य चान्तरत्वमन्नमयादिकोशापेक्षया। ब्रह्मणस्त्वान्तरत्वमानन्दमयार्थाद् गम्यत इति न श्रुत्योक्तम्। एवं चान्न मयादिवदानन्दमयस्य प्रियाद्यवयवयोगो युक्तः। वाङ्मनसागोचरे तु परब्रह्मण्युपाधिमन्तर्भाव्य प्रियाद्यवयवयोगः प्राचुर्यं च क्लेशेन व्याख्यायेयाताम्। तथा च मन्त्रवर्णिकस्य ब्रह्मण एव ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठेति स्वप्रधानस्याभिधानात् तस्यैवाधिकारो नानन्दमयस्येति। सोऽकामयतेत्याद्या अपि श्रुतयो ब्रह्मविषया नानन्दमयविषया इत्यर्थसंक्षेपः। सुगममन्यत्॥

भामती-व्याख्या

अधिकरणार्थपरता—इन दोनों पक्षों में समान है। अवयवार्थक पदों के प्राय-पाठ का बाध विकारार्थक पदों के प्राय-पाठ-बाध के तुल्य है, किन्तु 'ब्रह्म' पद, 'आनन्दमय' पद और 'आनन्द' पद—तीनों की मुख्यार्थता का बाध अधिक होता है, अतः मुख्य त्रितय का उल्लङ्घन होने के कारण पूर्व पक्ष अयुक्त और मुख्य-त्रितय का पोषक होने के कारण उत्तर पक्ष श्रेष्ठ है।

दूसरी बात यह भी कि 'आनन्दमय' पद को ब्रह्मार्थक मानने पर **"ब्रह्म पुच्छम्"—**इस वाक्य का सामञ्जस्य नहीं बैठता, क्योंकि वही ब्रह्म अवयवी भी और अपना अवयव भी हो—ऐसा सम्भव नहीं। 'पुच्छ' शब्द को आधारपरक मानने पर 'प्रतिष्ठा' पद भी उपपन्नतर हो जाता है। आनन्दमय में अभ्यन्तरता का प्रतिपादन अन्नमयादि कोशों की अपेक्षा किया जा सकता है। ब्रह्म में सर्वान्तरता तो अर्थात् सिद्ध हो जाती है, अतः श्रुति ने उसका अभिधान नहीं किया। इस प्रकार अन्नमयादि के समान आनन्दमय के प्रियादि अवयवों का योग और प्राचुर्य का समन्वय हो सकता है, किन्तु वह सुकर नहीं, अपितु क्लेश-साध्य है। फलतः **"सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म"—**इस मन्त्रवर्ण में प्रस्तावित ब्रह्म का ही **"ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा"—**यहाँ पर मुख्यतः अभिधान किया गया है, वही अधिकृत है, आनन्दमय नहीं। "सोऽकामयत" (तै. उ. २।६) इत्यादि श्रुतियाँ भी ब्रह्म को ही विषय करती हैं, आनन्दमय को नहीं। शेष भाष्य सुगम है। [यह जो शङ्का होती है कि 'ब्रह्म' पद नपुंसक लिङ्ग है, उसका **"सोऽकामयत"—**यहाँ पुँल्लिङ्गरूप से निर्देश क्योंकर होगा?' उस शङ्का का समाधान यह है कि **"तस्माद्वा एतस्मादात्मनः आकाशः सम्भूतः"—**इत्यादि वाक्यों में उसी ब्रह्म का