भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
| २२० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १९ |
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संक्रमितव्यस्यान्नमयादिवदब्रह्मत्वे सति नैव विदुषो ब्रह्मप्राप्तिः फलं निर्दिष्टं भवेत्। नैष दोषः, आनन्दमयोपसंक्रमणनिर्देशेनैव पुच्छप्रतिष्ठाभूतब्रह्मप्राप्तेः फलस्य निर्दिष्टत्वात्। 'तदप्येष श्लोको भवति। यतो वाचो निवर्तन्ते' इत्यादिना च प्रपञ्च्यमानत्वात्। या त्वानन्दमयसंनिधाने 'सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेयेति' इयं श्रुतिरुदाहृता, सा 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा' इत्यनेन संनिहिततरेण ब्रह्मणा संबध्यमाना नानन्दमयस्य ब्रह्मतां प्रतिबोधयति। तदपेक्षत्वाच्चोत्तरस्य ग्रन्थस्य 'रसो वै सः' इत्यादेर्नानन्दमयविषयता। ननु 'सोऽकामयत' इति ब्रह्मणि पुंल्लिङ्गनिर्देशो नोपपद्यते। नायं दोषः, 'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः' इत्यत्र पुंल्लिङ्गेनाप्यात्मशब्देन ब्रह्मणः प्रकृतत्वात्। या तु भार्गवी वारुणी विद्या 'आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानाद्' इति, तस्यां मयडश्रवणात्, प्रियशिरस्त्वाद्यश्रवणाच्च युक्तमानन्दस्य ब्रह्मत्वम्। तस्मादणुमात्रमपि विशेषमनाश्रित्य न स्वत एव प्रियशिरस्त्वादि ब्रह्मण उपपद्यते। नचेह सविशेषं ब्रह्म प्रतिपिपादयिषितं, वाङ्मनसगोचरातिक्रमश्रुतेः। तस्मादन्नमयादिष्वि-
भामती
आनन्दपदमिति त्रितयलङ्घनं त्वधिकं, तस्मान्मुख्यत्रितयलङ्घनादसाधीयान् पूर्वः पक्षः। मुख्यत्रयानुगुण्येन तूत्तर एव पक्षो युक्तः। अपि चानन्दमयपदस्य ब्रह्मार्थत्वे ब्रह्म पुच्छमिति न समञ्जसम्। नहि तदेवावयव्यवयवश्चेति युक्तम्। आधारपरत्वे च पुच्छशब्दस्य प्रतिष्ठेत्येतदप्युपपन्नतरं भवति। आनन्दमयस्य चान्तरत्वमन्नमयादिकोशापेक्षया। ब्रह्मणस्त्वान्तरत्वमानन्दमयार्थाद् गम्यत इति न श्रुत्योक्तम्। एवं चान्न मयादिवदानन्दमयस्य प्रियाद्यवयवयोगो युक्तः। वाङ्मनसागोचरे तु परब्रह्मण्युपाधिमन्तर्भाव्य प्रियाद्यवयवयोगः प्राचुर्यं च क्लेशेन व्याख्यायेयाताम्। तथा च मन्त्रवर्णिकस्य ब्रह्मण एव ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठेति स्वप्रधानस्याभिधानात् तस्यैवाधिकारो नानन्दमयस्येति। सोऽकामयतेत्याद्या अपि श्रुतयो ब्रह्मविषया नानन्दमयविषया इत्यर्थसंक्षेपः। सुगममन्यत्॥
भामती-व्याख्या
अधिकरणार्थपरता—इन दोनों पक्षों में समान है। अवयवार्थक पदों के प्राय-पाठ का बाध विकारार्थक पदों के प्राय-पाठ-बाध के तुल्य है, किन्तु 'ब्रह्म' पद, 'आनन्दमय' पद और 'आनन्द' पद—तीनों की मुख्यार्थता का बाध अधिक होता है, अतः मुख्य त्रितय का उल्लङ्घन होने के कारण पूर्व पक्ष अयुक्त और मुख्य-त्रितय का पोषक होने के कारण उत्तर पक्ष श्रेष्ठ है।
दूसरी बात यह भी कि 'आनन्दमय' पद को ब्रह्मार्थक मानने पर **"ब्रह्म पुच्छम्"—**इस वाक्य का सामञ्जस्य नहीं बैठता, क्योंकि वही ब्रह्म अवयवी भी और अपना अवयव भी हो—ऐसा सम्भव नहीं। 'पुच्छ' शब्द को आधारपरक मानने पर 'प्रतिष्ठा' पद भी उपपन्नतर हो जाता है। आनन्दमय में अभ्यन्तरता का प्रतिपादन अन्नमयादि कोशों की अपेक्षा किया जा सकता है। ब्रह्म में सर्वान्तरता तो अर्थात् सिद्ध हो जाती है, अतः श्रुति ने उसका अभिधान नहीं किया। इस प्रकार अन्नमयादि के समान आनन्दमय के प्रियादि अवयवों का योग और प्राचुर्य का समन्वय हो सकता है, किन्तु वह सुकर नहीं, अपितु क्लेश-साध्य है। फलतः **"सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म"—**इस मन्त्रवर्ण में प्रस्तावित ब्रह्म का ही **"ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा"—**यहाँ पर मुख्यतः अभिधान किया गया है, वही अधिकृत है, आनन्दमय नहीं। "सोऽकामयत" (तै. उ. २।६) इत्यादि श्रुतियाँ भी ब्रह्म को ही विषय करती हैं, आनन्दमय को नहीं। शेष भाष्य सुगम है। [यह जो शङ्का होती है कि 'ब्रह्म' पद नपुंसक लिङ्ग है, उसका **"सोऽकामयत"—**यहाँ पुँल्लिङ्गरूप से निर्देश क्योंकर होगा?' उस शङ्का का समाधान यह है कि **"तस्माद्वा एतस्मादात्मनः आकाशः सम्भूतः"—**इत्यादि वाक्यों में उसी ब्रह्म का
आनन्दमयस्य ब्रह्मत्वम् ] हन्दीसहितभामतीसंवलितम् २२१
वानन्दमयेऽपि विकारार्थ एव मयड् विज्ञेयो न प्राचुर्यार्थः, सूत्राणि त्वेवं व्याख्येयानि— 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा' इत्यत्र किमानन्दमयावयवत्वेन ब्रह्म विवक्ष्यत उत स्वप्रधानत्वे- नेति ? पुच्छशब्दादवयवत्वेनेति प्राप्त उच्यते—'आनन्दमयोऽभ्यासात्' । आनन्दमय आत्मत्यत्र 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा' इति स्वप्रधानमेव ब्रह्मोपदिश्यते, अभ्यासात् । 'असन्नेव स भवति' इत्यस्मिन्निगमनश्लोके ब्रह्मण एव केवलस्याभ्यस्यमानत्वात् । 'विकारशब्दान्नेति चेन्न प्राचुर्यात्' । विकारशब्देनावयवशब्दोऽभिप्रेतः । पुच्छमित्य- वयवशब्दान्न स्वप्रधानत्वं ब्रह्मण इति यदुक्तं, तस्य परिहारो वक्तव्यः । अत्रोच्यते— नायं दोषः, प्राचुर्यादप्यवयवशब्द्रोपपत्तेः । प्राचुर्यं प्रायापत्तिः, अवयवप्राये वचन- मित्यर्थः । अन्नमयादीनां हि शिरआदिषु पुच्छान्तेष्ववयवेषूक्तेष्वानन्दमयस्यापि शिरआदीन्यवयवान्तराण्युक्त्वाऽवयवप्रायापत्त्या 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा' इत्याह, नावयव- विवक्षया । यत्कारणमभ्यासादिति स्वप्रधानत्वं ब्रह्मणः समर्थितम् । 'तद्धेतुव्यपदे-
भामती-व्याख्या
'आत्मा' पद के द्वारा उल्लेख किया गया है, जो कि पुँल्लिङ्ग है । यह भृगु-द्वारा प्राप्त और वरुणोपदिष्ट विद्या में कहा गया है—"आनन्दं ब्रह्मेति व्यजानात्" ( तै. उ. ३।६ ) । वहाँ 'मयट्' का निर्देश नहीं, अतः आनन्द में ब्रह्मरूपता वहाँ सम्भव है । ब्रह्म में उपाधि का योग जब तक न हो, तब तक प्रियशिरस्त्वादि का सम्बन्ध स्थापित नहीं हो सकता । यहाँ सोपाधिक या सविशेष ब्रह्म विवक्षित नहीं कि प्रियशिरस्त्वादि का योग मान लिया जाता, क्योंकि "यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह" ( तै. उ. २।४।१ ) इत्यादि वाक्यों के द्वारा निर्विशेष ब्रह्म का प्रकरण अवधारित है । फलतः अन्नमयादि वाक्यों में जैसे 'मयट्' विकारार्थक है, वैसे ही 'आनन्दमय' शब्द में भी विकारपरक मयट् मानना ही न्याय-संगत है, प्राचुर्यार्थक नहीं । श्रुति का ऐसा तात्पर्य मानने पर इस अधिकरण के सूत्रों का जो विरोध होता है, उसकी निवृत्ति के लिए गौणी वृत्ति या लक्षणादि के द्वारा सूत्रों की अन्यथा व्याख्या कर लेनी चाहिए, क्योंकि ब्रह्मावगति में श्रुति-वाक्य प्रधान कारण है और सूत्र-वाक्य अप्रधान या गौण साधन, अत एव महर्षि जैमिनि ने मुख्य शब्दों की लक्षणादि न मान कर गौणीभूत पदों की ही लक्षणा को न्यायोचित ठहराया है—"गुणे तु अन्यायकल्पना" ( जै. सू. १।३।१५ ) । वार्तिककार भी कहते हैं—
वैदिकं जैमिनीयं च यत्र वाक्यं विरुध्यते ।
अध्याहारादिभिः सूत्रं वैदिकं तु यथाश्रुतम् ॥ ( श्लो. वा. पृ. १५ )
लक्षणादि के द्वारा सूत्रों का तात्पर्य ऐसा पर्यवसित होता है—'आनन्दमय' शब्द की "ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा"—इस वाक्य के घटकीभूत 'ब्रह्म' पद में लक्षणा की जाती है । आशय यह है कि 'आनन्दमय' इत्यादि वाक्यों में जो "ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा"—यहाँ प्रयुक्त 'ब्रह्म' पद मुख्यार्थक है, अतः वहाँ श्रुति को 'ब्रह्म अधिकरणम्'—ऐसा कहना चाहिए था, किन्तु वैसा न कह कर जो 'ब्रह्म पुच्छम्'—ऐसा कहा गया है, उसका कारण यह है कि पूर्व- वाक्यों में अवयवार्थक पदों का प्रयोग सन्निहित था, अतः सन्निधान के अनुरोध से अवयवा- र्थक 'पुच्छ' पद का प्रयोग कर दिया गया, किन्तु इसकी भी अधिकरण में लक्षणा की जा सकती है, [ अतः "आनन्दमयोऽभ्यासात्" इस सूत्र का अर्थ यह पर्यवसित होता है कि आनन्दमयपदोपलक्षित "ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा"—इस वाक्य का घटकीभूत 'ब्रह्म' पद अपने ब्रह्मात्मक मुख्यार्थ का ही बोधक है, क्योंकि 'असन्नेव स भवति असद् ब्रह्मेति वेद चेद"
२२२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. १९
शाच्च' । सर्वस्य हि विकारजातस्य सानन्दमयस्य कारणत्वेन ब्रह्म व्यपदिश्यते— ‘इदं .सर्वमसृजत । यदिदं किञ्च’ ( तै० २।६ ) इति । न च कारणं सत् ब्रह्म स्वविका- रस्थानन्दमयस्य मुख्यया वृत्त्याऽवयव उपपद्यते । अपराण्यपि सूत्राणि यथासंभवं पुच्छवाक्यनिर्दिष्टस्यैव ब्रह्मण उपपादकानि द्रष्टव्यानि ॥ १९ ॥
भामती
❖ सूत्राणि त्वेवं व्याख्येयानि इति ❖ । वेदसूत्रयोर्विरोधे गुणे त्वन्याय्यकल्पनेति सूत्राण्यन्यथा नेतव्यानि । आनन्दमयशब्देन तद्वाक्यस्थब्रह्मपुच्छप्रतिष्ठेत्येतद्गतं ब्रह्मपदमुपलच्यते । एतदुक्तं भवति— आनन्दमय इत्यादिवाक्ये यद् ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठेति ब्रह्मपदं, तत् स्वप्रधानमेवेति । यत्तु ब्रह्माधिकरणमिति वक्तव्ये ब्रह्म पुच्छमित्याह श्रुतिः, तत्कस्य हेतोः? पूर्वमवयवप्रधानप्रयोगात् तत्प्रयोगस्यैव बुद्धौ सन्निधानात्, तेनापि चाधिकरणलक्षणोपपत्तेरिति ॥ 'मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते ❖ ।१५। यत्सत्यं ज्ञानमित्यादिना मन्त्रवर्णेन ब्रह्मोक्तं तदेतदुपायभूतेन ब्राह्मणेन स्वप्राधान्येन गीयते—ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठेति । अवयववचनत्वे त्वस्य मन्त्रे प्राधान्यं ब्राह्मणे त्वप्राधान्यमिति, उपायोपेययोर्मन्त्रब्राह्मणयोर्विप्रतिपत्तिः स्यादिति । ❖ नेतरोऽनुपपत्तेः ❖ । अत्र इतश्चानन्दमय इति भाष्यस्य स्थाने इतश्च ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठेति पठितव्यम् । ❖ भेदव्यपदेशाच्च ❖ । अत्रापीतश्चानन्दमय इत्यस्य चानन्दमयाधिकार इत्यस्य च भाष्यस्य स्थाने ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठेति च ब्रह्मपुच्छाधिकार इति च पठितव्यम् । ❖ कामाच्च नानुमानापेक्षा ❖ । ❖ अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ❖ । इत्यनयोरपि सूत्रयोर्भाष्ये आनन्दमयस्थाने ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठेति पाठो द्रष्टव्यः । ❖ तद्धेतुव्यपदेशाच्च ❖ । विकारस्यानन्दमयस्य ब्रह्म पुच्छमवयवश्चेत् कथं सर्वस्यास्य
भामती-व्याख्या
( तै० उ० २।६।१ ) इत्यादि वाक्यों में केवल ब्रह्म ही अभ्यस्यमान है ॥ १२ ॥ ‘विकार- शब्दान्नेति चेन्न, प्राचुर्यात्’—इस सूत्र में 'विकार' शब्द से अवयव अभिप्रेत है । 'अवयवा- र्थक पुच्छ पद के योग में “ब्रह्म” पद मुख्यार्थक क्योंकर हो सकेगा ? इस शङ्का का परिहार इस सूत्र से किया गया है—“नायं दोष, प्राचुर्यात्” । प्राचुर्य का अर्थ है—प्रायपाठ । अवयवार्थक अन्नमयादि पदों के प्रवाह में पतित होने के कारण अवयवार्थक 'पुच्छ' पद के द्वारा ब्रह्म का भी निर्देश कर दिया गया है, 'पुच्छ' पद से आधारार्थ की विवक्षा है, मुख्य ब्रह्म जगत् का आधार ( अधिष्ठान ) है ही, अतः 'ब्रह्म' पद की मुख्यार्थता में किसी प्रकार की अनुपपत्ति नहीं ॥ १३ ॥ “तद्धेतुव्यपदेशाच्च”—इस सूत्र के द्वारा आनन्दमय-सहित समस्त विकार वर्ग की कारणता ब्रह्म में ही श्रुत है—"इदं सर्वमसृजत, यदिदं किंच" ( तै. उ. २।६ ) । कारणीभूत ब्रह्म अपने विकारभूत आनन्दमय का मुख्यरूप से अवयव नहीं हो सकता । अन्य सूत्र भी "ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा”—इस वाक्य में निर्दिष्ट ब्रह्म के ही उपपादक हैं ॥ १४ ॥] । जो सत्यं ज्ञानमनन्तम्'—इस मन्त्रवर्ण में ब्रह्म निर्दिष्ट है, वही ब्रह्म इस ब्राह्मण वाक्य में उपात्त है—'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा' । यदि मन्त्रगत 'ब्रह्म' पद मुख्यार्थक और ब्राह्मणवाक्यगत 'ब्रह्म' पद अवयवपरक माना जाता है, तब मन्त्र और ब्राह्मण का उपाय-उपेयभाव सुरक्षित नहीं रहता, अतः ब्राह्मणगत 'ब्रह्म' पद को भी मुख्यार्थक मानना आवश्यक है ॥ १५ ॥ “नेतरोऽनुपपत्तेः”—इसमें “इतश्चानन्दमय”—इस भाष्य के स्थान पर “इतश्च ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा”—ऐसा पढ़ना चाहिए ॥ १६ ॥ “भेदव्यपदेशाच्च”— इस सूत्र के स्थान पर “ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा” और “आनन्दमयाधिकारे” इसके स्थान पर “ब्रह्मपुच्छाधिकारे”—ऐसा पढ़ना चाहिए ॥ १७ ॥ “कामाच्च नानुमानापेक्षा” और “अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति”— इन दोनों सूत्रों के भाष्य में ही 'आनन्दमय' के स्थान पर
आदित्यपुरुषस्य जीवत्वाशङ्काः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २२३
( ७ अन्तरधिकरणम् । २०–२१ )
अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ॥ २० ॥
इदमाम्नायते—'अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आ प्रणखात्सर्व एव सुवर्णः' 'तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी तस्योदिति नाम स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदित उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद' 'इत्यधिदैवतम्' ( छा० १।६।६,७,८ )। अथाध्यात्ममपि 'अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते' (छा० १।७।१,५) इत्यादि। तत्र संशयः—किं विद्याकर्मातिशयवशात्प्राप्तोत्कर्षः कश्चित्संसारी सूर्यमण्डले चक्षुषि चोपास्यत्वेन श्रूयते, किंवा नित्य-
भामती
विकारजातस्य सानन्दमयस्य ब्रह्म पुच्छं कारणमुच्येत 'इदं सर्वमसृजत, यदिदं किञ्च' इति श्रुत्या ? नह्यानन्दमयविकारावयवो ब्रह्मविकारः सन् सर्वस्य कारणमुपपद्यते । तस्मादानन्दमयविकारावयवो ब्रह्मेति तदवयवयोग्यानन्दमयो विकार इह नोपास्यत्वेन विवक्षितः, किन्तु स्वप्रधानमिह ब्रह्म पुच्छं ज्ञेयत्वेनेति सिद्धम् ।
पूर्वस्मिन्नधिकरणेऽपास्तसमस्तविशेषब्रह्मप्रतिपत्त्यर्थमुपायतामात्रेण पञ्च कोशा उपाधयः स्थिताः, न तु विवक्षिताः । ब्रह्मैव तु प्रधानं ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठेति ज्ञेयत्वेनोपक्षिसमिति निर्णीतम् । सम्प्रति तु ब्रह्म विवक्षितोपाधिभेदमुपास्यत्वेनोपक्षिप्यते, न तु विद्याकर्मातिशयलब्धोत्कर्षो जीवात्मादित्यपदवेदनीय इति
भामती-व्याख्या
'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा'—ऐसा पढ़ना चाहिए ॥ १८-१९ ॥ 'तद्धेतुव्यपदेशाच्च' । आनन्दमयरूप विकार का यदि ब्रह्म पुच्छरूप अवयव है, तब आनन्दमय-सहित समस्त विकारवर्ग की हेतुता का जो श्रुतियों में प्रतिपादन है—"इदं सर्वमसृजत, यदिदं किञ्च"। वह कैसे उपपन्न होगा ? क्योंकि आनन्दमयरूप विकार का अवयवभूत ब्रह्म समस्त जगत् का कारण नहीं हो सकता, अतः आनन्दमयात्मक विकार का अवयवरूप ब्रह्म यहाँ उपास्यत्वेन निर्दिष्ट है—ऐसा कहना संगत नहीं, किन्तु 'ब्रह्म पुच्छम्'—यहाँ मुख्यार्थक 'ब्रह्म' पद ज्ञेयभूत मुख्य ब्रह्म का बोधक है ॥ १९ ॥
संगति—विगत अधिकरण में समस्त उपाधियों से रहित निर्विशेष ब्रह्म की प्रतिपत्ति (ज्ञान) प्राप्त करने के लिए उपायभूत अन्नमयादि पाँच कोशों का उपस्थापक वाक्य-समूह प्रस्तुत किया गया, वहाँ कोशरूप उपाधियाँ विवक्षित नहीं, मान्त्रवर्णिक निर्विशेष ब्रह्म ही "ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा"—इस वाक्य के द्वारा निर्णीत हुआ, किन्तु इस अधिकरण में विवक्षित उपाधियों से युक्त ब्रह्म उपास्यत्वेन प्रस्तुत किया जाता है। आदित्य पद के द्वारा वह जीव प्रतिपादनीय नहीं माना गया, जिसने अपनी विद्या और धर्म के द्वारा परमोत्कर्ष का लाभ कर लिया हो। [उपासना का यह प्रस्तुतीकरण अपने तक ही सीमित नहीं, अपितु इसका उद्देश्य ब्रह्म-ज्ञान के पावन शिखर पर पहुँचना ही है, कल्पतरु की अधोलोक्ति तथ्यपूर्ण है—
निर्विशेषं परं ब्रह्म साक्षात्कर्तुमनीश्वराः।
ये मन्दास्तेऽनुकम्प्यन्ते सविशेषनिरूपणैः ॥ १ ॥
वशीकृते मनस्येषां सगुणब्रह्मशीलनात्।
तदेवाविर्भवेत् साक्षादपेतोपाधिकल्पनम् ॥ २ ॥ ] ।
संशय—"य एषोऽन्तरादित्ये पुरुषो दृश्यते" (छां. १।६।६) इत्यादि वाक्यों में क्या
| २२४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. २० |
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सिद्धः परमेश्वर इति ? किं तावत्प्राप्तम् ? संसारीति । कुतः ? रूपवत्त्वश्रवणात् । आदित्यपुरुषे तावत् ‘हिरण्यश्मश्रुः’ इत्यादि रूपमुदाहृतम् । अक्षिपुरुषेऽपि तदेवातिदेशेन प्राप्यते—‘तस्यैतस्य तदेव रूपं यदमुष्य रूपम्’ इति । न च परमेश्वरस्य रूपवत्त्वं युक्तम्, ‘अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम्’ (का० १।३।१५) इति श्रुतेः, आधारश्रवणाच्च—‘य एषोऽन्तरादित्ये’, ‘य एषोऽन्तरक्षिणि’ इति । न ह्यनाधारस्य स्वमहिमप्रतिष्ठस्य सर्वव्यापिनः परमेश्वरस्याधार उपदिश्येत । ‘स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि’ (छा० ७।२४।१) इति । ‘आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः’ इति च श्रुतौ भवतः । ऐश्वर्यमर्यादाश्रुतेश्च । ‘स एष ये चामुष्मात्पराञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां च’ (छा० १।६।८) इत्यादित्यपुरुषस्यैश्वर्यमर्यादा । ‘स एष ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे मनुष्यकामानां च’ (छा० १।७।६) इत्यक्षिपुरुषस्य । न च परमेश्व-
भामती
निर्णायते । तत्र—
मर्यादाधाररूपाणि संसारिणि परे न तु ।
तस्मादुपास्यः संसारी कर्मानधिकृतो रविः ।
हिरण्यश्मश्रुरित्यादिरूपश्रवणात्, य एषोऽन्तरादित्ये य एषोऽन्तरक्षिणीति चाधारभेदश्रवणाद् ये चामुष्मात्पराञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां चेत्यैश्वर्यमर्यादाश्रुतेश्च, संसार्येत्र कार्यकारणसङ्घातात्मको रूपा तिसम्पन्न इहोपास्यः, न तु परमात्मा ‘अशब्दमस्पर्शम्’ इत्यादिश्रुतिभिः ‘अपास्तसमस्तरूपश्च स्वे महिम्नि’ इत्यादिश्रुतिभिरपाकृताधारश्च ‘एष सर्वेश्वरः’ इत्यादिश्रुतिभिरधिगतनिर्मर्यादैश्वर्य्यश्च शक्य उपास्यःत्वेनेह प्रतिपत्तुम् । सर्वपाप्मविरहश्चादित्यपुरुषे सम्भवति, शास्त्रस्य मनुष्याधिकारतया देवतायाः पुण्यपापयोरनधिकारात् । रूपादिमत्त्वान्यथानुपपत्त्या च कार्यकारणात्मके जीवे उपास्यत्वेन विवक्षिते
भामती-व्याख्या
जीव उपास्यत्वेन श्रुत है ? अथवा नित्य सिद्ध परमेश्वर ?
पूर्वपक्ष—यहाँ आदित्यपुरुष की उपासना प्रस्तुत की जाती है—
मर्यादाधाररूपाणि संसारिणि परे न तु ।
तस्मादुपास्यः संसारी कर्मानधिकृतो रविः ॥
श्रुति-प्रतिपादित मर्यादा, आधार और रूपात्मक उपाधियाँ जीव में ही सम्भावित हैं, परमेश्वर में नहीं, अतः जीवविशेष ही उपास्यत्वेन उपस्थित किया जाता है—‘हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेशः’ इत्यादि स्वर्णिम मूँछ, दाढ़ी और केशवाला भव्यरूप वर्णित है । “य एषोऽन्तरादित्ये”, “य एषोऽन्तरक्षिणि” इत्यादि आधार-विशेष कहा गया है । “ये चामुष्मात् पराञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां च” (छां. १।६।८)—इस प्रकार ऐश्वर्य की मर्यादा अवधारित है कि आदित्यलोक के ऊर्ध्वस्थ लोकों का ही शासन करता है । कथित रूप, आधार और अधिकार का समन्वय किसी संसारी जीव में हो सकता है, अतः कार्य (शरीर) और करण (इन्द्रियादि) से युक्त जीव ही यहाँ उपास्यत्वेन निर्दिष्ट है, परमेश्वर नहीं, क्योंकि वह “अशब्दमस्पर्शम्”—इत्यादि श्रुतियों के द्वारा समस्त उपाधियों से रहित और अपनी ही महिमा में अवस्थित कहा गया है—“स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्न” (छां. ७।२४।१) । उसका कोई अन्य आधार नहीं और न उसके ऐश्वर्य की कोई सीमा—“एष सर्वेश्वरः” (बृह. उ. ४।४।२२) । आदित्य-पुरुष में समस्त पापों का अभाव भी है, क्योंकि पुण्य-पापात्मक कर्मों के अनुष्ठान में त्रैवर्णिक पुरुष को छोड़ कर अन्य किसी देवतादि का अधिकार नहीं माना जाता, अतः वह पाप-युक्त क्यों होगा ? देवताओं द्वारा कर्म-सम्पादन का कहीं-कहीं
[ आदित्यपुरुषस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २२५
रस्य मर्यादावदैश्वर्यं युक्तम्, 'एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसंभेदाय' (बृ० ४।४।२२) इत्यविशेषश्रुतेः। तस्मान्नाक्ष्यादित्ययोरन्तः परमेश्वर इत्येवं प्राप्ते ब्रूमः—'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' इति, 'य एषोऽन्तरादित्ये', 'य एषोऽन्तरक्षिणि' इति च श्रूयमाणः पुरुषः परमेश्वर एव, न संसारी। कुतः? तद्धर्मोपदेशात्। तस्य हि परमेश्वरस्य धर्मा इहोपदिष्टाः। तद्यथा—'तस्योदिति नाम' इति श्रावयित्वा तस्यादित्यपुरुषस्य नाम 'स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य
भामती
यत्तावत् ऋगाद्यात्मकतयास्य सर्वात्मकत्वं श्रूयते तत्कथञ्चिदादित्यपुरुषस्यैव स्तुतिरित्यादित्यपुरुष एवोपास्यो न परमात्मेत्येवं प्राप्तम्। अनाधारस्त्वे च नित्यत्वं सर्वगतत्वं च हेतुः। अनित्यं हि कार्यं कारणाधारमिति नानाधारम्। नित्यमप्यसर्वगतं यत्तस्मादधरभावेनावस्थितं तदेव तस्योत्तरस्याधार इति नानाधारं तस्मादुभयमुक्तम्। एवं प्राप्तेऽभिधीयते—'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्'।
सर्वात्म्यसर्वदुरितविरहाभ्यामिहोच्यते ।
ब्रह्मैवाव्यभिचारिभ्यां सर्वहेतुविकारवत् ॥
नामनिरुक्तेन हि सर्वपाप्मापादानतयास्योदय उच्यते। न चादित्यस्य देवतायाः कर्मानधिकारेऽपि
भामती-व्याख्या
जो प्रतिपादन उपलब्ध होता है, वह अर्थवादमात्र है। जब कि श्रुति-प्रतिपादित रूप और आधारादि की अन्यथानुपपत्तिरूप अर्थापत्ति के द्वारा जीव उपास्यत्वेन निर्णीत हो गया, तब उस उपास्य तत्त्व के लिए जो "सैव ऋक्, तत्, साम, तदुक्थम्” (छां० १।७।५) इस प्रकार ऋगादिरूपता दिखाकर सर्वात्मकत्व ध्वनित किया है, वह अर्थवाद है और उसके द्वारा आदित्य-पुरुष की ही स्तुति की जाती है। फलतः यहाँ आदित्य-पुरुष का ही उपास्यत्वेन निर्देश सिद्ध होता है, गेय परमेश्वर का नहीं। भाष्यकार ने यह कहा है कि "न ह्यनाधारस्य स्वमहिमप्रतिष्ठितस्य सर्वव्यापिनः परमेश्वरस्याधार उपदिश्यते। "स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि" (छां० ७।२४।१) इति, "आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः" (गौड. का. ३।२) इति च श्रुतौ भवतः।" यहाँ परमेश्वर की अनाधारता सिद्ध करने के लिए 'नित्यत्व' और 'सर्वगतत्व'—इन दो हेतुओं का उल्लेख किया गया है, क्योंकि घटादि अनित्य पदार्थ जन्य होने के कारण अपने मृदादिरूप कारण पदार्थ को अपना आधार बनाता है; अतः अनाधार नहीं, तार्किकादि-सम्मत नित्य पदार्थ भी जो सर्वगत नहीं, ऐसे परमाण्वादि पदार्थ अनाधार नहीं होते, क्योंकि उनके नीचे अवस्थित पृथिव्यादि ही अपने ऊपर अवस्थित परमाण्वादि के आधार हैं, अतः 'नित्यत्व' और 'सर्वगतत्व'-दोनों को अनाधारता का हेतु बनाया गया है।
सिद्धान्त—"अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्" ।
सर्वात्म्यसर्वदुरितविरहाभ्यामिहोच्यते ।
ब्रह्मैवाव्यभिचारिभ्यां सर्वहेतुविकारवत् ॥
आदित्यादि के अन्दर अवस्थित पदार्थ ब्रह्म ही है, क्योंकि उसी के ही सर्वात्मत्वादि धर्मों का यहाँ उपदेश किया गया है। सर्वात्मत्व और सर्वपाप्म-निवृत्ति—ये दोनों धर्म ब्रह्म के अव्यभिचारी हैं, ब्रह्म को छोड़ कर अन्यत्र नहीं रहते। हिरण्यश्मश्रुत्वादि रूपविशेष का योग भी ब्रह्म में सम्भव है, किन्तु विकारवान् (सोपाधिक) ब्रह्म में, क्योंकि वह समस्त विश्व का हेतु है, अतः आदित्यादिगत कथित हिरण्यकेशादि-युक्तत्व का व्यवहार उसके हेतुभूत ब्रह्म में सम्भव है।
"तस्योदिति नाम"—इस प्रकार उक्त पुरुषतत्त्व का 'उद्' यह नाम बताकर इस नाम
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| २२६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. २० |
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उदितः' इति सर्वपाप्मापगमेन निर्वक्ति । तदेव च कृतनिर्वचनं नामाक्षिपुरुषस्याप्य- तिदिशति— 'यन्नाम तन्नाम' इति । सर्वपाप्मापगमश्च परमात्मन एव श्रूयते— 'य आत्माऽपहतपाप्मा' ( छा० ८।७।१ ) इत्यादौ । तथा चाक्षुषे पुरुषे 'सैवर्त्तत्साम तदुक्थं तद्यजुस्तद्ब्रह्म' इत्यृक्सामाद्यात्मकतां निर्धारयति । सा च परमेश्वरस्योपप- द्यते, सर्वकारणत्वात्सर्वात्मकत्वोपपत्तेः । पृथिव्यग्न्याद्यात्मके चाधिदैवतं ऋक्सामे,
भामती
सर्वपाप्मविरहः प्राग्भवीयधर्माधर्म रूपपाप्मसम्भवे सति । न चैतेषां प्राग्भवीयो धर्म एवास्ति, न पाप्मेति साम्प्रतम्, विद्याकर्मातिशयसमुदाचारेऽप्यनादिभवपरम्परोपार्जितानां पाप्मनामपि प्रसुप्तानां सम्भवात् । न च श्रुतिप्रामाण्यादादित्यशरीराभिमानिनः सर्वपाप्मविरह इति युक्तम्, ब्रह्मविषयत्वेनाप्यस्याः प्रामाण्यो- पपत्तेः । न च विनिगमनायां हेत्वभावः, तत्र तत्र सर्वपाप्मविरहस्य भूयो भूयो ब्रह्मण्येव श्रवणात् । तस्यैव चेह प्रत्यभिज्ञायमानस्य विनिगमनाहेतोर्विद्यमानत्वात् । अपि च सर्वात्म्यं जगत्कारणस्य ब्रह्मण एवोप- पद्यते । कारणावभेदात् कार्यजातस्य, ब्रह्मणश्च जगत्कारणत्वात् । आदित्यशरीराभिमानिनस्तु जीवात्मनो न जगत्कारणत्वम् । न च मुख्यार्थसम्भवे प्राशस्त्यलक्षणा स्तुत्यर्थता युक्ता । रूपवत्त्वञ्चास्य परानुग्रहाय
भामती-व्याख्या
का निर्वचन प्रस्तुत किया गया है— “स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः” ( छां. १।६।७ ) अर्थात् समस्त पापरूप अपादान से उदित या विमुक्त होने के कारण उसका 'उद्' यह नाम पड़ गया है। आदित्याभिमानी देवता में समस्त पाप-निवृत्ति सम्भव नहीं, क्योंकि यद्यपि देवता अपने वर्तमान जन्म में कर्म का अधिकारी न होने से पापार्जन नहीं कर सकता, तथापि उसके पूर्वजन्मार्जित पाप की सम्भावना बनी है, सर्वथा पापों की निवृत्ति ब्रह्म में ही घटती है। 'आदित्यादि देवगणों में पूर्वजन्मार्जित धर्म ही होता है, अधर्म या पाप नहीं'— ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि देवताओं में विद्या या धर्म का अतिशय अवश्य अपने कार्य में पूर्ण सक्षम होता है, किन्तु अनादि पूर्व जन्मों के अधर्म या पाप भी प्रसुप्त या अक्षम अवस्था में रहते हैं, जैसा कि योग-भाष्यकार कहते हैं— “क्लेशकर्मविपाकानुभवनििमित्ताभिस्तु वासनाभिरनादिकाल-सम्म्मूच्छितमिदं चित्रं चित्रीकृतमिव सर्वतो मत्स्यजालं ग्रन्थिभिरिवाततम्” ( यो० सू० २।१३ )।
शङ्का— जब श्रुति आदित्य-पुरुष के लिए कहती है कि “स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः” ( छां० १।६।७ ) तब श्रुति का प्रामाण्य इसी में है कि आदित्य-पुरुष सर्वथा निष्पाप होता है।
समाधान— उक्त श्रुति को यदि ब्रह्म के पाप्म-विरह का प्रतिपादक माना जाता है, तब भी उसका प्रामाण्य अक्षुण्ण रहता है। विनिगमनाभाव की भी शङ्का नहीं की जा सकती, क्योंकि ब्रह्म में ही बार-बार सर्वपाप्म-विरह प्रतिपादित है, अन्यत्र नहीं।
सर्वात्मत्व का सामञ्जस्य वस्तुतः ब्रह्म में ही होता है, अन्यत्र नहीं, क्योंकि ब्रह्म ही जगत् का कारण है। कार्य और कारण का अभेद होता है, आदित्य-पुरुष एक जीव है, जगत् का कारण नहीं हो सकता, अतः सर्वात्मक क्योंकर होगा? जब ब्रह्मगत मुख्य सर्वात्मत्व उपपन्न हो जाता है, तब आदित्याभिमानी जीव में स्तुत्यर्थक गौण सर्वात्मत्व की कल्पना संगत नहीं। ईश्वर सर्वशक्ति-सम्पन्न है सङ्कल्पमात्र से ऐसे शरीरों का निर्माण कर लेता है, जिसमें स्वर्णमय केशादि का समन्वय हो सकता है, वैसे शरीरों का धारण ईश्वर अपने भक्तों का उद्धार करने के लिए किया ही करता है। समस्त कार्य और विकार-वर्ग रूपवान् है एवं विकार-वर्ग अपने कारण से अभिन्न होता है, अतः विकारगत रूपादिमत्ता का व्यवहार कारणीभूत ईश्वर में वैसे ही हो जाता है, जैसे— “सर्वकर्मा, सर्वकामः, सर्वगन्धः, सर्वरसः”
आदित्यपुरुषस्येश्वरत्वम् ] | हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् | २३७
वाक्प्राणाद्यात्मके चाध्यात्ममनुक्रम्याह- 'तस्यर्क्च साम च गेष्णौ' इत्यधिदैवतम्। तथाऽध्यात्ममपि- 'यावमुष्य गेष्णौ तौ गेष्णो' इति। तच्च सर्वात्मन एवोपपद्यते। 'तद्य इमे वीणायां गायन्त्येतं ते गायन्ति तस्मात्ते धनसनयः' (छा० १।७।६) इति च लौकिकेष्वपि गानेष्वस्यैव गीयमानत्वं दर्शयति। तच्च परमेश्वरपरिग्रहे घटते, 'यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम्' (गी.१०।४१) इति भगवद्गीतादर्शनात्। लोककामेशितृत्वमपि निरङ्कुशं श्रूयमाणं परमेश्वरं
भामती
कायनिर्माणेन वा, तद्विकारतया वा सर्वस्य कार्यजातस्य, विकारस्य च विकारवतोऽनन्यत्वान्मायावश्वरूपभेदेनोपविश्यते, यथा 'सर्वगन्धः सर्वरसः' इति। न च ब्रह्मनिर्मितं मायारूपमनुवदच्छास्त्रमशास्त्रं भवति। अपि तु तां कुर्वदिति नाशास्त्रत्वप्रसङ्गः। यत्र तु ब्रह्म निरस्तसमस्तोपाधिभेदं ज्ञेयत्वेनोपदिश्यते, तत्र शास्त्रम् 'अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम्' इति प्रवर्तते। तस्माद्रूपवत्त्वमपि परमात्मन्युपपद्यते, एतेनैव मर्यादाधारभेदावपि व्याख्यातौ। अपि चादित्यदेहाभिमानिनः संसारिणोऽन्तर्यामी भेदेनोक्तः, स एवान्तरादित्य इत्यन्तः श्रुतिसाम्येन प्रत्यभिज्ञायमानो भवितुमर्हति। ॐ तस्मात्ते धनसनयः इति ॐ। धनवन्तो विभूतिमन्त इति यावन् कस्मात् पुनर्विभूतिमत्त्वं परमेश्वरपरिग्रहे घटत इत्यत आह ॐयद्यद्विभूतिमद् इतिॐ। सर्वात्मकत्वेऽपि विभूतिमत्स्वेव परमेश्वररूपाभिव्यक्तिः, न त्वविद्यातमःपिहितपरमेश्वरस्वरूपेष्वविभूति-
भामती-व्याख्या
(छां. ३।१४।४)। "हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेशः" (छां. १।७ १) ऐसा शास्त्र ब्रह्म-निर्मित माया रूप (मिथ्या रूप) का अनुवाद मात्र करता है, अतः अशास्त्र या अप्रमाण नहीं कहा जा सकता। हाँ, यदि वह नीरूप ब्रह्म में रूपवत्ता की माया बुद्धि (मिथ्या बुद्धि) को जन्म देता, तब वह अवश्य अशास्त्र हो जाता, किन्तु जब वह माया-द्वारा पूर्वोत्पादित कार्य का अनुवाद मात्र करता है, तब उसमें अशास्त्रत्व (अप्रमाणत्व) प्रसक्त क्यों होगा? जहाँ समस्त उपाधि-रहित ज्ञेय ब्रह्म का प्रसङ्ग है, वहाँ शास्त्र वस्तु-स्थिति पर पूर्ण प्रकाश डालता है—"अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम्" (कठो. १।३।१५ । फलतः ब्रह्म में रूपवत्ता की उपपत्ति हो जाती है। इसी प्रकार "स एष ये चामुष्प्रात् पराञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे" (छां. १।६।८) और "य एषोऽन्तरादित्ये" (छां. १।६।६) इत्यादि शास्त्रों के द्वारा प्रदर्शित मर्यादा और आधार की उपपत्ति भी औपाधिकरूप से ब्रह्म में हो जाती है। दूसरी बात यह भी है कि आदित्य-शरीराभिमानी जीव से भिन्न जो अन्तर्यामी के रूप में प्रदर्शित है—"एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः" (बृह. उ. ३।७।३)। वही "अन्तरादित्ये"—यहाँ प्रत्यभिज्ञात होता है, क्योंकि 'अन्तः' शब्द समानरूप से उभयत्र प्रयुक्त हुआ है, अतः अन्तर्यामी पदार्थ की ही यहाँ प्रत्यभिज्ञा होती है। [उसी परमेश्वर का अधिदेवत (देव-सम्बन्धी आदित्यादि प्रतीक में) ध्यान और अध्यात्म (यहाँ 'आत्मा' शब्द शरीर का बोधक है, अतः शरीर-सम्बन्धी प्राणादि में) उपासना प्रतिपादित है। उसी का गुण-गान वीणा में होता है, अत एव गायक-गण धनसनय हो जाते हैं]। धनसनय का अर्थ धनवान् या विभूतिमान् होता है। गायकों में विभूतिमत्त्व की उपपत्ति परमेश्वर के गान से क्यों? इस प्रश्न का उत्तर है—"तच्च परमेश्वरपरिग्रह एव घटते, 'यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ।। (गी. १०।४१) इति भगवद्गीतादर्शनात्"। यद्यपि ब्रह्मसर्वात्मक है, तथापि भूतिमान् (ऐश्वर्य-सम्पन्न) पदार्थों में ही उसकी अभिव्यक्ति होती है, अविद्यारूपी घोरान्धकार से जिन पदार्थों में परमेश्वर का स्वरूप आवृत्त (आच्छन्न) होता है, ऐसे अविभूतिमान् पदार्थों में परमेश्वर अभिव्यक्त नहीं होता। ऊर्ध्वादि लोकों का निरंकुश शासन
| २१८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. २२ |
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गमयति । यदुक्तं हिरण्यश्मश्रुत्वादिरूपश्रवणं परमेश्वरे नोपपद्यत इति, अत्र ब्रूमः—स्यात्परमेश्वरस्यापीच्छावशान्मायामयं रूपं साधकानुग्रहार्थम् । 'माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद । सर्वभूतगुणैर्युक्तं मैवं मां ज्ञातुमर्हसि' इति स्मरणात् । अपि च यत्र निरस्तसर्वविशेषं पारमेश्वरं रूपमुपदिश्यते, भवति तत्र शास्त्रम्—'अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम्' इत्यादि । सर्वकारणत्वात्तु विकारधर्मैरपि कैश्चिद्विशिष्टः परमेश्वर उपास्यत्वेन निर्दिश्यते—'सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः' ( छा० ३।१४।२ ) इत्यादिना । तथा हिरण्यश्मश्रुत्वादिनिर्देशोऽपि भविष्यति । यदप्याधार-श्रवणान्न परमेश्वर इति, अत्रोच्यते—स्वमहिमप्रतिष्ठस्याप्याधारविशेषोपदेश उपास-नार्थो भविष्यति, सर्वगतत्वाद् ब्रह्मणो व्योमवत्सर्वान्तरत्वोपपत्तेः । ऐश्वर्यमर्यादा-श्रवणमप्यध्यात्ममाधिदैवतविभागापेक्षमुपासनार्थमेव । तस्मात्परमेश्वर एवाक्ष्यादित्य-योरन्तरुपदिश्यते ॥ २० ॥
भेदव्यपदेशाच्चान्यः ॥ २१ ॥
अस्ति चादित्यादिशरीराभिमानिभ्यो जीवेभ्योऽन्य ईश्वरोऽन्तर्यामी, 'य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरं य आदित्यमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः' ( बृ० ३।७।९ ) इति श्रुत्यन्तरे भेदव्यपदेशात् । तत्र हि आदित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद' इति वेदितुरादित्याद्विज्ञानात्मनोऽन्योऽन्तर्यामी स्पष्टं निर्दिश्यते, स एवेहाप्यन्तरादित्ये पुरुषो भवितुमर्हति, श्रुतिसामान्यात् । तस्मात् परमेश्वर एवेहोपदिश्यत इति सिद्धम् ॥ २१ ॥
( ८ आकाशाधिकरणम् । सू० २२ )
आकाशस्तल्लिङ्गात् ॥ २२ ॥
इदमामनन्ति—'अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच सर्वाणि ह वा
भामती
मस्तित्वमर्थः । ॐ लोककामेशितृत्वमपि इति ॐ । अतोऽत्यन्तपारार्थ्यन्यायेन निरङ्कुशमैश्वर्य-मित्यर्थः ॥ २०-२१ ॥
पूर्वस्मिन्नधिकरणे ब्रह्मणोऽसाधारणधर्मदर्शनाद्विवक्षितोपाधिनोऽस्येवोपासना, न त्वादित्यशरीराभि-मानिनो जीवात्मन इति निरूपितम् । इदानीं त्वसाधारणधर्मदर्शनात् तदेवोद्गीथे सम्पाद्योपास्यत्वेनोपदि-
भामती-व्याख्या
और देवताओं की मनःकामना-पूर्ति एक मात्र परमेश्वर का कार्य है। समस्त जड़ और चेतन-वर्ग अत्यन्त परार्थ [ पराधीन अर्थात् परमेश्वर के अधीन ] है कि उसकी इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता—इस प्रकार अत्यन्त परार्थता के द्वारा परमेश्वर में निरङ्कुश शासकत्व सिद्ध होता है, उसके माध्यम से वहाँ परमेश्वर ही प्रधानतया प्रतिपाद्य सिद्ध होता है ॥ २०-२१ ॥
संगति—पूर्व अधिकरण में ब्रह्म के जिन सर्वात्मत्वादि असाधारण धर्मों के अनुरोध पर आदित्यादि उपाधियों के माध्यम से ब्रह्म की ही उपासना का निर्णय दिया गया, उन्हीं असाधारण धर्मों के अनुरोध पर इस अधिकरण में ब्रह्म की सम्पदुपासना का निश्चय किया जाता है।
संशय—"अस्य लोकस्य का गतिः ? आकाश इति होवाच । सर्वाणि ह वा इमानि
आकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३२९
इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवेभ्यो ज्याया- नाकाशः परायणम्' (छान्दो० १।९।१) इति। तत्र संशयः—किमाकाशशब्देन परं ब्रह्माभिधीयत उत भूताकाशमिति ? कुतः संशयः ? उभयत्र प्रयोगदर्शनात्। भूतवि- शेषे तावत्सुप्रसिद्धो लोकवेदयोराकाशशब्दः ब्रह्मण्यपि क्वचित्प्रयुज्यमानो दृश्यते । यत्र वाक्यशेषवशादसाधारणगुणश्रवणाद्वा निर्धारितं ब्रह्म भवति, यथा—'यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्' (तै० २।७) इति, 'आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद् ब्रह्म' (छा० ८।१४।१) इति चैवमादौ । अतः संशयः । किं पुनरत्र युक्तं ? भूताकाशमिति । कुतः ? तद्धि प्रसिद्धतरेण प्रयोगेण शीघ्रं बुद्धिमारोहति । न चाय- माकाशशब्द उभयोः साधारणः शक्यो विज्ञातुम्, अनेकार्थत्वप्रसङ्गात् । तस्माद् ब्रह्मणि गौण एवाकाशशब्दो भवितुमर्हति । विभुत्वादिभिर्हि बहुभिर्धर्मैः सदृशमाकाशेन ब्रह्म
भामती
इष्यते, न भूताकाश इति निरूप्यते । तत्र 'आकाश इति होवाच' इति किं मुख्याकाशपदानुरोधेन 'अस्य लोकस्य का गतिः' इति च 'सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि' इति च 'ज्यायान्' इति च 'परायणम्' इति च कथञ्चिद् व्याख्यायतामुततदनुरोधेनाकाशशब्दो भक्त्या परात्मनि व्याख्यायतामिति ? तत्र
प्रथमत्वात् प्रधानत्वादाकाशं मुख्यमेव नः।
तदानुगुण्येनैनान्यानि व्याख्येयानीति निश्चयः ॥
अस्य लोकस्य का गतिरिति प्रश्नोत्तरे 'आकाश इति होवाच' इत्याकाशस्य गतित्वेन प्रतिपाद्यतया प्राधान्यात्, 'सर्वाणि ह वा' इत्यादीनां तु तद्विशेषणतया गुणत्वात्, गुणे त्वन्यायकल्पनेति बहून्यप्यप्रधा- नानि प्रधानानुरोधेन नेतव्यानि । अपि च 'आकाश इति होवाच' इत्युत्तरे प्रथमावगतमाकाशपदमनुपजात-
भामती-व्याख्या
भूतानि आकाशादेव समुत्पद्यन्ते आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवेभ्यो ज्यायान् आकाशः परायणम्” (छां. १।९।१) इस श्रुति में क्या ‘आकाश’ पद के द्वारा मुख्य भूताकाश की विवक्षा और श्रुति-प्रतिपादित लोकाश्रयता, सर्वभूतोत्पादकत्व, सर्वतो ज्यायस्त्व एवं सर्वपरायणत्व का भूताकाश में कथंचित् सामञ्जस्य किया जाय ? अथवा ब्रह्म के लोका- श्रयत्वादि असाधारण धर्मों के अनुरोध पर ‘आकाश’ पद का ब्रह्म में गौण प्रयोग माना जाय ?
पूर्वपक्ष—
प्रथमत्वात् प्रधानत्वादाकाशं मुख्यमेव नः ।
तदानुगुण्येनैनान्यानि व्याख्येयानीति निश्चयः ॥
[ श्रुति में 'आकाश' पद प्रथम श्रुत होने के कारण असंजातविरोधी हैं, इतना ही नहीं, ‘अस्य लोकस्य का गतिः (आश्रयः ) ?' इस प्रश्न के उत्तर में लोकाश्रयत्वेन आकाश का निर्देश किया गया है—"आकाश इति होवाच"। इस प्रकार मुख्य प्रतिपाद्य वस्तु का समर्थक होने के कारण 'आकाश' पद अपने भूताकाश में रूढ़ है। "सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते" (छां. १।९।१) इत्यादि पद विशेषण और 'आकाश' पद विशेष्य है। विशेष्य प्रधान और विशेषण गौण होता है। प्रधान पद अभिधेय अर्थ का ही बोधक माना जाता है, किन्तु गौणीभूत पद लक्षणादि के द्वारा गौण अर्थ का भी उपस्थापक हो जाता है। "गुणे तु अन्यायकल्पना” (जै. सू. ९।३।१७) इस न्याय के आधार पर गौणी- भूत पदों की व्याख्या प्रधान पद के अनुसार ही करनी चाहिए ।
दूसरी बात यह भी है कि "आकाश इति होवाच" इस उत्तर-वाक्य में 'आकाश' पद
२३० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. २२
भवति । न च मुख्यसंभवे गौणोऽर्थो ग्रहणमर्हति । संभवति चेह मुख्यस्यैवाकाशस्य ग्रहणम् । ननु भूताकाशपरिग्रहे वाक्यशेषो नोपपद्यते--'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते' इत्यादिः । नैष दोषः, भूताकाशस्यापि वाय्वादिक्रमेण कारणत्वोपपत्तेः । विज्ञायते हि--'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः । आकाशाद्वायुः । वायोरग्निः' (तै० २।१) इत्यादि । ज्यायस्त्वपरायणत्वे अपि भूतान्तरापेक्षयोपपद्येते भूताकाशस्यापि । तस्मादाकाशशब्देन भूताकाशस्य ग्रहण
भामती
विरोधिस्त्वेन तदनुरक्तायां बुद्धौ यद्यदेव तदेव वाक्यगतमुपनिपतति तत्तदुपजातविरोधि तदानुगुण्येनैव व्यवस्थातुमर्हति । न च क्वचिदाकाशशब्दो भक्त्या ब्रह्मणि प्रयुक्त इति सर्वत्र तेन तत्परेण भवितव्यम् । न हि गङ्गायां घोष इत्यत्र गङ्गापवमनुपपश्या तीरपरमिति यादांसि गङ्गायामित्यत्राप्यनेन तत्परेण भवितव्यम् । सम्भवश्चोभयत्र तुल्यः । न च ब्रह्मण्यप्याकाशशब्दो मुख्यः, अनेकार्थत्वस्यान्याय्यत्वात् । भक्त्या च ब्रह्मणि प्रयोगोपपत्तेः । लोके चास्य नभसि निरूढतरत्वात् तत्पूर्वकत्वाच्च वेदार्थप्रतोतेर्विपरीत्यानुपपत्तेः । तदानुगुण्येन च 'सर्वाणि ह वा' इत्यादीनि भाष्यकृता स्वयमेव नीतानि । तस्माद् भूताकाशमेवात्रोपास्यत्वेनोपदिश्यते, न परमात्मेति प्राप्तम् ।
भामती-व्याख्या
प्रथम श्रुत होने के कारण असञ्जातविरोधी है अर्थात् उसके द्वारा अपने मुख्य अर्थ के बोधन में किसी प्रकार का विरोध उपस्थित नहीं होता, अतः यहाँ 'आकाश' पद बिना किसी विरोध के भूताकाश की अवगति करा देता है, क्योंकि प्रत्येक पद की अपने मुख्य अभिधेय अर्थ में संगति (शक्ति) गृहीत होती है, उस पद का श्रवण करते ही बुद्धि में उसका अभिधेय अर्थ तुरन्त उपस्थित हो जाता है। उस अर्थ के उपस्थित हो जाने पर विशेषण पदों के द्वारा विशेष्यार्थ के विरुद्ध अर्थ का बोधन नहीं किया जा सकता, अतः विशेषण पद सञ्जातविरोधी हो जाने के कारण लक्षणादि के द्वारा विशेष्यार्थ के अनुरूप ही अर्थ उपस्थित कराते हैं। यदि 'आकाश' पद कहीं पर परिस्थिति-वश गौणी वृत्ति के द्वारा ब्रह्म का उपस्थापक हो जाता है, तब वह सर्वत्र ब्रह्म का की बोधक होगा—ऐसा नियम कदापि नहीं किया जा सकता, क्योंकि 'गङ्गायां घोषः'—ऐसे प्रयोगों में 'गङ्गा' पद मुख्यार्थ की अनुपपत्ति के कारण तीर (तट) अर्थ का बोधक हो जाता है, तब क्या 'गङ्गायां यादांसि (जलीयजन्तवः) सन्ति'—इत्यादि प्रयोगों में भी 'गङ्गा' पद तींररूप अर्थ का ही उपस्थापक होगा ? कदापि नहीं, क्योंकि यहाँ 'जलप्रवाहे मत्स्यादयः सन्ति'—इस प्रकार के बोध में मुख्यार्थ की अनुपपत्ति न होने के कारण 'गङ्गा' पद अपने प्रवाहरूप मुख्यार्थ का ही बोधक होता है। 'गङ्गायां यादांसि' यहाँ मुख्यार्थ का अन्वय सम्भव और 'सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि आकाशादेव समुत्पद्यन्ते'—यहाँ पर मुख्यार्थ का अन्वय सम्भव नहीं—ऐसा नहीं, क्योंकि मुख्यार्थ के अनुरूप ही विशेषण पदों के द्वारा अर्थ की कल्पना करके मुख्यार्थ का अन्वय सर्वत्र सम्भव हो जाता है। एक ही 'आकाश' पद की भूताकाश और ब्रह्म—इन दोनों अर्थों में शक्ति नहीं मानी जा सकती, क्योंकि एक पद की अनेक अर्थों में शक्ति मानना संगत (न्यायोचित) नहीं होता। जब कि 'आकाश' पद के द्वारा गौणी वृत्ति से ब्रह्म में प्रयोग बन जाता है, तब उसमें उसकी शक्ति मानने की क्या आवश्यकता ? लोक में 'आकाश' पद नभ (भूताकाश) में ही निरुढ़तर है, अतः वेद में प्रयुक्त 'आकाश' पद के द्वारा भी भूताकाश का ही बोध होगा, श्री मण्डनमिश्र ने स्पष्ट कहा है—'लोकावगतसामर्थ्यः शब्दो वेदेऽपि बोधकः' (ब्र० सि० ३।२३)। अतः 'आकाश' पद ब्रह्म में रूढ़ और भूताकाश में गौण—ऐसी विपरीत कल्पना
आकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २३१
इत्येवं प्राप्ते ब्रूमः—
आकाशस्तल्लिङ्गात्' आकाशशब्देन ब्रह्मणो ग्रहणं युक्तम् । कुतः ? तल्लिङ्गात् । परस्य हि ब्रह्मण इदं लिङ्गम्—'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते' इति । परस्माद्धि ब्रह्मणो भूतानामुत्पत्तिरिति वेदान्तेषु मर्यादा । ननु भूताकाशस्यापि वाय्वादिक्रमेण कारणत्वं दर्शितम् । सत्यं दर्शितम्, तथापि मूलकारणस्य ब्रह्मणोऽपरिग्रहादाकाशादेवेत्यवधारणं, सर्वाणीति च भूतविशेषणं नानुकूलं स्यात् । तथा
भामती
एवं प्राप्तेऽभिधीयते—आकाशशब्देन ब्रह्मणो ग्रहणं, कुतः ? तल्लिङ्गात् । तथाहि—
सामानाधिकरण्येन प्रश्नतत्प्रतिवाक्ययोः ।
पौर्वापर्यपरामर्शात् प्रधानत्वेऽपि गौणता ॥
यद्यप्याकाशपदं प्रधानार्थं तथापि यत् पृष्टं तदेव प्रतिवक्तव्यं, न खल्वनुन्मत्त आम्रान् पृष्टः कोविदारानाचष्टे । तदिहास्य लोकस्य का गतिरिति प्रश्नो दृश्यमाननामरूपप्रपञ्चमात्रविषय इति तदनुरो-
भामती-व्याख्या
नहीं की जा सकती, क्योंकि लोक में वैसा नहीं देखा जाता । भूताकाश में भी सर्वभूतोत्पादकत्वादि का समन्वय स्वयं भाष्यकार ने दिखा दिया है, अतः यहाँ 'आकाश' पद के द्वारा भूताकाश का ही उपास्यत्वेन निर्देश पर्यवसित होता है ।
सिद्धान्त—कथित पूर्व पक्ष का खण्डन करते हुए सूत्रकार ने कहा है कि यहाँ 'आकाश' शब्द के द्वारा ब्रह्म का ग्रहण किया गया है, क्योंकि प्रक्रान्त प्रश्न और उत्तर वाक्यों का पर्यवसित सर्वभूतोपादानत्वरूप एकार्थरूप लिङ्ग ( ब्रह्म का असाधारण धर्म ) ब्रह्म का ही गमक है—
सामानाधिकरण्येन प्रश्नतत्प्रतिवाक्ययोः ।
पौर्वापर्यपरामर्शात् प्रधानत्वेऽपि गौणता ॥
[ "अस्य लोकस्य का गतिः" (छां. १।९।१) इस प्रश्न का यहाँ—"आकाश इति होवाच, सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते' (छां. १।९।१; यह उत्तर दिया गया है। प्रश्न और उसके प्रतिवाक्य (प्रतिवचन या उत्तर वाक्य) का सामानाधिकरण्य (एकार्थ-पर्यवसायित्व) नैसर्गिक है। प्रश्न सदैव पूर्व (पहले) किया जाता है और उसका उत्तर पश्चात् दिया जाता है। पूर्वोच्चरित वाक्य असञ्जातविरोधी और उत्तर-वाक्य पश्चाद्भावी होने से सञ्जातविरोधी होता है, अतः एव प्रश्न वाक्य का जो सहज सिद्ध अर्थ होता है, उसके साथ ताल-मेल रखते हुए ही उत्तर वाक्य का अर्थ किया जाता है, उसके लिए उत्तर-वाक्य के पदों की यदि लक्षणादि करनी पड़े, तो भी कोई दोष नहीं माना जाता । प्रकृत में सर्वलोकोपादानत्वविषयक प्रश्न किया गया, श्रुत्यादि प्रमाणों के द्वारा ब्रह्म में ही जगदुपादानत्व सिद्ध किया गया है, अतः उत्तर वाक्यगत ] 'आकाश' पद यद्यपि भूताकाश का प्रधानतया (रूढतया) बोधक होता है, तथापि यहाँ सञ्जातविरोधी होने के कारण गौणी वृत्ति के द्वारा ब्रह्म का ही उपस्थापक है, क्योंकि जो पूछा जाता है, वही कहना चाहिए, उन्मत्त (पागल) को छोड़ कर कोई समझदार व्यक्ति आम्र वृक्ष (आम) के विषय में पूछे जाने पर कोविदार (कचनार) की चर्चा नहीं करता । [ अनर्थ या असंगतार्थ के अभिधान पर उपालम्भ देते हुए महाभाष्यकार कहते हैं—"अन्यद्ब्रूवान् पृष्टोऽन्यदाचष्टे, आम्रान् पृष्टः कोविदारानाचष्टे" (पा. सू. १।२।४५)] । प्रकृत में "अस्य का गतिः?" ऐसा दृश्यमान नामरूपात्मक समस्त प्रपञ्च के आश्रय का प्रश्न किया गया, उसके अनुरूप जो समस्त प्रपञ्च
| २३२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. २२ |
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'आकाशं प्रत्यस्तं यन्ति' इति ब्रह्मलिङ्गं 'आकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम्' इति च ज्यायस्त्वपरायणत्वे । ज्यायस्त्वं ह्यनापेक्षिकं परमात्मन्येवैकस्मिन्नाम्नातम् - 'ज्यायान्पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षाज्ज्यायान्दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः' (छा० ३।१४।३) इति । तथा परायणत्वमपि परमकारणत्वात्परमात्मन्येवोपपन्नतरम् । श्रुतिश्च-
भामती
धात एव सर्वस्य लोकस्य गतिः, स एवाकाशशब्देन प्रतिवक्तव्यः । न च भूताकाशः सर्वस्य लोकस्य गतिः, तस्यापि लोकमध्यपतित्वात्, तदेव तस्य गतिरित्यनुपपत्तेः । न चोत्तरे भूताकाशश्रवणाद् भूताकाशकार्यमेव पृष्टमिति युक्तम् । प्रश्नस्य प्रथमावगतस्यानुपजातविरोधिनो लोकसामान्यविषयस्योपजातविरोधिनोत्तरेण सङ्कोचानुपपत्तेः, तदनुरोधेनोत्तरव्याख्यानात् । न च प्रश्नेन पूर्वपक्षरूपेणाव्यवस्थितार्थेनोत्तरं व्यवस्थितार्थं न शक्यं नियन्तुमिति युक्तम्, तन्निमित्तानामज्ञानसंशयविपर्ययाणामनवस्थानेऽपि तस्य स्वविषये व्यवस्थानात् । अन्यथोत्तरस्यानालम्बनत्वापत्तेर्वैयधिकरण्यापत्तेर्वा ।
अपि चोत्तरेऽपि बहुसमञ्जसम् । तथाहि - 'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते'
भामती - व्याख्या
का वस्तुतः उपादान है, उसी का 'आकाश' पद के द्वारा अभिधान करना चाहिए। भूताकाश समस्त जगत् का आश्रय नहीं, क्योंकि वह भी उपादेयभूत लोक या प्रपञ्च के अन्तर्गत है, वही उसका आश्रय हो ऐसा सम्भव नहीं।
शङ्का - प्रश्न और उत्तर की एकरूपता दो प्रकार से बन सकती है-(१) प्रश्न के अनुसार उत्तर की व्याख्या की जाय अथवा (२) उत्तर के अनुरूप प्रश्न वाक्य का अर्थ किया जाय। यहाँ उत्तर वाक्य में भूताकाश का अभिधान देख कर प्रश्न वाक्य का तात्पर्य केवल भूताकाशीय कार्य के आश्रय में किया जा सकता है, भूताकाश अपने को छोड़ कर अपने वायु आदि कार्य का आश्रय है ही, अतः 'आकाश' पद की ब्रह्म में गौणी वृत्ति मानने की क्या आवश्यकता ?
समाधान - यह कहा जा चुका है कि प्रश्न-वाक्य की उपस्थिति प्रथम होने के कारण उसका अपने लोक-प्रसिद्ध सामान्यतः समस्त प्रपञ्चोपादानत्वरूप मुख्यार्थ के बोधन में कोई विरोधी नहीं, अतः उस समय अनुत्पन्न और पश्चात् सञ्जात-विरोधी उत्तर-वाक्य के द्वारा प्रश्न-वाक्य के स्वाभाविक अर्थ में किसी प्रकार का संकोच नहीं किया जा सकता और उत्तर-वाक्य की व्याख्या पूर्वोत्पन्न प्रश्न-वाक्य के अनुरूप ही करनी होगी, फलतः 'आकाश' पद का ब्रह्म अर्थ करना न्यायोचित है ।
शङ्का - प्रश्न-वाक्य के अनुरोध पर उत्तर-वाक्य का नियमन सम्भव नहीं, क्योंकि प्रश्न-कर्ता के हृदय में जिस विषय का अज्ञान, संशय या विपर्यय होता है, वह उसी विषय का प्रश्न किया करता है, और उत्तर-वाक्य सदैव अपने विषय में व्यवस्थित होता है, अव्यवस्थितविषयक अत एव दुर्बल प्रश्न-वाक्य के अनुरोध पर व्यवस्थितविषयक उत्तर-वाक्य का अर्थ करना क्योंकर संभव होगा ?
समाधान - यद्यपि प्रश्न के उद्भावक अज्ञान, संशय और विपर्यय व्यवस्थित नहीं होते, तथापि प्रश्न का अपना विषय व्यवस्थित (निश्चित) होता है। यदि प्रश्न का कोई विषय नहीं, तब वह निर्विषयक हो जाता है और निर्विषयक प्रश्न कभी किया नहीं जा सकता, क्योंकि प्रश्न भी एक ऐसा वाक्य है, जिसका विषय जाने बिना वाक्य की रचना ही नहीं हो सकती और यदि प्रश्न भिन्नविषयक है, तब उत्तर-वाक्य से वैयधिकरण्य हो (ताल-मेल बिगड़) जाता है। अतः प्रश्न को अव्यवस्थितविषयक नहीं कहा जा सकता ।
आकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २३३
'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातेर्दातुः परायणम्' ( बृ० ३।९।२८ ) इति ।
अपि चान्तवत्त्वदोषेण शालावत्यस्य पक्षं निन्दित्वा, अनन्तं किञ्चिद्वक्तुकामेन
भामती
इति सर्वशब्दः कथञ्चिदल्पविषयो व्याख्येयः । एवमेवकारोऽप्यसमञ्जसः । न खल्वपामाकाश एव कारणम् अपि तु तेजोऽपि । एवमन्नस्यापि नाकाशमेव कारणम्, अपि तु पावकपाथसी अपि । मूलकारणविवक्षायान्तु ब्रह्मण्येवावधारणं समञ्जसम् । असमञ्जसन्तु भूताकाशे । एवं सर्वेषां भूतानां लयो ब्रह्मण्येव । एवं सर्वेभ्यो ज्यायस्त्वं ब्रह्मण एव । परमयनं ब्रह्मैव । तस्मात्सर्वेषां लोकानामिति प्रश्नेनोपक्रमाद्, उत्तरे च तत्तदसाधारणब्रह्मगुणपरामर्शात् , पृष्टायाश्च गतेः परमयनमित्यसाधारणब्रह्मगुणोपसंहारात् , भूयसीनां श्रुतीनामनुग्रहाय 'त्यजेदेकं कुलस्यार्थे' इतिवद् वरमाकाशपदमात्रमसमञ्जसमस्तु । एतावता हि बहु समञ्जसं स्यात् । न चाकाशस्य प्राधान्यमुत्तरे, किन्तु पृष्टार्थत्वादुत्तरस्य, लोकसामान्यगतेश्च पृष्टत्वाद्, परायणमिति च तस्यैवोपसंहाराद् ब्रह्मैव प्रधानम् । तथा च तदर्थं सदाकाशपदं प्रधानार्थं भवति, नान्यथा । तस्माद् ब्रह्मैव प्रधानमाकाशपदेनेहोपास्यत्वेनोपक्षिप्तं, न भूताकाशमिति सिद्धम् ।
भामती-व्याख्या
दूसरो बात यह है कि यहाँ उत्तर-वाक्य भी अव्यवस्थितविषयक नहीं, क्योंकि "सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि आकाशादेव समुत्पद्यन्ते, आकाशं प्रति अस्तं यन्ति, आकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम्" ( छां. १।९।१ ) इस वाक्य में 'सर्व' शब्द को तो भला "सर्वेभ्यो वै दर्शपूर्णमासौ" के समान कथंचित् अल्पविषयक ( केवल वाय्वादि कार्यपरक ) माना जा सकता है, किन्तु वह निसर्गतः प्राप्त सकलार्थ में असमञ्जस है, "आकाशादेव"—यहाँ पर एवकार भी अपने अन्ययोग-व्यवच्छेदरूप अर्थ में समंजस नहीं, क्योंकि जलादि कार्य का केवल आकाश ही कारण नहीं, अपितु तेज भी कारण है । अन्न ( पृथिवी ) का भी केवल आकाश कारण नहीं, अपितु तेज और जल भी उसके कारण माने जाते हैं । यदि यहाँ कारण पद से मूल कारण की विवक्षा की जाती है, तब ब्रह्म में ही अवधारण ( एवकारार्थ ) उपपन्न होता है । हाँ, भूताकाश में वह अवश्य असंगत है । सभी भूतों का अस्तंगमन ( लय ) भी ब्रह्म में ही होता है । सबकी अपेक्षा ज्यायस्त्व ( श्रेष्ठत्व ) ब्रह्म में ही है । सभी भूतों का परम अयन ( आश्रय ) ब्रह्म ही है । फलतः 'सर्वेषां लोकानाम्'—इस प्रकार के प्रश्न का उपक्रम, उत्तर-वाक्य में ब्रह्म के सर्वलोकाश्रयत्वरूप असाधारण धर्म का परामर्श और जिज्ञासित परम गति का "आकाशः परायणम्"—इस प्रकार उपसंहार देख कर 'आकाश' पद का ब्रह्म में तात्पर्य निश्चित होता है । ब्रह्मगत सर्वोपादानता की प्रतिपादिका अनेक श्रुतियों का सामंजस्य बनाए रखने के लिए एक 'आकाश' पद की मुख्यार्थता का बाध कर देना अनुचित नहीं, जैसे कि कहावत प्रचलित है—"त्यजेदेकं कुलस्यार्थे" [ श्री कुमारिलभट्टादि गम्भीर विचारकों का भी यही कहना है—"यत्र तु द्वयसन्निपातस्तत्रान्यतरेण कृतार्थत्वादवश्यावहेयेऽन्यतरस्मिन् भूयसामनुग्रहो युक्तः, त्यजेदेकं कुलस्यार्थे इति" ( तं. वा. पृ. ११६ ) ] । इस प्रकार अनेक पदों और अनेक श्रुतियों का सामंजस्य सुरक्षित हो जाता है ।
वस्तुतः उत्तर वाक्य में भी 'आकाश' ( भूताकाश ) प्रधान पदार्थ नहीं, क्योंकि उत्तर वाक्य सदैव प्रष्टव्यार्थपरक होता है, प्रष्टव्य है समस्त भूतों का आश्रय । 'परायणम्' यह पद भी उसी अर्थ का उपसंहारक है, अतः उत्तर वाक्य में भी ब्रह्म ही प्रधान अर्थ स्थिर होता है और 'आकाश' पद का भी तभी प्राधान्य माना जा सकता है, जब कि वह ब्रह्मपरक हो, अन्यथा नहीं । इस प्रकार 'आकाश' पद के द्वारा उपास्यत्वेन ब्रह्म ही उपक्षिप्त (उपस्थापित) है, भूताकाश नहीं—यह सिद्ध हो जाता है ।
३०
२३४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. २२
जैवलिना आकाशः परिगृहीतः, तं चाकाशमुद्गीथे संपाद्योपसंहरति — 'स एष परोव-रीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः' (छा० १।९।२) इति । तच्चानन्त्यं ब्रह्मलिङ्गम् । यत्पुनरुक्तं भूताकाशं प्रसिद्धिबलेन प्रथमतंर प्रतीयत इति, अत्र ब्रूमः — प्रथमतंर प्रतीतमपि सत् वाक्यशेषगतार्न्तरब्रह्मगुणान्वदृष्ट्वा न परिगृह्यते । दर्शितश्च ब्रह्मण्यप्याकाशशब्दः — 'आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता' इत्यादौ । तथाकाशपर्यायवाचिनामपि ब्रह्मणि प्रयोगो दृश्यते — 'ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः' (ऋ० सं० १।१६४।३९ ) 'सैषा भार्गवी वारुणी विद्या परमे व्योमन्प्रतिष्ठिता' ( तै० ३। १ ) 'ॐ कं ब्रह्म खं ब्रह्म' (छा० ४।१०।५) 'खं पुराणम्' (बृ० ५।१) इति चैवमादौ । वाक्योपक्रमेऽपि वर्तमानस्याकाशशब्दस्य वाक्यशेषवशाद्युक्ता ब्रह्मविषयत्वावधारणा । 'अग्निरधीतेऽनु-वाकम्' इति हि वाक्योपक्रमगतोऽप्यग्निशब्दो माणवकविषयो दृश्यते । तस्मादाकाश-शब्दं ब्रह्मेति सिद्धम् ॥ २२ ॥
भामती
❄ अपि च ❄ । अस्येवोपक्रमेऽन्तवत् किल ते सामेति ❄ अन्तवत्त्वदोषेण शालावत्यस्य इति ❄ । न चाकाशशब्दो गौणोऽपि विलम्बितप्रतिपत्तिः, तत्र तत्र ब्रह्मण्याकाशशब्दस्य तत्पर्यायस्य च प्रयोग-प्राचुर्यादत्यन्ताभ्यासेनास्यापि मुख्यवत् प्रतिपत्तेरविलम्बनादिति दर्शनाथं ब्रह्मणि प्रयोगप्राचुर्यं वैदिकं निदर्शितं भाष्यकृता । तत्रैव च प्रथमावगतानुगुण्येनोत्तरं नीयते, यत्र तदन्यथा कर्तुं शक्यम् । यत्र तु न शक्यं तत्रोत्तरानुगुण्येनैव प्रथमं नीयत इत्याह ❄ वाक्योपक्रमेऽपि इति ❄ ॥२२॥
भामती-व्याख्या
दूसरी बात यह भी है कि शालावत्य ऋषि ने जो अपना पक्ष प्रस्तुत किया—"अमुष्य लोकस्य का गतिरिति ? अयं लोक इति होवाच" ( छां. १।८।७ ) । उस पक्ष में दोष दिखाते हुए प्रवाहण जैवलि ने कहा—"अन्तवद्वै किल ते शालावत्य साम" ( छां. १।८।८ ) । इस शालावत्य के पक्ष में अन्तवत्त्व दोष दिखाकर किसी अनन्त तत्त्व की विवक्षा से जैवलि ने अपना पक्ष प्रस्तुत किया—"अस्य लोकस्य का गतिरिति ? आकाश इति होवाच" ( छां. १।९।१ ) । इतना ही नहीं, उक्त आकाश का उद्गीथ साम में सम्पादन करके कहा है—"स एष परावरीयानुद्गीथः, स एषोऽनन्तः" ( छां. १।९।२ ) । यदि यहाँ 'आकाश' पद से भूताकाश का ग्रहण किया जाता है, तब इस पक्ष में भी अन्तवत्त्व दोष बना रहता है, अतः "स एषोऽनन्तः" ऐसा आनन्त्याभिधान ब्रह्म का असाधारण धर्म होता हुआ 'आकाश' पद की ब्रह्मपरता का साधक है।
'आकाश' शब्द ब्रह्म में गौण होने पर भी ब्रह्म का बोध कराने में विलम्ब नहीं करता, क्योंकि "आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता" ( छां. ८।१४।१ ), "ऋचोऽक्षरे परमे व्योमनि" ( ऋ. सं. १।१६४।३९ ), 'सैषा भार्गवी वारुणी विद्या परमे व्योमन् प्रतिष्ठिता" ( तै. उ. ३।६ ), "कं ब्रह्म खं ब्रह्म" ( छां. ४।१०।५ ), "खं पुराणम्" ( बृह. उ. ५।१ ) इत्यादि अनेक स्थलों पर आकाश और उसके पर्याय-वाचक 'व्योमादि' पद ब्रह्म के लिए प्रयुक्त हुए हैं, अतः मुख्य 'ब्रह्म' पद के समान ही 'आकाशादि' गौण पद भी बिना विलम्ब के ही ब्रह्म के बोधक होते हैं।
प्रथमतः श्रुत प्रश्न-वाक्य के अनुसार वहीं उत्तर-वाक्य का अर्थ किया जाता है, जहाँ उत्तर-वाक्य का अर्थान्तर सम्भावित हो, प्रकृत में उत्तर वाक्यगत 'आकाश' पद "स एषोऽनन्तः
प्राणस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २३५
( ९ प्राणाधिकरणम् । सू० २३ )
अत एव प्राणः ॥ २३ ॥
उद्गीथे—'प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता' ( छां० १।१०।९ ) इत्युपक्रम्य श्रूयते—'कतमा सा देवतेति प्राण इति होवाच, सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता' ( छा० १।११।४,५ ) इति । तत्र संशयनिर्णयौ पूर्ववदेव द्रष्टव्यौ । 'प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः' ( छां० ६।८।२ ) 'प्राणस्य प्राणम्' ( बृ० ४।४।१८ ) इति चैवमादौ ब्रह्मविषयः प्राणशब्दो दृश्यते, वायुविकारे तु प्रसिद्धतरो लोकवेदयोः, अत इह प्राणशब्देन कतरस्योपादानं युक्तमिति भवति संशयः ।
किं पुनरत्र युक्तम् ? वायुविकारस्य पञ्चवृत्तेः प्राणस्योपादानं युक्तम् । तत्र हि
भामती
'उद्गीथे या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता' इत्युपक्रम्य श्रूयते—'कतमा सा देवतेति प्राण इति होवाचोषस्तिश्चाक्रायणः' उद्गीथोपासनप्रसङ्गेन प्रस्तावोपासनमप्युद्गीय इत्युक्तं भाष्यकृता । प्रस्ताव इति साम्नो भक्तिविशेषस्तमन्वायत्ता अनुगता प्राणो देवता । अत्र प्राणशब्दस्य ब्रह्मणि च वायुविकारे च दर्शनात् संशयः—किमयं ब्रह्मवचन उत वायुविकारवचन इति ?
तत्रात एव ब्रह्मलिङ्गादेव प्राणोऽपि ब्रह्मैव न वायुविकार इति युक्तम् । यद्येवं तेनैव गतार्थमेत-
भामती-व्याख्या
परोवरीयो हास्य भवति, परोवरीयसो लोकान् जयति” ( छां. १।९।२ ) इस अर्थवाद वाक्य से नियन्त्रित होकर ब्रह्मपरक ही है, भूताकाशपरक हो ही नहीं सकता, भाष्यकार ने स्पष्ट कहा है—“वाक्योपक्रमेऽपि वर्तमानस्य आकाशशब्दस्य वाक्यशेषवशाद् युक्ता ब्रह्मविषयत्वावधारणा” ॥ २२ ॥
संगति—पूर्वोक्त ‘आकाश' पद के समान ही 'प्राण' पद का प्रसङ्ग उपस्थित कर पूर्ववत् निर्णय दिया जाता है, इस प्रकार आतिदेशिकी संगति को सूत्रकार ने ही “अत एव” शब्द के द्वारा ध्वनित कर दिया है ।
विषय-वाक्य - [ साम एक वैदिक गीत या राग है, एक साम तीन ऋचाओं पर गाया जाता है। साम-गान करनेवाले तीन ऋत्विक् होते हैं—प्रस्तोता, उद्गाता, प्रतिहर्त्ता । एक-एक साम के पाँच भाग किए जाते हैं—( १ ) प्रस्ताव, ( २ ) उद्गीथ, ( ३ ) प्रतिहार, ( ४ ) उपद्रव और ( ५ ) निधन । प्रस्तावनामक प्रथम भाग का गान प्रस्तोता, उद्गीथसंज्ञक द्वितीय भाग का उद्गाता, प्रतिहाराख्य तृतीय भाग का गान प्रतिहर्त्ता, चतुर्थ और पञ्चम भाग का गान तीनों मिल कर करते हैं ] । उद्गीथ के प्रकरण में “या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता”—ऐसा प्रस्तावसंज्ञक साम का उपक्रम करके कहा गया है—“कतमा सा देवतेति प्राण इति होवाच उषस्त्यश्चाक्रायणः” ( छां. १।११।४ ) । यद्यपि यहाँ प्रस्ताव की उपासना अभिहित है, तथापि उद्गीथोपासना के प्रकरण में प्रस्ताव की उपासना का विधान उचित नहीं, अतः भाष्यकार ने 'उद्गीथे' कह दिया है । 'प्रस्ताव' साम की विशेष भक्ति ( भाग ) का नाम है, उस प्रस्ताव में प्राण देवता अन्वायत्त ( अनुगत ) है ।
संशय—'प्राण' शब्द ब्रह्म और शरीरगत वायु में प्रसिद्ध होने के कारण संशय हो जाता है कि यह 'प्राण' शब्द ब्रह्म का बोधक है ? अथवा शरीरगत वायु का वाचक है ?
पूर्वपक्ष—सूत्रकार ने जो सिद्धान्त किया है कि 'अत एव' ( ब्रह्म का साधारण
२३६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. २३
प्रसिद्धतरः प्राणशब्द इत्यवोचाम । ननु पूर्ववदिहापि तल्लिङ्गाद् ब्रह्मण एव ग्रहणं युक्तम् । इहापि वाक्यशेषे भूतानां संवेशनोद्गमनं पारमेश्वरं कर्म प्रतीयते, न; मुख्येऽपि प्राणे भूतसंवेशनोद्गमनस्य दर्शनात् । एवं ह्याम्नायते—'यदा वै पुरुषः स्वपिति प्राणं तर्हि वागप्येति प्राणं चक्षुः प्राणं श्रोत्रं प्राणं मनः', 'स यदा प्रबुध्यते प्राणादेवाधि पुनर्जा- यन्ते' (श० ब्रा० १०।३।३।६) इति । प्रत्यक्षं चैतत्,—स्वापकाले प्राणवृत्तावपरिलुप्य- मानायामिन्द्रियवृत्तयः परिलुप्यन्ते, प्रबोधकाले च पुनः प्रादुर्भवन्तीति । इन्द्रियसार- त्वाच्च भूतानामविरुद्धो मुख्ये प्राणेऽपि भूतसंवेशनोद्गमनवादी वाक्यशेषः । अपि चादित्योऽन्नं चोद्गीथप्रतिहारयोर्देवते प्रस्तावदेवतायाः प्राणस्यानन्तरं निर्दिश्येते ।
भामती
विति कोऽधिकरणान्तरस्यारम्भार्थः ? तत्रोच्यते— अर्थे श्रुत्येकगम्ये हि श्रुतिमेवाद्रियामहे । मानान्तरावगम्ये तु तद्वशात्तद्व्यवस्थितिः ॥
ब्रह्मणो वा सर्वभूतकारणत्वमाकाशस्य वा वाय्वादिभूतकारणत्वं प्रति नागमादृते मानान्तरं प्रभवति । तत्र पौर्वापर्यपर्यालोचनया यत्रार्थे समञ्जस आगमः स एवार्थस्तस्य गृह्यते, त्यज्यते चेतरः । इह तु संवेशनोद्गमने भूतानां प्राणं प्रत्युच्यमाने किं ब्रह्म प्रत्युच्येते आहो वायुविकारं प्रतीति विशये 'यदा वै पुरुषः स्वपिति प्राणं तर्हि वागप्येति' इत्यादिकायाः श्रुतेः सर्वभूतसारेन्द्रियसंवेशनोद्गमनप्रति- पादनद्वारा सर्वभूतसंवेशनोद्गमनप्रतिपादिकाया मानान्तरानुग्रहलब्धसामर्थ्याद्बलात्संवेशनोद्गमने वायुविकारस्यैव प्राणस्य, न ब्रह्मणः । अपि चात्रोद्गीथप्रतिहारयोः सामभक्त्योर्ग्रहणेऽन्ये आदित्यश्चान्नं च देवते अभिहिते कार्यकरणसङ्घातरूपे, तत्साहचर्यात् प्राणोऽपि कार्यकरणसङ्घातरूप एव देवता भवितु- मर्हति । निरस्तोऽप्ययमर्थ ईक्षत्यधिकरणे पूर्वोक्तपूर्वपक्षहेतूपोद्बलनाय पुनरुपन्यस्तः । तस्माद्वायुविकार
भामती-व्याख्या
धर्म) कीर्तित होने के कारण प्रक्रान्त प्राण भी ब्रह्म ही है। यदि यही मान लिया जाय, तब पूर्वोक्त आकाशाधिकरण से ही यह अधिकरण गतार्थ हो जाता है, अधिकरणान्तर के आरम्भ का क्या प्रयोजन ? अतः हमारा कहना है— अर्थे श्रुत्येकगम्ये हि श्रुतिमेवाद्रियामहे । मानान्तरावगम्ये तु तद्वशात् तद्व्यवस्थितिः ॥
अर्थात् ब्रह्म की सर्वभूत-कारणता और आकाशगत केवल वाय्वादि की कारणता श्रुत्येक-समधिगम्य है, प्रमाणान्तर के द्वारा अवगत नहीं, अतः ऐसे स्थल पर पौर्वापर्य-विचार से शास्त्र जिस पक्ष में समञ्जस (संगत) होता है, वही पक्ष उपादेय और पक्षान्तर त्याज्य होता है। किन्तु यहाँ जो समस्त भूतों का प्रवेश और उद्गमन कहा गया है—"सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते" (छां. १।११।४, ५), वह प्रवेश और उद्गमन शरीरगत वायुरूप प्राण के प्रति कहा जाता है ? अथवा ब्रह्म के प्रति ? इधर हम प्रत्यक्षरूप प्रमाणान्तर के द्वारा सुषुप्ति काल में देखते हैं कि भूतों के सारभूत इन्द्रियों का वायु-विकारात्मक प्राण में होता है और जागने पर प्राणों से ही उनका निर्गमन होता है, अतः यह निश्चित हो जाता है कि उक्त श्रुति का उपोद्वलक यही प्रत्यक्ष प्रमाण है। उसके आधार पर सर्व भूतों का प्रवेशाप्रवेश शरीरस्थ वायुरूप प्राण में ही स्थिर होता है, ब्रह्म में नहीं।
दूसरी बात यह भी है कि यहाँ उद्गीथ और प्रतिहाररूप साम-भागों के ब्रह्म से भिन्न आदित्य और अन्न देवता बताए गए हैं, जो कि कार्य-करण-संघातरूप (शरीरधारी) हैं। उनके सहचार से प्राण भी कार्यकारण-संघातरूप ही होना चाहिए। यद्यपि ईक्षत्यधिकरण
[ प्राणस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २३७
नच तयोर्ब्रह्मत्वमस्ति, तत्सामान्याच्च प्राणस्यापि न ब्रह्मत्वमित्येवं प्राप्ते सूत्रकार आह— 'अत एव प्राणः' इति। 'तल्लिङ्गाद्' इति पूर्वसूत्रे निर्दिष्टम्। अत एव तल्लिङ्गात्प्रा- णशब्दमपि परं ब्रह्म भवितुमर्हति। प्राणस्यापि हि ब्रह्मलिङ्गसंबन्धः श्रूयते—'सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते' (छा० १।११।५) इति। प्राणनिमित्तौ सर्वेषां भूतानामुत्पत्तिप्रलयावुच्यमानौ प्राणस्य ब्रह्मतां गमयतः। ननूक्तं — मुख्यप्राणपरिग्रहेऽपि संवेशनोद्गमनदर्शनमविरुद्धं, स्वापप्रबोधयो- र्दर्शनादिति। अत्रोच्यते—स्वापप्रबोधयोरिन्द्रियाणामेव केवलानां प्राणाश्रयं संवेश- नोद्गमनं दृश्यते, न सर्वेषां भूतानाम्। इह तु सेन्द्रियाणां सशरीराणां च जीवाविष्ठानां
भामती
एवात्र प्राणशब्दार्थ इति प्राप्तम्।
एवं प्राप्तेऽभिधीयते—
पुंवाक्यस्य बलीयस्त्वं मानान्तरसमागमात्।
अपौरुषेये वाक्ये तत्सङ्गतिः किं करिष्यति ॥
नो खलु स्वतःसिद्धप्रमाणभावमपौरुषेयं वचः स्वविषयज्ञानोत्पादे वा तद्व्यवहारे वा मानान्तर- मपेक्षते। तस्यापौरुषेयस्य निरस्तसमस्तदोषाशङ्कस्य स्वत एव निश्चायकत्वात्। निश्चयपूर्वकत्वाद् व्यवहारप्रवृत्तेः। तस्मादसंवादिनो वा चक्षुष इव रूपे त्वगिन्द्रियसम्वादिनो वा तस्यैव द्रव्ये नादाढर्यं दाढर्यं वा। तेन स्तामिन्द्रियमात्रसंवेशनोद्गमने वायुविकारे प्राणे, सर्वभूतसंवेशनोद्गमने तु न ततो
भामती-व्याख्या
में इस जड़कारणतावाद का भी खण्डन किया जा चुका है, तथापि पूर्वपक्ष के हेतु का
उपोहलन और प्रकारान्तर से उपन्यास करने के लिए फिर वही कह दिया गया है। फलतः
शरीरगत वायु ही यहाँ प्राण शब्द का अर्थ है।
सिद्धान्त—उक्त पक्ष का निरास करने के लिए कहा जाता है—
पुंवाक्यस्य बलीयस्त्वं मानान्तरसमागमात्।
अपौरुषेये वाक्ये तत्संगतिः किं करिष्यति॥
[ पुरुष-रचित वाक्यों का प्रामाण्य प्रमाणान्तर के संवाद पर निर्भर होता है, अतः उनके लिए अवश्य यह कहा जा सकता है कि प्रमाणान्तर से संवादित वाक्य उस पौरुषेय वाक्य से प्रबल होता है, जो प्रमाणान्तर से समर्थित नहीं होता किन्तु ] अपौरुषेय वाक्यों का प्रामाण्य प्रमाणान्तर-सापेक्ष न होकर स्वतः सिद्ध होता है, अपौरुषेय वाक्य न तो स्वविषय के ज्ञानोत्पादन में प्रमाणान्तर की अपेक्षा करता है और व्यवहाररूप अर्थ क्रिया के उत्पादन में। अपौरुषेय वाक्यों में किसी प्रकार के भ्रम, प्रमाद, करणापाटव और लिप्सादि दोषों की सम्भावना ही नहीं कि उनकी निवृत्ति के लिए उसको प्रमाणान्तर की अपेक्षा हो। वह स्वतः (अन्य-निरपेक्ष होकर) ही अपने विषय का निश्चायक होता है, निश्चय-पूर्वक व्यवहार में प्रवृत्ति होती है। जैसे चक्षु का रूप-ग्रहण में प्रमाणान्तर का संवाद नहीं होता, एतावता रूप-ग्रहण में अदाढर्य नहीं आता और चक्षु का ही घटादि द्रव्य के ग्रहण में त्वगिन्द्रिय का संवाद मिल जाने पर भी द्रव्य-ग्रहण में किसी प्रकार का दाढर्य नहीं माना जाता, वैसे ही अपौरुषेय वाक्य के द्वारा धर्मादि-ज्ञान के उत्पादन में प्रमाणान्तर का संवाद न होने के कारण धर्मादि-ज्ञान में किसी प्रकार का अदाढर्य और सुषुप्तद्यवस्थ प्राण में इन्द्रियों का प्रवेश और निर्गमन प्रमाणान्तर (प्रत्यक्ष) से संवादित होने पर भी प्रवेशाप्रवेश-ज्ञान में किसी प्रकार की विशेषता या दृढता नहीं मानी जाती। प्रत्यक्षावगत केवल इन्द्रियों का प्रवेश और निर्गमन भले ही शरीरस्थ वायुरूप प्राण में रहे, श्रुत्यभिहित समस्त भूतों का संवेशन और
| २३८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. २३ |
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भूतानां, ‘सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि’ ( छा० १।११।५) इति श्रुतेः। यदापि भूतश्रुतिर्महाभूतविषया परिगृह्यते, तदापि ब्रह्मलिङ्गत्वमविरुद्धम्। ननु सहापि विषयैरिन्द्रियाणां स्वापप्रबोधयोः प्राणेऽप्ययं प्राणाच्च प्रभवं शृणुमः—‘यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यथास्मिन् प्राण एवैकधा भवति तदैनं वाक् सर्वैर्नामभिः सहाप्येति’ (कौ० ३।३) इति। तत्रापि तल्लिङ्गात्प्राणशब्दं ब्रह्मैव। यत्पुनरुक्तम्— अन्नादित्यसंनिधानात्
भामती
वाक्यात्प्रतीयेते , प्रतीतौ वा तत्रापि प्राणो ब्रह्मैव भवेन्न वायुविकारः। 'यदा सुप्तः स्वप्नं न कञ्चन पश्यत्यथास्मिन् प्राण एवैकधा भवति' इत्यत्र वाक्ये यथा प्राणशब्दो ब्रह्मवचनः। न चास्मिन् वायुविकारे सर्वेषां भूतानां संवेशनोद्गमने मानान्तरेण दृश्येते । न च मानान्तरसिद्धसंवादेन्द्रियसंवेशनोद्गमनवाक्यदार्ढ्यात् सर्वभूतसंवेशनोद्गमनवाक्यं कथञ्चिदिन्द्रियविषयतया व्याख्यानमर्हति, स्वतःसिद्धप्रमाणभावस्य स्वभावदृढस्य मानान्तरानुपयोगात् । न चास्य तेनैकवाक्यता, एकवाक्यतायां वा तदपि ब्रह्मपरमेव स्यादित्युक्तम् । इन्द्रियसंवेशनोद्गमनं त्ववयुत्यानुवादेनाऽपि घटिष्यते । 'एकं वृणीते द्वौ वृणीते' इतिवत् ।
भामती-व्याख्या
उद्गमन तो प्राणों में नहीं देखा जाता। यदि माना जाता है, तब उस प्राण को भी ब्रह्म वैसे ही मानना होगा, वायुविकार नहीं, जैसे "यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यथास्मिन् प्राण एवैकधाभवति" (कौ. उ. ३।३) इस वाक्य में प्राण शब्द ब्रह्मपरक है। वायु-विकाररूप प्राण में न तो सभी भूतों का प्रवेश प्रत्यक्षादि प्रमाणान्तर से देखा जाता है, और न उससे उनका निर्गमन ।
शङ्का —प्राण में इन्द्रियों का प्रवेशाप्रवेश प्रत्यक्षादि प्रमाणान्तर से संवादित होने के कारण ऐसे श्रुति-वाक्य का प्रामाण्य दृढ़ हो जाता है। उसके अनुरोध पर सर्वभूत-प्रवेशाप्रवेश के प्रतिपादक श्रुति-वाक्य का तात्पर्य इन्द्रियों के प्रवेश और निर्गमन में क्यों न मान लिया जाय ?
समाधान —यह कहा जा चुका है कि वेद का प्रामाण्य स्वतः सिद्ध है, प्रमाणान्तर के संवाद से उसमें किसी प्रकार की दृढ़ता नहीं आती। अदृढ़ प्रामाण्य की दृढ़ता के सम्पादन में प्रमाणान्तर का संवाद उपयोगी हो सकता है, किन्तु वेद-वाक्य-जन्य ज्ञान का प्रामाण्य स्वभावतः दृढ़ होता है, अतः वहाँ प्रामाणान्तर के संवाद का वैसे ही कोई उपयोग नहीं, जैसे क्षुर की तीक्ष्णतम धार पर शाण-प्रयोग ।
दूसरी बात यह भी है कि एकवाक्यतापन्न उपक्रम के अनुरोध पर उपसंहार का संकोच माना जाता है। प्रकृत में इन्द्रियों के प्रवेश और उद्गमन का प्रतिपादक 'यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यथास्मिन् प्राणे एकधा भवति" (कौ. उ. ३।३) यह वाक्य संवर्ग विद्या में और सर्वभूत-प्रवेश-प्रतिपादक “सर्वाणि ह वा” (छां. १।११।४) यह वाक्य उद्गीथोपासना के प्रकरण में पठित है, अतः उनकी एकवाक्यता सम्भावित ही नहीं कि उपक्रम के अनुरोध पर उपसंहार की व्याख्या या संगमनिका की जाय । जिस वाक्य की एकवाक्यता मानी जाती है, उसका भी ब्रह्म में ही तात्पर्य पर्यवसित होता है—यह कहा जा चुका है। इन्द्रियों के संवेशन और निर्गमन का अन्वय अवयुत्यवाद की रीति से उपपन्न हो जायगा । [ श्रीशबरस्वामी कहते हैं— "यत्र परा संख्या कीर्त्यते, तत्रावयुत्यवादो भवति, यथा द्वादशकपाले यदष्टाकपालो भवति" (जै. सू. १।४।३५) । पुत्रोत्पत्ति होने पर वैश्वानरेष्टि की जाती है, उसका विधायक वाक्य है— "वैश्वानरं द्वादशकपालं निर्वपेत् पुत्रे जाते ! यदष्टाकपालो भवति गायत्रियैवैनं ब्रह्मवर्चसेन पुनाति, पञ्चकपालः त्रिवृतैवास्मिन् तेजो दधाति" (तै. सं.
प्राणस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २३९
प्राणस्याब्रह्मत्वमिति—'तदयुक्तम्, वाक्यशेषबलेन प्राणशब्दस्य ब्रह्मविषयतायां प्रतीयमानायां संनिधानस्याकिञ्चित्करत्वात् । यत्पुनः प्राणशब्दस्य पञ्चवृत्तौ प्रसिद्धतरत्वं, तदाकाशशब्दस्येव प्रतिविधेयम् । तस्मात्सिद्धं प्रस्तावदेवतायाः प्राणस्य ब्रह्मत्वम् ।
भामती
न तु सर्वशब्दार्थः सङ्कोचमर्हति । तस्मात् प्रस्तावभक्तिं प्राणशब्दाभिधेयब्रह्मदृष्ट्योपासीत, न वायुविकारदृष्ट्येति सिद्धम् । तथा चोपासकस्य प्राणप्राप्तिः कर्मसमृद्धिर्वा फलं भवतीति । ॐ वाक्यशेषबलेन इति ॐ ।
भामती-व्याख्या
२।२।५।३ )। यहाँ जिज्ञासा होती है कि द्वादशकपाल-संस्कृत पुरोडाशद्रव्यक इष्टि का विधान करने के अनन्तर जो कहा गया है—"यदष्टाकपालो भवति, यन्नवकपालः' इत्यादि, उसका प्रकृत में अन्वय क्योंकर होगा ? इस जिज्ञासा को शान्त करते हुए वार्तिककार कहते हैं—'वैश्वानरद्वादशकपालाधिकारे ह्यष्टत्वादय उच्चार्यमाणा, स्वरूपेणानुपयुज्यमानाः शक्तुवन्त्यवयवत्वं गमयितुम्” (तं. वा. पृ. १०९९)। द्वादश संख्या की घटकीभूत अष्टत्वादि संख्याएँ हैं, अतः द्वादश कपालों में संस्कृत पुरोडाश एक ऐसा अवयवी पदार्थ है, जिसके अष्टादिकपाल-संस्कृत पुरोडाश अवयव है, अतः अवयव-स्तुति के द्वारा अवयवी की स्तुति यहाँ विवक्षित है। वैसे ही ब्रह्म में सर्वभूतों का विलय और उद्भव होने से उनके अवयवभूत इन्द्रियादि का विलय और उद्भव अर्थ-प्राप्त है। उसी का अवयुत्य (विच्छिद्य) एकवाक्यता मानकर उत्थापित आकांक्षा के द्वारा स्वतन्त्रतया अन्वयाभिधान अवयुत्यवाद है। 'अवयुत्यानुवाद'—ऐसा पाठ भी उपलब्ध होता है, उसका भी यही आशय है कि ब्रह्म में जब सर्वभूतों का प्रवेशाप्रवेश अभिहित है, तब सर्व की घटकीभूत इन्द्रियादि प्रत्येक इकाई के अर्थ-प्राप्त प्रवेशाप्रवेश का अनुवाद इस वाक्य से विवक्षित है]। अवयुत्यवाद का स्पष्टीकरण करते हुए श्रीशबरस्वामी (जै.सू. ६।१।४३ में) कहते हैं—'त्रीन् वृणीते इति त्रित्वं विधास्यति, एकं वृणीते इत्यवयुत्यानुवादोऽयम्' (शा. भा. पृ. १३८४)। प्रायः सभी वैदिक कर्मों के आरंभ में जो संकल्प किया जाता है उसमें कर्त्ता पुरुष अपना नाम, गोत्र और प्रवर का उच्चारण करता हुआ प्रतिज्ञा करता है, जैसे—'अहं देवदत्तनामा, भारद्वाजगोत्रः, आङ्गिरसबार्हस्पत्यभारद्वाजाख्यत्रिप्रवरः एतत्कर्म करिष्ये'। किसी गोत्र में उत्पन्न हुए मन्त्र-द्रष्टा महर्षियों को प्रवर कहते हैं, किस गोत्र में कितने प्रवर हैं—यह प्रवराध्यायादि में वर्णित है। तीन प्रवरवाले व्यक्ति का श्रौतकर्म में अधिकार है—"त्रीन् प्रवरान् वृणीते”। त्रिप्रवरता की प्रशंसा के लिए कहा गया है—"एकं वृणीते, द्वौ वृणीते”। 'शते पञ्चाशत्'—इस न्याय के अनुसार तृत्व के द्वित्व और एकत्व घटक हैं, अतः जैसे अवयवों के द्वारा अवयवी की स्तुति यहाँ की जाती है, वैसे ही प्रकृत में इन्द्रियादि के प्रवेशन और निर्गमन के द्वारा समस्त भूतों के प्रवेशन और निर्गमन की स्तुति अभिवाञ्छित है। 'सर्व' शब्द का संकुचित अर्थ में तात्पर्य कभी निश्चित नहीं किया जा सकता। इस प्रकार यह सिद्ध हो जाता है कि प्राणशब्दाभिधेय ब्रह्म की दृष्टि (भावना) से साम के प्रस्तावरूप भाग की उपासना करनी चाहिए, शरीरस्थ वायुरूप प्राण की दृष्टि से नहीं। इस प्रकार की उपासना का फल है—प्राण-प्राप्ति या कर्म की समृद्धि, जैसा कि भाष्यकार ने कहा है—"प्रस्तावोद्गीथप्रतिहारभक्तीः प्राणादित्यान्नदृष्ट्योपासीतेति समुदायार्थः । प्राणाद्यापत्तिः कर्मसमृद्धिर्वा फलम्” (छां० पृ० ७१)। भाष्यकार कहते हैं—"यत्पुनरुक्तमत्रादित्यसन्निधानात् प्राणस्याब्रह्मत्वमिति, तदयुक्तम्, वाक्यशेषबलेन प्राणशब्दस्य ब्रह्मविषयतायां प्रतीयमानायां सन्निधानस्याकिञ्चित्करत्वात्” (ब्र. सू. १।१।२३) : यहाँ 'वाक्यशेष' शब्द