भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 255

[ प्राणस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २३७

नच तयोर्ब्रह्मत्वमस्ति, तत्सामान्याच्च प्राणस्यापि न ब्रह्मत्वमित्येवं प्राप्ते सूत्रकार आह— 'अत एव प्राणः' इति। 'तल्लिङ्गाद्' इति पूर्वसूत्रे निर्दिष्टम्। अत एव तल्लिङ्गात्प्रा- णशब्दमपि परं ब्रह्म भवितुमर्हति। प्राणस्यापि हि ब्रह्मलिङ्गसंबन्धः श्रूयते—'सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते' (छा० १।११।५) इति। प्राणनिमित्तौ सर्वेषां भूतानामुत्पत्तिप्रलयावुच्यमानौ प्राणस्य ब्रह्मतां गमयतः। ननूक्तं — मुख्यप्राणपरिग्रहेऽपि संवेशनोद्गमनदर्शनमविरुद्धं, स्वापप्रबोधयो- र्दर्शनादिति। अत्रोच्यते—स्वापप्रबोधयोरिन्द्रियाणामेव केवलानां प्राणाश्रयं संवेश- नोद्गमनं दृश्यते, न सर्वेषां भूतानाम्। इह तु सेन्द्रियाणां सशरीराणां च जीवाविष्ठानां

भामती

एवात्र प्राणशब्दार्थ इति प्राप्तम्।
एवं प्राप्तेऽभिधीयते—

पुंवाक्यस्य बलीयस्त्वं मानान्तरसमागमात्।
अपौरुषेये वाक्ये तत्सङ्गतिः किं करिष्यति ॥

नो खलु स्वतःसिद्धप्रमाणभावमपौरुषेयं वचः स्वविषयज्ञानोत्पादे वा तद्व्यवहारे वा मानान्तर- मपेक्षते। तस्यापौरुषेयस्य निरस्तसमस्तदोषाशङ्कस्य स्वत एव निश्चायकत्वात्। निश्चयपूर्वकत्वाद् व्यवहारप्रवृत्तेः। तस्मादसंवादिनो वा चक्षुष इव रूपे त्वगिन्द्रियसम्वादिनो वा तस्यैव द्रव्ये नादाढर्यं दाढर्यं वा। तेन स्तामिन्द्रियमात्रसंवेशनोद्गमने वायुविकारे प्राणे, सर्वभूतसंवेशनोद्गमने तु न ततो

भामती-व्याख्या

में इस जड़कारणतावाद का भी खण्डन किया जा चुका है, तथापि पूर्वपक्ष के हेतु का उपोहलन और प्रकारान्तर से उपन्यास करने के लिए फिर वही कह दिया गया है। फलतः शरीरगत वायु ही यहाँ प्राण शब्द का अर्थ है।
सिद्धान्त—उक्त पक्ष का निरास करने के लिए कहा जाता है—

पुंवाक्यस्य बलीयस्त्वं मानान्तरसमागमात्।
अपौरुषेये वाक्ये तत्संगतिः किं करिष्यति॥

[ पुरुष-रचित वाक्यों का प्रामाण्य प्रमाणान्तर के संवाद पर निर्भर होता है, अतः उनके लिए अवश्य यह कहा जा सकता है कि प्रमाणान्तर से संवादित वाक्य उस पौरुषेय वाक्य से प्रबल होता है, जो प्रमाणान्तर से समर्थित नहीं होता किन्तु ] अपौरुषेय वाक्यों का प्रामाण्य प्रमाणान्तर-सापेक्ष न होकर स्वतः सिद्ध होता है, अपौरुषेय वाक्य न तो स्वविषय के ज्ञानोत्पादन में प्रमाणान्तर की अपेक्षा करता है और व्यवहाररूप अर्थ क्रिया के उत्पादन में। अपौरुषेय वाक्यों में किसी प्रकार के भ्रम, प्रमाद, करणापाटव और लिप्सादि दोषों की सम्भावना ही नहीं कि उनकी निवृत्ति के लिए उसको प्रमाणान्तर की अपेक्षा हो। वह स्वतः (अन्य-निरपेक्ष होकर) ही अपने विषय का निश्चायक होता है, निश्चय-पूर्वक व्यवहार में प्रवृत्ति होती है। जैसे चक्षु का रूप-ग्रहण में प्रमाणान्तर का संवाद नहीं होता, एतावता रूप-ग्रहण में अदाढर्य नहीं आता और चक्षु का ही घटादि द्रव्य के ग्रहण में त्वगिन्द्रिय का संवाद मिल जाने पर भी द्रव्य-ग्रहण में किसी प्रकार का दाढर्य नहीं माना जाता, वैसे ही अपौरुषेय वाक्य के द्वारा धर्मादि-ज्ञान के उत्पादन में प्रमाणान्तर का संवाद न होने के कारण धर्मादि-ज्ञान में किसी प्रकार का अदाढर्य और सुषुप्तद्यवस्थ प्राण में इन्द्रियों का प्रवेश और निर्गमन प्रमाणान्तर (प्रत्यक्ष) से संवादित होने पर भी प्रवेशाप्रवेश-ज्ञान में किसी प्रकार की विशेषता या दृढता नहीं मानी जाती। प्रत्यक्षावगत केवल इन्द्रियों का प्रवेश और निर्गमन भले ही शरीरस्थ वायुरूप प्राण में रहे, श्रुत्यभिहित समस्त भूतों का संवेशन और