भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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२३८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. २३

भूतानां, ‘सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि’ ( छा० १।११।५) इति श्रुतेः। यदापि भूतश्रुतिर्महाभूतविषया परिगृह्यते, तदापि ब्रह्मलिङ्गत्वमविरुद्धम्। ननु सहापि विषयैरिन्द्रियाणां स्वापप्रबोधयोः प्राणेऽप्ययं प्राणाच्च प्रभवं शृणुमः—‘यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यथास्मिन् प्राण एवैकधा भवति तदैनं वाक् सर्वैर्नामभिः सहाप्येति’ (कौ० ३।३) इति। तत्रापि तल्लिङ्गात्प्राणशब्दं ब्रह्मैव। यत्पुनरुक्तम्— अन्नादित्यसंनिधानात्

भामती

वाक्यात्प्रतीयेते , प्रतीतौ वा तत्रापि प्राणो ब्रह्मैव भवेन्न वायुविकारः। 'यदा सुप्तः स्वप्नं न कञ्चन पश्यत्यथास्मिन् प्राण एवैकधा भवति' इत्यत्र वाक्ये यथा प्राणशब्दो ब्रह्मवचनः। न चास्मिन् वायुविकारे सर्वेषां भूतानां संवेशनोद्गमने मानान्तरेण दृश्येते । न च मानान्तरसिद्धसंवादेन्द्रियसंवेशनोद्गमनवाक्यदार्ढ्यात् सर्वभूतसंवेशनोद्गमनवाक्यं कथञ्चिदिन्द्रियविषयतया व्याख्यानमर्हति, स्वतःसिद्धप्रमाणभावस्य स्वभावदृढस्य मानान्तरानुपयोगात् । न चास्य तेनैकवाक्यता, एकवाक्यतायां वा तदपि ब्रह्मपरमेव स्यादित्युक्तम् । इन्द्रियसंवेशनोद्गमनं त्ववयुत्यानुवादेनाऽपि घटिष्यते । 'एकं वृणीते द्वौ वृणीते' इतिवत् ।

भामती-व्याख्या

उद्गमन तो प्राणों में नहीं देखा जाता। यदि माना जाता है, तब उस प्राण को भी ब्रह्म वैसे ही मानना होगा, वायुविकार नहीं, जैसे "यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यथास्मिन् प्राण एवैकधाभवति" (कौ. उ. ३।३) इस वाक्य में प्राण शब्द ब्रह्मपरक है। वायु-विकाररूप प्राण में न तो सभी भूतों का प्रवेश प्रत्यक्षादि प्रमाणान्तर से देखा जाता है, और न उससे उनका निर्गमन ।

शङ्का —प्राण में इन्द्रियों का प्रवेशाप्रवेश प्रत्यक्षादि प्रमाणान्तर से संवादित होने के कारण ऐसे श्रुति-वाक्य का प्रामाण्य दृढ़ हो जाता है। उसके अनुरोध पर सर्वभूत-प्रवेशाप्रवेश के प्रतिपादक श्रुति-वाक्य का तात्पर्य इन्द्रियों के प्रवेश और निर्गमन में क्यों न मान लिया जाय ?

समाधान —यह कहा जा चुका है कि वेद का प्रामाण्य स्वतः सिद्ध है, प्रमाणान्तर के संवाद से उसमें किसी प्रकार की दृढ़ता नहीं आती। अदृढ़ प्रामाण्य की दृढ़ता के सम्पादन में प्रमाणान्तर का संवाद उपयोगी हो सकता है, किन्तु वेद-वाक्य-जन्य ज्ञान का प्रामाण्य स्वभावतः दृढ़ होता है, अतः वहाँ प्रामाणान्तर के संवाद का वैसे ही कोई उपयोग नहीं, जैसे क्षुर की तीक्ष्णतम धार पर शाण-प्रयोग ।

दूसरी बात यह भी है कि एकवाक्यतापन्न उपक्रम के अनुरोध पर उपसंहार का संकोच माना जाता है। प्रकृत में इन्द्रियों के प्रवेश और उद्गमन का प्रतिपादक 'यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यथास्मिन् प्राणे एकधा भवति" (कौ. उ. ३।३) यह वाक्य संवर्ग विद्या में और सर्वभूत-प्रवेश-प्रतिपादक “सर्वाणि ह वा” (छां. १।११।४) यह वाक्य उद्गीथोपासना के प्रकरण में पठित है, अतः उनकी एकवाक्यता सम्भावित ही नहीं कि उपक्रम के अनुरोध पर उपसंहार की व्याख्या या संगमनिका की जाय । जिस वाक्य की एकवाक्यता मानी जाती है, उसका भी ब्रह्म में ही तात्पर्य पर्यवसित होता है—यह कहा जा चुका है। इन्द्रियों के संवेशन और निर्गमन का अन्वय अवयुत्यवाद की रीति से उपपन्न हो जायगा । [ श्रीशबरस्वामी कहते हैं— "यत्र परा संख्या कीर्त्यते, तत्रावयुत्यवादो भवति, यथा द्वादशकपाले यदष्टाकपालो भवति" (जै. सू. १।४।३५) । पुत्रोत्पत्ति होने पर वैश्वानरेष्टि की जाती है, उसका विधायक वाक्य है— "वैश्वानरं द्वादशकपालं निर्वपेत् पुत्रे जाते ! यदष्टाकपालो भवति गायत्रियैवैनं ब्रह्मवर्चसेन पुनाति, पञ्चकपालः त्रिवृतैवास्मिन् तेजो दधाति" (तै. सं.