भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्राणस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २३९
प्राणस्याब्रह्मत्वमिति—'तदयुक्तम्, वाक्यशेषबलेन प्राणशब्दस्य ब्रह्मविषयतायां प्रतीयमानायां संनिधानस्याकिञ्चित्करत्वात् । यत्पुनः प्राणशब्दस्य पञ्चवृत्तौ प्रसिद्धतरत्वं, तदाकाशशब्दस्येव प्रतिविधेयम् । तस्मात्सिद्धं प्रस्तावदेवतायाः प्राणस्य ब्रह्मत्वम् ।
भामती
न तु सर्वशब्दार्थः सङ्कोचमर्हति । तस्मात् प्रस्तावभक्तिं प्राणशब्दाभिधेयब्रह्मदृष्ट्योपासीत, न वायुविकारदृष्ट्येति सिद्धम् । तथा चोपासकस्य प्राणप्राप्तिः कर्मसमृद्धिर्वा फलं भवतीति । ॐ वाक्यशेषबलेन इति ॐ ।
भामती-व्याख्या
२।२।५।३ )। यहाँ जिज्ञासा होती है कि द्वादशकपाल-संस्कृत पुरोडाशद्रव्यक इष्टि का विधान करने के अनन्तर जो कहा गया है—"यदष्टाकपालो भवति, यन्नवकपालः' इत्यादि, उसका प्रकृत में अन्वय क्योंकर होगा ? इस जिज्ञासा को शान्त करते हुए वार्तिककार कहते हैं—'वैश्वानरद्वादशकपालाधिकारे ह्यष्टत्वादय उच्चार्यमाणा, स्वरूपेणानुपयुज्यमानाः शक्तुवन्त्यवयवत्वं गमयितुम्” (तं. वा. पृ. १०९९)। द्वादश संख्या की घटकीभूत अष्टत्वादि संख्याएँ हैं, अतः द्वादश कपालों में संस्कृत पुरोडाश एक ऐसा अवयवी पदार्थ है, जिसके अष्टादिकपाल-संस्कृत पुरोडाश अवयव है, अतः अवयव-स्तुति के द्वारा अवयवी की स्तुति यहाँ विवक्षित है। वैसे ही ब्रह्म में सर्वभूतों का विलय और उद्भव होने से उनके अवयवभूत इन्द्रियादि का विलय और उद्भव अर्थ-प्राप्त है। उसी का अवयुत्य (विच्छिद्य) एकवाक्यता मानकर उत्थापित आकांक्षा के द्वारा स्वतन्त्रतया अन्वयाभिधान अवयुत्यवाद है। 'अवयुत्यानुवाद'—ऐसा पाठ भी उपलब्ध होता है, उसका भी यही आशय है कि ब्रह्म में जब सर्वभूतों का प्रवेशाप्रवेश अभिहित है, तब सर्व की घटकीभूत इन्द्रियादि प्रत्येक इकाई के अर्थ-प्राप्त प्रवेशाप्रवेश का अनुवाद इस वाक्य से विवक्षित है]। अवयुत्यवाद का स्पष्टीकरण करते हुए श्रीशबरस्वामी (जै.सू. ६।१।४३ में) कहते हैं—'त्रीन् वृणीते इति त्रित्वं विधास्यति, एकं वृणीते इत्यवयुत्यानुवादोऽयम्' (शा. भा. पृ. १३८४)। प्रायः सभी वैदिक कर्मों के आरंभ में जो संकल्प किया जाता है उसमें कर्त्ता पुरुष अपना नाम, गोत्र और प्रवर का उच्चारण करता हुआ प्रतिज्ञा करता है, जैसे—'अहं देवदत्तनामा, भारद्वाजगोत्रः, आङ्गिरसबार्हस्पत्यभारद्वाजाख्यत्रिप्रवरः एतत्कर्म करिष्ये'। किसी गोत्र में उत्पन्न हुए मन्त्र-द्रष्टा महर्षियों को प्रवर कहते हैं, किस गोत्र में कितने प्रवर हैं—यह प्रवराध्यायादि में वर्णित है। तीन प्रवरवाले व्यक्ति का श्रौतकर्म में अधिकार है—"त्रीन् प्रवरान् वृणीते”। त्रिप्रवरता की प्रशंसा के लिए कहा गया है—"एकं वृणीते, द्वौ वृणीते”। 'शते पञ्चाशत्'—इस न्याय के अनुसार तृत्व के द्वित्व और एकत्व घटक हैं, अतः जैसे अवयवों के द्वारा अवयवी की स्तुति यहाँ की जाती है, वैसे ही प्रकृत में इन्द्रियादि के प्रवेशन और निर्गमन के द्वारा समस्त भूतों के प्रवेशन और निर्गमन की स्तुति अभिवाञ्छित है। 'सर्व' शब्द का संकुचित अर्थ में तात्पर्य कभी निश्चित नहीं किया जा सकता। इस प्रकार यह सिद्ध हो जाता है कि प्राणशब्दाभिधेय ब्रह्म की दृष्टि (भावना) से साम के प्रस्तावरूप भाग की उपासना करनी चाहिए, शरीरस्थ वायुरूप प्राण की दृष्टि से नहीं। इस प्रकार की उपासना का फल है—प्राण-प्राप्ति या कर्म की समृद्धि, जैसा कि भाष्यकार ने कहा है—"प्रस्तावोद्गीथप्रतिहारभक्तीः प्राणादित्यान्नदृष्ट्योपासीतेति समुदायार्थः । प्राणाद्यापत्तिः कर्मसमृद्धिर्वा फलम्” (छां० पृ० ७१)। भाष्यकार कहते हैं—"यत्पुनरुक्तमत्रादित्यसन्निधानात् प्राणस्याब्रह्मत्वमिति, तदयुक्तम्, वाक्यशेषबलेन प्राणशब्दस्य ब्रह्मविषयतायां प्रतीयमानायां सन्निधानस्याकिञ्चित्करत्वात्” (ब्र. सू. १।१।२३) : यहाँ 'वाक्यशेष' शब्द