भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 258, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें| २४० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. २३ |
|---|
अत्र केचिदुदाहरन्ति—'प्राणस्य प्राणम्' (बृ० ४।४।१८), 'प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः' (छा० ६।८।२) इति च—तदयुक्तम्, शब्दभेदात्प्रकरणाच्च संशयानुपपत्तेः। यथा पितुः पितेति प्रयोगेऽन्यः पिता षष्ठीनिर्दिष्टोऽन्यः प्रथमानिर्दिष्टः पितुः पितेति गम्यते, तद्वत् 'प्राणस्य प्राणम्' इति शब्दभेदात्प्रसिद्धात्प्राणादन्यः प्राणस्य प्राण इति निश्चीयते। न हि स एव तस्येति भेदनिर्देशार्हो भवति। यस्य च प्रकरणे यो निर्दिश्यते नामान्तरेणापि स एव तत्र प्रकरणी निर्दिष्ट इति गम्यते। यथा ज्योतिष्टोमाधिकारे—'वसन्ते वसन्ते ज्योतिषा यजेत' इत्यत्र ज्योतिःशब्दो ज्योतिष्टोमविषयो भवति, तथा परस्य ब्रह्मणः प्रकरणे 'प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः' (छा० ६।८।२) इति श्रुतः प्राणशब्दो वायुविकारमात्रं कथमवगमयेत् ? अतः संशयाविषयत्वान्नैतदुदाहरणं युक्तम्। प्रस्तावदेवतायां तु प्राणे संशयपूर्वपक्षनिर्णया उपपादिताः ॥ २३ ॥
भामती
वाक्यात् सन्निधानं दुर्बलमित्यर्थः। उदाहरणान्तरन्तु निगदव्याख्यातेन भाष्येण दूषितम् ॥ २३ ॥
भामती-व्याख्या
का अर्थ है—ब्रह्मलिङ्गक उपक्रम की एकवाक्यता। 'एकवाक्यता' शब्द से वाक्य प्रमाण विवक्षित है और 'सन्निधि' शब्द से स्थान प्रमाण। "श्रुतिलिङ्गवाक्यप्रकरणस्थानसमाख्यानां समवाये पारदौर्बल्यमर्थविप्रकर्षात्" (जै. सू. ३।३।१३) इस सूत्र में स्पष्ट कहा गया है कि पूर्व-पूर्व प्रमाणों की अपेक्षा उत्तरोत्तर प्रमाण दुर्बल होते हैं, अतः वाक्य की अपेक्षा स्थान का दुर्बल होना स्वाभाविक है, [ क्योंकि उत्तरोत्तर प्रमाण पूर्व-पूर्व की कल्पना करके ही विनियोजक माने जाते हैं, वाक्य प्रमाण को अपने पूर्ववर्ती केवल लिङ्ग और श्रुति—इन दो प्रमाणों की कल्पना करनी है और स्थान प्रमाण को 'प्रकरण, वाक्य लिङ्ग और श्रुति'—इन चार प्रमाणों की कल्पना करनी है, अतः कल्पना-लाघव के कारण वाक्य प्रमाण प्रबल और कल्पना-गौरव होने के कारण स्थान प्रमाण दुर्बल होता है, वार्तिककार कहते हैं—"यावदाकांक्षापूर्वकमेकवाक्यत्वादिकल्प्यते तावदितरेनानन्तर्यात्तु समानविषयत्वाच्च सामर्थ्यादि कल्पयित्वा विनियोगः कृत इति बलीयस्त्वम्" (तं. वा. पृ. ८३९) ]।
इस अधिकरण में वृत्तिकार ने जो "प्राणस्य प्राणम्" (बृह. उ. ४।४।१८) और "प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः" (छां. ६।८।२) इन दो वाक्यों का उदाहरण प्रस्तुत कर विचार किया है कि यहाँ 'प्राण' शब्द शरीरस्थ वायुरूप प्राण का बोधक है ? अथवा ब्रह्म का ? प्राण-बोधकता का पूर्वपक्ष उठा कर ब्रह्मपरता का सिद्धान्त स्थिर किया है। वह युक्ति-युक्त नहीं प्रतीत होता, क्योंकि उदाहृत दोनों वाक्यों में संशय ही नहीं बनता, 'पितुः पिता'—ऐसे सम्बन्धगर्भित वाक्य-प्रयोग में दोनों पितृपदार्थों की एकता सम्भव नहीं रहती, अत उनका भेद अनिवार्य है। "प्राणस्य प्राणः"—यहाँ षष्ठ्यन्त प्राणपदार्थ की अपेक्षा प्रथमान्त प्राणपदार्थ भिन्न ही मानना होगा, वह प्रकरण के आधार पर ब्रह्म ही निश्चित होता है, क्योंकि जिसके प्रकरण में जो निर्दिष्ट होता है, वही प्रकरणी पदार्थ ही विभिन्न नामों से विवक्षित होता है। ज्योतिष्टोमसंज्ञक कर्म के प्रकरण में पठित "वसन्ते-वसन्ते ज्योतिषा यजेत"—इस वाक्य में 'ज्योतिः' शब्द जैसे ज्योतिष्टोमपरक होता है, वैसे ही पर ब्रह्म के प्रकरण में पठित "प्राणबन्धनं सोम्य मनः"—इस श्रुति का घटकीभूत 'प्राण' शब्द ब्रह्म का वाचक न होकर वायु-विकारात्मक प्राण का बोधक क्योंकर होगा ? अतः जिस वाक्य में