भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २३१
इत्येवं प्राप्ते ब्रूमः—
आकाशस्तल्लिङ्गात्' आकाशशब्देन ब्रह्मणो ग्रहणं युक्तम् । कुतः ? तल्लिङ्गात् । परस्य हि ब्रह्मण इदं लिङ्गम्—'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते' इति । परस्माद्धि ब्रह्मणो भूतानामुत्पत्तिरिति वेदान्तेषु मर्यादा । ननु भूताकाशस्यापि वाय्वादिक्रमेण कारणत्वं दर्शितम् । सत्यं दर्शितम्, तथापि मूलकारणस्य ब्रह्मणोऽपरिग्रहादाकाशादेवेत्यवधारणं, सर्वाणीति च भूतविशेषणं नानुकूलं स्यात् । तथा
भामती
एवं प्राप्तेऽभिधीयते—आकाशशब्देन ब्रह्मणो ग्रहणं, कुतः ? तल्लिङ्गात् । तथाहि—
सामानाधिकरण्येन प्रश्नतत्प्रतिवाक्ययोः ।
पौर्वापर्यपरामर्शात् प्रधानत्वेऽपि गौणता ॥
यद्यप्याकाशपदं प्रधानार्थं तथापि यत् पृष्टं तदेव प्रतिवक्तव्यं, न खल्वनुन्मत्त आम्रान् पृष्टः कोविदारानाचष्टे । तदिहास्य लोकस्य का गतिरिति प्रश्नो दृश्यमाननामरूपप्रपञ्चमात्रविषय इति तदनुरो-
भामती-व्याख्या
नहीं की जा सकती, क्योंकि लोक में वैसा नहीं देखा जाता । भूताकाश में भी सर्वभूतोत्पादकत्वादि का समन्वय स्वयं भाष्यकार ने दिखा दिया है, अतः यहाँ 'आकाश' पद के द्वारा भूताकाश का ही उपास्यत्वेन निर्देश पर्यवसित होता है ।
सिद्धान्त—कथित पूर्व पक्ष का खण्डन करते हुए सूत्रकार ने कहा है कि यहाँ 'आकाश' शब्द के द्वारा ब्रह्म का ग्रहण किया गया है, क्योंकि प्रक्रान्त प्रश्न और उत्तर वाक्यों का पर्यवसित सर्वभूतोपादानत्वरूप एकार्थरूप लिङ्ग ( ब्रह्म का असाधारण धर्म ) ब्रह्म का ही गमक है—
सामानाधिकरण्येन प्रश्नतत्प्रतिवाक्ययोः ।
पौर्वापर्यपरामर्शात् प्रधानत्वेऽपि गौणता ॥
[ "अस्य लोकस्य का गतिः" (छां. १।९।१) इस प्रश्न का यहाँ—"आकाश इति होवाच, सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते' (छां. १।९।१; यह उत्तर दिया गया है। प्रश्न और उसके प्रतिवाक्य (प्रतिवचन या उत्तर वाक्य) का सामानाधिकरण्य (एकार्थ-पर्यवसायित्व) नैसर्गिक है। प्रश्न सदैव पूर्व (पहले) किया जाता है और उसका उत्तर पश्चात् दिया जाता है। पूर्वोच्चरित वाक्य असञ्जातविरोधी और उत्तर-वाक्य पश्चाद्भावी होने से सञ्जातविरोधी होता है, अतः एव प्रश्न वाक्य का जो सहज सिद्ध अर्थ होता है, उसके साथ ताल-मेल रखते हुए ही उत्तर वाक्य का अर्थ किया जाता है, उसके लिए उत्तर-वाक्य के पदों की यदि लक्षणादि करनी पड़े, तो भी कोई दोष नहीं माना जाता । प्रकृत में सर्वलोकोपादानत्वविषयक प्रश्न किया गया, श्रुत्यादि प्रमाणों के द्वारा ब्रह्म में ही जगदुपादानत्व सिद्ध किया गया है, अतः उत्तर वाक्यगत ] 'आकाश' पद यद्यपि भूताकाश का प्रधानतया (रूढतया) बोधक होता है, तथापि यहाँ सञ्जातविरोधी होने के कारण गौणी वृत्ति के द्वारा ब्रह्म का ही उपस्थापक है, क्योंकि जो पूछा जाता है, वही कहना चाहिए, उन्मत्त (पागल) को छोड़ कर कोई समझदार व्यक्ति आम्र वृक्ष (आम) के विषय में पूछे जाने पर कोविदार (कचनार) की चर्चा नहीं करता । [ अनर्थ या असंगतार्थ के अभिधान पर उपालम्भ देते हुए महाभाष्यकार कहते हैं—"अन्यद्ब्रूवान् पृष्टोऽन्यदाचष्टे, आम्रान् पृष्टः कोविदारानाचष्टे" (पा. सू. १।२।४५)] । प्रकृत में "अस्य का गतिः?" ऐसा दृश्यमान नामरूपात्मक समस्त प्रपञ्च के आश्रय का प्रश्न किया गया, उसके अनुरूप जो समस्त प्रपञ्च