भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २३२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. २२ |
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'आकाशं प्रत्यस्तं यन्ति' इति ब्रह्मलिङ्गं 'आकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम्' इति च ज्यायस्त्वपरायणत्वे । ज्यायस्त्वं ह्यनापेक्षिकं परमात्मन्येवैकस्मिन्नाम्नातम् - 'ज्यायान्पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षाज्ज्यायान्दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः' (छा० ३।१४।३) इति । तथा परायणत्वमपि परमकारणत्वात्परमात्मन्येवोपपन्नतरम् । श्रुतिश्च-
भामती
धात एव सर्वस्य लोकस्य गतिः, स एवाकाशशब्देन प्रतिवक्तव्यः । न च भूताकाशः सर्वस्य लोकस्य गतिः, तस्यापि लोकमध्यपतित्वात्, तदेव तस्य गतिरित्यनुपपत्तेः । न चोत्तरे भूताकाशश्रवणाद् भूताकाशकार्यमेव पृष्टमिति युक्तम् । प्रश्नस्य प्रथमावगतस्यानुपजातविरोधिनो लोकसामान्यविषयस्योपजातविरोधिनोत्तरेण सङ्कोचानुपपत्तेः, तदनुरोधेनोत्तरव्याख्यानात् । न च प्रश्नेन पूर्वपक्षरूपेणाव्यवस्थितार्थेनोत्तरं व्यवस्थितार्थं न शक्यं नियन्तुमिति युक्तम्, तन्निमित्तानामज्ञानसंशयविपर्ययाणामनवस्थानेऽपि तस्य स्वविषये व्यवस्थानात् । अन्यथोत्तरस्यानालम्बनत्वापत्तेर्वैयधिकरण्यापत्तेर्वा ।
अपि चोत्तरेऽपि बहुसमञ्जसम् । तथाहि - 'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते'
भामती - व्याख्या
का वस्तुतः उपादान है, उसी का 'आकाश' पद के द्वारा अभिधान करना चाहिए। भूताकाश समस्त जगत् का आश्रय नहीं, क्योंकि वह भी उपादेयभूत लोक या प्रपञ्च के अन्तर्गत है, वही उसका आश्रय हो ऐसा सम्भव नहीं।
शङ्का - प्रश्न और उत्तर की एकरूपता दो प्रकार से बन सकती है-(१) प्रश्न के अनुसार उत्तर की व्याख्या की जाय अथवा (२) उत्तर के अनुरूप प्रश्न वाक्य का अर्थ किया जाय। यहाँ उत्तर वाक्य में भूताकाश का अभिधान देख कर प्रश्न वाक्य का तात्पर्य केवल भूताकाशीय कार्य के आश्रय में किया जा सकता है, भूताकाश अपने को छोड़ कर अपने वायु आदि कार्य का आश्रय है ही, अतः 'आकाश' पद की ब्रह्म में गौणी वृत्ति मानने की क्या आवश्यकता ?
समाधान - यह कहा जा चुका है कि प्रश्न-वाक्य की उपस्थिति प्रथम होने के कारण उसका अपने लोक-प्रसिद्ध सामान्यतः समस्त प्रपञ्चोपादानत्वरूप मुख्यार्थ के बोधन में कोई विरोधी नहीं, अतः उस समय अनुत्पन्न और पश्चात् सञ्जात-विरोधी उत्तर-वाक्य के द्वारा प्रश्न-वाक्य के स्वाभाविक अर्थ में किसी प्रकार का संकोच नहीं किया जा सकता और उत्तर-वाक्य की व्याख्या पूर्वोत्पन्न प्रश्न-वाक्य के अनुरूप ही करनी होगी, फलतः 'आकाश' पद का ब्रह्म अर्थ करना न्यायोचित है ।
शङ्का - प्रश्न-वाक्य के अनुरोध पर उत्तर-वाक्य का नियमन सम्भव नहीं, क्योंकि प्रश्न-कर्ता के हृदय में जिस विषय का अज्ञान, संशय या विपर्यय होता है, वह उसी विषय का प्रश्न किया करता है, और उत्तर-वाक्य सदैव अपने विषय में व्यवस्थित होता है, अव्यवस्थितविषयक अत एव दुर्बल प्रश्न-वाक्य के अनुरोध पर व्यवस्थितविषयक उत्तर-वाक्य का अर्थ करना क्योंकर संभव होगा ?
समाधान - यद्यपि प्रश्न के उद्भावक अज्ञान, संशय और विपर्यय व्यवस्थित नहीं होते, तथापि प्रश्न का अपना विषय व्यवस्थित (निश्चित) होता है। यदि प्रश्न का कोई विषय नहीं, तब वह निर्विषयक हो जाता है और निर्विषयक प्रश्न कभी किया नहीं जा सकता, क्योंकि प्रश्न भी एक ऐसा वाक्य है, जिसका विषय जाने बिना वाक्य की रचना ही नहीं हो सकती और यदि प्रश्न भिन्नविषयक है, तब उत्तर-वाक्य से वैयधिकरण्य हो (ताल-मेल बिगड़) जाता है। अतः प्रश्न को अव्यवस्थितविषयक नहीं कहा जा सकता ।