भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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आकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २३३

'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातेर्दातुः परायणम्' ( बृ० ३।९।२८ ) इति ।
अपि चान्तवत्त्वदोषेण शालावत्यस्य पक्षं निन्दित्वा, अनन्तं किञ्चिद्वक्तुकामेन

भामती

इति सर्वशब्दः कथञ्चिदल्पविषयो व्याख्येयः । एवमेवकारोऽप्यसमञ्जसः । न खल्वपामाकाश एव कारणम् अपि तु तेजोऽपि । एवमन्नस्यापि नाकाशमेव कारणम्, अपि तु पावकपाथसी अपि । मूलकारणविवक्षायान्तु ब्रह्मण्येवावधारणं समञ्जसम् । असमञ्जसन्तु भूताकाशे । एवं सर्वेषां भूतानां लयो ब्रह्मण्येव । एवं सर्वेभ्यो ज्यायस्त्वं ब्रह्मण एव । परमयनं ब्रह्मैव । तस्मात्सर्वेषां लोकानामिति प्रश्नेनोपक्रमाद्, उत्तरे च तत्तदसाधारणब्रह्मगुणपरामर्शात् , पृष्टायाश्च गतेः परमयनमित्यसाधारणब्रह्मगुणोपसंहारात् , भूयसीनां श्रुतीनामनुग्रहाय 'त्यजेदेकं कुलस्यार्थे' इतिवद् वरमाकाशपदमात्रमसमञ्जसमस्तु । एतावता हि बहु समञ्जसं स्यात् । न चाकाशस्य प्राधान्यमुत्तरे, किन्तु पृष्टार्थत्वादुत्तरस्य, लोकसामान्यगतेश्च पृष्टत्वाद्, परायणमिति च तस्यैवोपसंहाराद् ब्रह्मैव प्रधानम् । तथा च तदर्थं सदाकाशपदं प्रधानार्थं भवति, नान्यथा । तस्माद् ब्रह्मैव प्रधानमाकाशपदेनेहोपास्यत्वेनोपक्षिप्तं, न भूताकाशमिति सिद्धम् ।

भामती-व्याख्या

दूसरो बात यह है कि यहाँ उत्तर-वाक्य भी अव्यवस्थितविषयक नहीं, क्योंकि "सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि आकाशादेव समुत्पद्यन्ते, आकाशं प्रति अस्तं यन्ति, आकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम्" ( छां. १।९।१ ) इस वाक्य में 'सर्व' शब्द को तो भला "सर्वेभ्यो वै दर्शपूर्णमासौ" के समान कथंचित् अल्पविषयक ( केवल वाय्वादि कार्यपरक ) माना जा सकता है, किन्तु वह निसर्गतः प्राप्त सकलार्थ में असमञ्जस है, "आकाशादेव"—यहाँ पर एवकार भी अपने अन्ययोग-व्यवच्छेदरूप अर्थ में समंजस नहीं, क्योंकि जलादि कार्य का केवल आकाश ही कारण नहीं, अपितु तेज भी कारण है । अन्न ( पृथिवी ) का भी केवल आकाश कारण नहीं, अपितु तेज और जल भी उसके कारण माने जाते हैं । यदि यहाँ कारण पद से मूल कारण की विवक्षा की जाती है, तब ब्रह्म में ही अवधारण ( एवकारार्थ ) उपपन्न होता है । हाँ, भूताकाश में वह अवश्य असंगत है । सभी भूतों का अस्तंगमन ( लय ) भी ब्रह्म में ही होता है । सबकी अपेक्षा ज्यायस्त्व ( श्रेष्ठत्व ) ब्रह्म में ही है । सभी भूतों का परम अयन ( आश्रय ) ब्रह्म ही है । फलतः 'सर्वेषां लोकानाम्'—इस प्रकार के प्रश्न का उपक्रम, उत्तर-वाक्य में ब्रह्म के सर्वलोकाश्रयत्वरूप असाधारण धर्म का परामर्श और जिज्ञासित परम गति का "आकाशः परायणम्"—इस प्रकार उपसंहार देख कर 'आकाश' पद का ब्रह्म में तात्पर्य निश्चित होता है । ब्रह्मगत सर्वोपादानता की प्रतिपादिका अनेक श्रुतियों का सामंजस्य बनाए रखने के लिए एक 'आकाश' पद की मुख्यार्थता का बाध कर देना अनुचित नहीं, जैसे कि कहावत प्रचलित है—"त्यजेदेकं कुलस्यार्थे" [ श्री कुमारिलभट्टादि गम्भीर विचारकों का भी यही कहना है—"यत्र तु द्वयसन्निपातस्तत्रान्यतरेण कृतार्थत्वादवश्यावहेयेऽन्यतरस्मिन् भूयसामनुग्रहो युक्तः, त्यजेदेकं कुलस्यार्थे इति" ( तं. वा. पृ. ११६ ) ] । इस प्रकार अनेक पदों और अनेक श्रुतियों का सामंजस्य सुरक्षित हो जाता है ।

वस्तुतः उत्तर वाक्य में भी 'आकाश' ( भूताकाश ) प्रधान पदार्थ नहीं, क्योंकि उत्तर वाक्य सदैव प्रष्टव्यार्थपरक होता है, प्रष्टव्य है समस्त भूतों का आश्रय । 'परायणम्' यह पद भी उसी अर्थ का उपसंहारक है, अतः उत्तर वाक्य में भी ब्रह्म ही प्रधान अर्थ स्थिर होता है और 'आकाश' पद का भी तभी प्राधान्य माना जा सकता है, जब कि वह ब्रह्मपरक हो, अन्यथा नहीं । इस प्रकार 'आकाश' पद के द्वारा उपास्यत्वेन ब्रह्म ही उपक्षिप्त (उपस्थापित) है, भूताकाश नहीं—यह सिद्ध हो जाता है ।

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