भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

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२३० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. २२

भवति । न च मुख्यसंभवे गौणोऽर्थो ग्रहणमर्हति । संभवति चेह मुख्यस्यैवाकाशस्य ग्रहणम् । ननु भूताकाशपरिग्रहे वाक्यशेषो नोपपद्यते--'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते' इत्यादिः । नैष दोषः, भूताकाशस्यापि वाय्वादिक्रमेण कारणत्वोपपत्तेः । विज्ञायते हि--'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः । आकाशाद्वायुः । वायोरग्निः' (तै० २।१) इत्यादि । ज्यायस्त्वपरायणत्वे अपि भूतान्तरापेक्षयोपपद्येते भूताकाशस्यापि । तस्मादाकाशशब्देन भूताकाशस्य ग्रहण


भामती

विरोधिस्त्वेन तदनुरक्तायां बुद्धौ यद्यदेव तदेव वाक्यगतमुपनिपतति तत्तदुपजातविरोधि तदानुगुण्येनैव व्यवस्थातुमर्हति । न च क्वचिदाकाशशब्दो भक्त्या ब्रह्मणि प्रयुक्त इति सर्वत्र तेन तत्परेण भवितव्यम् । न हि गङ्गायां घोष इत्यत्र गङ्गापवमनुपपश्या तीरपरमिति यादांसि गङ्गायामित्यत्राप्यनेन तत्परेण भवितव्यम् । सम्भवश्चोभयत्र तुल्यः । न च ब्रह्मण्यप्याकाशशब्दो मुख्यः, अनेकार्थत्वस्यान्याय्यत्वात् । भक्त्या च ब्रह्मणि प्रयोगोपपत्तेः । लोके चास्य नभसि निरूढतरत्वात् तत्पूर्वकत्वाच्च वेदार्थप्रतोतेर्विपरीत्यानुपपत्तेः । तदानुगुण्येन च 'सर्वाणि ह वा' इत्यादीनि भाष्यकृता स्वयमेव नीतानि । तस्माद् भूताकाशमेवात्रोपास्यत्वेनोपदिश्यते, न परमात्मेति प्राप्तम् ।


भामती-व्याख्या

प्रथम श्रुत होने के कारण असञ्जातविरोधी है अर्थात् उसके द्वारा अपने मुख्य अर्थ के बोधन में किसी प्रकार का विरोध उपस्थित नहीं होता, अतः यहाँ 'आकाश' पद बिना किसी विरोध के भूताकाश की अवगति करा देता है, क्योंकि प्रत्येक पद की अपने मुख्य अभिधेय अर्थ में संगति (शक्ति) गृहीत होती है, उस पद का श्रवण करते ही बुद्धि में उसका अभिधेय अर्थ तुरन्त उपस्थित हो जाता है। उस अर्थ के उपस्थित हो जाने पर विशेषण पदों के द्वारा विशेष्यार्थ के विरुद्ध अर्थ का बोधन नहीं किया जा सकता, अतः विशेषण पद सञ्जातविरोधी हो जाने के कारण लक्षणादि के द्वारा विशेष्यार्थ के अनुरूप ही अर्थ उपस्थित कराते हैं। यदि 'आकाश' पद कहीं पर परिस्थिति-वश गौणी वृत्ति के द्वारा ब्रह्म का उपस्थापक हो जाता है, तब वह सर्वत्र ब्रह्म का की बोधक होगा—ऐसा नियम कदापि नहीं किया जा सकता, क्योंकि 'गङ्गायां घोषः'—ऐसे प्रयोगों में 'गङ्गा' पद मुख्यार्थ की अनुपपत्ति के कारण तीर (तट) अर्थ का बोधक हो जाता है, तब क्या 'गङ्गायां यादांसि (जलीयजन्तवः) सन्ति'—इत्यादि प्रयोगों में भी 'गङ्गा' पद तींररूप अर्थ का ही उपस्थापक होगा ? कदापि नहीं, क्योंकि यहाँ 'जलप्रवाहे मत्स्यादयः सन्ति'—इस प्रकार के बोध में मुख्यार्थ की अनुपपत्ति न होने के कारण 'गङ्गा' पद अपने प्रवाहरूप मुख्यार्थ का ही बोधक होता है। 'गङ्गायां यादांसि' यहाँ मुख्यार्थ का अन्वय सम्भव और 'सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि आकाशादेव समुत्पद्यन्ते'—यहाँ पर मुख्यार्थ का अन्वय सम्भव नहीं—ऐसा नहीं, क्योंकि मुख्यार्थ के अनुरूप ही विशेषण पदों के द्वारा अर्थ की कल्पना करके मुख्यार्थ का अन्वय सर्वत्र सम्भव हो जाता है। एक ही 'आकाश' पद की भूताकाश और ब्रह्म—इन दोनों अर्थों में शक्ति नहीं मानी जा सकती, क्योंकि एक पद की अनेक अर्थों में शक्ति मानना संगत (न्यायोचित) नहीं होता। जब कि 'आकाश' पद के द्वारा गौणी वृत्ति से ब्रह्म में प्रयोग बन जाता है, तब उसमें उसकी शक्ति मानने की क्या आवश्यकता ? लोक में 'आकाश' पद नभ (भूताकाश) में ही निरुढ़तर है, अतः वेद में प्रयुक्त 'आकाश' पद के द्वारा भी भूताकाश का ही बोध होगा, श्री मण्डनमिश्र ने स्पष्ट कहा है—'लोकावगतसामर्थ्यः शब्दो वेदेऽपि बोधकः' (ब्र० सि० ३।२३)। अतः 'आकाश' पद ब्रह्म में रूढ़ और भूताकाश में गौण—ऐसी विपरीत कल्पना

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