भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआदित्यपुरुषस्य जीवत्वाशङ्काः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २२३
( ७ अन्तरधिकरणम् । २०–२१ )
अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ॥ २० ॥
इदमाम्नायते—'अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आ प्रणखात्सर्व एव सुवर्णः' 'तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी तस्योदिति नाम स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदित उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद' 'इत्यधिदैवतम्' ( छा० १।६।६,७,८ )। अथाध्यात्ममपि 'अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते' (छा० १।७।१,५) इत्यादि। तत्र संशयः—किं विद्याकर्मातिशयवशात्प्राप्तोत्कर्षः कश्चित्संसारी सूर्यमण्डले चक्षुषि चोपास्यत्वेन श्रूयते, किंवा नित्य-
भामती
विकारजातस्य सानन्दमयस्य ब्रह्म पुच्छं कारणमुच्येत 'इदं सर्वमसृजत, यदिदं किञ्च' इति श्रुत्या ? नह्यानन्दमयविकारावयवो ब्रह्मविकारः सन् सर्वस्य कारणमुपपद्यते । तस्मादानन्दमयविकारावयवो ब्रह्मेति तदवयवयोग्यानन्दमयो विकार इह नोपास्यत्वेन विवक्षितः, किन्तु स्वप्रधानमिह ब्रह्म पुच्छं ज्ञेयत्वेनेति सिद्धम् ।
पूर्वस्मिन्नधिकरणेऽपास्तसमस्तविशेषब्रह्मप्रतिपत्त्यर्थमुपायतामात्रेण पञ्च कोशा उपाधयः स्थिताः, न तु विवक्षिताः । ब्रह्मैव तु प्रधानं ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठेति ज्ञेयत्वेनोपक्षिसमिति निर्णीतम् । सम्प्रति तु ब्रह्म विवक्षितोपाधिभेदमुपास्यत्वेनोपक्षिप्यते, न तु विद्याकर्मातिशयलब्धोत्कर्षो जीवात्मादित्यपदवेदनीय इति
भामती-व्याख्या
'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा'—ऐसा पढ़ना चाहिए ॥ १८-१९ ॥ 'तद्धेतुव्यपदेशाच्च' । आनन्दमयरूप विकार का यदि ब्रह्म पुच्छरूप अवयव है, तब आनन्दमय-सहित समस्त विकारवर्ग की हेतुता का जो श्रुतियों में प्रतिपादन है—"इदं सर्वमसृजत, यदिदं किञ्च"। वह कैसे उपपन्न होगा ? क्योंकि आनन्दमयरूप विकार का अवयवभूत ब्रह्म समस्त जगत् का कारण नहीं हो सकता, अतः आनन्दमयात्मक विकार का अवयवरूप ब्रह्म यहाँ उपास्यत्वेन निर्दिष्ट है—ऐसा कहना संगत नहीं, किन्तु 'ब्रह्म पुच्छम्'—यहाँ मुख्यार्थक 'ब्रह्म' पद ज्ञेयभूत मुख्य ब्रह्म का बोधक है ॥ १९ ॥
संगति—विगत अधिकरण में समस्त उपाधियों से रहित निर्विशेष ब्रह्म की प्रतिपत्ति (ज्ञान) प्राप्त करने के लिए उपायभूत अन्नमयादि पाँच कोशों का उपस्थापक वाक्य-समूह प्रस्तुत किया गया, वहाँ कोशरूप उपाधियाँ विवक्षित नहीं, मान्त्रवर्णिक निर्विशेष ब्रह्म ही "ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा"—इस वाक्य के द्वारा निर्णीत हुआ, किन्तु इस अधिकरण में विवक्षित उपाधियों से युक्त ब्रह्म उपास्यत्वेन प्रस्तुत किया जाता है। आदित्य पद के द्वारा वह जीव प्रतिपादनीय नहीं माना गया, जिसने अपनी विद्या और धर्म के द्वारा परमोत्कर्ष का लाभ कर लिया हो। [उपासना का यह प्रस्तुतीकरण अपने तक ही सीमित नहीं, अपितु इसका उद्देश्य ब्रह्म-ज्ञान के पावन शिखर पर पहुँचना ही है, कल्पतरु की अधोलोक्ति तथ्यपूर्ण है—
निर्विशेषं परं ब्रह्म साक्षात्कर्तुमनीश्वराः।
ये मन्दास्तेऽनुकम्प्यन्ते सविशेषनिरूपणैः ॥ १ ॥
वशीकृते मनस्येषां सगुणब्रह्मशीलनात्।
तदेवाविर्भवेत् साक्षादपेतोपाधिकल्पनम् ॥ २ ॥ ] ।
संशय—"य एषोऽन्तरादित्ये पुरुषो दृश्यते" (छां. १।६।६) इत्यादि वाक्यों में क्या