भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआनन्दमयस्य ब्रह्मत्वम् ] हन्दीसहितभामतीसंवलितम् २२१
वानन्दमयेऽपि विकारार्थ एव मयड् विज्ञेयो न प्राचुर्यार्थः, सूत्राणि त्वेवं व्याख्येयानि— 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा' इत्यत्र किमानन्दमयावयवत्वेन ब्रह्म विवक्ष्यत उत स्वप्रधानत्वे- नेति ? पुच्छशब्दादवयवत्वेनेति प्राप्त उच्यते—'आनन्दमयोऽभ्यासात्' । आनन्दमय आत्मत्यत्र 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा' इति स्वप्रधानमेव ब्रह्मोपदिश्यते, अभ्यासात् । 'असन्नेव स भवति' इत्यस्मिन्निगमनश्लोके ब्रह्मण एव केवलस्याभ्यस्यमानत्वात् । 'विकारशब्दान्नेति चेन्न प्राचुर्यात्' । विकारशब्देनावयवशब्दोऽभिप्रेतः । पुच्छमित्य- वयवशब्दान्न स्वप्रधानत्वं ब्रह्मण इति यदुक्तं, तस्य परिहारो वक्तव्यः । अत्रोच्यते— नायं दोषः, प्राचुर्यादप्यवयवशब्द्रोपपत्तेः । प्राचुर्यं प्रायापत्तिः, अवयवप्राये वचन- मित्यर्थः । अन्नमयादीनां हि शिरआदिषु पुच्छान्तेष्ववयवेषूक्तेष्वानन्दमयस्यापि शिरआदीन्यवयवान्तराण्युक्त्वाऽवयवप्रायापत्त्या 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा' इत्याह, नावयव- विवक्षया । यत्कारणमभ्यासादिति स्वप्रधानत्वं ब्रह्मणः समर्थितम् । 'तद्धेतुव्यपदे-
भामती-व्याख्या
'आत्मा' पद के द्वारा उल्लेख किया गया है, जो कि पुँल्लिङ्ग है । यह भृगु-द्वारा प्राप्त और वरुणोपदिष्ट विद्या में कहा गया है—"आनन्दं ब्रह्मेति व्यजानात्" ( तै. उ. ३।६ ) । वहाँ 'मयट्' का निर्देश नहीं, अतः आनन्द में ब्रह्मरूपता वहाँ सम्भव है । ब्रह्म में उपाधि का योग जब तक न हो, तब तक प्रियशिरस्त्वादि का सम्बन्ध स्थापित नहीं हो सकता । यहाँ सोपाधिक या सविशेष ब्रह्म विवक्षित नहीं कि प्रियशिरस्त्वादि का योग मान लिया जाता, क्योंकि "यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह" ( तै. उ. २।४।१ ) इत्यादि वाक्यों के द्वारा निर्विशेष ब्रह्म का प्रकरण अवधारित है । फलतः अन्नमयादि वाक्यों में जैसे 'मयट्' विकारार्थक है, वैसे ही 'आनन्दमय' शब्द में भी विकारपरक मयट् मानना ही न्याय-संगत है, प्राचुर्यार्थक नहीं । श्रुति का ऐसा तात्पर्य मानने पर इस अधिकरण के सूत्रों का जो विरोध होता है, उसकी निवृत्ति के लिए गौणी वृत्ति या लक्षणादि के द्वारा सूत्रों की अन्यथा व्याख्या कर लेनी चाहिए, क्योंकि ब्रह्मावगति में श्रुति-वाक्य प्रधान कारण है और सूत्र-वाक्य अप्रधान या गौण साधन, अत एव महर्षि जैमिनि ने मुख्य शब्दों की लक्षणादि न मान कर गौणीभूत पदों की ही लक्षणा को न्यायोचित ठहराया है—"गुणे तु अन्यायकल्पना" ( जै. सू. १।३।१५ ) । वार्तिककार भी कहते हैं—
वैदिकं जैमिनीयं च यत्र वाक्यं विरुध्यते ।
अध्याहारादिभिः सूत्रं वैदिकं तु यथाश्रुतम् ॥ ( श्लो. वा. पृ. १५ )
लक्षणादि के द्वारा सूत्रों का तात्पर्य ऐसा पर्यवसित होता है—'आनन्दमय' शब्द की "ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा"—इस वाक्य के घटकीभूत 'ब्रह्म' पद में लक्षणा की जाती है । आशय यह है कि 'आनन्दमय' इत्यादि वाक्यों में जो "ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा"—यहाँ प्रयुक्त 'ब्रह्म' पद मुख्यार्थक है, अतः वहाँ श्रुति को 'ब्रह्म अधिकरणम्'—ऐसा कहना चाहिए था, किन्तु वैसा न कह कर जो 'ब्रह्म पुच्छम्'—ऐसा कहा गया है, उसका कारण यह है कि पूर्व- वाक्यों में अवयवार्थक पदों का प्रयोग सन्निहित था, अतः सन्निधान के अनुरोध से अवयवा- र्थक 'पुच्छ' पद का प्रयोग कर दिया गया, किन्तु इसकी भी अधिकरण में लक्षणा की जा सकती है, [ अतः "आनन्दमयोऽभ्यासात्" इस सूत्र का अर्थ यह पर्यवसित होता है कि आनन्दमयपदोपलक्षित "ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा"—इस वाक्य का घटकीभूत 'ब्रह्म' पद अपने ब्रह्मात्मक मुख्यार्थ का ही बोधक है, क्योंकि 'असन्नेव स भवति असद् ब्रह्मेति वेद चेद"