भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआदित्यपुरुषस्येश्वरत्वम् ] | हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् | २३७
वाक्प्राणाद्यात्मके चाध्यात्ममनुक्रम्याह- 'तस्यर्क्च साम च गेष्णौ' इत्यधिदैवतम्। तथाऽध्यात्ममपि- 'यावमुष्य गेष्णौ तौ गेष्णो' इति। तच्च सर्वात्मन एवोपपद्यते। 'तद्य इमे वीणायां गायन्त्येतं ते गायन्ति तस्मात्ते धनसनयः' (छा० १।७।६) इति च लौकिकेष्वपि गानेष्वस्यैव गीयमानत्वं दर्शयति। तच्च परमेश्वरपरिग्रहे घटते, 'यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम्' (गी.१०।४१) इति भगवद्गीतादर्शनात्। लोककामेशितृत्वमपि निरङ्कुशं श्रूयमाणं परमेश्वरं
भामती
कायनिर्माणेन वा, तद्विकारतया वा सर्वस्य कार्यजातस्य, विकारस्य च विकारवतोऽनन्यत्वान्मायावश्वरूपभेदेनोपविश्यते, यथा 'सर्वगन्धः सर्वरसः' इति। न च ब्रह्मनिर्मितं मायारूपमनुवदच्छास्त्रमशास्त्रं भवति। अपि तु तां कुर्वदिति नाशास्त्रत्वप्रसङ्गः। यत्र तु ब्रह्म निरस्तसमस्तोपाधिभेदं ज्ञेयत्वेनोपदिश्यते, तत्र शास्त्रम् 'अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम्' इति प्रवर्तते। तस्माद्रूपवत्त्वमपि परमात्मन्युपपद्यते, एतेनैव मर्यादाधारभेदावपि व्याख्यातौ। अपि चादित्यदेहाभिमानिनः संसारिणोऽन्तर्यामी भेदेनोक्तः, स एवान्तरादित्य इत्यन्तः श्रुतिसाम्येन प्रत्यभिज्ञायमानो भवितुमर्हति। ॐ तस्मात्ते धनसनयः इति ॐ। धनवन्तो विभूतिमन्त इति यावन् कस्मात् पुनर्विभूतिमत्त्वं परमेश्वरपरिग्रहे घटत इत्यत आह ॐयद्यद्विभूतिमद् इतिॐ। सर्वात्मकत्वेऽपि विभूतिमत्स्वेव परमेश्वररूपाभिव्यक्तिः, न त्वविद्यातमःपिहितपरमेश्वरस्वरूपेष्वविभूति-
भामती-व्याख्या
(छां. ३।१४।४)। "हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेशः" (छां. १।७ १) ऐसा शास्त्र ब्रह्म-निर्मित माया रूप (मिथ्या रूप) का अनुवाद मात्र करता है, अतः अशास्त्र या अप्रमाण नहीं कहा जा सकता। हाँ, यदि वह नीरूप ब्रह्म में रूपवत्ता की माया बुद्धि (मिथ्या बुद्धि) को जन्म देता, तब वह अवश्य अशास्त्र हो जाता, किन्तु जब वह माया-द्वारा पूर्वोत्पादित कार्य का अनुवाद मात्र करता है, तब उसमें अशास्त्रत्व (अप्रमाणत्व) प्रसक्त क्यों होगा? जहाँ समस्त उपाधि-रहित ज्ञेय ब्रह्म का प्रसङ्ग है, वहाँ शास्त्र वस्तु-स्थिति पर पूर्ण प्रकाश डालता है—"अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम्" (कठो. १।३।१५ । फलतः ब्रह्म में रूपवत्ता की उपपत्ति हो जाती है। इसी प्रकार "स एष ये चामुष्प्रात् पराञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे" (छां. १।६।८) और "य एषोऽन्तरादित्ये" (छां. १।६।६) इत्यादि शास्त्रों के द्वारा प्रदर्शित मर्यादा और आधार की उपपत्ति भी औपाधिकरूप से ब्रह्म में हो जाती है। दूसरी बात यह भी है कि आदित्य-शरीराभिमानी जीव से भिन्न जो अन्तर्यामी के रूप में प्रदर्शित है—"एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः" (बृह. उ. ३।७।३)। वही "अन्तरादित्ये"—यहाँ प्रत्यभिज्ञात होता है, क्योंकि 'अन्तः' शब्द समानरूप से उभयत्र प्रयुक्त हुआ है, अतः अन्तर्यामी पदार्थ की ही यहाँ प्रत्यभिज्ञा होती है। [उसी परमेश्वर का अधिदेवत (देव-सम्बन्धी आदित्यादि प्रतीक में) ध्यान और अध्यात्म (यहाँ 'आत्मा' शब्द शरीर का बोधक है, अतः शरीर-सम्बन्धी प्राणादि में) उपासना प्रतिपादित है। उसी का गुण-गान वीणा में होता है, अत एव गायक-गण धनसनय हो जाते हैं]। धनसनय का अर्थ धनवान् या विभूतिमान् होता है। गायकों में विभूतिमत्त्व की उपपत्ति परमेश्वर के गान से क्यों? इस प्रश्न का उत्तर है—"तच्च परमेश्वरपरिग्रह एव घटते, 'यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ।। (गी. १०।४१) इति भगवद्गीतादर्शनात्"। यद्यपि ब्रह्मसर्वात्मक है, तथापि भूतिमान् (ऐश्वर्य-सम्पन्न) पदार्थों में ही उसकी अभिव्यक्ति होती है, अविद्यारूपी घोरान्धकार से जिन पदार्थों में परमेश्वर का स्वरूप आवृत्त (आच्छन्न) होता है, ऐसे अविभूतिमान् पदार्थों में परमेश्वर अभिव्यक्त नहीं होता। ऊर्ध्वादि लोकों का निरंकुश शासन