भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २२६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. २० |
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उदितः' इति सर्वपाप्मापगमेन निर्वक्ति । तदेव च कृतनिर्वचनं नामाक्षिपुरुषस्याप्य- तिदिशति— 'यन्नाम तन्नाम' इति । सर्वपाप्मापगमश्च परमात्मन एव श्रूयते— 'य आत्माऽपहतपाप्मा' ( छा० ८।७।१ ) इत्यादौ । तथा चाक्षुषे पुरुषे 'सैवर्त्तत्साम तदुक्थं तद्यजुस्तद्ब्रह्म' इत्यृक्सामाद्यात्मकतां निर्धारयति । सा च परमेश्वरस्योपप- द्यते, सर्वकारणत्वात्सर्वात्मकत्वोपपत्तेः । पृथिव्यग्न्याद्यात्मके चाधिदैवतं ऋक्सामे,
भामती
सर्वपाप्मविरहः प्राग्भवीयधर्माधर्म रूपपाप्मसम्भवे सति । न चैतेषां प्राग्भवीयो धर्म एवास्ति, न पाप्मेति साम्प्रतम्, विद्याकर्मातिशयसमुदाचारेऽप्यनादिभवपरम्परोपार्जितानां पाप्मनामपि प्रसुप्तानां सम्भवात् । न च श्रुतिप्रामाण्यादादित्यशरीराभिमानिनः सर्वपाप्मविरह इति युक्तम्, ब्रह्मविषयत्वेनाप्यस्याः प्रामाण्यो- पपत्तेः । न च विनिगमनायां हेत्वभावः, तत्र तत्र सर्वपाप्मविरहस्य भूयो भूयो ब्रह्मण्येव श्रवणात् । तस्यैव चेह प्रत्यभिज्ञायमानस्य विनिगमनाहेतोर्विद्यमानत्वात् । अपि च सर्वात्म्यं जगत्कारणस्य ब्रह्मण एवोप- पद्यते । कारणावभेदात् कार्यजातस्य, ब्रह्मणश्च जगत्कारणत्वात् । आदित्यशरीराभिमानिनस्तु जीवात्मनो न जगत्कारणत्वम् । न च मुख्यार्थसम्भवे प्राशस्त्यलक्षणा स्तुत्यर्थता युक्ता । रूपवत्त्वञ्चास्य परानुग्रहाय
भामती-व्याख्या
का निर्वचन प्रस्तुत किया गया है— “स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः” ( छां. १।६।७ ) अर्थात् समस्त पापरूप अपादान से उदित या विमुक्त होने के कारण उसका 'उद्' यह नाम पड़ गया है। आदित्याभिमानी देवता में समस्त पाप-निवृत्ति सम्भव नहीं, क्योंकि यद्यपि देवता अपने वर्तमान जन्म में कर्म का अधिकारी न होने से पापार्जन नहीं कर सकता, तथापि उसके पूर्वजन्मार्जित पाप की सम्भावना बनी है, सर्वथा पापों की निवृत्ति ब्रह्म में ही घटती है। 'आदित्यादि देवगणों में पूर्वजन्मार्जित धर्म ही होता है, अधर्म या पाप नहीं'— ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि देवताओं में विद्या या धर्म का अतिशय अवश्य अपने कार्य में पूर्ण सक्षम होता है, किन्तु अनादि पूर्व जन्मों के अधर्म या पाप भी प्रसुप्त या अक्षम अवस्था में रहते हैं, जैसा कि योग-भाष्यकार कहते हैं— “क्लेशकर्मविपाकानुभवनििमित्ताभिस्तु वासनाभिरनादिकाल-सम्म्मूच्छितमिदं चित्रं चित्रीकृतमिव सर्वतो मत्स्यजालं ग्रन्थिभिरिवाततम्” ( यो० सू० २।१३ )।
शङ्का— जब श्रुति आदित्य-पुरुष के लिए कहती है कि “स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः” ( छां० १।६।७ ) तब श्रुति का प्रामाण्य इसी में है कि आदित्य-पुरुष सर्वथा निष्पाप होता है।
समाधान— उक्त श्रुति को यदि ब्रह्म के पाप्म-विरह का प्रतिपादक माना जाता है, तब भी उसका प्रामाण्य अक्षुण्ण रहता है। विनिगमनाभाव की भी शङ्का नहीं की जा सकती, क्योंकि ब्रह्म में ही बार-बार सर्वपाप्म-विरह प्रतिपादित है, अन्यत्र नहीं।
सर्वात्मत्व का सामञ्जस्य वस्तुतः ब्रह्म में ही होता है, अन्यत्र नहीं, क्योंकि ब्रह्म ही जगत् का कारण है। कार्य और कारण का अभेद होता है, आदित्य-पुरुष एक जीव है, जगत् का कारण नहीं हो सकता, अतः सर्वात्मक क्योंकर होगा? जब ब्रह्मगत मुख्य सर्वात्मत्व उपपन्न हो जाता है, तब आदित्याभिमानी जीव में स्तुत्यर्थक गौण सर्वात्मत्व की कल्पना संगत नहीं। ईश्वर सर्वशक्ति-सम्पन्न है सङ्कल्पमात्र से ऐसे शरीरों का निर्माण कर लेता है, जिसमें स्वर्णमय केशादि का समन्वय हो सकता है, वैसे शरीरों का धारण ईश्वर अपने भक्तों का उद्धार करने के लिए किया ही करता है। समस्त कार्य और विकार-वर्ग रूपवान् है एवं विकार-वर्ग अपने कारण से अभिन्न होता है, अतः विकारगत रूपादिमत्ता का व्यवहार कारणीभूत ईश्वर में वैसे ही हो जाता है, जैसे— “सर्वकर्मा, सर्वकामः, सर्वगन्धः, सर्वरसः”